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यकीन मानिए,वो गे नहीं है

Posted On 10:24 am by विनीत कुमार |


रात के खाने के बाद अक्सर वो किसी न किसी बहाने मेरे पास रुकने की कोशिश किया करता। कभी कहता-भैय्या,अब रात में कार्यालय कौन जाए तो कभी कहता- इकॉनमिक्स में कुछ समझना है तो कभी कहता-नीचे ही बिछाकर सो जाएंगे,आप अपने बेड पर ही सोइएगा।

दिनभर की पढ़ाई और कॉलेज की थकान के बाद उसका आना मुझे अच्छा ही लगता कि चलो कोई तो बोलने बतियाने के लिए मिल जाता है। लेकिन पता नहीं क्यों,दिनभर कोई मुझसे कितनी भी बातें क्यों न कर ले, देर रात तक कितनी गप्पें न लडा ले,अपने यहां किसी का रातभर के लिए रुकना मुझे जरा भी अच्छा नहीं लगता। मैं नहीं चाहता कि कोई रात में मेरे यहां रुके। लेकिन वो रात में मेरे यहां रुकना चाहता औऱ मैं उसे किसी न किसी तरह वापस कार्यालय भेजना चाहता।

उसने मैट्रिक की पढ़ाई अपने घर पर ही रहकर की औऱ आगे वो बिगड़ न जाए इसकी चिंता से उसके मां-बाप ने उसे कार्यालय में भेज दिया। वैसे कार्यालय में रहने का नियम होता है कि आपके उपर जब तक किसी तरह की जिम्मेदारी नहीं है,आप लंबे समय तक वहां रुक नहीं सकते। वो जिस समय कार्यालय में रहने आया उसके पास कोई जिम्मेदारी नहीं थी। वैसे भी वो विचारधारा के प्रसार के लिए नहीं बल्कि पढ़ने आया था। लेकिन धीरे-धीरे उसे किसी न किसी काम में लगाया जाने लगा। महीना दो महीना होते-होते वो कार्यालय के काम में इतनी बुरी तरह फंस गया कि कोई भी देखता तो कहता कि ये भी औरों की तरह सबकुछ छोड़-छाड़कर सपनों का भारत बनाने की तैयारी में है। वैसे देखा जाए तो ऑफिसीयली अभी भी उसे कुछ भी नहीं करना होता। सब काम के लिए लोग लगे होते लेकिन उसके शब्दों में कहें तो- भइया इससे लाख गुणा अच्छा होता कि हम कॉलोनी जाकर दो-चार बच्चों को ट्यूशन पढ़ा लेते या फिर फोटो मशीन की दुकान में पांच-छह घंटे काम कर लेते। दिनभर किसी न किसी के आगे-पीछे डोलते ही रहना पड़ता है।

एक रात मैंने लगभग झिड़कते हुए कहा- वो सब तो ठीक है कि तुम दिनभर की परेशानी मुझे बता जाते हो,वो भी ऐसी जगह की परेशानी जिसे कि मैं अपने स्तर से दूर नहीं कर सकता लेकिन ये रात में आकर क्यों रुकने की बात करते हो। सच कहूं दोस्त, बुरा मत मानना, तू दिनभर मेरे कमरे में रह ले लेकिन रात में मुझे किसी का रुकना जरा भी अच्छा नहीं लगता। मैं देर रात तक जागता हूं और अपने उपर समय देता हूं। रात में किसी के रुकने से खलल पड़ जाती है। इसके पहले भी मैं उसे कुछ न कुछ कह दिया करता औऱ वो डर लगता है जाने में...और भी कुछ न कुछ कहकर बात टाल जाता। आज वो फफक-फफककर रोने लग गया।

आपको क्या लगता है भइया कि हम शौक से रुकते हैं,अब हम क्या बताएं आपको। कार्यालय में विचारधारा को मजबूत करनेवाले एक महाशय हैं। लोग उनका सम्मान करते हैं। रोज रात उनके सिर में दर्द होता है। सिरदर्द न भी हो तो प्यास लग जाती है। हमें बुलाते हैं और कभी शीशी और कभी पानी लेकर उनके पास जाता हूं। कुछ देर इधर-उधर की बातें करते हैं और फिर कहते हैं- यहीं बिछाकर सो जाओ। मैं कहता हूं-नहीं,बाहर बरामदे में सोता हूं मैं। कभी आदेश के लहजे में,कभी थोड़ा डांटते हुए और कभी-कभी घिघिआने के अंदाज में ऐसा कहते हैं। शुरु-शुरु में तो मैं एक-दो बार सो गया। अभी सोए थोड़ी ही देर हुए कि देखा कि हमें सहला रहे हैं। पहले तो अच्छा लगा कि इस अंजान शहर में कोई हमें पिता का प्यार दे रहा है,मुझे लगा कि उस अंधेरे में ही उठकर उनका पैर छू लूं। लेकिन फिर वो मुझे अपनी तरफ खींचने लगे। उसके बाद...छी..रहने दीजिए भइया। हांफती हुई सांसों में मुझे पिता के स्नेह से ज्यादा सालों से गंधा रहे किसी हवशी का सडांध महसूस हुआ,मैं बाहर आ गया। मैं दिन में भी उनकी नजरों से बचने लग गया। उनके सामने पड़ना ही नहीं चाहता। कभी रोते हुए,कभी सिसकियां लेके हुए वो सबकुछ एक सांस में बोल गया।

अब लोग मुझे देखकर फुसफुसाते हैं। मेरी उम्र के लोग मुझे देखकर मुस्कराते हैं। कोई कहता है- उसे जानते हो,बहुत अच्छा मालिश करता है और फिर ठहाके लगाने लग जाता है। कहते हैं अब मुझे कोई बसंती और बिजुरिया की जरुरत नहीं है,मेरा काम ऐसे ही चल जाएगा।....

ऐसे समय में मुझे मैंला आंचल की लक्ष्मी दासी याद आती है। धीरज धरो सेवादास,बोलती हुई लक्ष्मी। कभी कठोर,कभी लाचार होकर रोती हुई लक्ष्मी। रात के सन्नाटे में रोज अपने को बचाने की जद्दोजहद से लड़ती हुई लक्ष्मी। चित्रलेखा याद आती है। दुनियाभर की बदनामी से मुक्त होने के लिए आश्रम का शरण लेनेवाली चित्रलेखा। उपन्यास और सिनेमा के चरित्रों के बीच जब-तब वो भी याद आता है लेकिन अफसोस कि वो कभी अकेले याद नहीं आता। लगता है कतार के कतार चले आ रहे है उसी की शक्ल में,उसी की तरह मासूमियत लिए...और भी कई,सैंकड़ों,हजारों। अच्छा बनने,सामाजिक बनने,बिगड़ जाने के डर से बुजुर्गों के बीच रहने। इस बात से अंजान की सेवादास की तरह लाखों लोगों के सिर पर हवश सवार है जो लक्ष्मी से दूर रहकर और भी ज्यादा खूंखार होते चले जाते हैं।
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4 Response to 'यकीन मानिए,वो गे नहीं है'
  1. जितेन्द़ भगत
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/07/blog-post_05.html?showComment=1246774667141#c164563808301731282'> 5 जुलाई 2009 को 11:47 am

    आपने इस मुद्दे के मनोवैज्ञानि‍क पक्ष्‍ा को सही उभारा है।

     

  2. उपाध्यायजी(Upadhyayjee)
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/07/blog-post_05.html?showComment=1246780946448#c2175488787515311487'> 5 जुलाई 2009 को 1:32 pm

    Sarkar ko bahut soch samajh kar faisla lena chahiye. Peechhle din main pink shirt pahan kar office chala gaya. Mere ek colleague ne bataya ki America me pink shirt walo ko log gay samajhte hain. So I am scared to you. Maine kaha ki yaar ye India hai. Lekin ab to wo logic bhi nahin chalega. Ab kitna savdhani baratani padegi ek ees 377 ke chakkar me.

     

  3. Near to Earth
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/07/blog-post_05.html?showComment=1246793660338#c353641404848495697'> 5 जुलाई 2009 को 5:04 pm

    dr saheb kya likha hai....

     

  4. निशांत मिश्र - Nishant Mishra
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/07/blog-post_05.html?showComment=1246813733949#c281857757066181261'> 5 जुलाई 2009 को 10:38 pm

    बहुत बढ़िया लिखा, विनीत. मुझे भी भोपाल में मेरे दोस्त-यार बचाते फिरते थे ऐसे-ऐसे अंकलों के चक्कर में पड़ने से. आज तो वो सब सोचकर बहुत हंसी आती है!:)

     

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