.

मीडिया कोर्स कर रहे हमारे साथी इस खबर से हुलसते कि इसके पहले ही सरकार ने उस पर मठ्ठा घोलने का काम कर दिया। लम्बे समय के सरकारी झोल-झाल के बाद इस बात पर विचार किया गया कि अब जल्द ही निजी एफएम चैनलों पर खबरें प्रसारित होंगी। लेकिन इसमें सरकार की तरफ से लोचा लगा दिया गया है कि चैनल जो भी खबरें प्रकाशित करेगें वो इसे या तो एजेंसियों से लेगें या फिर सरकारी संगठनों से। खबरों के लिए चैनल अपनी तरफ से रिपोर्टर्स नहीं रखेंगे। यानि निजी एफएम चैनलों पर खबरें तो होंगी लेकिन रिपोर्टर्स नहीं। सरकार रिपोर्टर्सविहीन चैनल की बात कर रही है।
जाहिर है सरकार ने ये फैसला निजी समाचार चैनलों के रवैये को ध्यान में रखकर लिया है। निजी समाचार चैनल जिस तरह से खबर के नाम पर भूत-प्रेत, इश्क-मोहब्बत और पाखंड फैलाने का काम करते हैं, ये स्थिति किसी भी वेलफेयर स्टेट की सरकार के लिए परेशानी पैदा करनेवाली हो सकती है. ये अलग बात है कि सरकार को इससे ज्यादा परेशानी चैनलों की उन गतिविधियों से होती है जिसमें वो जनता यानि ऑडिएंस की तरफ से बोलते हुए उन्हें लगातार नाकाम और भ्रष्ट साबित करने की कोशिश में लगे होते हैं। इसलिये निजी एफएम चैनलों के मामले में सरकार पहले ही सावधान है। खबरों को जानने के लिए इन चैनलों के दांत और नाखून उगे इसके पहले जरुरी है कि उनकी उंगलियों और मसूडों को ही पहले से उखाड़ लिए जाएं। उसे पता है कि निजी टीवी समाचार चैनलों को रेगुलेट करने में कितनी परेशानी हो रही है। सरकार की इस नीति का हम दिल से स्वागत करें और हमारा भरोसा उसके इस फैसले पर जाए इस पहले हमें सोचना होगा कि-
क्या सरकारी संगठन और न्यूज एजेंसियां एफएम चैनलों और इसकी ऑडिएंस की जरुरतों और उनके मुताबिक खबरें मुहैया कराने में पूरी तरह सक्षम है। क्या न्यूज एजेंसी जिन खबरों को चुनती है उसके बाद किसी भी तरह की खबर की गुंजाईश नहीं रह जाती। क्या इसके बाद जो भी खबरें रह जाती है वो या तो गैरजरुरी होती है, खबर के नाम पर पाखंड होती है जिसे प्रसारित करने से समाज और अधिक भ्रष्ट होगा। एजेंसी की खबर के बाद खबर पर फुलस्टॉप लग जाता है या फिर सरकारी संगठनों द्वरा मुहैया करायी जानेवाली खबरों के बाद खबर का मामला खत्म हो जाता है। अगर ऐसा है तो फिर क्यों सारी ऑडिएंस सिर्फ दूरदर्शन देखने नहीं लग जाती या फिर एफएम गोल्ड और रेनवो से ही अपना काम नहीं चला लेती। जाहिर है ऑडिएंस निजी समाचार चैनलों को देखने के लिए महीने में तीन से चार सौ रुपये खर्च करती है।
क्या ऐसा नहीं है कि ऐसा करके सरकार निजी एफएम चैनलों को सरकारी भोंपा बनाने की मूड में है। संभव है जो लोग निजी समाचार चैनलों से त्रस्त हैं उन्हें अब भी बाकी चैनलों के मुकाबले दूरदर्शन ही सही लगता है लेकिन उनसे अगर ये पूछा जाए कि क्या दूरदर्श खबरों के लिए काफी है, इसके बाद किसी भी निजी चैनलों या माध्यमों की जरुरत नहीं रह जाती। मुझे नहीं लगता कि वो सीधे-सीधे हां में जबाब देंगे। सार्वजनिक माध्यमों को किस तरह से सरकारीकरण और उसे अपने हित में भोंपा बनाने का काम हुआ है, ये किसी से छुपा नहीं है। इसलिए शायद ही कोई करोडों रुपये लगाकर उसे रेडियो क्रांति करने के बजाय उसे सरकार का दुमछल्लो बनाना चाहेगा।
एजेंसियों के भरोसे खबरें प्रसारित करने के फैसले में सरकार की समझदारी है कि इससे खबरों के प्रति विश्वसनीयता बनी रहेगी। लेकिन उसने एजेंसियों की खबरों को परफेक्ट मान लेने की भारी भूल की है। क्या मैनिपुलेशन का काम यहां बिल्कुल भी नहीं होता। खबर और बाजार के खेल में क्या ये एजेंसियां शामिल नहीं है। सरकार को इन सवालों पर तसल्ली से विचार करने चाहिए।
किसी भी माध्यम से खबर प्रसारित होने से खबर का एक नया रुप और एक नयी परिभाषा सामने आती है। एजेंसी से इन चैनलों को जो भी खबरें मिलेगी उसे एक हद तक ये चैनल अपने स्तर पर प्रस्तुत कर सकेंगे लेकिन कंटेट के स्तर पर बहुत अधिक प्रयोग करने करने के स्तर पर इनकी बहुत अधिक ताकत नहीं होगी। चैनल अहर अपने रिपोटर्स बहाल करते हैं तो संभव है कि कई ऐसे विषय और मुद्दे सामने आएंगे जिसे कि एंजेंसियां नोटिस नहीं लेती।चाहे तो कोई कह सकता है कि एफएम चैनलों का जो मिजाज है उससे कहीं लगता कि वो खबर को लेकर कुछ बेहतर कर पाएगी। लेकिन इस तरह से सोचने में और सरकार की नीति में कोई बहुत अधिक फासला नहीं है। दरअसल सरकार एफएम की ताकत को समझते हुए इस पर शुरु से ही नकेल कसने में लगी है। जबकि होना ये चाहिए कि निजी एपएम चैनलों को भी अपने रिपोर्टर्स बहाल करने का प्रावधान हो ताकि वो खबर की एक नयी दुनिया रच सके।
आगे भी जारी।
( ये खबर कल के अमर उजाला में प्रकाशित की गयी है जिसका विश्लेषण मैंने अपने स्तर से किया है।)
| edit post
3 Response to 'सरकार कहती है बिना रिपोर्टर्स के चैनल चलाओ'
  1. Anil
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/12/blog-post_06.html?showComment=1228558380000#c3606200937459325256'> 6 दिसंबर 2008 को 3:43 pm

    हाल ही में मुंबई में जिस तरह मीडिया ने सरकार और व्यवस्था की गीदडनुमा हरकतों को जिस तरह "लाइव टेलिकास्ट" फरमाया है, उससे सरकारी ऊदबिलाव काफी नाराज-परेशान है. देख रहे हैं कैसे एकदम मुंबई का नाम चैनलों से गायब हो रहा है? मीडिया पर सरकारी नियंत्रण होना चाहिये, लेकिन सिर्फ उतना, जितना लोकतंत्र में आवश्यक है - न उससे ज्यादा, न उससे कम!

     

  2. ab inconvenienti
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/12/blog-post_06.html?showComment=1228579500000#c4269081438886398934'> 6 दिसंबर 2008 को 9:35 pm

    प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में एफडीआई की अनुमति देकर सरकार फंस चुकी है, उन्हें सिर्फ़ टीआरपी और मीडिया मुग़ल बनने की पड़ी है, देश और संप्रभुता जाए भाड़ में. आपने इस पोस्ट में यही कहा की रिपोर्टर न रखने की नीति से कुछ अच्छाई की क्रांति नही आ जाने वाली. पर कम से कम एफएम बेवकूफी, मीडिया ट्रायल, अफवाह, जादू-तंत्र-मंत्र, नाग-नागिन-ओझा, प्रोपेगेंडा जैसी बुराइयों से तो बचा ही रहेगा.

    अगर टीवी की राह पर एफएम भी निरंकुश होकर चल पड़ा तो बहुत कुछ ग़लत हो सकता है, सरकार का मध्य मार्गी निर्णय सही है.

    आपने सरकार की चिंताओं का कोई हल नहीं बताया?

     

  3. Anil Pusadkar
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/12/blog-post_06.html?showComment=1228589460000#c7388349381609905535'> 7 दिसंबर 2008 को 12:21 am

    बोतल से बाहर आ गया है जिन्न।

     

एक टिप्पणी भेजें