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वो देखिए रात के हारमोनियम वाले उदय प्रकाश, अरे विश्वनाथ त्रिपाठी अचानक से बूढ़ लगने लगे, देखो, कोई जरुरी नहीं कि मेरी कविता इश्तहारों की तरह छपे इन्होंने ही तो लिखा है अपने कुंवर नारायण सिलेबस में लगी है इनकी किताबें औऱ वो राजेन्द्रजी हमेशा की तरह अभी भी मस्त हैं। अरे साथ में इ लड़की कौन है। विनयजी चौंधिआइए नहीं, इ लड़की राजेन्द्रजी के साथ पिछले दो साल से घूम रही है। याद है न, हिन्दू कॉलेज में जब सारे लड़के इनसे ऑटोग्राफ ले रहे थे तो अंत में उ भी आकर बोली कि आप तो हमें कुध लिखकर दे ही नहीं रहे हैं। इसी पर राजेन्द्रजी ने कहा-तुम तो जब चाहो ले लेना, कभी मना किया है। इ वही लड़की है, इधर दो-तीन साल में शरीर भर गया है। पीछे से भाई ने कहा- हां कहानी से लघु उपन्यास की तरह।
श्रीराम सेंटर के बुक शॉप पर हम एम ए के दौरान जाते और बड़े-बड़े साहित्कारों को पत्रिकाएं पलटते हुए, बहुत सधे ढंग से बात करते हुए हसरत भरी नजरों से देखते। इधर की किताबों में तो पीछे या फ्लैप पर लेखकों की तस्वीर भी धपी होती है, इसलिए पहचानने में सुविधा होने लगी है लेकिन पहले की किताबों में ऐसा नहीं होता था। मैं ये बात दावे के साथ कह सकता हूं कि श्रीराम सेंटर आकर दर्जनों साहित्यकार औऱ नामचीन लोगों को पहली बार देखा। उन्हें जब भी देखता तो उनकी लिखी किताबों को भूलकर उनके गेटअप पर गौर करता। अशोक वाजपेयी के कुर्तो का रंग, पांडेजी की पाइप, उदय प्रकाश के चेहरे पर जमी हुई गंभीरता, प्रभाकर श्रोत्रिय मुझे सिल्क इम्पोरियम के ब्रांड एम्बेसडर लगते। मैं अक्सर मन बनाता कि एक बार कहीं कुछ हो-हवा जाए तो इन्हीं की तरह अपन भी झाड़कर चला करेंगे। छोटी-मोटी चीजें तो मैं तब से ही फॉलो करने लगा था जिसमें से एक था- बिना चीनीवाली ब्लैक कॉफी पीकर हाथ लहराते हुए अपनी बात कहना।
हममें से कुछ लोग ऐसे भी होते जो इन नामचीन लोगों के पास चले जाते औऱ अपना परिचय कुछ इस तरह से देते- सर, मैं आशीष, आपको याद है पटनावाले कार्यक्रम में मैं आपसे मिला था, आपको स्टेशन तक छोड़ने भी गया था। नामचीन अचानक से बोल पड़ते- हां, फिर सहज होते हुए कहते- हां-हां याद आया औऱ तुम्हारे साथ थी वो आजकल क्या कर रही है। सर उसकी तो झारखंड में नौकरी लग गयी। नामचीन कहते- वाह, बहुत मेहनती थी वो। औऱ सब क्या चल रहा है। इस पर दोस्त पूरी रामकथा लेकर बैठ जाता। इसके पहले कि नामचीन पक जाएं पीछे से कोई आवाज देता- अरे भाई साब, इधर कैसे आना हुआ औऱ फिर उनके बीच दोस्त और उसकी बातें अधूरी रह जाती। नामचीन कहते, चलो आशीष, फिर कभी मिलते हैं, तुम्हारी दोस्त मिले तो बताना कि मैंने याद किया है, फोन कर ले। दोस्त हुलसते हुए आता और कहता- जो कहो, बड़े लोग ऐसे ही बड़े नहीं बन जाते, जैसे ही नाम लिए एकदम से चीन्ह (पहचान) गए।
दूसरा दोस्त किसी दूसरे नामचीन से अपना परिचय रिन्यूअल कराने चला। सर, मिथिलेश, आपको याद होगा, बनारस में मिले थे हमलोग। नामचीन माथे पर बल देते हुए कहते-कौन मिथिलेश। दोस्त फिर कहता, सर वही जब आपकी लंका पर रिक्शेवाले से भाड़े को लेकर झंझट हो गयी थी तो मैंने मामला साफ किया था। आपने कभा भी था कि आजकल के बच्चे सिचुएशन को ज्यादा बेहतर तरीके से हैंडल करते हैं। अरे मिथिलेश माफ करना, मैं पहचान नहीं पाया। वो क्या है न कि जब से बूब्बू की मां गुजरी है, तब से कुछ भी ध्यान नहीं रहता। मिथिलेश ने अबकी बार कहा- ओह सर, लेकिन ये तो याद होगा कि आपने कहा था कि कोई बनारस आए औऱ भोलेबाबा का देसी माल न ले। तब मैंन गुदौलिया जाके लाया था औऱ अपने रुम पर चूड़ा भूंजे थे और सरसो तेल में बुट झंगड़ी फाई करके लाए थे। अबकी बार नामचीन को लगा- हां, हां याद आया, बहुत बढिया भूंजे थए तुम। तो कुछ-लिखा विखो। हम मन-मंथन नाम से एक पत्रिका निकाल रहे हैं, हम चाहते हैं कि इसमें ज्यादा से ज्यादा युवा लोग जुड़े। मिथिलेश ने कहा-जी सर। फिर वहां से विदा लेकर सीधे हमलोगों के पास आया- स्साला साहित्यकारों के साथ यही झंझट है, दिल्ली के बाहर निकलेगा तो एतना अपनापा और भद्र दिखाएगा कि पूछो मत। लेकर जैसे ही बलिया, बनारस, इलाहाबाद, पटना से लौंडों का माल खाकर आएगा तो दिल्ली आते ही बूब्बू की माय मर जाएगी और फिर कुछ भी याद नहीं रहेगा। कह रहा था कि नया-नया दिल्ली में शिफ्ट कर रहे हैं, जरा सामान जमाने आ जाना। अब करे फोन, मोबाइल का एक डिजिट नंबर ही कम दे दिए हैं औऱ गलती से श्रीराम सेंटर मिल गया तो कहेंगे, पच्छाघाट से नानी मर गयी सो गांव चले गए थे सर।
श्रीराम सेंटर की बुक शॉप, दिल्ली की एक ऐसी जगह जहां हम जैसे नंबर बटोरु साहित्य के छात्र कई साहित्यकारों को फेस टू फेस देखा करते। हमें न पीआर बनाने से मतलब होता, न ही कविता-कहानी छपवाने में रुचि होती औऱ न ही गोष्ठियों में मिले थैले ढोने का शौक होता। तब मेरे लिए एक ही पैमाना होता, कौन कितने तरीके से पहन-ओढ़कर आया है, दिखने में इन्टल किस्म का लगता है कि नहीं. जब वो बातचीत करता है तो छपी किताबों से कुछ नया कह रहा है कि नहीं। ऐसा तो नहीं है कि जो किताब १९८५ में लिख दिया, उसी की टेप चलाए जा रहा है। हमारी नजर में वही महान होते जो अपनी किताबों में एमए के लिहाज से मसाला मार गए हों, नहीं तो सूखा-सूखी ज्ञान छांटनेवालों से हम हेमेशा ही दूर रहते. हमारा सीधा फंड़ा होता, ज्ञान बंटोरने और साहित्य की प्यास बुझाने के लिए पूरी जिंदगी पड़ी है, यहां डीयू में पचपन नहीं बना तो सब तेल हो जाएगा। इसलिए हम नामवर सिंह, मैनेजर पांडेय, विश्वनाथ त्रिपाठी जैसे स्टूडेंट की जरुरत को ध्यान में रखकर किताबें लिखनवाले आलोचकों को अपने ज्यादा करीब पाते। उन्हें देखकर दूर से ही श्रद्धा का ही भाव जागता, लेकिन बात करने की कोशिश कभी नहीं करते. कई बार ऐसा होता है कि लेखक को रचना के स्तर पर मिलना ज्यादा बेहतर होता है, मिले कि मोहभंग हो गया और इनलोगों से तब मोहभंग होने का मतलब था- एमए में फेल।
इस शॉप से मैंने कभी भी कोई किताबें नहीं खरीदी। यहां से खरीदने पर लगता कि किताब नहीं जरुरी दवाई खरीदे रहे हैं। दाम एकदम से टाइट लेती मैडम। विद्यार्थी जीवन में किताबों पर जब ढंग से छूट न मिले तब तक लगता है कि किताब खरीदने के नाम पर अय्याशी कर रहे हैं। कुछ पत्रिकाएं खरीदता। लेकिन कोई यहां से कुछ भी न खरीदकर भी लिखने के लिए बस देख-सुनकर रचना की कच्ची सामग्री जुटा सकता था।
अब कहां करें भसोड़ी और कहां भंजाएं सीवान का संबंध पढ़िए आगे।
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2 Response to 'तो बनारस, बलिया के संबंध छनते थे इस बुक शॉप पर'
  1. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/12/blog-post_04.html?showComment=1228441620000#c4263919210398087781'> 5 दिसंबर 2008 को 7:17 am

    अगले भाग का इंतजार है!

     

  2. अभिषेक ओझा
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/12/blog-post_04.html?showComment=1228470780000#c6239189481055585267'> 5 दिसंबर 2008 को 3:23 pm

    बढ़िया जा रहा है... !

     

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