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श्रीराम सेंटर की बुकशॉप की तरह हमारे डीयू कैंपस में भी कभी पुस्तक मंडप नाम से बुक शॉप हुआ करती थी। वो तो उजड़ गयी लेकिन उसकी जगह जो नयी बिल्डिंग बनी है वहां पर फिर से एक नयी दूकान खुली है। ये शॉप पहले के मुकाबले ज्यादा समृद्ध है क्योंकि यहां हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं के अलावे राउट्लेज, ब्लैकबेल औऱ पेंगुइन इंडिया जैस बड़े पब्लिशरों की भी किताबें मौजूद होती हैं। अगर कुछ नहीं भी है तो कहने पर वो ला देते हैं। लेकिन इसे मैं पुस्तक मंडप की भरपाई नहीं मानता। इसे देखकर कुछ ऐसा ही लगता है जैसे कुल्लड़ में बेचनेवाली गंदले चाय की दूकान तोड़कर कॉफी डे की आउटलेट खोल दी गयी हो। ऐसा मैं किसी भी तरह की नास्टॉलजिया में आकर कि हर पुरानी चीजें अच्छी होती है,नही कह रहा हूं। बल्कि इसकी एक बड़ी ही मजबूत वजह है।

इस पुस्तक मंडप पर आकर मुझे कभी नहीं लगा कि इसे मुनाफे के लिए खोली गयी है। सारी पत्रकाएं मौजूद होती, चर्चित और जरुरी किताबें लेकिन इसे बेचने की हड़बड़ी मैं यहां के लोगों में नहीं देखता। तब इस शॉप पर अपने क्रांतिकारी मनोज भाई हुआ करते। जिन किताबों की किताब बहुत अधिक होती, उसे वो दो-चार दिनों के लिए पढ़ने दे दिया करते। इस बीच हमलोग कभी-कभार फोटोकॉपी करा लेते। उनका सीधा जुमला होता- पढ़िए साथी, ललक है तो पढ़िए, पैसा कोई प्रॉब्लम नहीं है। बिजनेस के लिहाज से संभव हो इस दूकान से बहुत अधिक मुनाफा नहीं होता हो लेकिन इसकी जितनी लोकप्रियता हमारे बीच थी उतनी शायद इस नए बुकशॉप की नहीं है।

तब कैंपस में एक खास तरह का कल्चर था जो कि अब धीरे-धीरे खत्म हो रहा है। अच्छा है या फिर बुरा, कह नहीं सकता। जूनियर्स साथी बीए या फिर एमए में एडमीशन लेते ही बाकी कामों के साथ-साथ सबसे पहले अपने सब्जेक्ट के टॉपर सीनियर्स से मिलते। नोट्स तो एक मामला होता ही लेकिन वो उन किताबों के बारे में भी जानना चाहते जिससे समझ बन सके। ऐसे में कई बार सीनियर्स दुराग्रह की वजह से रामविलास शर्मा की किताबों को कूड़ा बताकर डॉ नगेन्द्र को साहित्य का एकमात्र विकल्प बताते। जूनियर उनकी बातों को बनाकर अपनी हैसियत से उन किताबों की सूची बनाता जिसे कि वो खरीद सकता है। वो लिस्ट लेकर सीनियर के पास लेकर आता और कहता- एकबार आप साथ चलिए न सर, ठीक रहेगा। कई सीनियरों को मैंने इस पुस्तक मंडप पर जूनियर्स को किताबें खरीदवाते हुए देखा है। हमलोग अलग पंथ के लोग रहे। सीनियर्स को शुरु से ही ज्यादा तब्बजो नहीं दिया, ऐसे में खुद ही पुस्तक मंडप पहुंचते। मनोज भाई और कभी-कभी मैडम जो कि दुकान की मालकिन थी- सीधे कहती- तुम जैसे लोगों को इसे तो हर हाल में पढ़नी ही चाहिए, इसे आप खरीद लें। शुरु-शुरु में तो ऐसा लगा कि ये बेचने के लिए ऐसा कर रहे हैं लेकिन बाद में उनके कहने पर कुछ किताबें खरीदी औऱ वो भी अतिरिक्त छूट पर तो बात समझ में आने लगी कि ये सचमुच बेहतर पाठक गढ़ने की कोशिश में हैं। यही वजह रही कि डॉ।नगेन्द्र का गढ़ कहे जानेवाले दिल्ली विश्वविद्यालय में हमने रामविलास शर्मा को खरीदा, नामवर सिंह को खरीदा, भक्तिकाल पर शिवकुमार मिश्र को खरीदा औऱ बीच-बीच में हमजाद जैसे उपन्यास भी खरीदकर पढ़े। इस शॉप ने हमारे भीतर किताबों को खरीदकर पढ़ने का भाव पैदा किया। ये कहते हुए कि अगर आप इसे खरीदना नहीं चाहते तो ऐसे ही ले जाइए,पढ़कर लौटा दीजिएगा। बस इसके लिए समय निकाल लीजिए साथी। इस मंडप पर आकर मुझे पहली बार महसूस किया कि चीजों को बेचने के क्रम में भी विचारधारा के प्रति विश्वास, पढ़ने के प्रति ललक और शॉप पर आनेवाले लोगों को ग्राहक के तौर पर देखने के बजाय पाठक के रुप में देखा जाना संभव है। श्रीराम सेंटर में काफी हद तक इस बात की संभावना रही नहीं तो अब जो बुकशॉप खुल रहे हैं उसमें उलट-पलटकर और बिना खरीदे छोड़ देने की न तो गुंजाइश है और न ही कोई इतना समझदार औऱ सह्दय है कि कहे- कोई बात नहीं, दस रुपये चेंज नहीं है तो बाद में दे दीजिएगा.

इसलिए संभव है कि कल श्रीराम सेंटर में पुरानेवाले बुक शॉप की जगह और चीजों की तरह बिग शॉप खुल जाए जहां दुनिया भर की किताबें और पत्रकाएं हों लेकिन बिना कुछ खरीदे टाइप पास करने के लिहाज से, बिना अंटी में पैसे डाले भीतर घुसने पर सिर्फ खाली-पीली करनेवाले लोग ही करार दिए जाएंगे।
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4 Response to 'भले ही बुक शॉप के लिए बिग शॉप खुल जाए'
  1. संजीव कुमार सिन्हा
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/12/blog-post_05.html?showComment=1228468140000#c6617234600324077033'> 5 दिसंबर 2008 को 2:39 pm

    भाई विनीत, बहुत ही सहजतापूर्ण आपने पुराने दिनों की यादें ताजा करवा दीं। गत 28 नवंबर को दिल्‍ली में मतदान के सिलसिले में नॉर्थ कैम्‍पस जाना हुआ। इसके बाद अचानक मन में हिलोरें मारने लगा और कदम विवेकानंद स्‍टेच्‍यू की ओर बढ चले। दरअसल, मैं विद्यार्थी परिषद् नॉर्थ कैम्‍पस का प्रमुख रह चुका हूं इसलिए पोस्‍टर लगाने में बडी दिलचस्‍पी रही और अन्‍य छात्र संगठनों के पोस्‍टरों को पढने में भी। कला संकाय परिसर में प्रवेश करते ही मैं हर उस स्‍थान पर गया जहां पोस्‍टरें चिपकायी जाती थीं। अच्‍छा लगा कि अब भी यह सक्रियता बनी हुई थी। लेकिन पुस्‍तक मंडप का जगह सूना लगा। वहां केवल सुंदर घास दिखायी दी। हालांकि पुस्‍तक मंडप को वामपंथी कार्यकर्ता चलाते थे लेकिन मैं उसका स्‍थायी ग्राहक था। मनोजजी और राकेशजी से वहीं परिचय हुआ। मेरी वामपंथी चेतना भी वहीं जाग्रत हुई। क्रिश्‍चयन कॉलोनी स्थित विद्यार्थी परिषद् के प्रदेश कार्यालय, जहां मैं रहता था, वामपंथी साहित्‍य से भर गया। ऐसे ही श्री राम सेंटर स्थित बुक शॉप पर तो मैं सैलरी मिलने के दिन बडे से उत्‍साह से जाता था। ब्‍लॉगजगत के जरिये ही मुझे यह सूचना मिली कि यह शॉप भी अब बंद हो गयी। इन दोनों दुकानों के न होने का गम मुझे साल रहा है। पुस्‍तक की दुकानें तो अनगिन है दिल्‍ली में लेकिन इन दोनों की बात ही कुछ और थी। यहां वैचारिक खुराक मिलती थी। हालांकि दोनों दुकानों पर वामपंथी साहित्‍य ही बहुधा मिलते थे लेकिन दुनिया, देश और समाज में क्‍या सोचा जा रहा हैं, इसकी जानकारी सहज मिल जाती थी। पता नहीं क्‍यों वामपंथी दुकानें बंद होती जा रही हैं।

     

  2. जितेन्द़ भगत
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/12/blog-post_05.html?showComment=1228478760000#c4625108636373689226'> 5 दिसंबर 2008 को 5:36 pm

    ग्राहक और पाठक के बीच बढि‍या फर्क कि‍या है आपने।
    पि‍छली पोस्‍ट में 'और आतंकवादी देखते रहे इंडिया टीवी'पढ़कर बहुत अच्‍छा लगा।

     

  3. सुशील कुमार छौक्कर
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/12/blog-post_05.html?showComment=1228480680000#c5112339620311744125'> 5 दिसंबर 2008 को 6:08 pm

    कह तो सही रहे हो दोस्त।

     

  4. Dr.Parveen Chopra
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/12/blog-post_05.html?showComment=1228488540000#c5344997335059157321'> 5 दिसंबर 2008 को 8:19 pm

    आज की अमर उजाला के संपादकीय पन्ने के ब्लॉग कोने में आप की ब्लाग पोस्ट - बनारस, बलिया के संबंध छनते थे इस बुक शॉप पर ---देख कर बहुत अच्छा लगा।
    बहुत बहुत शुभकामनायें।

     

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