.

भाई हमने तो अपना मामला नोट्स से हटाकर यूआरएल लिंक तक पहुंचा दिया। पहले जो जूनियर्स नोट्स या किताब मांगते थे अब वे मेरे ब्लॉग का लिंक पूछते हैं, धीर-धीरे ब्लॉग की दुकान जम रही है।
परसों ही एक जूनियर मेरे ब्लॉग का लिंक लिखकर ले गई और आज मिलने पर बताया कि अच्छा लिखते हैं सर आप। मैंने तो मम्मी को भी दिखाया। मैं मन ही मन खुश हो रहा था कि अच्छा है दिल्ली की आंटी लोग जो कि मां के बहुत दूर होने की वजह से मां ही लगती है, इम्प्रेस होगी और कभी खाने पर बुला लिया तो एक पोस्ट की मेहनत तो सध जाएगी, सो पूरे ध्यान से उसकी बात सुन रहा था। लेकिन आगे उसने जो कुछ कहा उससे मेरे सपने तो टूटे ही, आगे के दिनों के लिए चिंता भी होने लगी। जूनियर का कहना था कि सर मैं अपनी मम्मा को आपका ब्लॉग पढ़ा रही थी कि अचानक एक लाइन आ गयी। आपने लिखा था कि- हिन्दी की ही क्यों लेने लगते हो। मम्मा ने कहा ऐसा लिखना ठीक नहीं है, ऐसे नहीं लिखना चाहिए और फिर उठकर वहां से चली गई। मैं समझ गया कि आंटी ने इस शब्द को अश्लील समझा।
इधर वीचैनल को लगातार देख रहा हूं। उस पर एक कैंपस शो के लिए एड आती है जिसमें लाइन है- किसकी फटेगी। आंटी इसका अर्थ भी उसी हिसाब से लगा सकती है और चैनल को अश्लील कह सकती है। मुझे याद है मैं अपने कॉलेज के दिनों में खूब एक्टिव रहा करता था- क्या डिवेट, क्या प्ले। करता भी और कराता भी और हांफते हुए अपनी मैम के पास पहुंचता और मैम पूछती कि क्या हुआ तो अचानक मेरे मुंह से निकल जाता मैंम सब तेल हो गया या फिर मेरे दोस्त राहुल ने स्पांसर्स का केला कर दिया और मैम मेरे कहने का मतलब समझ जाती।
एफएम में आए दिन आपको ऐसे शब्द सुनने को मिल जाएंगे। तीन-चार दिनपहले ही तो रेडएफएम पर बज रहा था जब इंडिया ने पर्थ में परचम फैलाया था- मैं भज्जी, आपका हरभजन सिंह रेड एफएम 93.5 बजाते रहो, किसकी पता नहीं। अब तक तो यही समझ रहे थे किरेड एफएम बजाते रहना है, अभ समझ रहे हैं कि आस्ट्रेलिया जैसी जीम को बजाते रहना है और फिर धीरे-धीरे एक मुहावरा बन जाता है कि यार उसकी तो बजा कर रख दूंगा। मेरा दोस्त कहा करता है उसकी तो मैंने रेड लगा दी, हम मतलब समझ जाते हैं लेकिन कभी भी अश्लील अर्थ की तरफ नहीं जाते।
पॉपुलर मीडिया में शब्दों की तह तक जाने की बात नही होती, लोग संदर्भ के हिसाब से उसका मतलब समझ लेते हैं, खुलापन सिर्फ जीने के स्तर पर नहीं आया है। व्हीस्पर का एड देखिए हर लड़की एक दूसरे के कन में दाम घटने की बात करती है बावजूद इसके हम सुन लेते हैं और फिर सुनेगें नहीं तो बिकेगा कैसे।
आंटी के मेरी पोस्ट को देखने पर उठकर जाना पड़ा और मैं सोचने लगा कि वाकई कैंपस में बोली जानेवाली इस भाषा पर विचार करने की जरुरत है। ये भाषा के स्तर पर संस्कारी होने का मामला है, अच्छा बच्चा होने का आग्रह है या फिर बदलती बिंदास हिन्दी को नहीं बर्दास्त कर पाने का हादसा। फिलहाल लड़की ने मेरा हौसला बढ़ाया कि सर आप लिखिए- मैंने तो मम्मा को बताया कि हिन्दी में लोग अब ऐसे ही लिखते हैं।
अपने ब्लॉगर साथियों से तो इतना ही कहूंगा कि भाई लोग आपलोग जो इतना धुंआधार गालियां लिखते हो, जरा चेत जाओ। पहले चेक कर लो कि ये मां-बहन के पढ़ने लायक है भी या नहीं।
| edit post
5 Response to 'जरा बच के, मां-बहन भी पढ़तीं हैं ब्लॉग'
  1. rangbaaz
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/01/blog-post_24.html?showComment=1201181640000#c5112165611920719003'> 24 जनवरी 2008 को 7:04 pm

    yah bindaas Hindi naheen sanskaarheen laphangon kee Hindi hai . aisee Hindi par iThalaane vaalon par ek saTeek kahaavat hai par jaraa bhades hai so philhaal rahane detaa hoon .

     

  2. Sanjeet Tripathi
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/01/blog-post_24.html?showComment=1201197600000#c4225502039679200653'> 24 जनवरी 2008 को 11:30 pm

    ह्म्म, एकदम सटीक मुद्दा पकड़े बंधु!!
    साधुवाद स्वीकार करो!!

     

  3. क़ानूनी निज़ाम
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/01/blog-post_24.html?showComment=1201246140000#c8978784115634636991'> 25 जनवरी 2008 को 12:59 pm

    बहुत अच्छा लिखते हो यार. मैं तो केवल सुनती थी. पढ़ा. पिछला माल भी देखूंगी. क्या करूं कचहरी, फ़ाइल, भाग-दौड़. ख़ूब थका देती है. उधर घर में किलकारी का धमाल.


    अच्छा रंगबाज़ साहब से एक निवेदन कर रही हूं. हुजूर, आपने विनीत की भाषा को संस्कारहीन और लफंगो वाली कह दी और अपना नाम ही रखा है रंगबाज़. तो विनीत की भाषा में खोट है या आपकी नियत में? और फिर आप जैसे संस्कारी लोग 'ऐसी हिन्दी पर इठलाने वालों पर एक सटीक कहावत है पर ज़रा भदेस है, सो फिलहाल रहने देता हूं' कहकर अपने मन को का ढेर तो नहीं बना रहे?
    बचा सकते हैं तो बचा लीजिए अपनी भाषा. अभी क्या फटी है, आगे-आगे देखिए. और फटेगी. मैं एक पेशेवर वकील हूं. आइए, कचहरी में किसी दिन. दिखाती हूं जज साहब कैसी भाषा में बातचीत करते हैं. अपनी बिरादरी की बात सुनकर तो आपकी वाट लग जाएगी.

     

  4. garima
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/01/blog-post_24.html?showComment=1201266240000#c1212236970142153555'> 25 जनवरी 2008 को 6:34 pm

    thanks sir , ki aapne is aam se baat per dhyan deker ise khas bnaya aur is blog ko bhi mene mummy ko phaya ,aap nishchint ho jaiy wo aapse khafa nahi hai . unhone aapke is pryas ko sraha hai lekin unki pareshani yese shabdoon kke t.v ya fm per prayog kiye jane se nahi hai kyon ki shayad whan pratikriya ki itni aasan suvidha nahi hai .

     

  5. garima
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/01/blog-post_24.html?showComment=1201266300000#c3427343373276865808'> 25 जनवरी 2008 को 6:35 pm

    thanks sir , ki aapne is aam se baat per dhyan deker ise khas bnaya aur is blog ko bhi mene mummy ko phaya ,aap nishchint ho jaiy wo aapse khafa nahi hai . unhone aapke is pryas ko sraha hai lekin unki pareshani yese shabdoon kke t.v ya fm per prayog kiye jane se nahi hai kyon ki shayad whan pratikriya ki itni aasan suvidha nahi hai .isliy sabhy ho to sabhy raho

     

एक टिप्पणी भेजें