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नया ज्ञानोदय(मार्च) के लिए लेख लिखने के क्रम में मुझे एक बार फिर न्यूज चैनलों के उन पुराने फुटेज औऱ खबरों को खंगालना पड़ गया जिसमें सीरियलों की नई खेप को सामाजिक विकास का माध्यम बतालाया गया था। स्टार न्यूज, इ 24 और आजतक ने सीरियलों की इस नयी खेप पर बहुत सारी स्टोरी की है। सबमें ये बताने की कोशिश की है कि अब टीवी सीरियल के जरिए सामाजिक विकास का काम किया जा रहा है। हेडलाइन्स टुडे 14 नवम्बर बाल दिवस के दिन बालिका वधू का असर देखते हुए राजस्थान के उन इलाकों की कवरेज में जुटा रहा, जहां सरकारी प्रतिबंध के वाबजूद भी बाल-विवाह जारी है। कुल मिलाकर चैनलों द्वारा इस तरह के महौल बनाए गए कि एकबारगी हम भी सोचने लग गए कि क्या वाकई टीवी सीरियलों के जरिए सामाजिक विकास संभव है। http://teeveeplus.blogspot.com
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जरा ड्राइंग रुम से बाहर तो झांकिए, पूरा भारत आपका इंतजार कर रहा है। ये रवीश कुमार का विश्लेषण है, एनडीटीवी इंडिया का विश्लेषण है उस फिल्म को लेकर जिसे मेरे साथी ब्लॉगर भारतीय औऱ विदेशी के साथ जोड़कर देख रहे हैं। पोस्ट को देखकर एकबारगी तो मन में आया कि एक कमेंट दे मारुं कि क्या भारतीयता का सवाल आज भी हमारे लिए उतना ही महत्वपूण है जितना कि आज से चालीस-पचास साल पहले रहा है। अगर तिरंगे का होना ही एक बड़ा सच और शाश्वच सच है तब तो भारतीयता का चिरकाल तक जिंदा रहना तय है। पूरी पोस्ट के लिए क्लिक करें- http://teeveeplus.blogspot.com
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पंकज पचौरी का ये सवाल अभी पूरा ही होता कि टेलीविजन रियलिटी और बनावटी, देश और दुनिया के जाने-माने पत्रकार मार्क टली ने जबाब दिया-टेलीविजन की रियलिटी तमाशा है। रियलिटी शो में जो कुछ भी दिखाया जाता है उसमें कुछ भी रियल नहीं होता, सिर्फ तमाशा होता है। मार्क टली के इस विचार से नलिनी सिंह भी सहमत नजर आई और साफ कहा कि हल्की-फुल्की चीजें दिखाकर टेलीविजन किसी हद तक हमारा भला नहीं कर रहा। पंकज पचौरी की इस टिप्पणी पर कि चैनलों का हमेशा ये दावा होता है कि वो वही दिखा रहे हैं, जिसे कि देश की ऑडिएंस देखना चाहती है। पूरी पोस्ट के लिए क्लिक करें- http://teeveeplus.blogspot.com/
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चैनल के कई एंकर मौजूद थे और तभी एनडीटीवी की मैनेजिंग डायरेक्टर बरखा दत्त ने कहा- लगता है हमारी नौकरी खतरे में है, क्या आप मेरी नौकरी लेने जा रहे हो या फिर मैं आपकी। न्यूज चैनल के इतिहास में 26 मई 2005 बड़ा ही दिलचस्प दिन रहा है और स्ट्रैटजी के लिहाज से एक प्रयोग भी। बाद में इसकी आलोचना भी हुई लेकिन मौजूदा स्थिति को देखते हुए अब ये ट्रेंड-सा बन गया है।
26 मई प्राइम टाइम 8 बजे,एनडीटीवी इंडिया पर अभिषेक और रानी मुखर्जी बतौर एंकर आते हैं औऱ एनडीटीवी की ऑडिएंस के सामने पूरे आधे घंटे तक न्यूज बुलेटिन पेश करते हैं। बाकायदा इस अभिवादन के साथ कि- आठ बजे की खबरों में आपका स्वागत है। मैं हूं बंटी और मैं हूं बबली। इन दोनों ने अपना नाम न तो अभिषेक बच्चन लिया औऱ न ही रानी मुखर्जी। दोनों फिल्मी कैरेक्टर के तौर पर अपने को इन्ट्रोड्यूस करते हैं। इन दोनों का इस न्यूज चैनल पर आना फिल्म प्रोमोशन का एक हिस्सा भर था। चैनल के लिए ब्रांड पोजिशनिंग की रणनीति लेकिन इन दोनों ने आधे घंटे की पूरी बुलेटिन पढ़ी जिनमें सामान्य दिनों की तरह ही वो सारी खबरें थी। मनमोहन सरकार से भेल में विनिवेश के मसले पर वामपंथी पार्टियों का विरोध, दिल्ली में जामा मस्जिद की ऐतिहासिकता पर विवाद औऱ इसी तरह से उत्तर प्रदेश में एक सती से जुड़ी खबर। चैनल पर बार-बार फ्लैश होता रहा ये बंटी-बबली स्पेशल हैं और ऑडिएंस एसएमएस के जरिए अपनी राय दे सकते हैं। बाद में इन दोनों को खबर के तौर पर प्रयोग किया गया और रिपोर्टर द्वारा सवाल किए गए कि आपने ताजमहल को बेच दिया( फिल्म का प्लॉट) औऱ अब एनडीटीवी में एंकर बन गए, ये पूरा सफर कैसा रहा, कैसा लग रहा है आपको। फिल्म की घटना और चैनल की खबर का कॉकटेल कुछ इस तरह से पेश किया गया कि ऑडिएंस को खबर के नाम पर डिफरेंट देखने का अहसास हुआ।
इसमें कहीं भी अभिषेक औऱ रानी मुखर्जी का नाम नहीं लिया गया। रियलिटी औऱ फैंटेसी को पूरी तरह ब्लर्र किया गया।
इस मामले में राज नायक( सीइओ, एनडीटीवी) का कहना था कि हम उम्मीद करते हैं कि सिलेब्रेटी वैल्यू की वजह से एनडीटीवी को वो लोग भी देखेंगे जो कि एनडीटीवी नहीं देखते।
राज नायक की मानें तो देश की ऑडिएंस सिलेब्रेटी को चाहे किसी भी रुप में देखने को तैयार रहती है। सिलेब्रेटी कुछ भी करे, कहे देखने औऱ मानने को तैयार रहती है। ये बात आपको विज्ञापनों में तो साफ तौर पर दिखता ही है कि जहां सिलेब्रेटी इमेज ब्रांड इमेज में कन्वर्ट हो जाती है। पल्स पोलियो अभियान के लिए अमिताभ बच्चन औऱ टीवी की रोकथाम के विवेक ओबराय को शामिल किए जाने में भी दिखाई देता है। आप कह सकते हैं कि समाज में इन लोगों के कहने का असर होता है। असर होता है भी या नहीं लेकिन लोगों का अटेंशन तो बनता ही है, लोग गौरसे देखते हैं। इसलिए आप देखेंगे कि इन सिलेब्रेटी का प्रयोग न केबल चड्डी च्यवनप्राश, चॉकलेट औऱ पेनवॉम बेचने के लिए ही नहीं बल्कि सामाजिक संदेश देने के लिए किए जाते हैं। आप चाहे तो इनके प्रयोग की दो कैटेगरी बना सकते हैं- एक विज्ञापन के लिए औऱ दूसरा सामाजिक संदेश के लिए। लेकिन अब एक तीसरी कैटेगरी भी तेजी से विकसित हो रही है, खबर देने की, चैनल को स्टैब्लिश करने की। देश की ऑडिएंस को ये बताने की अगर शाहरुख न्यूज 24 देख सकते हैं तो फिर आप दूसरे चैनलों की खबर क्यों देखते हैं।
अभिषेक बच्चन जो कि बंटी और बबली के लिए एनडीटीवी इंडिया पर एकरिंग करते नजर आए, कल सीएनएन आइबीएन के न्यूज रुम में माइक लिए रिपोर्टिंग करते दिख गए। वो उस फ्रीज को दिखा रहे थे जिसमें बहुत सारे चाकलेट रखे थे। अभिषेक बता रहे थे कि राजदीप क्यों इतना मीठा बोलते हैं, ये है चॉकलेट का राज। थोड़ी देर के लिए एडिटिंग मशीन पर भी बैठे और कीबोर्ड के साथ छेड़छाड़ की। बाद में सोनम कपूर ने माइक उसके हाथ से ले ली और फिर उसके द्वारा रिपोर्टिंग शुरु की। फिल्म दिल्ली-6 का मीडिया पार्टनर नेटवर्क 18 ग्रुप है और कल प्राइम टाइम की खबर में अभिषेक और सोनम द्वारा जो रिपोर्टिंग की गयी वो फिल्म प्रोमोशन और चैनल को पॉपुलर बनाने की सट्रैटजी थी।
नलिन मेहता ने अपनी किताब इंडिया ऑन टेलीविजन में खबरों को इस रुप में पेश किए जाने और उनमें सिलेब्रेटी के शआमिल किए जाने के पीछे की रणनीति को एडवर्टिजमेंट और चैनल इकोनॉमी का हिस्सा बताया है। पूरा का पूरा एक चैप्टर ही है- CHAPTER-4 THE NEWS WITH BUNTY AND AND BABLI: ADVERTISING,RATINGS AND TELEVISION NEWS ECONOMY. इस पूरे चैप्टर में उन्होंने विस्तार से बताया है कि कैसे न्यूज इकोनॉमी के तहत चैनल आए दिन खबरों को नयी-नयी शक्ल में पेश करते हैं। हमारे लिए वो किसी भी फार्म में आए, खबर ही है लेकिन इसके बीच से हम विश्लेषण कर सकते हैं कि बाजार, रेटिंग औऱ मैनेजमेंट के बीच से होकर गुजरती खबरों का मिजाज कितनी तेजी से बदल रहा है।
फिलहाल मैंने सीएनएन के किसी भी अधिकारी से इस स्ट्रैटजी को लेकर कोई बयान नहीं सुना है। लेकिन चैनलों के भीतर जिस तरह से सिलेब्रेटी घुसकर खबर बनते हैं जो कि वाकई फिल्मी शूटिंग का हिस्सा नहीं है बल्कि खबर है, लोग चैनल से ज्यादा फेमिलियर होते जाते हैं। बाकी प्रोफेशन की तरह सिनेमा औऱ ऐसी खबरों के जरिए लोगों के जीवन में ये शामिल होता जाता है। नहीं तो अभी तक किसे पता होता था कि न्यूज रुम की शक्ल कैसी होती है। मैं तो ये भी कहूंगा कि एडीटिंग मशीन पर दिनभर फुटेज कतरते मेरे दोस्त जब बाहर आकर कहते हैं कि- बस बिता दिए दस घंटे हमने चुतियापा करते हुए,चांद के दर्द को दिखाने के लिए सोयी हुई मुमताज का दरवाजा खटखटा आए, अब वो भी कह सकेगा- इतना रद्दी प्रोफेशन भी नहीं है,पैकेज बनाना, अभिषेक ने उसमें ग्लैमर भरने का काम किया है। दूसरी तरफ जो लोग अब तक इंडिया टीवी औऱ आजतक से काम चला रहे थे वो भी मशक्कत करके सीएनएन देखेंगे- क्योंकि इस पर हीरो-हीरोईन रिपोर्टिंग करता है।
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फिल्मी पंडित( फिल्म क्रिटिक) या तो बॉक्स ऑफिस के हिसाब से फिल्मों की समीक्षा करते हैं या फिर इस हिसाब से कि फलां फिल्म पर ऑडिएंस रिएक्शन क्या होगा। नतीजा ये होता है कि पहले जिस फिल्म को बेकार कहा, बॉक्स ऑफिस के हिसाब से पिट जाने वाला बताया, वो फिल्म जब चल गयी तो अपनी बात बदल दी। रब ने बना दी जोड़ी के बेकार कहा और जब फिल्म चल गयी तो ऑडिएंस की समझ पर ही सवाल उठा दिए। फिल्मी पंडित फिलम की समीक्षा नहीं करते। फिल्म रीलिज होने के पहले हमसे दुनिया भर के सवाल पूछते हैं। वो सारे सवाल फिल्मों को बिना देखे करते हैं, उनमें एक तरह के एजेम्पशन होते हैं, पहले से बनी-बनायी धारणा होती है और उसी को सवाल के तौर पर रख देते हैं।( बीबीसी एक मुलाकात में संजीव श्रीवास्तव के साथ अनुराग कश्यप की बातचीत, रेडियो वन, १५ फरवरी २००९, १२.४८ बजे)।
संजीव श्रीवास्तव के इस सवाल पर कि आप फिल्म क्रिटिक को किस रुप में लेते हैं, अनुराग कश्यप ने साफ कहा- ये अच्छी बात है कि फिल्म क्रिटिक होनी चाहिए। लेकिन फिल्म क्रिटिक के नाम पर जो हो रहा है, क्या उसे फिल्म क्रिटिक कहा जा सकता है। ये हमारे यहां ही होता है कि फिल्मों को बॉक्स ऑफिस या फिर ऑडिएंस की पसंद के साथ बांध देते हैं। बाहर ऐसा नहीं होता।
अनुराग कश्यप फिल्मी समीक्षा को जिस तरह बॉक्स ऑफिस के साथ बांधने पर( ये मानते हुए कि इस लिहाज से फिल्मों पर बात होनी चाहिए लेकिन सिर्फ यही न हो) आपत्ति जताते हैं, कमोवेश यही हाल मीडिया की आलोचलना के संदर्भ में भी है। हम मीडिया की आलोचना टीआरपी जैसे चालू शब्दों को लेकर करते हैं। हमें पता ही नहीं चल पाता कि हम टीआरीपी जैसे सिस्टम की आलोचना कर रहे हैं या फिर मीडिया की। फर्ज कीजिए अगर टीआरपी जैसा भोकाल मीडिया से चला जाए तो आलोचना का आधार क्या होगा, क्या ये संभव है कि हम टीआरपी के बाहर जाकर भी मीडिया आलोचना के कुछ तर्क विकसित करें। समीक्षा के नाम पर सिर्फ बॉक्स ऑफिस को ध्यान में रखकर की गयी समीक्षा पर्याप्त नहीं है। ऐसे में तो बात सिर्फ मेनस्ट्रीम, फार्मूला बेस्ड और चालू मुहावरे से जड़ी फिल्मों की ही हो पाएगी, बाकी की फिल्मों का तो कोई सेंस ही नहीं रह जाएगा।
दूसरी स्थिति है कि ऑडिएंस के लिहाज से इन फिल्मों की समीक्षा की जाए। ऑडिएंस किसी फिल्म को किस रुप में लेती है या ले रही है। इसमें इस बात की गुंजाइश बढ़ती है कि ऐसी फिल्मों पर भी विचार किया जा सकेगा और किया भी जाता है जो कि बॉक्स ऑफिस के खेल से बाहर है। बॉक्स ऑफिस पर बहुत अच्छा नहीं करने पर भी माइल स्टोन के तौर पर जानी जा सकती है। कहीं और न जाकर हम अनुराग कश्यप की फिल्म को ले सकते हैं- सत्या, नो स्मोकिंग, ब्लैक फ्राइडे। इसे आप ऐसे भी कह सकते हैं कि ऑडिएस आधारित समीक्षा का मतलब है सिनेमा के साथ सोशल इफेक्ट को जोड़कर देखना। लेकिन सोशल इफेक्ट इतना लिनियर और सिंगुलर वर्ड है क्या। आप जैसे ही सोशल इफेक्ट पर आते हैं आपको बिना देखे-समझे दर्जनों फिल्मों के प्रति विरोध झेलने पड़ जाते हैं, संस्कृति, परंपरा, नैतिकता औऱ भी न जाने क्या-क्या। यह सब कुछ ऑडिएंस रिएक्शन के नाम पर, सोशल इफेक्ट के नाम पर।.......आखिर मामला क्या है। अनुराग कश्यप के शब्दों को ही लें तो इश्यू को लोग बहुत कन्जर्वेटिव तरीके से लेते हैं। एक ने कहा- यार तुमने देव डी बड़ील गर फिल्म बना दी है। मैंने कहा- उसमें तो कुछ दिखाया भी नहीं। उन्होंने कहा- तुम लड़की को रजाई लेकर खेत भेजते हो, यहां तक तो चलो फिर भी ठीक है लेकिन, ये क्यों कि तुम्हारे बाल बहुत हैं, सबकुछ ध्यान में आने लगता है। अनुराग का कहना है कि ये जो व्लगरिटी है वो किसमें है, कहां है। सप्रेस्ड सेक्सुअलिटी पर जब स्त्रियां बात करने लगे, सोचने लगे तो पुरुषों को भारी परेशानी होने लगती है औऱ खुद मस्ती जैसी फिल्में देखेंगे। दोहरे चरित्र के साथ जीनेवाले होते हैं ऐसे पुरुष।
मामला क्या, अलग-अलग मसलों को लेकर नमूने पेश न भी करें तो एक बात साफ है कि सोशल इश्यू और कल्चर के नाम पर जो बातें की जाती है, चाहे वो सिनेमा के स्तर पर हो या फिर इवेंट के स्तर पर, बात करते वक्त सबों के दामन इतने छोटे कर लिए गए हैं कि जरा-सा कहीं कुछ धुआ नहीं कि हो गया दामन मैला। इस क्रम में यह भी देखना जरुरी नहीं समझा जाता कि जिस ऑडिएंस इफेक्ट की बात कर रहे हैं, वो किस हद तक बदल चुकी है या फिर वो ऑडिएंस औऱ सिटिजन अलग-अलग रुपों में अपनी पसंद-नापसंद रखती है। सिनेमा समीक्षा का एक बड़ा है हिस्सा इसी खांचे में कैद है।
इसलिए फिल्म की नयी समीक्षा पद्धति में सोशल रिएक्शन और इम्पैक्ट से ज्यादा जेनरॉ पर बात किया जाना अनिवार्य समझा जाने लगा है। सिनेमा को इस लिहाज से देखने में टिमॉती सैरी(2002) की किताब जेनरेशन मल्टीप्लेक्सः दि इमेजेज ऑफ इन कॉन्टेम्पररी अमेरिकन सिनेमा नयी समझ देती है। कैसे हम जेनरॉ, सोशल इफेक्ट, सिनेमा और सोशल इश्यू के साथ घालमेल करते हैं और दूसरी तरफ बदलाव की सारी उम्मीद इसी सिनेमा से लगा बैठते हैं।
सफाई- अनुराग कश्यप के बोल गए शब्द कुछ इधर-उधर हो गए हैं, लेकिन भाव वहीं है।
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