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ताप्ती गुहा ठाकुरता ने अपनी बात रखने के पहले ही ये स्पष्ट कर दिया था कि वो बंगाल के दुर्गा पूजा को लेकर कोई धार्मिक इतिहास प्रस्तुत नहीं करने जा रही है. उसके तुरंत बाद ही दुर्गा पूजा के लिए पूजा प्रोडक्शन शब्द प्रयोग करने( जो कि अंत तक बना रहा) से ये स्पष्ट हो गया कि वो दुर्गा पूजा को लेकर एक ऐसे अध्ययन की बात कर रही है जो कला( और वो भी अभिजन,स्थायी और विमर्श का नहीं) के उद्योग से संबंधित है, जिसका करीब चालीस करोड़ रुपये का कारोबार है, जिससे करीब 2000 लोगों का करिअर जुड़ा है और जिसमे बाजार,ब्रांड,मार्केटिंग,स्पांसरशिप के वो तमाम दांव-पेंच शामिल हैं जो किसी भी दूसरे उत्पाद को लेकर होते हैं. और इन सबके बीच खुद कोलकाता को एक ब्रांड शहर बनाने में इस पूजा कितना और किस तरह से काम में लाया जाता है, ये भी जानना उतना ही दिलचस्प है जिससे अध्ययन का एक सिरा सिटी स्पेस की तरफ भी बढ़ता जाता है.

 ठाकुरता ने इसे कोलकाता से बिल्कुल अलग-थलग तीन पूजा प्रोडक्शन से जुड़े आर्टिस्ट की केस स्टडी को शामिल करते हुए विस्तार से बताया कि कैसे ये तीनों, अपने-अपने स्तर पर ब्रांड निर्माण और स्थापना के काम में लगे रहे हैं, जिन्हें कला कहा भी जाए,ये अपने आप में विवादास्पद है खासकर तब जब उनमे से एक के काम( पंडाल और मूर्ति) के प्रमुख स्पांसर आइटीसी( आमार सोनार बांगला) के होने के बावजूद टेरिक ऑबराय को ये पता नहीं कि ये किनका काम है और वो नाम किसी जातिवाचक संज्ञा में तब्दील हो जाता है. पूजा प्रोडक्शन के माध्यम से ठाकुरता ने अपार श्रद्धा, परंपरा और संस्कृति का हिस्सा माने जाते रहनेवाले दुर्गा पूजा के बीच ब्रांड पोजिशनिंग,पैकेजिंग,स्पॉन्सर्स द्वारा कला को परिभाषित करने के दुस्साहस आदि पर बड़े ही दिलचस्प ढंग से अपनी बात कही. इस विषय पर आनेवाली उनकी किताब जिस पर कि वो पिछले बारह साल से काम कर रही हैं और जिसका कि हमें बेसब्री से इंतजार है, मार्केटिंग, विज्ञापन और उपभोक्ता संस्कृति में दिलचस्पी रखनेवालों के लिए एक जरुरी किताब होगी.

वैसे तो संस्कृति के उद्योग बनने और अपने उसी मिजाज से काम करने को लेकर थ्योडोर अर्डोनो की संस्कृति उद्योग से लेकर हर्बर्ट मार्कूजे और अब सिल्वरस्टोन की सैद्धांतिकी को पढ़ते आए हैं लेकिन पॉपुलर संस्कृति और दृश्यगत संस्कृति( visual art) के अध्ययन की पाठ सामग्री के रुप में ठाकुरता का ये कम बेहद दिलचस्प है और एक नए किस्म के नजरिए का विकास है कि जिसे अभी तक हम संस्कृति,परंपरा,लोक व्यवहार आदि के अन्तर्गत विश्लेषित करते आए हैं, उसे अगर रिलाएंस और टोएटा जैसे दूसरे हजारों ब्रांड के विश्लेषित करने के औजार से समझने की कोशिश करें तो कितना कुछ अलग,नया और दिलचस्प हो जाता है..मीडिया अध्ययन के लिए संयोग से ये काम पहले हो चुका है.


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1 Response to 'दुर्गा पूजा सिर्फ आस्था का नहीं ब्रांडिंग का भी मामला है'
  1. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/07/blog-post_9241.html?showComment=1374860173592#c7908614096636917473'> 26 जुलाई 2013 को 11:06 pm

    'दुर्गा पूजा सिर्फ आस्था का नहीं ब्रांडिंग का भी मामला है'

    अच्छा! सही ही है। अब तो हर किसी की ब्रांडिंग हो रही है। :)

     

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