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अच्छे भले शरीर का
अचानक कटे पेड़ के माफिक
बिस्तर पर गिर जाना,
चहकते चेहरे का एक गुमसुम
पोटली में बदल जाना
आंखों की नीली-सफेद वृत्तियों पर
सपेने के बजाय उदासी का तैरने लग जाना
मिट जाना सुबह और शाम के फर्क का
एक-एक करके सारे संबंध औ संबोधन
लगने लग जाते हैं किनारे
जैसे तालाब में पत्थर के डूबने के साथ ही
तरंगों की चकरियां ओझल होती चली जाती है
सचमुच बीमार होने की इस भाववाचक संज्ञा का होना
कितना नकारात्मक है !

तब हम अपने हाथ पर छूने का
आंखों के ठीक-ठीक देखे जाने का,
दिल-दिमाग के चुस्त रहने का भरोसा नहीं कर पाते
हम एक टूटे-बिखरे खिलौने के मानिंद
अक्सर खोजने लगते हैं भावना की एक पेचकस
जो भावों की ढीली पड़ी पेंच को कसता चला जाए
और जितनी जल्द हो सके झुठला ला सके
इस नाकारात्मक शब्द को.

क्या करते हैं हम बीमार होने पर वैसे
कीबोर्ड पर किटकिटाती उंगलियां लग जाती है
टेबलेट छिलने में, चम्मच में सिरप उड़ेलने
आंखे एक्सपायरी डेट पढ़ने में और कान
सांसों की आवाजाही सुनने में
और मन ?

और मन इन सबसे अलग भावों की वो पेचकस न मिलने पर
उदास नहीं होता है
वो तब लग जाता है नए सिरे से
इसी बिखरे खिलौने के बीच संबंधों को खोजने में
वो तब कलेजे में खोज निकालता है एक मां,
भाग-भागकर काढ़ा बनाती बहन, डांट-डपट करता भाई
और नसीहतों के पुलिंदे फेंकते पापा
लेकिन ये बहुत देर तक थोड़े ही न टिक पाते हैं अपने इसी रुप में
वो जल्द ही बंट जाते हैं मुक्तिबोध के मैं और वह में
बिखरे खिलौने जैसा शरीर वह हो जाता है
और ये सब मिलकर मैं
और ये खुद में खुद को खोजने की कोशिश
अनवरत तब तक चलती रहती है
जब तक थर्मामीटर का पारा गिरकर सामान्य पर
न अटक जाए
उगलियां कीबोर्ड पर फिर से न थिरकरने न लग जाए
सुबह और शाम का फर्क दो ध्रुवों में बंटा न दिखने न लग जाए
इस पूरी प्रक्रिया में हम सच में कितना प्यार करने लगते हैं खुद से
कितनी ममता आती है खुद पर,कितना लाड़ होता है अपने पर
उन बिखरे समय को समेटते हैं, उन भावों को जमा करते हैं
जो सामान्य दिनों पर अटक जाता हैं दूसरों पर, जाया कर देते हैं दूसरों पर लेकिन
इस मैं और वह में कैसे बारी-बारी से हम बनते हैं जायसी के आशिक
और कबीर के राजाराम भरतार.

ये सब चलता है बीमार होने के उसी नकारात्मक भाववाचक संज्ञा के भीतर
जब सारे संबंध और संबोधन तालाब के छल्ले की तरह किनारे लगने लगते हैं
औपरचारिक होने की जिद में फंसे के बीच हम एक मुद्दा भर बनकर चर्चा में होते हैं
सोचिए तो कितना खूबसूरत है न बीमार होने की पीड़ा के बीच इस बीमार शब्द का होना
जब शुरु होते हैं भीतर के कई प्रोजेक्ट जिसे हमने बहुत पहले
पता नहीं किस नाउम्मीदी में,किसके भरोसे
अधूरी छोड़कर निकल आए थे.
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3 Response to 'बीमारीः एक भाववाचक संज्ञा से गुजरते हुए'
  1. प्रवीण पाण्डेय
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/07/blog-post_11.html?showComment=1373557302025#c907549362918971217'> 11 जुलाई 2013 को 9:11 pm

    मन जब तक अपने आयामों को छूकर न आने लगे, अशक्त सा ही लगता है।

     

  2. chavanni chap
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/07/blog-post_11.html?showComment=1373566743130#c7415383516504564856'> 11 जुलाई 2013 को 11:49 pm

    जल्‍दी स्‍वस्‍थ हों।

     

  3. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/07/blog-post_11.html?showComment=1373598805076#c7240365335355266583'> 12 जुलाई 2013 को 8:43 am

    fatafat theek ho jaao bhai. kavita chakachak hai.

     

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