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इन दिनों टेलीविजन संसद में थाली विमर्श जोरों पर है. ऐसे जैसे कभी पूरी राजनीति राम जन्मभूमि मंदिर-मस्जिद विवाद की तरफ लप्प( झुकना) जाती है तो कभी मोदी बयान पर कल्टी खाने लगती है. इस थाली की सियासत की अपनी कहानी है जो हमारे ट्विट और एफबी स्टेटस की तरह जल्द ही गुम हो जाएंगे..लेकिन इस थाली शब्द के दिन-रात कान में गूंजते रहने के बीच क्या हम पांच रुपये या 12 रुपये की थाली की कल्पना से खिसककर एक ऐसी थाली की कल्पना के बजाय सीधे किचन में बनाने घुस सकते हैं, जिनकी दोस्ती-यारी,प्यार-मोहब्बत में खिलाने पर कोई कीमत न हो और अगर दिन-दशा खराब होने लगे तो जीने लायक पैसे मिल जाएंगे. इसी तुक्का-फजीहत में अपने तैयार की शनिवारी थाली. हमारे रेगुलर पाठकों के लिए भारी-भरकम विमर्श के बीच ये निहायत ही बकवास पोस्ट लगे लेकिन क्या पता इनसे कुछ जो आए दिन संतनगर,बुराड़ी,पांडवनगर में अकेले हडिया हिलाते-डुलाते रहते हैं, उन्हें इस शहर में यारबाजी का एक विकल्प मिल जाए, बस इसी नीयत से-

शनिवारी थालीः बैचलर्स किचन की खास पेशकश




खाद्य सामग्रीः कढ़ी, भात( चावल नहीं), आलू भुजिया, पापड़, खीरे की सलाद

कढ़ी के लिए 100 सौ ग्राम चने की दाल और 25 ग्राम मूंग डाल लें और 10 मिनट तक पानी में भिगोंकर रखें. बरसात का मौसम है सो बेसन की जगह तुरंत दाल पीसी हुई इस्तेमाल करना ज्यादा सही होगा. दस मिनट बाद इसे मिक्सर ग्राइंडर में अच्छी तरह पीस लें. पीसने के पहले दो चम्मच पानी दाल में मिलाएं.

इस पीठ्ठी से सात-आठ छोटे-छोटे पकौड़े तलकर एक तरफ रख लें. बाकी में सौ ग्राम के करीब दही मिलाएं, साथ में रंग आने लायक हल्दी और स्वाद के हिसाब से नमक और एक भगोने में सारी सामग्री डाल लें. मिक्सर पॉट में जो पीठ्ठी लग रह जाए उसे भी पानी से धोकर इस भगोने में डाल दें ताकि बिल्कुल भी कुछ बर्बाद न हो. भगोने की सामग्री को ब्लेंडर से अच्छी तरह मिला लें ताकि ये तरल बिल्कुल हल्का हो जाए.

इधर कड़ाही गर्म करें और दो चम्मच सरसों का तेल डालें और गर्म होने तक इंतजार करें. गर्म होते ही इसमे करी पत्ता( बालकनी के गमले से), तेजपत्ता( पुष्कर की मां ने दुमका से लाकर एक साल पहले दिए थे सो अभी तक चल रहा है), काली सरसों, दस दाना जीरा, एक लाल मिर्च के दो टुकड़े( इससे बहुत प्यारा रंग खिलकर आता है कढ़ी में) डाल दें. इसके बाद तरल को कडाही में डाल दें और खौलने तक इधर दूसरा काम करें.

तब तक एक छोटे से खीरे के छिलके उतार लें और फ्रेंच पोटेटो आकार में काट लें. एक टुकड़ा नींबू मिलाएं और एक चुटकी नमक ताकि पानी छोड़ने पर आपको खाने के आखिर में दो-चार बूंद सिरका पीने में मजा आए. एक भगोने में दो मुठ्ठी चावल डालें, अच्छे से धोकर पानी के साथ भात बनने के लिए चढ़ा दें. आमतौर पर बैचलर्स कूकर में चावल बनाना पसंद करते हैं लेकिन इससे उसके कार्बोहाइड्रेटस उसी में रह जाते हैं और लंबे समय तक ऐसा खाने से कब्ज और मोटापे की शिकायत हो सकती है. सो समय हो तो चावल भगोने में बनाए और बाबा नागार्जुन का भात और रघुवीर सहाय की चित्रित स्त्री की तरह माड़ पसाने का अभ्यास करें. बिल्कुल अलग स्वाद मिलेगा. दोनों चूल्हें पर कढ़ी और चावल पकते रहेंगे.

दो मंझोले आकार के आलू काटें. जैसे मैकडी में पोटेटो फ्रेंच मिलते हैं, उसी तरह और अच्छे से धोकर चूल्हा फ्री होने का इंतजार करें. कढ़ी उबलने लगी होगी तब तक. इसे लगातार चलाएं और जमने न दें. करीब दस मिनट तक चलाएं और फिर उतारकर एक ग्राम हींग डालकर थोड़ी देर के लिए ढंक दें. कढ़ी तैयार. उधर चावल भी तैयार हो गया होगा तो माड निकालकर अलग कर लें. भात भी तैयार.

अब कहाड़ी में थोड़ा जीरा, एक हरी मिर्च डालें और लाल हो जाने पर कटे आलू डाल दें. पांच मिनट इंतजार करें और फिर सिर्फ नमक और हल्दी डालें. डीयू के हॉस्टल में लाल मिर्च और धनिया के पाउडर भी डालते हैं, आप चाहें तो डाल सकते हैं. मैं तो हल्दी नमक के अलावे कुछ नहीं डालता.

इस बीच एक पापड़ निकाल लें और दोनों तरफ बटर की लेप चढ़ा दें. और तब उसे आग पर सेकें. बटर लगाकर आग पर सेंकने से तलकर पापड़ खाने जैसा मजा भी मिलेगा और पकाकर खाने के सोंधेपन का जबकि शरीर में तेल की मात्रा कम जाने से केलेस्ट्रॉल की समस्या भी नहीं. पकाते समय ही अपने मिजाज के अनुसार इसे शेप दें. बांसुरी की तरह लंबी, त्रिभुज या फिर जैसे मैंने दोसे की तरह डबल फोल्ड कर दिए हैं वैसे. फोल्ड करने से पापड़ लंबे समय तक कुरकुरे रहते हैं और आप बिल्कुल आराम से बाइट ले सकते हैं. चूल्हे पर आपकी भुजिया भी तैयार हो गई होगी जिसे आप एक छोटी प्लेट फंसाकर तेल पूरी तरह निकल जाने पर दूसरे बर्तन में डाल सकते हैं. आपकी सारी सामग्री तैयार है और बस क्राकरी निकालकर शनिवारी थाली सजानी है. थाली सजते ही फेसबुक के लिए बारी-बारी से सबकी तस्वीरें उतारें और फिर खाना शुरु कर दें. पहले अपलोड करने लगेंगे तो आधी से ज्यादा चीजें अपने मूल स्वाद से बिदक जाएगी.
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4 Response to 'सियासत से दूरः इश्क-मोहब्बत,दोस्ती-यारी में मुफ्त की थाली'
  1. देवेन्द्र पाण्डेय
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/07/blog-post_27.html?showComment=1374924580324#c5270199009926750881'> 27 जुलाई 2013 को 4:59 pm

    हा हा हा..मस्त पोस्ट है। बनाना पड़ेगा।

     

  2. प्रवीण पाण्डेय
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/07/blog-post_27.html?showComment=1374931745654#c4719146476724280980'> 27 जुलाई 2013 को 6:59 pm

    पढ़ ली और रसोइये को बनाने के लिये कह भी दी, कुछ कुछ बैचेलर की तरह लगने का मन कर रहा है।

     

  3. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/07/blog-post_27.html?showComment=1374941900993#c3035260777393397137'> 27 जुलाई 2013 को 9:48 pm

    चकाचक खाना है। अपन तो बेचलर किचन का स्वाद चख भी चुके हैं। :)

     

  4. काजल कुमार Kajal Kumar
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/07/blog-post_27.html?showComment=1375001324181#c6442029513118769958'> 28 जुलाई 2013 को 2:18 pm

    थालीवि‍मर्श सत्‍ता की सीढ़ी है

     

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