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वैसे तो शुभ्रांशु चौधरी की किताब- let's call him basu( उसका नाम वासु नहीं) माओवादी दुनिया को समझने के लिए बेहरीन किताबों में से एक है. किताब की सबसे खास बात है कि हार्ड कोर फील्ड रिपोर्टिंग का हिस्सा होते हुए, तथ्यात्मक होते हुए भी इतनी लिरिकल है कि आपको इसे राग दरबारी और मैला आंचल जैसी क्लासिकल उपन्यास की तरह बीच में छोड़ने का मन नहीं करेगा. शुभ्रांशु ने बीहड़ जंगलों, पठारों और कई अंधेरी रातों की यात्रा करके जो कुछ हमारे सामने पेश किया है, वो तथ्यात्मक होकर भी अपने मिजाज में किस्सागोई का सुख देता है. लेकिन
इस किताब को मीडिया और रिपोर्टिंग की जरुरी किताब के रुप में भी पढ़ा जाना चाहिए. पन्ने दर पन्ने ये किताब बताती है कि इस देश में मेनस्ट्रीम मीडिया पत्रकारिता के नाम पर क्या कर रहा है जिसमे निजी मीडिया के साथ-साथ पब्लिक ब्रॉडकास्टिंग तक शामिल है. निजी मीडिया जो आए दिन सरकार और उसकी नीतियों से असहमत और उसे लेकर गरजता-दहाड़ता दिखाई देता है वो दंतेवाड़ा जैसी जगह में कैसे सरकार की एक मशीनरी और उसकी नीतियों का हिस्सा बनकर रह जाता है. शुभ्रांशु ने एक जगह ये भी स्पष्ट किया है कि जिस तरह की बात और रिपोर्टिंग हमने इस किताब के जरिए की है, वो बीबीसी में रहते हुए संभव नहीं था. ऐसे में आप जब इस पूरी किताब से गुजरेंगे तो मीडिया को लेकर ऐसे कई मिथक ध्वस्त होते चले जाएंगे जो सालों से पालकर रखे हैं. जिनमे से एक ये भी है कि आकाशवाणी की पहुंच और लोगों के बीच इसकी जबरदस्त पकड़ के बीच शुभ्रांशु का एक वाजिब सवाल भी है कि- सन 2001 की जणगणना के अनुसार देश में 27 लाख गोंड़ी भाषी हैं केवल 14000 लोग संस्कृत बोलते हैं. लेकिन फिर भी ऑल इंडिया रेडियो में संस्कृत में कई बुलेटिन प्रसारित किए जाते हैं और गौंडी का एक भी नहीं.

आंतकवाद,माओवाद से लेकर भ्रष्टाचार जैसे गंभीर मुद्दों पर फील्ड की रिपोर्टिंग के बजाय एडीटिंग मशीन पर पैकेज बनाए जाने की आपाधापी के बीच शुभ्रांशु की ये विकट फील्ड रिपोर्टिंग कई उन तथ्यों को सामने लाती है जो कि मुख्यधारा मीडिया में स्थापित मान्यताओं का हिस्सा बन गए हैं. मसलन उनकी किताब बताती है कि ईमानदार अधिकारी के प्रति एक माओवादी क्या राय रखता है- "हमें पुलिस पर हमला करने के आदेश नहीं थे लेकिन पुलिस के हमारे उपर हमले जारी रहे. मुझे एक निर्भीक पुलिस अफसर आज भी याद है,डीआईजी अयोध्या नाथ पाठक. जब तक वे रहे उन्होंने हमारी नाक में दम कर दिया. उनके बाद कोई ऐसा अफसर नहीं आया". सोनू की आवाजा में आदर का भाव साफ सुनाई दिया.

कॉमरेड सोनू जिस पुलिस अधिकारी की बात कर रहा है, वो अधिकारी माओवादियों को लेकर कुछ इस तरह की राय रखते हैं- "माओवादी सच्चे और समर्पित लोग हैं. ये भोले-भाले लोगों को नहीं मारते, " भोपाल में घर पर हुई एक मुलाकात में सेवानिवृत पाठक ने मुझसे एक मुलाकात में कहा था. उन्होंने बताया था, "मैंने उनकी कमजोर नस टटोलने की बहुत कोशिश की- लेकिन वे साधारण आदमियों की तरह नहीं हैं. आम तौर पर हर आदमी या तो धन या शबाब पर नीयत खराब कर लेता है- फिर उसे आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है. लेकिन ये लोग बिचलित नहीं होते. अगर उनके साथ लड़ना है तो उनकी तरह होना होगा और उनकी तरह सोचना होगा." इसी तरह एक और वाक्या का जिक्र-
चाय पर दंतेवाड़ा के पुलिस प्रमुख राहुल शर्मा ने कहा "सबसे बड़ी समस्या है कि आदिवासी को लालच नहीं है.अगर वे लालची होते तो समस्या का जल्दी हल हो जाता." "हमें गांवों में टीवी दे देना चाहिए, तो यह समस्या जल्दी हल हो जाएगी." यह बात मैंने पहले भी सुनी थी. मेरे पत्रकारिता के गुरु और लातिनी अमेरिका के विशेषज्ञ जॉन रेट्टी की राय थी कि "जो कुछ अमरीकी सेना सालों से नहीं कर पायी,टोवी ने कर डाला.इसने सातिन अमरीका की संस्कृति की आदिवासी संस्कृति का विनाश कर दिया, और उसकी सामूहिक शक्ति की लड़ाई का भी."

इस तरह के प्रसंग, संदर्भ और उदाहरण किताब में कई जगहों पर हैं बल्कि ये कहा जाए कि पूरी किताब की टेक्सचर इन्हीं प्रसंगों से बनी है जो परस्पर एक दूसरे से धुर-विरोधी ध्रुवों पर खड़ी होकर इकठ्ठी किए जाने के बावजूद इस बेचैनी को शामिल करती है कि जैसा और जिस तरह से मेनस्ट्रीम मीडिया ने देश के मुद्दों की शक्ल लाखों-करोड़ों लोगों के सामने पेश की है, दुनिया वैसी नहीं बल्कि उससे बिल्कुल अलग है. ये टेक्सचर किताब को जितना विश्वसनीय बनाते हैं उतना ही पत्रकारिता में तटस्थता की अनिवार्यता को भी रेखांकित करते हैं. कहीं से आपको नहीं लगेगा कि शुभ्रांशु जैसे मेनस्ट्रीम मीडिया एक पार्टी( कभी सरकार की तो कभी कार्पोरेट की) खड़ा होकर बात करते हैं ने किया है. वो ऐसे मीडिया से अपने को निकालकर स्पष्ट रुप से एक पत्रकार के रुप में निखरते हैं.  यहीं पर आकर आप ये बात शिद्दत से महसूस कर पाते हैं कि हमारा मीडिया पाठक और शर्मा जैसे पुलिस अधिकारी जैसा भी ईमानदार नहीं जो कार्रवाई तो आदिवासियों और माओवादियों के विरोध में करते हैं लेकिन उन्हें अपनी पूरी बातचीत में सही-सही संदर्भों में प्रस्तुत करते हैं. यहां मीडिया सरकार और सत्ता से कहीं ज्यादा क्रूर और निकम्मा नजर आने लगता है. हां, इन सबके बीच अगर आप किताब के हिन्दी संस्करण से गुजरते हैं और आरएसएस के स्वयंसेवक का अनुवाद संत देखते हैं तो वैचारिक स्तर पर नहीं भी तो भी ये जरुर लगेगा कि स्वयंसेवक तो इतना लोकप्रिय है, अलग से संत शब्द का प्रयोग करने की क्या जरुरत है ?

पूरी किताब अगर कोई मीडियाकर्मी पढ़ता है, मीडिया के छात्र पढ़ते हैं तो ये उन सबसे की गई एक अपील सी लगेगी कि पत्रकारिता की मूल जमीन फील्ड की रिपोर्टिंग है न कि लुटियन जोन,आइटीओ से जारी प्रेस रिलीज के वाक्य-विन्यास बदलकर और संबंधित व्यक्ति की बाइट नत्थी करके नोएडा फिल्म सिटी में पैकेज तैयार कर देना. किताब की ये लाइन हमेशा याद रह जानेवाली है- जिसकी झोपड़ी जलाई गई, उससे तो पूछते हो कैसा लग रहा है, कभी उससे भी पूछो जिसने जलाई है.

किताब की कवर पेज पर विद द माओइस्ट इन छत्तीसगढ़ लिखा देखकर संभव है कि दूसरे लोग तो छोड़िए, रक्षासूत्र लाल धागा बांधकर पीटूसी करने और करने की तैयारी में लगे सैकड़ों छात्र इस किताब को पलटना तक जरुरी नहीं समझेंगे लेकिन अगर वो ऐसा करने का साहस और तत्परता जुटा पाते हैं तो ये बात बात गहराई से समझ सकेंगे कि चंद अवधारणाओं को अधकचरे तथ्यों के बीच तैरनेवाले मीडिया के बरक्स फील्ड में उतरकर तथ्यों को जुटाने से पत्रकारिता की तस्वीर कितनी बदल जाती है. अगर शुभ्रांशु के पास इस किताब से संबंधित कच्ची सामग्री जो कि किताब का हिस्सा नहीं बनने पाई है ( जाहिर है, सैकड़ों पन्ने में होगें) तो उससे एक अलग किताब निकल सकती है जो ये प्रस्तावित करेगी कि न्यूजरुम/एडीटिंग मशीन को अंतिम सत्य मानकर किए जानेवाले मीडिया धंधे से अलग पत्रकारिता का मिजाज कैसा होता है ? मीडिया संस्थानों और पत्रकारिता के नाम पर करोड़ों रुपये की दूकान चलानेवाले मीडिया स्कूलों ने रिपोर्टिंग का मतलब जो माइक लगाकर मैंगो फेस्टीबल कवरेज तक समेट दिया है, ये किताब इस बड़ी जालसाजी पर सेंध लगाएगी. आज की मीडिया दुनिया में ऐसे एक उदारहरण की जरुरत तो है ही. 


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2 Response to 'ये किताब जितनी माओवाद पर है, उतनी ही मेनस्ट्रीम मीडिया पर भी'
  1. Sujit Sinha
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/07/blog-post_22.html?showComment=1374509793659#c1784872130743364663'> 22 जुलाई 2013 को 9:46 pm

    kis praksha se pustak prakasit hui hai? kahan se kharidi jaa sakti hai?

     

  2. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/07/blog-post_22.html?showComment=1374860034483#c802520780161804741'> 26 जुलाई 2013 को 11:03 pm

    बहुत अच्छी पोस्ट लगी। ये किताब पढ़ने का मन हो आया। :)

     

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