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अरुण प्रकाश से वो मेरी पहली और आखिरी मुलाकात थी. आज से करीब तीन साल पहले अजय ब्रह्मात्मज के साथ हम उनके घर गए. योजना ये थी कि अरुण प्रकाश से भेंट भी हो जाएगी और उनकी पसंदीदा फिल्म उनके साथ बैठकर देखेंगे और अगर वो बात करने की स्थिति में होंगे तो उस पर चर्चा भी करेंगे. हम उनके पास करीब 11 बजे गए और दिनभर उनके साथे रहे.


जब उनके यहां पहुंचे और उनकी हालत देखी तो लगा हमारे साथ सिनेमा क्या वो दस मिनट सहज ढंग से बात तक नहीं कर सकते. थोड़ी देर तक लीविंग रुम में बैठने और चाय पीने के बाद हम उनके बेडरुम में गए जहां एक टीवी लगी थी. वो मशीन से सांस लेने लगे. उसके बाद हमसे बातचीत शुरु की. डेढ़-दो घंटे बाद फिर मशीन चालू किया और फिर से कोई दवाई के साथ ऑक्सीजन लेने लगे. मैं ये सब बहुत ही विस्मय से देख रहा था. सांस लेने के बाद फिर वो इस पूरी प्रक्रिया को समझाने लगे. पहले कैसे सिलिंडर से सांस लेते थे लेकिन वो बहुत मंहगा पड़ता था तो फिर उनके बेटे ने ये मशीन ला दी और अब वो जरुरत के मुताबिक ऑक्सीजन ले पाते हैं. आज से तीन साल पहले ही उनकी हालत बहुत खराब थी और मैं उन्हें देख-देखकर अफसोस कर रहा था कि क्यूं आते ही हमने उन्हें कह दिया कि उनके साथ कोई पसंदीदा फिल्म देखने की योजना है और उस पर बात भी करेंगे. वो तो ये सुनते ही उत्साह से भर गए थे और अजयजी को कहा था- ये कौन सी भारी बात है ?

लेकिन उनकी हालत मुझसे देखी नहीं जा रही थी. वो बहुत ही तकलीफ में थे और यकीन मानिए मैंने जिंदगी में पहली बार किसी के जल्द ही गुजर जाने की कामना की थी. ये जानते हुए कि उनका भरा-पूरा परिवार है. लेकिन मेरे मन में बार-बार एक ही सवाल उठ रहा था कि ये भी जीना कोई जीना है क्या जिसमें इंसान सांस तक न ले सके. उनकी पत्नी उन्हें बार-बार कम बोलने की हिदायत दे रही थी लेकिन वो हमदोनों को देखकर इतने उत्साह में थे कि अपने को रोक नहीं पा रहे थे. और जैसे ही बोलना शुरु करते,जोर की ऐसी खांसी उठती कि फिर रुकने का नाम न लेती और फिर वो मास्क लगा लेते. हमें भीतर से बहुत ग्लानि हो रही थी कि क्यों इनसे बात करने के इरादे से आए. नमकीन से भरी प्लेट और चाय मेरे गले से नीचे किसी भी तरह से उतर नहीं रहा था. अजयजी का भी यही हाल था. मैं खुद भी बहुत लंबी बीमारी से उठा था और खाली पेट रह नहीं सकता था सो मन मारकर कुछ-कुछ खाता जा रहा था. मुझे याद है उन्होंने हमारे साथ फिल्म देखी थी. कौन सी मुझे उस बदहवास स्थिति में बिल्कुल भी याद नहीं. हां सिनेमा पर उन्होंने जो सारी बातें कही, वो टुकड़ों-टुकड़ों में याद है. वो सिनेमा पर लगातार बोलते जा रहे थे. अपने मुंबई प्रवास और संघर्ष की कहानी जिसमें मुझे वाकई बहुत दिलचस्पी बनी हुई थी. लेकिन बीच में जब अजयजी ने बताया कि ये टेलीविजन पर लिखता है और उस पर रिसर्च कर रहा है तो उन्होंने सिनेमा के बजाय टीवी और मीडिया पर बातचीत शुरु कर दी.

उनकी बातचीत से मुझे संतोष हुआ कि उन्हें टीवी की न केवल गहरी समझ है बल्कि वो इसे बहुत ही गंभीरता से लेते हैं. दिवंगत कमला प्रसाद के बाद वो मुझे दूसरे ऐसे गंभीर साहित्यकार/आलोचक मिले जो लगातार टीवी सीरियल देखते हैं. उन्होंने टीवी से जुड़े कुछ पाश्चात्य विद्वानों के काम की चर्चा की और कल्चरल स्टडीज के कुछ उन विद्वानों का नाम लिया जिन्हें कि मैं उन दिनों पढ़ भी रहा था. बीच-बीच में मैं भी कुछ-कुछ बोलता-बताता जा रहा था और वो उससे संतुष्ट भी नजर आ रहे थे. मुझे याद नहीं है कि उन्होंने हमदोनों से कितनी बार कहा होगा कि अच्छा किया आपलोग हमारे पास आए. अजयजी तो मुंबई रहते हैं,तुम मेरे पास आते रहना. तुम्हारा बहुत सारा टीचर हमसे पढ़ा-सीखा है,जाकर बताना आज अरुण प्रकाश से मिलना हुआ. एकाध लेखों को छोड़कर उनका लिखा मैंने कुछ भी नहीं पढ़ा था लेकिन बातचीत से उनके लिखे में क्या तासीर होगी,अंदाजा लगा पा रहा था. चलने के पहले तक की बातचीत सामान्य थी लेकिन जब हमलोगों ने कहा कि अब निकलते हैं तो उन्होंने कुछ उन पुराने प्रसंगों की चर्चा शुरु की जिन्हें सुनते हुए मैं महसूस कर रहा था कि ये शख्स अकेले जब बैठता होगा तो कैसे अपने पुराने दिनों और रुतबे को याद करके कसकता होगा..
अरे विनीत, साहित्य अकादमी का जमाना था..लाइन लगाए रहते थे लोग..अरुणजी ये लिखा है, वो देख लीजिए, यहां चल दीजिए...अब सब विजी है, व्यस्त हो गए..होने दो,समय किसका हुआ है ?

देर रात जब मैंने एफबी वॉल पर प्रियदर्शन की स्टेटस देखी और जिसे पढ़कर जाना कि अरुण प्रकाश हमारे बीच नहीं रहे तो उनका कसकता हुआ वो चेहरा याद हो आया और अब अपने साथी निरुपम की पिछले सप्ताह कही गई वो बात बार-बार टीस मार रही है- अरुण प्रकाश सालों से बीमार चल रहे हैं. उनकी हालत बहुत खराब है. किसी हिन्दीवाले को सुध है उनके बारे में जानने की ? नहीं. देखना न, एक दिन वो भी हमारे बीच से चले जाएंगे और तब यही हिन्दीवाले उन्हें महान,कालजयी,संत करार देंगे और विशेषांक निकालेंगे. हमारा हिन्दी समाज अपने रचनाकारों को लेकर कितना लापरवाह है इसका बस एक नमूना बस महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की वेबसाइट हिन्दी समय डॉट कॉम पर दिए अरुण प्रकाश के पते से ही लग जाता है.

मैं आज से तीन साल पहले उनके घर गया था तो वे मयूर विहार में रह रहे थे और मेरा ख्याल है कि वे अब भी वहीं रहा करते थे. लेकिन वहां दिलशाद गार्डन का पता दिया है. इसका मतलब है कि इस बीच विश्वविद्यालय ने उनसे कोई संपर्क नहीं किया और वही पुराने पते को वेबसाइट ढोए चला जा रही है जिसे कि अरुणजी ने कभी अपनी किताबों में दिया था. दूसरा कि अभी भी वेबसाइट पर लिखा है कि वे साहित्य अकादमी की पत्रिका समकालीन साहित्य का संपादन करते हैं. आप सवाल कर सकते हैं कि क्या इन वेबसाइटों पर लाखों रुपये ऐसी ही पुरानी जानकारियों को भरने पर खर्च किए जाते हैं ? अगर साहित्यकारों को लेकर अपडेट ऐसी वेबसाइट जिसके उपर करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हों पर नहीं होंगे तो क्या इसके लिए अलग से अखबारी इश्तहार का इंतजार करें. हिन्दी या समय किसी हिन्दीवाले की क्या, हमारे ही शरीर में पिछले पांच सालों से हिन्दी फैलोशिप के पैसे से दूध-फल-सब्जी,अनाज, शब्द और समझ जाता रहा कभी अरुण प्रकाश या किसी दूसरे साहित्यकार को पलटकर देखने नहीं गए. पिछले तीन सालों से दिन में दो से तीन बार उनके घर के सामने से गुजरना हुआ फिर भी कभी नहीं. किसी और के बारे में क्या कहें ? मौकापरस्ती और कमीनापन ही हमारा मूल्य बन चुका है तो इसमें अरुण प्रकाश के यहां नहीं जाना या उनका मौजूदा पता अपडेट नहीं करना कौन सी बड़ी बात है.

पिछले कई दिनों से साथी निरुपम कह रहा है- यार,तुम्हारे इधर आना है हमें. सुदीप्ति भी अजमेर से आ गयी है. मैं अंदाजा लगा रहा था कि मेरी तरफ आने में उनलोगों का अरुण प्रकाश के यहां जाना भी शामिल होगा. वो किसी दिन तो अभी तक नहीं आया लेकिन अरुण प्रकाश इसी दिन हमारे बीच से चले गए. सब किसी दिन और इसी दिन के बीच झूलते हुए चले जाएंगे और हम सब अपने को सुदीप्ति और निरुपम की तरह अभागा करार देकर अफसोस करते रह जाएंगे. 
सुधार- रात के बारे में को रक्त के बारे में पढ़े. गौरीनाथ का शुक्रिया.
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5 Response to 'चले गए अरुण प्रकाश, उन्हें तो जाना ही था'
  1. Amrendra Nath Tripathi
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/06/blog-post_19.html?showComment=1340051063409#c6669364484309687903'> 19 जून 2012 को 1:54 am

    क्या कहूं..हमारी नियति ही कुछ ऐसी हो गयी है. कुछ समय के पहले अदम जी के दिवंगत होने के बाद मुझे परिवेश संबंधी बेहद त्रासद अनुभव हुआ था. परिवेश के मौकापरस्त व्यवहार पर एक सी पुनरावृत्ति दिखती है. सही कहा आपने, इसकी अनुभूति उन्हें थी, 'अरे विनीत, साहित्य अकादमी का जमाना था..लाइन लगाए रहते थे लोग..अरुणजी ये लिखा है, वो देख लीजिए, यहां चल दीजिए...अब सब विजी है, व्यस्त हो गए..होने दो,समय किसका हुआ है ?'
    संयोग से मैं अरुण जी से एक ही बार मिला था, एक मित्र मिलने गए थे उन्हीं के साथ, साहित्य अकादमी में. पर हाँ बाद में कभी न मिल पाने की कचोट आज बहुत है. हम अभागे रहे, हमें बदलने की जरूरत है, परिवेश में हम भी तो हैं!

     

  2. जनविजय
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/06/blog-post_19.html?showComment=1340052586673#c7334614022947595155'> 19 जून 2012 को 2:19 am

    कल ही अरुण जी की कहानी ’नहान’ पढ़ रहा था और उन्हें शिद्दत से याद कर रहा था। साहित्य अकादमी में ही उनसे अन्तिम भेंट हुई थी। फिर मिलना नहीं हुआ। याद उन्हें अक्सर करता था। पर कभी उनके बारे में सोचा ही नहीं कि वे कहाँ होंगे, क्या कर रहे होंगे। मुझे तो ये भि पता नहीं था कि वे बीमार हैं। सचमुच हम क्रूर और आत्मकेन्द्रित हो गए हैं। मुझे अब अपनी काहिली और लापरवाही के ऊपर गुस्सा आ रहा है कि मैं मार्च में उनसे मिलने क्यों नहीं गया। जबकि मास्को से यह सोचकर भारत गया था कि इस बार अरुण प्रकाश से मिलना है। लेकिन भारत पहुँचकर भूल गया यह बात। सचमुच दुखी हूँ।

     

  3. प्रवीण पाण्डेय
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/06/blog-post_19.html?showComment=1340064884178#c1113798877530602829'> 19 जून 2012 को 5:44 am

    पहली बार इतना जाना, विनम्र श्रद्धांजलि..

     

  4. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/06/blog-post_19.html?showComment=1340067964570#c8725179376681280773'> 19 जून 2012 को 6:36 am

    अफ़सोस! विनम्र श्रद्धांजलि अरुण प्रकाश जी को!

     

  5. BS Pabla
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/06/blog-post_19.html?showComment=1340126345641#c721540517080319314'> 19 जून 2012 को 10:49 pm

    विनम्र श्रद्धांजलि अरुण प्रकाश जी को

     

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