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लप्रेक ऑफ्टर गैंग्स ऑफ वासेपुर

Posted On 2:52 pm by विनीत कुमार |

रागिनी ! ओह डियर, उठो न. तुम गऊ ( गैंग्स ऑफ बासेपुर ) से आने के बाद इतनी उदास और मरी-मरी सी क्यों हो गई ? चलो-चलो, फटाफट नहाओ और लंच कर लो. फिर आज मल्कागंज भी तो चलना है. हम भी देखें कि रागिनी अपने नए कुर्ते में कैसी खिलती-दमकती है ?


रघु..रघुSssss. अरे पागल, तुम रो क्यों रही हो ? मैं अनुराग को नहीं छोडूंगी रघु, उससे बदला लूंगी. बदला लोगी ? पर किया क्या अनुराग ने तुम्हें, उसने एक बेहतरीन फिल्म ही तो बनायी है, हां गोलियों की आवाज और खून से लथपथ कटे-लटके भैंसे को देखकर कल तुम्हें चक्कर आने लगा था लेकिन आकर मैंने तुम्हें मसाज भी तो किया था घंटों,भूल गई..सिर्फ गोली और बमबारी की है, सिर्फ कटे भैंसे दिखाएं है ?
जानते हो रघु. जितनी तबाही कुरैशियों और पठानों ने आपसी रंजिश में धनबाद में नहीं मचायी होगी, उससे कई ज्यादा गुना बर्बादी इस अनुराग ने मचायी है. जिस धनबाद को लोग पढ़ने-लिखने और कल्चरली रिच टाउन मानते थे न, अब इसे गुंड़ों का शहर समझेंगे. एक बड़े सच को दिखाने के लिए ही सही पर इसने कल्चरली इसको बहुत डैमेज किया है. मेरे बचपन के शहर की धज्जी उड़ा दी रघु. मेरी सारी खूबसूरत स्म़तियों की चिद्दी-चिद्दी कर दी इस इंटल डायरेक्टर ने. वो जब लाल स्कूल ड्रेस में बच्चों को स्कूल जाते दिखा रहा था न तो लगा- अरे ये तो मैं हूं..लेकिन वो बच्चे गायब हो गए. क्या बासेपुर,धनबाद की एक भी लड़की कॉलेज नहीं जाती रघु ? तो फिर तहलका की अनुपमा ने क्यों राइटअप में लिखा कि वहां बहुत सारे डॉक्टर हैं,बहुत सारे इंजीनियर और वहीं रहते हैं. मैं एकटक देख रही थी पूरी फिल्म कि कभी तो इस धनबाद में मेरा देशभर में मशहूर डिनोबली पब्लिक स्कूल दिखेगा, क्या पता सरदार खान का कोई बेटा ही डीपीएस में दिख जाए लेकिन नहीं वो तो अपने बाप की सीन देखने के बाद अचानक से बड़ा हो गया. सीधा हथियार लाने ही चला गया. उसकी टीन एज कहां गयी रघु ? मैं आइएसएम की पैनमैन ऑडिटोरियम खोजती रही, क्या पता कोई वूमनिया सैटेनालिया में आयी हो लेकिन नहीं कहीं नहीं..


मैं अपनी दोस्त रेशमा को याद कर रही थी जिसने सलीम के पहली बार किस किए जाने पर चाउमीन खिलाया था..यहां तो वो परमिशन पर ऐसे अटक गयी कि इम्बैरेस कर दिया. इम्तियाज अली के चरित्र ने हम लड़कियों को खुली तिजोरी(जब बी मेट) कहा और इसमें खुद हमसे अपनी देह को घर कहलवाया. क्या हम लड़कियों का शरीर सिर्फ घर भर है क्या जिसके एक घुप्प अंधेर हिस्से में मर्दों का हवसपुर बसता है. नहीं न रघु. आखिर वजह तो बताओ कि जिस नजमा को दुनियाभर के मर्दों और हवलदारों के आगे चट्टान की तरह दिखाया, उसे अपने हवसी पति सरदार खान के आगे एक समझौतापरस्त औरत. एक ऐसी औरत जो अपनी गृहस्थी बचाने के लिए न केवल ढाई रुपये की रंडी की झांट जैसी गालियां देती है बल्कि अपने अय्याश पति को खिला-पिलाकर इतना पठ्ठा बनाना चाहती है कि गर वो किसी दूसरी औरत के साथ सोए तो उसकी जल्दी चू न जाए..और फिर उसके चूने में नाक किसकी कटेगी रघु ? उसी नजमा की जिसने दमभर खिलाया. क्या गृहस्थी अगर बचाना जरुरी है तो उसके लिए एक स्त्री ही आखिर दम तक समझौते करे और अय्याश मर्द नाड़ा खोलने-बांधने का उपक्रम रचता रहे ? नहीं, वो ऐसा नहीं करेगी, अनुराग के लाख चाहने पर भी नहीं. वो जिस कट्टे से मोहल्ले के बाकी ठरकियों पर वार करेगी, उसी कट्टे से अपने मर्द के सौ ग्राम का बटखरा भी कुट्टी-कुट्टी करके काटेगी जिसने समाज को बहुत भारी बना दिया है.
 
तुम कहोगे कि मैं हर फिल्म,हर किताब,हर कविता में फेमिनिज्म के एंगिल ढूंढने लगती हूं लेकिन बार-बार चूतिया और गांड के बीच हम किस तरह कुचली जा रही थीं,तुम्हें कहां होश था..तुम जब गांड में तार डालकर पतंग उड़ाने पर ठहाके लगा रहे थे न तो लगा तुम्हारे मुंह पर थूक दूं..तुमने पिछले सात दिनों में दोस्तों से बात करते हुए, फोन पर न जाने कितनी बार कहकर ले ली मैंने कहा होगा. क्या कहकर लेने से जितने ईमानदारी का मसीहा तुम मर्द बनते-बनाते दिख रहे हो, उससे तुम्हारे भीतर का घिनौनापन कम हो जा रहा है? कल तुम्हारा मर्दवाद चरम पर था रघु और सॉरी तुम जितने भी प्रोग्रेसिव बनने की कोशिश करो, हम पर बनी गालियां सुनकर तुम और तुम्हारे अनुराग कश्यप उतने ही सटिस्फाय और प्लेजर पाते हो जितना कि दुर्गा को हुमचते हुए वो कमीना सरदार खान. ये गैंग ऑफ वासेपुर नहीं, सॉग्स ऑफ हवसपुर थी रघु..कायदे से इस फिल्म की स्क्रिप्ट की कॉपराइट पर उस सादिक,इमरान,खालिद,जुबैर की होनी चाहिए जो दिनभर मैं सैंकड़ों बार चूतिया बोलता है लेकिन किसी शख्स को नहीं, टायर-ट्यूब को जो सही से सोलेशन लगाने पर भी नहीं चिपकता. उस सिलाई मशीन को जिसकी सुई एक ब्लाउज भी नहीं सिलती कि टूट जाती है. उस तराजू को भोंसड़ी के कहता है जिस पर तीन किलो से ज्यादा की लौकी चढ़ाओ तो कमाची झटक जाती है. हां, सो कॉल्ड रेडिकल अनुराग ने इतना जरुर किया है कि पहले जहां मर्द मादर-बहन की गालियां देते थे, अब वो फीमेल कैरेक्टर के लिए भी उतना ही स्पेस देता है. उसका मर्द चरित्र लाल हुए चादर को चूमता नहीं बल्कि स्त्री चरित्र साईकिल से गद्दे लाती है..वो मित्रो मरजानी बनने की कोशिश करती है लेकिन आत्मा को छू नहीं पाती.. इन सबके बावजूद तुम जैसे लाखों मर्दों को ये फिल्म अच्छी लग रही है,लगेगी क्योंकि तुम इसे सिर्फ और सिर्फ पॉलिटिकल एंगिल से देख रहे हो, कभी अस्मिता और सांस्कृतिक सवालों से जोड़कर देखोगे न तो जिस रिसर्च पर तुम फिदा हो रहे है, कई सारी चीजें दुराग्रह लगेगी जिसमें कुरैशी, पठान और आसनसोल की बंगालिन सब शामिल हैं.

तुम मर्दों में सौ ग्राम का अतिरिक्त अंग आ जाने पर इतना गुरुर क्यों है रघु. मैं आज दिन तक समझ नहीं पायी. इस सौ ग्राम का वजन इतना तो नहीं होता कि पूरी सभ्यता,पूरे साधन,पूरी संस्कृति पर वो भारी पड़ जाए..रागिनी,रागिनी..तुम ठीक कर रही हो..प्लीज रघु,मुझे चुप्प कराने के नाम पर टच करने के बहाने न निकालो. प्लीज मुझे अकेला छोड़ दो..मैुझे कुछ घंटे के लिए अकेले रहने दो. आज नए कुर्ते में नहीं चटखेगी तुम्हारी रागिनी. ठीक है,तुम्हें जो कहना है कहो रागिनी.

मैं सिर्फ इतना भर कहूंगा- तुम सारा गुस्सा अनुराग कश्यप और मुझ पर उतारने के बजाय इस सिरे से सोच सकती हो थोड़ी देर के लिए कि तुम्हारे पापा ने 15 साल तक तुम्हें उस शहर में रखा. तमाम सुविधाएं दी,दुनियाभर की आजादी भी. लेकिन क्यों फलां रास्ते, फलां गली में जाने से मना करते रहे..और वो भी सिर्फ इसलिए कि वहां मुसलमान रहते हैं. माफ करना रागिनी. तुम्हारे पापा ने तुम्हें ग्लोब,टाइगर्स आइ सीरिज और अब लैपटॉप भले ही दे दिए हों लेकिन उन मोहल्ले और गलियों में जाने की इजाजत कभी नहीं दी जहां हिन्दुस्तान का एक दूसरा ही सच धूप में सूख रहा है, बारिश में भींग रहा है और ठंड में ठिठुर रहा है. जिस पापा ने तुम पर लाखों खर्च करके वो समझ औऱ विजन तुम्हारे भीतर नहीं पैदा होने दिया, वो अनुराग ने 300 में देने की कोशिश की..फिर भी तुम उसे सामंती कहती हो, पट्रियारकल कहती हो. कहो,जितनी बार मन करता है कहने का कहो..तुम्हारी फेमिनिस्ट दुनिया में हम पुरुषों के लिए उतनी ही बड़ी बिडंबना है जितना कि बंद समाज में खुलकर वाली स्त्री के लिए चरित्रहीन करार दे दिया जाना...हम कुछ और नहीं कह सकते. बस एक बात प्लीज अपना गुस्सा इस लंच पर न उतारो. कल तुमने ही तो कहा था न कि अनुराग ने ये फिल्म हम दोनों के बीच दरार पैदा करने के लिए नहीं बनायी है...


फुटनोटः- लप्रेक यानि लघुप्रेम कथा जिसके जनक/प्रवर्तक एनडीटीवी इंडिया के रवीश कुमार हैं.
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5 Response to 'लप्रेक ऑफ्टर गैंग्स ऑफ वासेपुर'
  1. anuj
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/06/blog-post_23.html?showComment=1340462211438#c4063399940349657874'> 23 जून 2012 को 8:06 pm

    ye ragini ji bhi bilkul anuraag jaise soch ki hain. confuse raho aur karo. wah wah

     


  2. INDIAN NEW WAVE CINEMA...ERA STARTS 2011
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/06/blog-post_23.html?showComment=1340570209447#c3561603223897700775'> 25 जून 2012 को 2:06 am

    jo maine likha hai wo ardh -satya hai....use dekh kar raveesh bhi sirf itni hi door aa paaye, itna hi samajh paaye.. wo phir se shabdon ki chaashni me kuchh bhaunde muddon ko dubo kar sirf itna hi keh paaye.......bechaare ko aaj bhi month end me aane wali salary ki fikar jyada hai....phir bhi...kuchh achha sa likha to maine share kiya.....warna......kadwahat is se bhi jyada hai...jo raveesh jaise patrakaar bhi nahi dekh paate.....aur dekh bhi lein to wo sach nahi bolte jo unhone dekha bhoga hai.....

     

  3. INDIAN NEW WAVE CINEMA...ERA STARTS 2011
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/06/blog-post_23.html?showComment=1340570427373#c5564756759167787604'> 25 जून 2012 को 2:10 am

    Raveesh ji...aapse kuchh ummeedein hai...aap puri na bhi kar paayein to ghila nahi....main Vyavsayik dunika ka chehra samajh sakta hoon....aapko...do taraf ki bajani padti hai...tabhi ap ek hi lekh me badi chaturaai se duniya ke do (aadhe aadhe) hisson ki baat itne shaandaar tarike se keh gaye.......

     

  4. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/06/blog-post_23.html?showComment=1340775035696#c2144362602177946916'> 27 जून 2012 को 11:00 am

    रागिनी की पीड़ा का बखान यहां भी हुआ है
    http://chitthacharcha.blogspot.in/2012/06/blog-post_27.html

     

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