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आज सुबह-सुबह फेसबुक वॉल पर ओम थानवी ने डॉ. रामविलास शर्मा पर उदय प्रकाश की बनायी फिल्म की चर्चा की. साथ ही फिल्म में शामिल की गई डॉ.रामविलास शर्मा के जवानी के दिनों की तस्वीर अपनी टाइमलाइन में लगायी है. फिल्म की यूट्यूब लिंक हमलोगों से साझा करते हुए उन्होंने लिखा-
"दिन की कितनी खुशगवार शुरुआत! सुबह-सुबह डॉ रामविलास शर्मा पर उदय प्रकाश की फिल्म देखने को मिली: "कालजयी मनीषा". एक शानदार वृत्तचित्र. कुमार गन्धर्व और उनकी पत्नी वसुंधरा जी का गाया "अवधूता, युगन-युगन हम योगी.." जाने कितनी बार सुना है, उदय जी ने रामविलास जी के सन्दर्भ में प्रयोग कर भजन की भी नयी परतें खोली हैं. बस यही सोच रहा हूँ, रामविलास जी के जीते जी यह फिल्म बनी होती -- जैसे अज्ञेय, कुंवर नारायण, केदारनाथ सिंह, विजयदान देथा आदि पर बनती रही हैं -- तो क्या और अच्छा न होता! हिंदी अकादमी देर से जागी, इसके लिए भी बधाई. पर जीते जी क्यों नहीं? जबकि अकादमी ने अपना पहला शलाका सम्मान रामविलास जी को दिया और ग्यारह लाख का शताब्दी सम्मान भी. खैर. मेरे पिता जी कहा करते हैं: "आता है आने दो अपना है, जाता है जाने दो सपना है!" ...Take life as it comes... हिंदी की एक कालजयी (मगर जीते जी अपनी ही बिरादरी में दुत्कारी गयी) मनीषा पर बनी इस फिल्म का स्वागत कीजिए. देर आयद, दुरुस्त आयद! "

लिहाजा, हम सुबह की चाय,अखबार और चूल्हा-चौका छोड़कर इस फिल्म को देखने में ही लग गए. साहित्यिक आत्मा की इंटरनेट पर कृपा रही, बिना ज्यादा बफरिंग के हमने पूरी फिल्म देख ली. अंत में अपने संजीव, शशिकांत जैसे लोगों का नाम देखकर अच्छा लगा. पूरी फिल्म देखने के बाद जो फेसबुकी प्रतिक्रया रही-

डॉ. रामविलास शर्मा पर उदय प्रकाश की फिल्म देखकर लगा कि कुछ नए शाब्दिक प्रयोग और तकनीक की उपलब्धता के बूते चीजों और तथ्यों को खारिज करने की जो तत्परता हमारे बीच तेजी से पनप रही है, हमें उस पर दोबारा से ठहरकर सोचना चाहिए. उदय प्रकाश ने फिल्म में रामविलास शर्मा को जिस तरह से पोट्रे किया है, वो सिर्फ एक आलोचक और उसके रचनाकर्म का सम्मान नहीं है बल्कि अपने पूर्वज लेखकों के प्रति असहमति रखते हुए भी कैसे आत्मीय हुआ जा सकता है, उसका सांस्कृतिक पाठ भी है. स्वयं रामविलास शर्मा के छोटे भाई का उनके संबंध में कथन है- अंदर से जोर-जोर से निराला और बड़े भाई की आवाज आ रही थी. मैंने तभी सोचा. जो आदमी निरालाजी से इस तरह तरह से बहस कर सकता है, उसे दबाना आसान नहीं है. आमतौर पर हिन्दी समाज में असहमति शत्रुता का और सहमति चाटुकारिता का जो पर्याय बन गया है या फिर लंबे समय से बनता रहा है, रामविलास शर्मा के दौर में भी..उस संदर्भ में इन पंक्तियों को खासतौर पर देखा जाना चाहिए. उदय प्रकाश ने अपने पूर्वज लेखक डॉ रामविलास शर्मा को जिस आत्मीयता से याद किया है, उन्हें इस बात का शुक्रिया अदा किए बना हम छूट नहीं सकते कि हमें अपने लेखकों और उनके काम को याद करने के क्रम में उदारमना होना अनिवार्य है.

पूरी फिल्म में अपने समय के सबसे चर्चित और आमतौर पर हिन्दी के सभी मसलों पर बात करनेवाले आलोचक नामवर सिंह की कोई बाइट नहीं है जो कि कई लोगों को परेशान भी कर सकती है. कई लोगों को जो फिल्म में शामिल बाइट हैं उनसे खासा दिक्कत भी हो सकती है, अटपटा भी लग सकता है. इसका एक अर्थ ये भी लगाया जा सकता है कि हर साहित्यिककर्म और घटना पर उनको शामिल किया जाना शायद जरुरी नहीं है. फिर भी इस फिल्म को आकादमिक आयोजन जैसी कोई चीज मानकर उपस्थिति पुस्तिका में दर्ज नामों से मिलान करने से बचें तो हम जैसे लोग मौजूदा रचनाकारों पर कुछ इसी तरह का काम करने के लिए प्रेरित हो पाते हैं.
 
धूल-धक्कड़ में खेलते रामविलास शर्मा के बचपन और अकादमिक उपलब्धियों के बीच हम जैसे युवा फुटेज को बीच-बीच में रोककर अपनी छवि छिपकाने के लोभ से अपने को रोक नहीं पाए..हां हम कर सकते हैं उनके जैसा. उनसे अलग भी और वो भी किसी के बिना हाथ और साथ के.

और आखिरी बात. डॉ. रामविलास शर्मा के अध्ययन कक्ष में कोने में रखी टीवी देखकर बहुत अच्छा लगा. पीछे उनके काम और दृष्टि को लेकर विद्वानों ने कहा कि उन्होंने मार्क्सवाद का यांत्रिक ग्रहण और पाठ नहीं किया. टीवी देखकर मुझे लगा कि उनका जीवन उसी तरह से सहज था कि घड़ी,चश्मा,किताबों के बीच एक टीवी भी. उनकी तस्वीर और किताबों के अंबार के बीच इस अकेले टीवी के होने से मैं उन्हें अपने ज्यादा करीब पाता हूं.
शुक्रिया उदय प्रकाशजी और ओम थानवीजी,
हमारी रोज की सुबह ऐसी ही हो.

फिल्म की वीडियो देखने के लिए चटकाएं- http://www.youtube.com/watch?v=_FvX4o0rGys&list=UU83GDEE-RbhYKEYIk4SpNog&index=1&feature=plcp

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2 Response to 'तो ऐसे थे हमारे डॉ. रामविलास शर्मा'
  1. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/06/blog-post_13.html?showComment=1339666116090#c3645131206213452491'> 14 जून 2012 को 2:58 pm

    इसे मोबाइल पर पढ़ा था दिल्ली हवाई अड्डे पर। तारीफ़ करने के लिये फोन किया तो बाद में तुम्हारे एस.एम.एस. से पता चला कि तुम वहीं गये थे जहां सुबह आम तौर पर लोग जाते हैं। अब जबलपुर आकर टिपिया रहे हैं। बहुत अच्छा लगा इसे पढ़ना। सुन/देख अभी भी नहीं पाये हैं वीडियो। कुछ लफ़ड़ा है।

    रामविलास शर्मा जी की किताब ’ मेरी धरती मेरे गीत’ के कई अंश याद आ गये। :)

     

  2. प्रवीण पाण्डेय
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/06/blog-post_13.html?showComment=1339667474280#c4780789585875148835'> 14 जून 2012 को 3:21 pm

    जी, देखते हैं..

     

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