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रे विनीत, ये बिग बॉस की अश्लीलता पर क्या हंगामा मचा हुआ है? मैंने मोहल्ला लाइव पर लिखी तुम्हारी पोस्ट पढ़ी। सुनो मैं चाहता हूं कि तुम टेलीविजन, रियलिटी शो और संस्कृति को लेकर एक शोधपरक लेख वसुधा के लिए लिखो। कब तक भेज रहे हो?

मैंने कहा, जरूर लिखता हूं सर, दस दिन तो लग ही जाएंगे कम से कम। अभी इस पर काम कर रहा हूं, तो कोशिश करूंगा कि इतने समय में कर दूं।
कर दो जल्दी से, दिसंबर का अंक तो निकल गया, अगले अंक के लिए लिखो तुम विस्तार से।
कमला प्रसाद मुझे जब भी फोन करते तो पहली लाइन यही होती, मेरी बड़ी इच्छा रहती है कि तुम वसुधा के लिए नियमित लिखा करो। लेकिन तुमने कह दिया था कि पीएचडी के काम में लगा हूं, इसलिए मैं तंग करना नहीं चाहता। खैर, अगर समय हो तो इस मुद्दे पर लिख दो।
मैंने वसुधा के लिए सास-बहू सीरियलों में बनती स्त्री छवि या फिर यूथ जेनरेशन की समझ पर बनी फिल्‍म रंग दे बसंती जैसे लेख उनके इसी परेशान न करने की बात और खैर समय मिले तो लिख देना के बीच लिखा। वसुधा हिंदी की गंभीर पत्रिका है, इसलिए मैं यहां लिखने के लिए एक तो बहुत समय लेता और दूसरा कि लिखते हुए भीतर से हमेशा एक खास किस्म का भय होता कि पता नहीं इसे पाठक किस रूप में लेंगे? बहरहाल…
दस दिनों बाद उन्होंने दोबारा मुझे फोन किया, हो गया विनीत लेख? मैं फोन पर सहज तरीके से बात करने की स्थिति में नहीं था। बड़ी मुश्किल से जवाब दिया, नहीं सर, कहां हो पाया।
क्यों क्या हो गया?
मैंने अपनी पूरी हालत जैसे-तैसे बतायी। उनका भी उसी वक्त कोई ऑपरेशन हुआ था या फिर पिछले दिनों फोर्टिस, दिल्ली में जो कराया था, उसी में कुछ उलझनें आ गयी थीं। मेरी हालत पर पलटकर कहा, ओह, तुम्हारी हालत तो मुझसे भी खराब है। कोई है कि नहीं साथ में? मैं हॉस्पीटल से छूटकर दो दिन पहले ही आया था। मैं कुछ बोलने के बजाय फफककर रोने लग गया था। आज महसूस करता हूं कि मैंने कितना बड़ा अपराध किया था। एक बुजुर्ग और बीमार साहित्यकार के आगे मुझे इस तरह रोना नहीं चाहिए था।
उन्होंने कहा था, देखो न, गजब का संयोग है, हमदोनों एक ही तरह से बिस्तर पर लेटे हैं। खैर, तुम चिंता न करो। जवान आदमी हो, एकदम ठीक हो जाओगे। लेख का क्या है, फिर कभी। दुरुस्त रहोगे तो तुमसे कई लेख लिखवा लेंगे। अपना ध्यान रखा करो। कोई बात हो तो बताना।
मैं आत्मपीड़न का ऐसा शिकार आदमी कि पलटकर पूछा तक नहीं कि आपको क्या हो गया? अव्वल मेरी आवाज भी तो नहीं निकल रही थी। जनवरी की ठंड में उनसे मेरी ये आखिरी बातचीत थी। दिल्ली की ठिठुरती ठंड और थोड़ी निष्ठुरता से पिंड छुड़ाने के लिए मैंने घर फोन कर दिया था और भइया आकर मुझे अपने घर लेकर चले गये थे। घर से आने के बाद हम सामान्य होने होने के लिए आये दिन नयी-नयी चीजें आजमा रहे थे कि इसी बीच कल सुबह खबर मिली कि कमला प्रसाद नहीं रहे। मैं उन्हें अंतिम बार देखने से अपने को रोक नहीं सका और जैसे-तैसे अजय भवन, दिल्ली की तरफ भागा। लेकिन मेडिकल शर्तों की वजह से उन्हें अंतिम बार देखना न हो सका। ताबूत में रखा उनका पार्थिव शरीर सिकुड़कर कितना छोटा हो गया था? सुरक्षित रखने के लिहाज से उसकी पैकिंग कर दी गयी थी और मैं बस वही देखकर वापस आ गया था।
कमला प्रसाद से मेरा जुड़ाव साहित्य और आलोचना के स्तर पर बिल्कुल भी न था और न ही पार्टी और साहित्यिक मंचों के स्तर पर ही कोई नाता था। उनसे मेरा बहुत ही भावुक, आत्मीय और कुछ-कुछ एक बुजुर्ग दोस्त की तरह था, जो विचार के स्तर पर मुझसे कहीं ज्यादा छरहरे थे। जिनके साथ घूमते हुए मैं बड़े आराम से कह देता था – रुकिए सर, मुझे बंगाली मार्केट में गोलगप्पे खा लेने दीजिए। उन्होंने पहली बार मुझे तब फोन किया था, जब मैंने चैनल की नौकरी छोड़कर नया-नया लिखना शुरू ही किया था। नया ज्ञानोदय में टेलीविजन पर लिखा मेरा पहला लेख था – टेलीविजन विरोधी समीक्षा और रियलिटी शो। भोपाल से ही फोन करके कहा – मैं कमला प्रसाद बोल रहा हूं, तुम्हारा लेख पढ़ा।
वह हिंदी के पहले आलोचक थे, जिन्होंने कहा था कि लेख को शुरू से अंत तक पढ़ा है। मुझे हैरानी भी हुई थी कि इन्होंने टेलीविजन पर इस तरह क्यों मेरे लेख को पढ़ा? आगे कहा कि जल्द ही दिल्ली आना होगा। आने पर मुलाकात होगी।
कुछ दिनों बाद सचमुच वो दिल्ली आये और फोन करके कहा, इंडिया इंटरनेशनल के पास ठहरा हूं, सुबह का नाश्ता साथ करेंगे। कल आ जाना। सच पूछिए तो मैं उनसे मिलना नहीं चाहता था। लगता था कि एक और साहित्यकार टेलीविजन को दमभर कोसेगा। मेरे लिखे पर बिफर जाएगा और कहेगा कि सब बकवास है, सब कूड़ा है।
इसके एक दिन पहले रात में विमल कुमार मेरे इस लेख पर अपनी असहमति और अच्छी-खासी बहस दर्ज कर चुके थे। मैं कुछ कहता, इसके पहले ही उन्होंने कहा कि आ जाओ, मैं चाहता हूं कि अबकी बार तुम वसुधा के लिए लिखो। सास-बहू सीरियलों में जो कुछ चल रहा है और उससे जो स्त्रियों की छवि बन रही है, उस पर गंभीरता से कुछ करो। मैं न चाहते हुए भी चला गया। नया ज्ञानोदय में आगे इसी पर लिखना था, बात हो चुकी थी।
चाय-नाश्ते के बाद वो टेलीविजन पर बात करने लग गये। मुझे हिंदी के वरिष्ठ आलोचकों और अध्‍येताओं में वो पहले ऐसे शख्स मिले, जिन्हें सुनते हुए महसूस कर रहा था कि वो इस पर देखकर बात कर रहे हैं। उनके रोजमर्रा के कामों में टेलीविजन देखना शामिल है। नहीं तो अब तक जितने मिले, उनमें से अधिकांश ने बिना देखे, इस पर एक आदिम राय बना रखी है और उस पर पूंजीवादी माध्यम, जो कि सत्तर के दशक की बहस से निकली हुई समझ है, लेबल चस्‍पां कर दिया है। वो छोटी बहू पर बात कर रहे थे, तो बाकायदा उनके चरित्र याद थे। स्टार प्लस के सीरियलों पर बात कर रहे थे, तो उनके चरित्रों के साथ साहित्यिक पात्रों को याद कर रहे थे। बीच-बीच में ये जोड़ना नहीं भूलते कि पोती के चक्कर में देखता हूं। लेकिन साथ में ये भी कहा कि जीटीवी और कलर्स के कुछ सीरियल मुझे खासतौर से पसंद हैं। ये उनकी साहित्यिक और सामाजिक छवि से बिल्कुल अलग रूप था कि वो टेलीविजन को एक सांस्कृतिक पाठ की तरह देख रहे थे। उस पर रस लेकर बात कर रहे थे और मेरी बात में सीधे तौर पर शामिल हो रहे थे। टेलीविजन के प्रति उनका यह लगाव ही था कि मैं आगे उनके करीब गया। नहीं तो बुलाकर उसे कोसने का काम करते तो शायद उनसे मेरी अंतरंगता नहीं होती।
उस मुलाकात के बाद फोन पर बातचीत का सिलसिला जारी रहा। घूम-फिरकर टीवी पर बात आ ही जाती। मैं उन्हें फोन पर ही एमटीवी रोडीज में कौन गया, कौन बचा है, स्प्लीटविलॉज शो क्या है और आजकल इमैजिन के सीरियल क्यों बकवास हो गये हैं, बताता रहता। अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजौ को उन्हें अच्छा सीरियल बताया था और कहा कि हमारे कुछ जाननेवाले लोग भी काम कर रहे हैं। हम उन्हें टेलीविजन कार्यक्रमों के बारे में कुछ इस तरह बताते कि जैसे ये सब सिर्फ दिल्ली में ही प्रसारित होते हों, भोपाल में नहीं। वो मेरी बातों को ध्यान से सुनते और अंत में कहते – जब इतना सब देखा-सुना है ही, तो एक लेख भेजो न वसुधा के लिए इस पर। हर बार तो लेख लिखना संभव नहीं हो पाता। फिर वो खुद ही कहते – तुम्हारी पीएचडी अभी अधूरी है न, उसे पूरी कर लो। अंतिम बार की बातचीत में तो ये भी शामिल था कि तुम्हारी किताब अभी तक अधूरी रह गयी न। खैर ठीक हो जाने पर उसे पूरी कर लेना, बहुत रोचक काम कर रहे हो।
जब से कमला प्रसाद के पार्थिव शरीर को देखकर लौटा हूं, दिनभर बेचैन रहा। रात का भी एक बड़ा हिस्सा गुजर गया। हमें साहित्यकार, आलोचक, मार्क्सवाद की विचारधारा का झंड़ा बुलंद करनेवाले कमला प्रसाद के गुजर जाने से कहीं ज्यादा हम जैसे युवाओं और उसके काम पर भरोसा रखनेवाले कमला प्रसाद के अचानक चले जाने से ज्यादा तकलीफ हो रही है। लग रहा है, हमारे समर्थन में एक वोट कट गया। हम सब अपने स्वार्थ के तहत ही तो किसी के महत्व को समझ पाते हैं न। हिंदी समाज में जाइए तो मीडिया, ब्लॉगिंग और न्यू मीडिया जिसे लेकर मैं काम कर रहा हूं और सक्रिय हूं, एक से एक नयी नस्ल के हिंदी प्रेमियों में हिकारत का भाव है, वो इसे दो कौड़ी की चीज समझते हैं, जिनमें कई बार उनका फ्रस्ट्रेशन भी जहां-तहां से मसककर सामने आ जाता है। इन नस्लों के भीतर गांव का सठिआया एक बुजुर्ग बैठा है, जो इनके युवा होने के बावजूद भी जब-तब कुढ़ता रहता है। कमला प्रसाद के भीतर इससे ठीक उलट एक ऐसा युवा मन सक्रिय था, जो कि नयी चीजों, विचारों और समझ का सम्मान करता था, उनका हौसला बढ़ाता था। हम जैसे लोग उनसे इसी स्तर पर जुड़े थे। नहीं तो वो दिल्ली किस काम से आते थे, किस किताब का लोकार्पण कर रहे हैं, किस किताब के लिए फ्लैप लिखा है, किस पुरस्कार समिति में हैं, इन सबसे हमें कोई मतलब नहीं होता।
एक बार मैंने उन्हें अपनी अभिरुचि जाहिर कर दी, तो कभी उससे इतर उन्होंने बात नहीं छेड़ी। मीडिया के प्रति मेरे पैशन को लेकर खुश रहते और कहते मजा आता है तुमसे बात करके। साहित्यकारों के बीच घिरे होने पर उसी में जब मुझे भी बुला लेते तो सबों के जाने पर कहते – तुम बोर तो नहीं हो गये? मैं हंसकर कहता, नहीं तो सर, आखिर मैं भी तो हिंदी से ही हूं। फिर भी कभी भी कुछ भी लादने और थोपने की कोशिश नहीं। कोई साहित्यक रचना पर लिखने, पढ़ने का दबाव नहीं बनाया।
इस बीच अकादमिक और साहित्यिक स्तर पर उनकी अपनी उठापटक चलती रहती लेकिन हमने उस हिस्से को कभी भी जानने की कोशिश नहीं की। कभी-कभी नौकरी के बारे में जरूर पूछते और मैं मुस्करा देता। फिर खुद ही कहते – परेशान मत होना ज्यादा, समय के साथ सब हो जाएगा।
आज जब मैं उन्हें याद कर रहा हूं, तो सबसे ज्यादा एक ही शब्द बार-बार याद आ रहा है – अधूरा। उनकी जिंदगी को लेकर क्या योजना थी, मुझे नहीं पता। क्या लिखना या प्रकाशित करना चाहते थे, नहीं मालूम। लेकिन मैंने अपनी जो भी योजना बतायी थी, उनके जाते तक वो सबकी सब अधूरी ही रह गयी। अधूरी पीएचडी, अधूरी किताब, वसुधा के लिए भेजा जानेवाला अधूरा लेख और यहां तक कि अंतिम बार देखने गया तो भी नाश्ते के लिए जो कुछ तैयार कर रहा था, वो भी अधूरा ही रह गया। रसोई में धुली दाल भगोने में पड़ी रह गयी और फ्रीज से बाहर निकाली दही फ्रीज के ऊपर ही… सब अधूरा ही।
मूलतः प्रकाशित- मोहल्लाlive

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5 Response to 'कमला प्रसाद के जाने से हमारा एक वोट कट गया'
  1. Sharad Sharma
    http://taanabaana.blogspot.com/2011/03/blog-post_26.html?showComment=1301118870265#c5123336890634307005'> 26 मार्च 2011 को 11:24 am

    very touchy and nice article Vineet ! Badhai!

     

  2. राजेश उत्‍साही
    http://taanabaana.blogspot.com/2011/03/blog-post_26.html?showComment=1301119709433#c3204331674363419278'> 26 मार्च 2011 को 11:38 am

    आपका लेख पढ़ते हुए कमला जी से मेरी चंद मुलाकातें मुझे भी याद हो आईं। यह सच है कि वे युवाओं में विश्‍वास रखते थे। और आपने सही कहा कि युवाओं का एक वोट घट गया।

     

  3. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2011/03/blog-post_26.html?showComment=1301278526217#c6907879222716166176'> 28 मार्च 2011 को 7:45 am

    कमला प्रसाद जी के बारे में अपनी तरह का अनूठा और बेहद आत्मीय संस्मरण लिखा विनीत तुमने।

    कमलाप्रसाद जी को विनम्र श्रद्धांजलि!

     

  4. वन्दना अवस्थी दुबे
    http://taanabaana.blogspot.com/2011/03/blog-post_26.html?showComment=1301333311697#c975815283687471902'> 28 मार्च 2011 को 10:58 pm

    क्या कहूं? आपका संस्मरण पढते हुए खुद भी पता नहीं कितनी यादों में गुम हो गई हूं, जहां कमलाप्रसाद जी साथ हैं, और हमेशा रहेंगे. श्रद्धांजलि.

     

  5. देवेन्द्र पाण्डेय
    http://taanabaana.blogspot.com/2011/03/blog-post_26.html?showComment=1302192528713#c211293537032958914'> 7 अप्रैल 2011 को 9:38 pm

    ..यहाँ आ कर अच्छा लगा।

     

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