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DUCR 90.4 FM रेडियो की प्रोग्राम मैनेजर डॉ. विजयलक्ष्मी सिन्हा ने अल्सायी दुपहरी में फोन करके कहा- मैंने आपके बारे में सुना है,आप मीडिया पर लगातार लिख रहे हैं,मुझे आपके बारे में ज्यादा जानकारी अपने रेडियो प्रेजेंटर बलवीर सिंह गुलाटी से मिली। हम चाहते हैं कि आप इस चैनल पर मीडिया से संबंधित बात करें जिससे कि हमारे लिस्नर को फायदा हो। आप अपने अनुभव शेयर करें। गुलाटी से मेरी कोई मुलाकात नहीं थी। बस एक दिन उन्होंने मेल करके जरुर कहा था कि मैं आपको पढ़ता हूं और चाहता हूं कि आप हमारे यहां आएं। अब मैं उनसे मिल चुका हूं और उनके बारे में बस एक लाइन कहना चाहूंगा कि कायदे से इंटरव्यू मेरी नहीं उनकी ली जानी चाहिए और सिर्फ रेडियो पर ही नहीं अखबारों में भी छपे। बहुत ही अलग,सरोकार से जुड़ा और पूरे लगाव से वो काम कर रहे हैं। वो डीयू के उन छात्रों के लिए ऑडियो पाठ तैयार करते हैं जो कि खुद से किताबें नहीं पढ़ सकते। हिन्दी साहित्य की एक से एक किताबों को उन्होंने अपनी आवाज में पाठ तैयार किया है। मैं उन पर अलग से लिखूंगा। लेकिन ये शुद्ध रुप से वर्चुअल स्पेस के जरिए बननेवाला संबंध था। लिहाजा हमने खुशी जाहिर करते हुए कहा कि बिल्कुल आएंगे,बस कुछ दिन पहले बता दें। उन्होंने मेरे लिए 16 मार्च दिन के 11.00 से 12.00 बजे समय तय कर दिया। प्रोग्राम का नाम था- सक्सेस मंत्रा जिसमें मुझे कुछ अपने बारे में बात करनी थी- वही मेरा बचपन,मेरा शहर, दिल्ली तक का सफर,मीडिया के अनुभव,लेखन औऱ मीडिया में आनेवाले छात्रों के लिए सुझाव और संभावनाएं।

इन दिनों मैं पूरी तरह टेलीविजन चैनलों के बीच डूबा रहा लेकिन संयोग ऐसा बना कि  रेडियो को लेकर कुछ-कुछ गतिविधियां जारी रही। एक तो देवीप्रसाद मिश्र ने एफएम रेडियो पर बना रहे अपनी फिल्म के लिए कुछ कहने को कहा। वो भी शानदार अनुभव रहा। मैंने क्या कहा वो तो फिल्म में बात होगी ही। कभी उसकी ऑडियो रिकार्डिंग भी यहां लगाकर आपलोगों को सुनने के लिए जिद करुंगा। लेकिन फिर अपने पुराने काम को भी पढ़ने लग गया। नईम अख्तर ने ज्ञानवाणी से जुड़ी गड़बड़ियों का भारी-भरकम पुलिंदा भेजा,उसे भी पढ़ने लग गया और टेलीविजन में डूबते हुए भी रेडियो में तैरने लग गया। इस बीच एफ एम रेडियो में एकाध छोटे-छोटे लेख भी निबटाने थे। डीयूसीआर का काम इसी बीच आया। तब फेसबुक पर न्यू मीडिया को लेकर बहस जारी थी और मीडिया के कुछ मठाधीशों ने इसे बहुत ही पर्सनली लिया था। बहरहाल, टेलीविजन के बीच धकड़पेंच के बीच जब मुझे रेडियो पर बात करने,लिखने और उस पर काम करने का मौका मिला तो लगा कि जैसे मुझे खुश होने का सबसे बड़ा बहाना मिल गया। एक ब्याही स्त्री को जैसे ससुराल या फिर मेट्रो की अकेली जिंदगी से छूटकर जो सुख मायका जाने पर मिलता है,कुछ वैसा ही। टेलीविजन और रेडियो मेरे लिए भाई-बहन की तरह है क्योंकि भाईयों औऱ बहनों ने जब गृहस्थी की मजबूरियों के बीच साथ छोड़ दिया( भौगोलिक स्तर पर) तो भी इन दोनों ने मुझे खुश रखने की कोशिशें की।

रेडियो को लेकर बोलना,सोचना या फिर उस पर लिखना बचपन,रिसर्च और नास्टॉल्जिया में डूब जाने जैसा है। ये मेरी अब तक जिंदगी की तीन धूरी है जिससे मैं जुड़ा हूं। बचपन में रेडियो से इसलिए नहीं जुड़ा था कि उसे सुनना अच्छा लगता था बल्कि इसलिए कि जब टार्च की बैटरी निकालकर मैं दिनभर रेडियो बजाता और रात को वापस टार्च में डाल देता तो उसकी रोशनी बहुत ही डिम होती। पापा बहुत झल्लाते। वो जितना झल्लाते,मैं उतना ही खुश होता। मुझे जितनी खुशी मिलती,शायद ही किसी को अमीन सयानी को बिनाका गीतमाला सुनकर होती होगी। मैं बचपन से पापा को अपना विपक्ष मानता रहा और दबे-छुपे ही सही कभी उनकी नकल,कभी जो नहीं पसंद है वही करके अपना प्रतिरोध जाहिर करता रहा। हिन्दी विभाग के लोगों को देशभर में खोजे उत्तर-आधुनिकता के चिन्ह नहीं मिल रहे हैं,एक सुधी आलोचक के पूरे लक्षण गिना दिए जाने पर नाक-भौं सिकोड़े जा रहे हैं लेकिन अगर 2011 की जणगणना में उत्तर-आधुनिक बच्चे की गिनती शुरु हो तो मां मेरा नाम जरुर लिखवाएगी। मेरे लिए सारा मजा पापा की सोच औऱ नसीहत से ठीक उल्टा करने से पैदा होता और इसमें रेडियो सुनना सबसे ज्यादा शामिल था। बाद में पापा खुद से बैटरी लाने लगे थे,रेडियो भी। एकबारगी तो लगा कि अब रेडियो सुनने में मजा नहीं रहा लेकिन तब तक मजा चिढ़ाने से ज्यादा सुनने में पैदा होने लग गयी थी।

दूसरा कि एम फिल मैंने एफ एम चैनलों की भाषा पर ही की। रेडियो का पुराना प्यारा बहुत ही अलग अंदाज में हरा होने को था। रिसर्च बोर्ड के आगे विषय सुझाया तो ही ही,खीं-खीं की ध्वनि के बीच मेरा विषय ही लगा गुन हो जाएगा। लेकिन उन्हीं लोगों के बीच से कुछ को इस विषय में शोध की संभावना दिखी और मुझे मेरे मन-मुताबिक विषय पर रिसर्च करने के लिए मिल गया। मैं लगातार एफ एम चैनलों को सुनता। कई बार तो 24 घंटे रेडियो मिर्ची फिर कुछ दिन आराम फिर 24 घंटे तक रेडियो सिटी। यकीन मानिए तब मैं रेडियो ट्रामा में जीने लग गया था। फिर आकाशवाणी और एफ एम चैनलों से जुड़े लोगों से मिलना जुलना। मैंने इस पर कई पोस्टें लिखी है। वो संसद मार्ग पर दस के चार केले खाने से लेकर झाजी के साथ बैठकर रेडियो की किस्सागोई। एक अजीब सा नशा,एक खास किस्म का लगाव। अफेयर हो जाने जैसी नरम किन्तु असरदार अनुभूति और वो भी चौबीसों घंटे।

तीसरा कि मैं पूरी तरह टेलीविजन पर फोकस्ड होकर लिखने लग गया था। एक तो मेरे रिसर्च का पूरा काम इसी से संबंधित है और दूसरा कि मैं अखबारों-पत्रकाओं में इससे जुड़े मुद्दे पर बात करना चाहता था। अपने ब्लॉग पर अधिकांश पोस्टे टेलीविजन पर ही लिखता आया हूं। इसी बीच आकाशवाणी के भीतर हिन्दी को लेकर भारी खेल हुआ। फिर एफ एम गोल्ड की फ्रीक्वेंसी प्राइवेट चैनलों को अलॉट करने की बात आयी। एक जीते-जागते चैनल को बंद कर देने की खबरें आने लगी। मैं इस वक्त सबसे ज्यादा रेडियो को लेकर काम कर रहा था। लगातार अपडेट्स ले रहा था। लंबी-लंबी बातचीत और मुलाकातें करने लगा था,उन तमाम रेडियो में काम करनेवाले लोगों से जो कि रेडियो को हर हाल में बचाना चाहते हैं। अपने स्तर से जहां तक हो सका,लिखना शुरु किया।

DUCR 90.4FM की स्टूडियो में पहुंचा तो ये सारी यादें एक क्रम से याद आ रही थी। मैं थोड़ा नास्टॉल्जिक हो रहा था। गुलाटी और उसके साथ की सहयोगी रेडियो प्रेजेंटर दोनों की बहुत भले लगे। ब्रेक में उसने माहौल को बिल्कुल हल्का करने की कोशिश की थी और थोड़ी-थोड़ी चुहलबाजी भी। मजा आ रहा था मुझे इन दोनों से बात करते हुए। सुनिल बाबू- बढ़िया है..जब वो नकल कर रही थी तो मैंने ठहाके लगाने से अपने को रोक नहीं पाया। लेकिन इस नास्टॉल्जिया के बीच जब वो एक के बाद एक मीडिया और न्यू मीडिया से जुड़े सवाल पूछ रहे थे तो मैं थोड़ा सख्त हो जा रहा था, मेरे भीतर की कसमसाहट मेरी बातों में झलकने लगी थी और तभी मैंने कहा था कि- देश और दुनिया की आवाज उठानेवाला आज का पत्रकार सबसे ज्यादा गुलाम है। वो जेटएयर वेज की हड़ताल की खबर दिखा सकता है लेकिन उससे कहीं अधिक व्आइस ऑफ इंडिया पर ताला लग जाने से बेरोजगार,सड़कों पर आ जानेवाले मीडियाकर्मियों के बारे में एक शब्द नहीं लिख-बोल सकता।..उसी क्रम में मेरे मुंह से निकला कि संस्थानों में जो मीडिया की पढ़ाई हो रही है,वो संत बनाने की ट्रेनिंग है,पत्रकार बनाने की नहीं। लेकिन अच्छी बात है कि न्यू मीडिया और वर्चुअल स्पेस ने साबित कर दिया है कि अब किसी भी मीडिया स्टूडेंट को द्रोणाचार्य की जरुरत नहीं है। इस तरह मीडिया को लेकर बहुत सारी बातें मैंने की।

मेरी इच्छा नहीं बल्कि जिद है कि आप इसे सुनें। मीडिया को लेकर अपनी राय जाहिर करें। मेरी बात बकवास लगे तो बीच-बीच में कुछ गाने हैं ताकि आप इसे अधूरी छोड़ जाने की स्थिति में न आएं। नीचें ऑडियों लिंक चेंप रहा हूं, सुनने के लिए उस पर चटका लगाएं। आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार है-

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4 Response to 'मैं रेडियो पर लाइव था और यादों में डूब-उतर रहा था'
  1. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2011/03/blog-post_24.html?showComment=1300971377694#c4474844263191887550'> 24 मार्च 2011 को 6:26 pm

    बहुत अच्छी पोस्ट है! बहुत दिन बाद हुंकार पर आये पढ़ने के लिये। पढ़कर बहुत अच्छा लगा। खासकर पिताजी को विपक्ष मानकर की जाने वाली हरकतें और अपने आपको उत्तर आधुनिक बच्चा मानने वाली बात!

    अब बाकी विचार सुनने के बाद लिखे जायेंगे।

     

  2. Satish Chandra Satyarthi
    http://taanabaana.blogspot.com/2011/03/blog-post_24.html?showComment=1300974050711#c5362491632228458427'> 24 मार्च 2011 को 7:10 pm

    एक बढ़िया चर्चा मीडिया और उससे जुड़े कई पहलुओं पर...

     

  3. mukti
    http://taanabaana.blogspot.com/2011/03/blog-post_24.html?showComment=1300991867454#c9218975739274679266'> 25 मार्च 2011 को 12:07 am

    अभी तो पोस्ट पढ़ी है विनीत... ये कार्यक्रम भी सुनूँगी. अपने काम को जूनून मानकर करने वाले और एक मिशन की तरह लेकर चलने वाले लोग ही आगे बढते हैं.
    मैं आपकी इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ ' लेकिन अच्छी बात है कि न्यू मीडिया और वर्चुअल स्पेस ने साबित कर दिया है कि अब किसी भी मीडिया स्टूडेंट को द्रोणाचार्य की जरुरत नहीं है.'
    शुभकामनाएँ !

     

  4. अजय कुमार झा
    http://taanabaana.blogspot.com/2011/03/blog-post_24.html?showComment=1372584701364#c5625742948159197292'> 30 जून 2013 को 3:01 pm

    गजब है जी गजब विनीत भाई , आप लोगों को पढने के बाद लगता है अगर आप अकेले में भी माद्दा है तो लडाई जारी रहेगी , आपकी सोच और हौसले दोनों को सलाम । बढिया है ..बनाए रखिए

     

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