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रश्मि ऑटो में बैठकर अभी थोड़ी दूर ही चली थी कि ऑटो हिलने लगा। उसने ड्राइवर से जब पूछा तो बताया कि कुछ नहीं मैडम,बस इंजन गर्म हो जाने से ऐसा हो जाता है। कुछ दूर तक सब ठीक रहा लेकिन फिर से हिलना शुरु हो गया। अबकी बार रश्मि ने थोड़ा जोर देकर पूछा और थोड़ी घबराहट भी हुई। अंत में उसने ड्राइवर से ऑटो रोकने कहा और रुकते ही एकदम से आगे उसके पास आ गयी। उसने देखा कि ड्राइवर की पैंट खुली हुई है,आपत्तिजनक स्थिति में है और मास्टरवेट कर रहा था,उसने झट से रुमाल रख लिया। बाद में लोग जुट गए और रश्मि ने भी कारवायी की मांग की।

8 मार्च,अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस को ध्यान में रखकर तमाम न्यूज चैनलों पर एक के बाद स्त्री अधिकार और उसकी सुरक्षा को लेकर विमर्श का दौर शुरु हो गया था। इस दौरान मनोरंजन चैनलों पर जो चरित्र पूरे साल तक व्रत रखने और करवाचौथ को पहले से खूबसूरत बनाने के टिप्स दिया करती है,स्त्री अधिकारों और सुरक्षा को लेकर बात करने लग जाती है। इसी में से स्त्रियों का एक ऐसा वर्ग उभरकर सामने आने लगा है जो इस दिन को फुलटाइम मस्ती का दिन देने की शक्ल में लगी है। इसमें पितृसत्तात्मक समाज के बीच रहकर होनेवाले संघर्ष और चुनौतियां गायब है। वहीं दूरदर्शन पर चर्चा में नीलम सिंह के साथ पैनल के भीतर इस बात को लेकर चर्चा हो रही थी कि एक दिन ही क्यों महिला के अधिकारों,सुरक्षा और उनके हक की बातें सालभर होनी चाहिए। इस लिहाज से लोकसभा टीवी पर नियमित प्रसारित कार्यक्रम जेंडर डिस्कोर्स को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। लेकिन आइबीएन7 पर जिंदगी लाइव में इस तरह के विमर्श से बिल्कुल जुदा जो कार्यक्रम प्रसारित हुए,उसने एकबारगी विमर्श के असर पर ही सवाल खड़े कर दिए। कार्यक्रम की रुपरेखा देखकर एक सवाल तो एकदम से मन में आया कि स्त्री अधिकार औऱ चुनौतियों पर विमर्श करने  के बजाय क्या यह ज्यादा जरुरी नहीं है कि स्त्रियां अपने अनुभवों को ज्यादा से ज्यादा साझा करे? शायद यही वजह रही कि दूरदर्शन पर स्त्री विमर्शकारों की जो पैनल रही,स्त्री विमर्श की दुनिया में स्थापित नाम है, बावजूद उसके जिंदगी लाइव पर अपने अनुभवों को साझा कर रही स्त्रियों ने हम जैसे दर्शकों पर अपनी पकड़ ज्यादा बना पायी। रश्मि के साथ-साथ हिना और उज्मा की साझेदारी वैसा ही असर डालती है।

हिना और उज्मा पढ़ाई करने के लिए बाहर जाती,आज वह डॉक्टर है। लेकिन जैसे ही वह घर पहुंचती,उसके अपने ही सगे भाई उसके लिए वेश्या शब्द का इस्तेमाल करते। हिना ने बताया कि ये बात अगर कोई बाहर का व्यक्ति करता तो फिर भी नजरअंदाज किया जा सकता था लेकिन अपने ही लोग ऐसा कर रहे थे। आगे उज्मा ने बताया कि लेकिन हमने सोचा कि इस बात को सार्वजनिक करना जरुरी है। हमने शिकायत दर्ज कराने की कोशिश की लेकिन थाने ने लापरवाही दिखायी और हमारी बात नहीं सुनी। हम इसे इसलिए भी सार्वजनिक करना चाह रहे थे कि समाज को वेनिफिट ऑफ डाउट न मिले कि बाहर जाकर पढ़ती है तो हो सकता है ऐसा करती हो? आगे चलकर दोनों बहनों ने अपने स्तर से संघर्ष किया।

जिंदगी लाइव में स्त्रियों के जो अनुभव खुलकर हमारे सामने आए,दरअसल वह हमारे पितृसत्तात्मक समाज का वह ब्लूप्रिंट है जिसके आधार पर आगे की पीढ़ियां गढ़ने की कोशिश की जाती है। बहुत कम ही मौके होते हैं जिसमें टेलीविजन इस ब्लूप्रिंट को हमारे सामने बेपर्दा करता है और अगर करता भी है तो इस तरह से नहीं कि उसका सीधा अर्थ लगाया जाए कि देश की आधी दुनिया अभी शिक्षा,सुविधा और संसाधनों के बीच जीती हुई भी अपने अधिकारों और सम्मान से कोसों दूर है। टेलीविजन का रवैया समाज के पितृसत्तात्मक समाज के पक्ष में है। तभी तो आजतक जैसे चैनल ने आगरा में ससुराल के लोगों के प्रताड़ित किए जाने की घटना पर कहा- 3 करोड़ दहेज देने के बावजूद लड़की को 13 घाव दिए गए। खबरों की लाइनों की तुकबंदी और भारी-भरकम पार्श्व ध्वनियों के बीच इस खबर का असर भले ही बढ़ गया हो लेकिन चैनल की मानसिकता भी सामने आने से बच नहीं पाती कि दहेज देकर शादी करना लगभग एक सुरक्षित जीवन की गारंटी है। चैनल ने इसी तरह 1 जनवरी 2011 को खबर चलाया कि 3 करोड़ मिलने के बावजूद भी वालीवुड की मुन्नी ने ठुमके लगाने से मना कर दिया।

एक तो समाज का शिंकजा इतना जटिल है कि स्त्रियों का प्रतिरोध हमारे सामने खुलकर सामने नहीं आ पाता है,हर तरह से उसे दबाने की कोशिश की जाती है लेकिन जब भी किसी रुप में उसके प्रतिरोध आते हैं,ऐसे वक्त अधिकांश मौके पर चैनल का पितृसत्तात्मक समाज से पैदा हुए शब्द उसे कुचल जाते हैं। स्त्रियों का यह प्रतिरोध सनसनी,एसीपी अर्जुन या जुर्म जैसे कार्यक्रम के खाते में जाकर टीवी सीरियल की शक्ल ले लेता है और खबरों की मुख्य बहस से बाहर हो जाता है। प्रतिरोध करनेवाली स्त्री के चेहरे पर लगाए गए लाल गोले और लूपिंग(बार-बार एक ही विजुअल दिखाना) उसे समाज का एक तमाशाई चरित्र में बदल देता है जिसके पीछे चैनल की एक ही कोशिश होती है कि इस पूरे घटना को देखकर मदद के बजाय सीरियल का मजा पैदा करना हो जिसे देखखर पुरुष समाज अट्टहास लगाए- देख लिया न,बने-बनाए ढांचे और नियमों से विरोध करने का नतीजा। बाकी रही सही कसर सास-बहू आधारित सीरियल पूरी कर ही रहे हैं।
(मूलतः प्रकाशित- टीवी मेरी जान,जनसंदेश टाइम्स 9 मार्च 2011) 
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1 Response to 'न्यूज चैनलों के लिए स्त्री एक तमाशाई चरित्र है'
  1. डॉ .अनुराग
    http://taanabaana.blogspot.com/2011/03/blog-post_09.html?showComment=1299682473368#c2758826184236989762'> 9 मार्च 2011 को 8:24 pm

    सच कहूँ तो न्यूज़ चैनल वाले सब जानते है पर वे बदलना नहीं चाहते.....दूसरी बात केवल एक स्त्री ही दूसरी स्त्री को अधिकार दिलवाने में सबसे पहला कदम उठा सकती है ...मां ,सास को भी साहस से अपनी बेटी-बहु के अधिकारों के लिए दृढ रहना होगा ....क्यूंकि पुरुषो का एक तबका कभी परिवर्तन स्वीकारेगा नहीं ...

     

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