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दूधनाथ सिंह को छोड़कर दिल्ली से बाहर का एक भी वक्ता नहीं है लेकिन ये यूजीसी की ओर से फंडेड राष्ट्रीय संगोष्ठी है। राष्ट्रीयता की अवधारणा के साथ इतना घटिया और अश्लील मजाक शायद ही आपको कहीं देखने को मिले। जिस हिन्दी साहित्य और समाज के लोगों का ककहरा राष्ट्रीय शब्द से शुरु होता है और जर्जर होने तक इसी राष्ट्रीय पर जाकर खत्म हो जाता है,वहां राष्ट्रीयता के नाम पर इस तरह की बेशर्मी की जाएगी,इस बेशर्मी से ही हिन्दी समाज की तंग मानसिकता उघड़कर बजबजाती हुई हमारे सामने आ जाती है।

हिन्दू कॉलेज,दिल्ली विश्वविद्यालय में अज्ञेय की जन्मशती को लेकर दो दिनों की राष्ट्रीय संगोष्ठी( दिसंबर 14 और 15) का आयोजन किया गया है। इस आयोजन के लिए यूजीसी की तरफ से पैसे मिले हैं। जाहिर है जब पैसे यूजीसी से मिले हैं और वो भी राष्ट्रीय संगोष्ठी के नाम पर तो इसका सीधा मतलब है कि इसमें देश के अधिक से अधिक लोगों,कॉलेजों और विचारों की भागीदारी हो। वैसे भी अगर संगोष्ठी के लिए पैसे यूजीसी की तरफ से दिए जाते हैं तो आयोजकों पर इस बात की खास जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वो इस राष्ट्रीय संगोष्ठी की अवधारणा को लेकर चौकस रहे। लेकिन दिल्ली से बाहर एक अकेले दूधनाथ सिंह को बुलाकर बाकी दिल्ली के 20-25 किलोमीटर की रेडियस पर रह रहे और लगभग जंग खा चुके आलोचकों को बुलाकर उसे राष्ट्रीय संगोष्ठी का नाम देना पूरी अवधारणा की सरेआम धज्जियां उड़ाने जैसा है। मुझे याद है अब तक मैंने कम से कम दस राष्ट्रीय(यूजीसी की ओर से फंडेड) संगोष्ठियों में हिस्सा लिया है और दो संगोष्ठियों में बतौर आयोजकों की तरफ से शामिल रहा हूं,इस तरह की पहली घटना मुझे दिखाई दे रही है जहां कि एक शख्स के दिल्ली से बाहर होने पर राष्ट्रीय संगोष्ठी करा ली जा रही है। मैंने तमाम सेमिनारों में कम से कम छ-सात राज्यों के प्रतिनिधि वक्ता और कुछ हद तक श्रोताओं के शामिल होने की स्थिति को ही राष्ट्रीय संगोष्ठी के तौर पर देखा है। जहां तक मेरी अपनी समझदारी और जानकारी है कि इस तरह के सेमिनार के लिए ऐसा किया जाना जरुरी भी है। यूजीसी इसके लिए दो स्तरों पर पैसे देती है- एक तो कार्यक्रम के आयोजन के लिए और दूसरा कि कुल की आधी रकम प्रकाशन के लिए।

हिन्दू कॉलेज या देश के किसी भी कॉलेज या विश्वविद्यालय की अपनी इच्छा है कि वो अज्ञेय,मुक्तिबोध या किसी भी रचना या रचनाकार के बहाने राजपूत सभा,ब्राह्ण सभा या दिल्ली सभा का आयोजन करा दें। लेकिन यूजीसी की ओर से सहयोग दी जानेवाली संगोष्ठी कोई हेयर कटिंग सलून या होटल नहीं होते कि ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए नाम के आगे नेशनल या इन्टरनेशनल जोड़ दिया जाए। बाकी सारे ग्राहक भले ही चार-पांच गलियों में सिमटे हुए लोग हों। विभाग इस तरह से संगोष्ठी के आगे राष्ट्रीय चस्पाकर एक बड़ी अवधारणा को फ्रैक्चरड करने की कोशिश कर रहा है जो कि किसी भी अर्थ में सही नहीं है। सिर्फ दिल्ली के साहित्यकार अज्ञेय पर पंचायती कर देंगे और वो राष्ट्रीय संगोष्ठी का दर्जा पा जाएगा,ऐसी स्थिति में यूजीसी को विभाग से सवाल किए जाने चाहिए कि आपने बाहर से कितने लोगों को बुलाया या फिर सिर्फ दिल्ली के ही लोगों को क्यों बुलाया?

देशभर के हिन्दी विभागों के रिसर्चर से मिलिए,आपको हर चार में से एक अज्ञेय,मुक्तिबोध या नई कविता पर शोध करता मिल जाएगा। इन विषयों पर रिसर्च कर चुके लोगों की एक लंबी फौज है। लेकिन वक्ताओं की लिस्ट में एक भी ऐसा नाम नहीं है जो कि 40 साल से नीचे का हो। अभी अज्ञेय,नागार्जुन,शमशेर जैसे रचनाकारों की सीजन होने की वजह से दर्जनों साहित्यिक पत्रिकाएं इन पर विशेषांक निकाल रही हैं। मेरे कुछ साहित्यिक साथी इनके लिए शोधपरक लेख भी लिख रहे हैं और खुद संपादकों की डिमांड में नए लोग हैं। आप उन अंकों को पलटें तो 25 से 35-40 तक के लोगों की एक लंबी सूचि मिल जाएगी। लेकिन इस संगोष्ठी में एक भी ऐसा नाम नहीं है। आयोजक इस बात से पल्ला नहीं झाड़ सकते कि उन्हें ऐसे नए लोगों के एक भी नाम नहीं मिले,बल्कि उन्होंने इस दिशा में न तो पहल की और न ही ऐसा करना जरुरी समझा। इससे क्या संदेश जाता है कि पिछले दस-पन्द्रह साल में पूरे दे के िसी भी विश्वविद्यालय ने एक भी अज्ञेय का जानकार पैदा नहीं किया। अगर 15 साल में सैंकड़ों रिसर्चर अज्ञेय और नई कविता पर शोध करने और लेख लिखने के बावजूद यूजीसी के पैसे पर आयोजित किसी राष्ट्रीय संगोष्ठी में आने का दर्जा नहीं पा सकते तो फिर सरकार के लाखों रुपये खर्च करके इन्हें जारी रखने का क्या तुक है? मैं ये बिल्कुल नहीं कह रहा कि रिसर्चर की सारी काबिलियत उसकी संगोष्ठी में शिरकत करने से ही साबित होगी लेकिन कल को इस संगोष्ठी के वक्तव्य पर आधारित पाठ और पुस्तकें तैयार होंगी तो उसमें तो 45 से नीचे का कोई भी लेखक नहीं होगा जबकि पत्रिकाओं में वो लगातार लिख रहा है। अब सोचिए कि ऐसे में वो कितनी बड़ी साजिश का शिकार होता है?

इस संगोष्ठी में एक भी ऐसा नाम नहीं है जो कि केंद्रीय विश्वविद्यालय से बाहर के हों। मतलब ये कि केन्द्रीय विश्वविद्यालय से बाहर एक भी ऐसा साहित्यकार या आलोचक नहीं है जो कि अज्ञेय पर बात करने की क्षमता रखता हो। ये कॉलेज के विभाग की अपनी समझ है। जो विभाग तमाम रचना और रचनाकारों में राष्ट्रीयता,आंचलिकता और  सरोकार की घुट्टी बीए फर्स्ट इयर के स्टूडेंट से ही पिलानी शुर कर देता हो,उसकी इस हरकत पर सैद्धांतिक अवधारणाओं और व्यवहार के बीच उसके जड़ हो जाने की स्थिति बहुत ही नंगई के साथ सामने आती है। दिल्ली में बैठे साहित्यकारों और आलोचकों के प्रति देशभर के लोगों की टकटकी बंधी रहती है,यहां से जब लोग छोटे शहरों और कस्बों के कॉलेजों में बोलने और शिरकत करने जाते हैं,उनकी जो कहां उठाउं-कहां बिठाउं की शैली में स्वागत किए जाते हैं, फेसबुक पर टंगी इस सूचना और वक्ताओं की लिस्ट देखकर कैसा महसूस करते हैं,इसका शायद रत्तीभर भी अंदाजा नहीं है। बड़े नामों को जुटाने से एकबारगी तो लगता है कि भव्य आयोजन होगा लेकिन इसके साथ ही आयोजकों की ठहर चुकी समझ की तरफ इशारा करता है कि उसने पिछले 15 सालों में एक भी नया नाम नहीं खोज पाए। बड़े नामों का आना आयोजन की सफलता जरुर तय करती है लेकिन नए नामों को शामिल नहीं किया जाना,उसकी जड़ता को रेखांकित करती है। हालांकि इस तरह की संगोष्ठियां नेक्सस बनाने और एक-दूसरे को तुष्ट करने के लिए पूरी तरह बदनाम हो चुकी हैं,जिसके प्रतिरोध में लिखे जाने की स्थिति में एवनार्मल करार दिए जाने का खतरा है लेकिन सैद्धांतिक तौर पर नए विचारों और चिंतन के लिए ही यूजीसी लाखों रुपये खर्च करके कराती है। 

इस संगोष्ठी में एक भी दलित वक्ता नहीं है। नहीं हैं तो इसका मतलब है कि देश में अज्ञेय के एक भी दलित जानकार नहीं है। कुल चार सत्र में से पहले के तीन सत्र में एक भी स्त्री वक्ता नहीं है। अंतिम सत्र में जो कि अज्ञेय के चिंतन पक्ष  को लेकर है,उसमें दो स्त्री वक्ताओं निर्मला जैन(अध्यक्षता) और राजी सेठ को रखा गया है। पहले के तीन सत्र जिसमें कि उनके गद्य और कविता से संबंधित सत्र है,एक भी वक्ता नहीं है। कुल बारह वक्ताओं में से दो स्त्री वक्ता हैं और बाकी पुरुष वक्ता। बाकी इन वक्ताओं के नाम के अंत में लगे हॉलमार्क काफी कुछ कह देते हैं।

अब सवाल है कि ये सबकुछ बस आयोजन का एक स्वाभाविक हिस्सा है या फिर इसमें गलत क्या है? फेसबुक पर एक शख्स ने इस सेमिनार के प्रति अहमति में लिखे जाने पर खुन्नस में आकर ऐसा लिखने की बात कही। लेकिन इसका प्रतिरोध किया जाना वाकई खुन्नस का हिस्सा है या फिर कार्यक्रम की रुपरेखा एक सैंपल पेपर की तरह है जिसके आधार पर हमें देशभर में होनेवाली राष्ट्रीय संगोष्ठी जिसे कि यूजीसी पैसे देती है,उस पर सोचने और तय करने के लिए विवश करती है कि यूजीसी के करोड़ों रुपये किस तरह एक अवधारणा को फ्रैक्चरड किए जाने,खंडित और क्षतिग्रस्त किए जाने के लिए पानी की तरह बहाए जा रहे हैं। राष्ट्रीयता की अवधारणा अपने आप में बहुत विवादास्पद है जिसका मैं खुद भी पक्षधर नहीं हूं। लेकिन अगर राष्ट्रीयता सुविधा और शामिल किए जाने की शर्त तक परिभाषित होती है तो दिल्ली के चंद साहित्यकारों को पूरे देश को काटकर,उनका हक मारकर राष्ट्रीय होने और कहलाने का कुचक्र कितनी घिनौनी साजिश को मजबूत करती हैं,जरा सोचिए?
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8 Response to 'राष्ट्रीय संगोष्ठी के नाम पर हिन्दू कॉलेज में ड्रामा'
  1. amitesh
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/12/blog-post_13.html?showComment=1292270946274#c1908634984389715198'> 14 दिसंबर 2010 को 1:39 am

    राष्ट्रीयता को लेकर आपकी आपत्ति...जाति के पुर्वग्रहों में बदल जाती है..बाद में इसे आप दलित और स्त्री का कवच पहना देते हैं ताकि इनको लगे कि आप इस विमर्श के बड़े प्रवक्ता हैं और आहत है...जहिर है कल तक आपके कुछ हमखयाल चिंतक आपके पक्ष में खडे होंगे...राष्ट्रीयता की आपकी समझ क्या है? क्या देश की राजधानी होकर दिल्ली, अभी भी अपना राष्ट्रीय स्वरूप नहीं रखती...आयोजन में शामिल वक्ता भले ही दिल्ली निवासी हों पर क्या वे किसी खास राज्य का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे? कम से कम चार राज्य के तो वो हैं ही?
    'जंग खा चुके आलोचक' क्यों हैं? क्या इनकी उम्र अधिक हो गयी है या ये 'ब्राह्म्ण-ठाकुर' है इसलिये? क्या इनमें से किसी आलोचक कि पढने, लिखने और बोलने में किसी तरह की कोई कमी आ गयी है. क्या इनकी सक्रियता किसी युवा लेखक से कम है. अब ये आयोजकों की भी मर्जी है कि वह युवा लेखकों को वक्ता के तौर पर शामिल करता है कि नहीं. या हो सकता है की युवा लेखन में सचमुच कोई नाम ऐसा नहीं हो. मेरे देखे में तो युवा आलोचना की यहीं स्थिति है अन्यथा आलोचना के बिमार हो जाने की स्थिति पर पत्रिकाएं विशेषांक नहीं निकालती. क्या यह युवा लेखन की कमजोरी नहीं कि साहित्यिक मंच पर वो अपनी जगह नहीं बना पा रहे ? अब आप इनको पटक कर उन्हें बैठाना चाहते हैं तो अलग बात है.
    दरसल यह विरोध बड़े नाम और जाति का विरोध है. और ऐसे विरोध से बोध की एक बड़ी परंपरा का त्याग करना पड़ेगा...शायद ही हम ऐसा चाहेंगे. जब जातिवाद का विरोध जाति विरोध में शामिल हो जाता है तो मुझे यह खुन्नस ही लगता है. आप इसे प्रगतिशीलता कहते होंगे.
    रहा दलित और स्त्री की बात तो मेरे खयाल से दलित और स्त्री भी ऐसा नहीं चाहेंगे कि केवल दलित और स्त्री होने की वज़ह से उन्हें शामिल किया जाये.
    अंतिम बात, फ़ेसबुक पर टंगी यह सुचना...चार दिन पहले की है...पोस्ट अब लगी है...संभवत: तैयारी में समय लगा होगा या इन्स्टेंट होगा, जो ब्लागरी स्वभाव है. कल सेमिनार शुरु हो रहा है. जाहिर है इसके निहितार्थ है. थोडा अपनी नज़र को भी खोलिये नहीं तो उसे सिर्फ़ तंगनज़री ही दिखेगी...
    नोट; यह पोस्ट संभवतः मोहल्ला पर छपे तो इस टिप्पणी को भी साथ में चेप दिया जाये...अगर ऐसा नहीं भी करेंगे तो मैं इसे आपके निर्णय की स्वतंत्रता मानुंगा जो आपको होना चाहिये

     

  2. विनीत कुमार
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/12/blog-post_13.html?showComment=1292296723254#c2375355777657673287'> 14 दिसंबर 2010 को 8:48 am

    नहीं अमितेश,अगर ये जाति के पूर्वग्रह में बदल जाती तो दूधनाथ सिंह को लेकर भी लिखता और इस पर तो नहीं ही लिखता कि राज्य से कोई कॉलेज क्यों नहीं है? आपने कितनी बड़ी बात लिख दी-अब ये आयोजकों की भी मर्जी है कि वह युवा लेखकों को वक्ता के तौर पर शामिल करता है कि नहीं. इस मर्जी को कौन दुरुस्त करेगा और फिर आपकी ये समझ कि एक भी युवा आलोचक उस लायक नहीं है,कितनी खतरनाक समझ को जन्म देता है।...और जहां सवाल तैयारी की है तो आप मुझे अगर लगातार पढ़ते हों तो समझ सकते हैं कि मैं कितनी तैयारी करके लिखता हूं।.

     

  3. सुशीला पुरी
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/12/blog-post_13.html?showComment=1292297595741#c685728934184206007'> 14 दिसंबर 2010 को 9:03 am

    विनीत ! आपने बहुत हिम्मत से ''राष्ट्रीयता'' की आड़ मे हो रही साजिशों को वेनक़ाब किया है ...।

     

  4. Kajal Kumar
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/12/blog-post_13.html?showComment=1292305507249#c3353688561707395187'> 14 दिसंबर 2010 को 11:15 am

    अच्छा लिखा है. राष्ट्रीयता भी धंधा होकर रह गई है आज.

     

  5. ZEAL
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/12/blog-post_13.html?showComment=1292313456271#c8196648508621697945'> 14 दिसंबर 2010 को 1:27 pm

    जबरदस्त आलेख !
    और शीर्षक तो सोने पे सुहागा है।

     

  6. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/12/blog-post_13.html?showComment=1292340894454#c3142714038040811074'> 14 दिसंबर 2010 को 9:04 pm

    आपने यह नहीं लिखा कि सभी वक्ता लाल सलाम वाले हैं। शायद यह आपके लिए स्वागत योग्य बात हो।

     

  7. Sheeba Aslam Fehmi
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/12/blog-post_13.html?showComment=1292358666872#c1672077315047292642'> 15 दिसंबर 2010 को 2:01 am

    बधाई विनीत को और उन सब टिपण्णी कारों को जो अब नाम लेकर सही ग़लत को चिन्हित कर रहे हैं. राष्ट्रीयता की समझ हिंदी के समाज में जैसी है वो विश्व हिंदी सम्मलेन से ले कर साहित्य अकादेमी तक जग ज़ाहिर है. ध्यान देने की बात ये भी है की राष्ट्रीयता पर दलित, महिला, वंचित, एक तरफ़ और जातीय उच्ताबोध वाले दूसरी तरफ़ ही क्यों दिखते हैं. ऐसी पालेबंदी और उसके पीछे के समाजशास्त्र पर फ़िक्र होती है. वैसे राष्ट्रवाद से ज़्यादा कृत्रिम अवधारणा शायद ही कोई दूसरी हो.

     

  8. हिंदीब्लॉगजगत
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/12/blog-post_13.html?showComment=1292572312709#c129020271037517640'> 17 दिसंबर 2010 को 1:21 pm

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