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मुझे लगता है कि मैं जबाब देती हुई थोड़ी लाउड हो रही हूं। मनु जोसेफ का जबाब देते हुए बरखा दत्त ने जब माहौल को थोड़ा हल्का करने की कोशिश की तो मनु जोसेफ ने भी उसी अंदाज में कहां- इट्स योर ऑफिस। बरखा ने इसे अनफेयर बताया और फिर सवाल-जबाब का सिललिला आगे बढ़ता रहा। पूरी बातचीत क्या हूं इसे मैं देर रात की थकान में ट्रांसक्रिप्ट नहीं कर सकता लेकिन ये लिखते हुए कि अपनी पूरी बातचीत में बरखा दत्त हमें इस बात का भरोसा नहीं दिला पायी कि ओपन मैगजीन ने टेप के माध्यम से जो बात कही है वो पूरी तरह से निराधार है और इसे सिरे से खारिज किया जाना चाहिए। जिस तरह से पत्रिका ये कहती है और आज संपादक मनु जोसेफ ने भी दोहराया कि हम बरखा दत्त के बारे में ये बिल्कुल नहीं कह रहे कि कोई करप्शन किया है,उसी तरह से हम भी यही बात दोहराते हैं। लेकिन बरखा ने आज जिस तरह से अपनी बात रखी उससे कई सवाल अभी भी ज्यों के त्यों बने रह जाते हैं। कुछ मामूली टिप्पणी और ऑब्जर्वेन्स के साथ आपके बीच ऑडियो औऱ वीडियो लिंक रख दे रहा हूं। आप खुद भी इसे देख-सुनकर अपनी राय कायम कर सकेंगे।

30 दिसंबर रात दस बजे NDTV24X7 ने नीरा राडिया और 2G स्पेक्ट्रम घोटाला को लेकर बरखा दत्त का नाम सामने आने के बाद एक कार्यक्रम प्रायोजित किया। RADIA TAPE CONTROVERSY नाम से प्रसारित इस कार्यक्रम में संजय बारू,(संपादक बिजनेस स्टैन्डर्ड, स्‍वपन दासगुप्‍ता( सीनियर जर्नलिस्ट), दिलीप पडगांवकर( पूर्व संपादक दि टाइम्स ऑफ इंडिया) और मनु जोसेफ( संपादक, ओपन मैगजीन) को बरखा दत्त से सवाल-जबाब के लिए पैनल में शामिल किया गया। आउटलुक के विनोद मेहता को भी इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए बुलाया गया लेकिन उन्होंने आने से मना कर दिया। बहरहाल

इस पूरी बातचीत में ERROR OF JUDGEMENT शब्द को बार-बार दोहराया गया और अंत में संजय बारु ने कहा भी कि हम सबसे गलतियां होती रहती है,बरा तुम्हें चाहिए कि इसे एरर ऑफ जजमेंट मानकर अपने दर्शकों से माफी माग लें, जस्ट से- SORRY। बरखा दत्त ने कहा कि वो जरुर माफी मागती है लेकिन इस बात पर बिल्कुल भी नहीं कि कौन एडीटर क्या स्टोरी करेंगे और कौन नहीं,ये कोई और बताए। दरअसल पूरी बातचीत का ए बड़ा हिस्सा इस बात पर आकर अटक गया जिसे कि मनु जोसेफ ने उठाया कि एक कार्पोरेट की पीआर,अंबानी कंपनी की पीआर को इस बात में दिलचस्पी है कि दो पार्टियों में से किस पार्टी का कौन क्या बनेगा जो कि इस शताब्दी की बड़ी स्टोरी हो सकती है,वो आपके लिए कोई स्टोरी नहीं है? ये कैसे हो सकता है? मनु अपने सवाल में बरखा दत्त से इसी बात का जबाब चाह रहे थे जिसे कि बरखा दत्त ने कई तरीके से घुमाने-फिराने की कोशिश की। पहले तो ये कहा कि उसके पास कई तरह के लोगों के फोन आते रहते हैं और कहते हैं कि फलां ये बन रहा है,फलां वहां जा रहा है,लेकिन इस पर ध्यान देने की जरुरत मैं नहीं समझती। लेकिन जब मनु ने दोबारा दोहराया कि अंबानी ग्रुप की पीआर ये जानना चाह रही है कि कौन क्या बनेगा और ये स्टोरी नहीं है? उसके बाद बरखा दत्त ने कहा कि कौन स्टोरी है औऱ कौन नहीं ये चुनाव करने का हर एडीटर और पत्रकार को अपना निजी नजरिया होता है। मैं भी उसी तरह से सवाल कर सकती हूं कि बिजनेस स्टैन्डर्ड ने ये स्टोरी क्यों नहीं छापी,ओपन ने वो क्यों नहीं छापी। ये कोई तर्क नहीं हैं। बरखा मनु के इस सवाल में जाल पैदा करती है और जिसे लेकर मनु जोसेफ अंत तक असंतुष्ट नजर आए।

बरखा ने शुरुआत में ही कहा कि मीडिया ने इसे तोड़-मरोड़कर पेश किया है,सभी ने नहीं भी तो कुछ ने ऐसा जरुर किया है और सबसे बड़ी बात है कि ये रॉ टेप हैं। बरखा दत्त के ऐसा कहने का मतलब है कि इसमें संभव है कि छेड़छाड़ की गयी हो,इसकी ऑथेंटिसिटी को लेकर भी सवाल किए जा सकते हैं। उसने यहां तक कहा कि मेरे साथ ये सब जोड़कर स्टोरी क्रिएट की गयी है और भी 40 पत्रकारों की बातचीत हुई,उनके टेप क्यों नहीं जारी हुए? यहां पर आकर एक राजनीतिक पर्सनालिटी और बरखा दत्त में कोई खास फर्क नहीं रह जाता और वो भी दूसरे पत्रकारों के शामिल किए जाने की मांग और मीडिया को इसके लिए जिम्मेदार बताती नजर आयी। ये बहुत ही दिलचस्प और हास्यास्पद है कि आज एक मीडिया की बड़ी शख्सीयत मीडिया के काम करने के तरीके पर सवाल खड़ी कर रही है। इस बातचीत का एक हिस्सा मीडिया एथिक्स की तरफ जाता हुआ दिखाई देने लगा जिसमें बरखा दत्त ने ओपन पर आरोप लगाते हुए कहा कि उसने इस एथिक्स को नजरअंदाज करने का काम किया है और बिना उसकी बात जाने प्रकाशित किया। किसी को किसी के व्यक्तित्व के साथ ऐसा करने का अधिकार नहीं है। अपने 16 साल के करियर का हवाला देते हुए उसने अपनी समान सोच और निष्पक्ष समझ की बातें शामिल की। लेकिन बरखा रौ में ये सब जब कुछ बोल रही थी तो हमें पता नहीं क्यों भरोसा नहीं जम रहा था। आगे स्वप्न दासगुप्ता ने कहा भी कि हम यहां मीडिया एथिक्स पर बात करने नहीं आए हैं,हम बात करने आए हैं बरखा दत्त औऱ राडिया टेप को लेकर जो हुआ है। बरखा दत्त ये मानती रही कि मीडिया एथिक्स का सवाल इन सबसे अलग नहीं है।

मनु जोसेफ का यह सवाल धरा का धरा ही रह गया कि यदि ये एरर ऑफ जजमेंट था तो फिर 2010 में भी ये स्टोरी क्यों नहीं चली? मनु जोसेफ ने साफ कहा कि सॉरी,मैं आपके जबाब से खुश नहीं हूं। बरखा दत्त के पास इस बात का भी साफ-साफ जबाब नहीं था जिसे कि दिलीप पडगांवकर ने उठाया कि एक पत्रकार की सीमा रेखा कहां जाकर ब्लर हो जाती है। ये एक जेनरल पर्सपशेन बनी है कि ऐसा हुआ है। सवाल ये भी है कि एक पीआर और एक एडीटर के बात करने के तरीके में कोई फर्क नहीं होगा क्या? इसके साथ ही वो एक पीआर को ये क्यों बता रही हैं कि मेरे जर्नलिस्ट क्या कहते हैं? स्वपन दासगुप्ता ने सुप्रीम कोर्ट के जज के मामले में जो बातचीत हुई उसे लेकर एक ग्रुप एडीटर की बातचीत में और एक पीआर के बात करने में क्या फर्क होने चाहिए,इस पर सोचना होगा। इस सवाल ने भी जोर पकड़ा कि आखिर नीरा राडिया ने बरखा दत्त को ही क्यों फोन किया? बरखा दत्त अपने तर्कों में बार-बार में कवरेज को ईमानदारीपूर्वक देखने की बात करती है।
हालांकि अंत में चैनल की तरफ से एंकर सोनिया सिंह ने इस बात की तरफ हमारा इशारा जरुर किया कि संभव हो कि ये कॉर्पोरेट वॉर हो लेकिन उन इस इशारे की खोज में हम आए नहीं थे। हम आए थे कि बरखा पर जितने भी तरह के आरोप लगे और लगाए जा रहे हैं,उसे लेकर वो अपना पक्ष किस तरह से रखती है? बरखा दत्त ने बार-बार कहा कि उसका 2G स्पेक्ट्रम, डी राजा और ऐसे तमाम मामलों औऱ घोटालों के साथ जोड़कर देखना नाइंसाफी होगी। पैनल में मनु जोसेफ सहित किसी ने भी नहीं कहा कि उसका संबंध करप्शन से हैं लेकिन जिस बरखा दत्त की स्टोरी,उसके बोलने के अंदाज के हम जमाने से कायल रहे हें,अपना ही पक्ष लेती हुई हमें इस तरह से निराश करेगी, इसकी हमें उम्मीद नहीं थी। बरखा दत्त को नेताओं और बच्चों की तरह उसके कपड़े भी मैले हैं कोई उसे क्यों नहीं कहता के अंदाज में बात करने के बजाय मजबूती से अपने पक्ष रखने चाहिए थे। चैनल ने इस तरह का कार्यक्रम आयोजित करके भले ही विश्वास जुटाने की कोशिश की हो लेकिन हमारा भरोसा कार्यक्रम देखने के बाद बढ़ा नहीं है। हममें से जो लोग फेस रीडिंग औऱ बॉडी लैंग्वेज के जानकर हैं वो बरखा दत्त और इस शो में उसके रवैये से भी काफी कुछ मायने निकाल सकते हैं। हालांकि उसने नार्मल होने की पूरी कोशिश की लेकिन हमारी आंखें भी तो कुछ फर्क करना जानती है न। बाकी आप नीचें की वीडियो लिंक पर चटकाकर पूरी स्टोरी खुद देखें और अपनी राय दें-

वीडियो के लिए चटकाएं- बरखा दत्त विवाद
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1 Response to 'कटघरे में भरोसा नहीं दिला पायी बरखा दत्त'
  1. जीत भार्गव
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/12/blog-post.html?showComment=1327081022644#c1796113034608927686'> 20 जनवरी 2012 को 11:07 pm

    बरखा दत्त और राजदीप सरदेसाई (नोट के बदले वोट की सीडी निगलनेवाले) जैसे लोग मीडिया के नाम पर कलंक हैं। इनकी कई नाजायज हरकतों के बावजूद हमारे प्रेस संगठन और नियामक संस्थाओं ने इनके खिलाफ कोई कार्रवाई नही की है!!
    चैनल तो अपने व्यापारिक हितो के लिए इन्हे पाले हुये हैं, कॉंग्रेस सरकार भी इनको टूकड़ा डालती है। लेकिन इनकी बकवास पत्रकारिता देश की आवाम को झेलनी पद रही है। यह दर्दनाक बात है भाई।

     

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