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मां रोज के मुकाबले आज कुछ ज्यादा परेशान थी। बातचीत में साफ झलक रहा था कि उसकी दिल्ली में बाढ़ को लेकर चिंता( मुझे लेकर,वैसे सचिवालय,विधान सभा डूब जाए क्या मतलब) बढ़ती जा रही है। पिछले चार-पांच दिनों से वो रोज पूछती- सुन रहे हैं दिल्ली में बाढ़ आ गया है और फिर कुछ सवाल। पहले एक दिन मजाक में कहा भी.हियां( गरमी से परान जा रहा है,भेज दो कुछ पानी इधरे) लेकिन बाद में न्यूज चैनलों ने बाढ़ की खबरों का जो तंबू ताना कि वो मजाक करना भूलकर चिंतिंत होने लग गयी। आज तो हद ही हो गयी। जब उसने चैनल में मयूर विहार का भी नाम सुन लिया। उसे मेरे रहने का इलाका ठीक से पता नहीं था लेकिन हाल ही पता लिखाने के दौरान उसे याद हो आया था।

 झूठ्ठा- और कोई नहीं मिला तो हमरे से झूठ बोल दिए कि सब ठीक है,हिआं टाटा स्काई पर दिखा रहा है कि जहां तुम रहते हो,हुआं(वहां ) भी बाढ़ आ गया है। तुमको बोले थे उ दिन कि इंडिया टीवी में सब देखा रहा है तो तुम बोले कि दू कौड़ी का चैनल है,मत देखा करो उसको,सब बकवास देखाता है। आज तो स्टार न्यूज भी यही सब देखा रहा है औ उ दाढ़ीवाला भी बोल रहा था कि आ गया है बाढ़। बता रहा था कि सब डूब गया,तब तो खाय-पिए में बड़ी दिक्कत हो जाता होगा बेटा,सर-समान ठीक से रखना।                                                                                    मैंने मजे लेने शुरु कर दिए,मां को हल्का करने के लिए। कहा- कौन दीपक चौरसिया,वही कह रहे थे? अच्छा ये बताओ कि जब सबकुछ डूब गया तो फिर उनको एकदम से टीवी स्क्रीन में हेकड़ी दिखाने के लिए गुटखा कहां से मिल गया,देख नहीं रही थी..कैसे भसर-भसर चिबा रहे थे। मां लगातार बोले जा रही थी..तुम हमको बहलाते हो,जरुर संकट में हो,आवाजे से लग रहा है,माय का करेजा तुम कैसे समझोगे,है तीन-चार साल। समझ में आ जाएगा कि कैसन होता है माय-बाप का बाल-बच्चा के लिए दर्द।

दिल्ली में बाढ़ को लेकर मां सहित तीन अलग-अलग शहरों में बसी दीदी से बात होती रही। सबके साथ वही परिहास। दिल्ली का पानी यहां भेज दो,बहुत गर्मी है। लेकिन आज सब थोड़े-थोड़े चिंतिंत। मां जितनी तो नहीं लेकिन मेरी बातों पर पूरी तरह भरोसा भी नहीं नहीं और बेफिक्र भी नहीं। मैंने सबों से यही कहा कि सबसे ज्यादा बाढ़ न्यूज चैनलों पर आया है। अगर मेरा बस चलता तो स्टोरी करता- फिल्म सिटी में हाहाकार,कौन है जिम्मेदार? डूब गया फलां चैनल का न्यूजरुम,छतरी लगाकर कर रहे हैं एंकरिंग। लेकिन क्या करें? सबों की एक ही लाइन,फिर भी- तुम सब बात हंसी में टाल देते हो,ध्यान रखना। आज तो सीरियसली सबने दिखाया है।

ये कहानी सिर्फ मेरी और मेरे घर के लोगों की चिंता को लेकर नहीं है। संभव है मेरी तरह अकेले दिल्ली में रहनेवाले लोगों के घर से भी लगातार फोन आ रहे होंगे,घर के लोग परेशान होंगे। वो बिहार-झारखंड,यूपी देश के दूरदराज इलाके में बैठकर न्यूज चैनल्स देख रहे हैं,उन्हें कैसे समझाया जाए कि दिल्ली में बाढ़ से ज्यादा चैनलों में एडीटिंग मशीन की संतानों की कारस्तानी है। वो अपनी पीटूसी पर लट्टू हुए जा रहे होंगे और यहां है कि लाखों-हजारों परिवार के लोगों की जान अटकी हुई होगी। उन्हें इन सबसे क्या मतलब? वो एक टीवी कर्मचारी होने के अलावे किसी का बेटा,किसी के भाई,किसी के पति,किसी के देवर थोड़े ही है? उनके पीछे उन्हें याद करनेवाला,रोनेवाला थोड़े ही है?..और अगर है भी तो देख ही रहे होंगे कि मेरा बेटा कैसे शान से केसरिया रंग का डूबने से बचनेवाला जैकिट पहनकर हीरोगिरी कर रहा है,वोट में बैठकर सैर कर रहा है और जो कुछ भी कविता-कहानी बांच रहा है उसको लाखों लोग आंख गड़ाकर सुन-देख रहे होंगे? इंडिया टीवी की क्या कहें- बाढ़ वाली दिल्ली की दस कहानियां। इस चैनल को दस का अंक लगाने की ऐसी लत लगी है कि लगता है दाती महाराज ने सलाह दी है,हर बात में दस..दस चुलबुल पांडे तक।.हद है।.

ऐसी स्थिति में हम और बाकी लोग अपने घर के लोगों को टेलीविजन की उन बारीकियों को नहीं समझा सकते,जहां पर वो निरा चिरकुटई का काम करते हैं। शाम को स्टार न्यूज जिसने कि बाढ़ की खबरों को लेकर सबसे ज्यादा तंबू खड़ा किए हुए है,उसके दर्जनभर संवाददाता इसी काम में लगे हुए हैं कि वो दिल्ली के कुछ इलाकों में घुस आए पानी को कोसी के कहर से भी बड़ा दिखाएं-बताएं-उनकी बेशर्मी चरम पर है। एक संवाददाता प्रफुल्ल श्रीवास्तव तो भी- मोटर लगी नाव में खड़ा है-चारो तरफ पानी है। जाहिर है ये इलाके के भीतर का पानी नहीं है-वहीं से खड़े होकर चारों तरफ के उन इलाकों को डूबा हुआ बता रहा है जहां कि सड़के सूखी है। वो प्रोपर्टी डीलर की तरह हाथें फैलाता है-ये देखिए,इधर डूबा,वो देखिए सब डूबा।.वो जहां खड़ा है वहां की पूरी चौहद्दी को डूबा करार दे रहा है। जब शहर को डूबा हुआ ही दिखाना है तो लोकेशन वाइज मैंदान में उतरकर बात करो न। तुम पेड़ की तरफ इशारा किए और कह दिया-ये रहा निगम बोधघाट और हम मान लें।.. गदहे हैं क्या? उसी चैनल का संवाददाता वही काम कर रहा है जबकि फुटेज में चैनल की ओबी दिख रही है जिसके टायर तक डूबे नहीं है। लोकेशन को लेकर चैनल जो घपलेबाजी कर रहा है,वो आम ऑडिएंस के बीच आतंक से कम दहशत पैदा नहीं कर रहा। मयूर विहार में पानी,डूब गया।..तो भाई कौन सा इलाका,माचिस की डिबिया है क्या मयूर विहार? प्रोपर्टी के लिए इंच-इंच की मारकाट मची होती है और आप हो कि राउंड फीगर में सब बता रहे हो। हमें ये बात समझ आ रही है कि ये चैनल ऐसा क्यों कर रहा है?    
            
 आजतक ने कल से जो ऑपरेशन हे राम जिसमें आशाराम बापू से लेकर दाती महाराज,सुधांशु महाराज, महाकाल सब लपेटे में आ गए हैं,उससे चैनल को अच्छी टीआरपी मिलनी लगभग तय है। इधर  इंडिया टीवी ने लीग मैच पूरी लाइव दिखायी थी और एंकर ने हिन्दी में कमेंटरी कर दी,ये न्यूज चैनल पर क्रिकेट को पेश करने का नया तरीका था,अब इस चैनल के पास भी अच्छी टीआरपी आनी चाहिए। अब स्टार के पास क्या बचता तो बस खेल गए दिल्ली में बाढ़ और पल-पल की खबर पर। अश्लील तो तब लगा जब संवाददाता ने कहा कि आज दोपहर तक कॉमनवेल्थ के फ्लैट्स जहां बने हैं दोपहर तक पानी नहीं था और जब प्रत्यक्षदर्शी से बोलने कहा तो उसने बताया कि सुबह चार बजे ही पानी घुस आया था। फील्ड में अपने को चमकाने की बेहूदा हरकतें लाखों ऑडिएंस के जीवन को किस तरह प्रभावित करती है,इसका कोई अंदाजा इन्हें नहीं है। खबरों के पीछे का समाजशास्त्रीय विश्लेषण पूरी तरह मर गया,उसका गला घोंट दिया गया है। टीआरपी आ जाने की स्थिति में वो ठहाके लगाएंगे- अच्छा खेल गए हम इस बाढ़ पर। संभव है अबकी बार फिर बाढ़ की स्टोरी पर किसी को पॉलिटिकल कैटेगरी में गोयनका अवार्ड मिल जाए। लेकिन, जिस अंदाज में वो दिल्ली में बाढ़ की खबरें दिखा रहे हैं वो खबरें देने का काम कम,डराने का काम ज्यादा कर रहे हैं। उनके लिए बाढ़ का आना उत्सव है, पानी का उतरना मातम। लेकिन शायद वो ये नहीं समझ पा रहे हैं कि इस अफरा-तफरी में लोगों से टीवी देखना ही छूट गया तो टीआरपी के बदले क्या आएगा- घंटा?

मां को कई तरह से आश्वस्त किया। इतना तक कहा कि जब बाढ़ से ही डूबकर मरना है तो बिहार-झारखंड ही ठीक है न। घर छोड़कर इतनी दूर आए हैं,दिल्ली में कुछ करने आए हैं,कुछ और नहीं तो बाढ़ में डूबकर मरेंगे क्या? मां तुम टेंशन मत लो और हां एक काम करो,मैं तुम्हें सास-बहू सीरियलों के अलावे कुछ इधर-उधर मतलब न्यूज चैनलों को भी देखने की जो राय देता रहा,उसे भूल जाओ। तुम सास-बहू ही देखती रहो। हम तुमसे इसी पर बात करेंगे कि लाडो की सिया कैसे धीरज को बचा पाएगी, उतरन की तपस्या फिर किसके जाल में फंसेगी,गीत का सपना पूरा होगा भी या नहीं, ललिया की यादाश्त वापस आएगी कि नहीं? मां,अगली बार फोन पर यही सब बात करुंगा,एपीसोड देखकर तैयार रहना..

नोट- चैनलों की इस गंध मचाने,बाढ़ के नाम पर रायता फैलाने की तरफ वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल ने भी फेसबुक पर नोटिस ली है- दिल्ली के एक हिस्से में यमुना बहती है। उसके आसपास रहने वाले कुछ इलाकों में पानी भर गया है। इनसाइट फाउंडेशन के मित्र अनूप कुमार ने अपनी मां को मैसेज भेजा है कि ज्यादा परेशान न हों और हो सके तो न्यूज चैनल कम देखें। दिल्ली का राष्ट्रीय मीडिया दिल्ली-मुंबई को लेकर जिस तरह पगलाया हुआ है, वह उसके राष्ट्रीय होने पर सवालिया निशान खड़ा करता है। कोशी की बाढ़ में 15000 लोगों के मरने से बड़ी है यमुना की बाढ़! शर्म...शर्म।
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16 Response to 'तुम सास-बहू ही देखती रहना मां,न्यूज चैनल नहीं'
  1. ajit gupta
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/09/blog-post_12.html?showComment=1284264268595#c2106003766299585173'> 12 सितंबर 2010 को 9:34 am

    हम तो इन्‍हें भस्‍मासुर कहते हैं, यह जब तक पूरे देश को भस्‍म नहीं कर देंगे इन्‍हें चैन नहीं आएगा। ये तो गुलामी में ही जीएंगे। अच्‍छी पोस्‍ट है।

     

  2. निशांत मिश्र - Nishant Mishra
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/09/blog-post_12.html?showComment=1284265130953#c586178007456874706'> 12 सितंबर 2010 को 9:48 am

    भोपाल से मेरे घर से भी फोन आता है. हद तो तब है जब इन्होने पानी भरे हुए कई इलाकों में वसंत कुञ्ज का नाम भी दिखा दिया जहाँ मैं रहता हूँ. कंस्ट्रक्शन चल रहे इलाके में कुछ दूरी तक निकासी न होने के कारण आधा-एक फुट पानी भर जाता है उसे ये बाढ़ का पानी बता देते हैं.
    मैं तो स्टार न्यूज़ नहीं देखता. इण्डिया टी वी देखने का सवाल ही पैदा नहीं होता. आजतक देखने का मन नहीं करता. एनडीटीवी देखता हूँ पर लगता है उसे कौंग्रेस से आर्थिक सहायता मिलती है. अब और क्या देखूं. सरकारी चैनल बहुत सीमित समाचार दिखाते हैं जिनमें बेतरह सरकारीपन होता है.
    कभी मन करता है कहीं से करोड़ों रुपये कबाड़ कर अपना एक चैनल बनाऊं और उसमें सिर्फ खबरें दिखाऊँ.
    वैसे, आप भी तो उसी का एक सदस्य हैं जो पत्रकार बिरादरी चैनलों पर यह सब कर रही है. आप उनकी जगह हों तो यह सब नहीं करेंगे क्या?

     

  3. सत्यानन्द निरुपम
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/09/blog-post_12.html?showComment=1284266274850#c5156199952033837114'> 12 सितंबर 2010 को 10:07 am

    maan aur media ke bich, niji aur sarvjanik ke bich, aatmiy aur samajik ke bich khade hokar donon se rishta rakhte hue, donon se doori banaye rakh kar mool midde par vichar karne ka jo kaushal lagataar nikharte ja rahe ho, wah kamaal hai aur tumse hamari ummidein badhate ja raha hai...
    lage raho ..dil se, jage raho..dimag se :)

     

  4. सिद्धार्थ
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/09/blog-post_12.html?showComment=1284269587450#c8785906237088844966'> 12 सितंबर 2010 को 11:03 am

    न्यूज चैनेल वालों ने वाकई अन्धेर मचा रखी है। मेरे पिताजी भी मेरे भतीजे को लेकर चिंतित हो गये हैं। जबकि वह नोयडा में एक बड़े अपार्टमेंट में रहता है। आपकी रिपोर्ट उन्हें पढ़वाता हूँ। मेरे समझाने को अब शायद सही मान लेंगे। :)

     

  5. Pooja Prasad
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/09/blog-post_12.html?showComment=1284270562973#c7401716201744315562'> 12 सितंबर 2010 को 11:19 am

    चैनल वालों के लिए क्या कहें और क्या न कहें...ऐसा लगता है कि इस हमाम में हम सभी नंगे हैं..दूसरा, अपना निजी अनुभव बताऊं तो अब घर में जब भी न्यूज देखी जा रही होती है तो मैं उसका जिस्ट (यानी मेन न्यूज) मां और सबको दो लाइनों में बता देती हूं। और कह देती हूं कि बाकी जो भी कुछ इसके अलावा मोटे और भारी शब्द, और ये भाव भंगिमाएं देख रहो हो, ये सब प्रैक्टिस्ड ऐक्टिंग है..न्यूज चैनल की किसी भी रिपोर्ट या खबर से सिर्फ इंफॉर्मेशन उठाओ और बस कान बंद कर लो या चैनल बदल लो...न्यूज चैनलों की भावनाओं को सच मत मानो क्योंकि वे रावण का छलावा हैं जिन्हें सीता की टीआरपी चाहिए...

     

  6. मनोज कुमार
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/09/blog-post_12.html?showComment=1284271279137#c1595114423774147420'> 12 सितंबर 2010 को 11:31 am

    बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
    काव्यशास्त्र (भाग-1) – काव्य का प्रयोजन, “मनोज” पर, आचार्य परशुराम राय की प्रस्तुति पढिए!

     

  7. प्रभात रंजन
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/09/blog-post_12.html?showComment=1284273467059#c228209669216047967'> 12 सितंबर 2010 को 12:07 pm

    सचमुच समाचार चैनलों को देखने से लग रहा है दिल्ली डूबने वाली है. आपने अच्छा विश्लेषण किया है.

     

  8. निखिल आनन्द गिरि
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/09/blog-post_12.html?showComment=1284273927232#c7265599598875442641'> 12 सितंबर 2010 को 12:15 pm

    हमारी मां टीवी नहीं देखती...शुक्र है....शुक्र है कि मैंने भी अभी तक दिल्ली में टीवी नहीं लिया....दांती महाराज को दांती लग गया है...इसीलिए इंडिया टीवी के रिपोर्टर्स पछाड़ खा के गिर रहे हैं बारिश में....बाकी चैनल भी हेल रहे हैं पानी में...टीआरपी की मछली मिलेगी वहीं से...

     

  9. काजल कुमार Kajal Kumar
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/09/blog-post_12.html?showComment=1284280224900#c1975689553269855380'> 12 सितंबर 2010 को 2:00 pm

    इन जोकरों का बस चले तो पूरी दिल्ली को डुबा कर ही मानें. शुक्र है कि यमुना में हर साल बाढ़ आती है और हम दिल्ली वालों को पता है कि ये कितना झूठ बखान रहे हैं.

     

  10. Sanjeet Tripathi
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/09/blog-post_12.html?showComment=1284282979142#c5087465584318238490'> 12 सितंबर 2010 को 2:46 pm

    bahut accha lapeta hai. shukr hai ki mujhe TV dekhne ki aadat nahi hai. 10 mint dekh liya to bahut hai...

    vaise aapka ye kahna ki "मां तुम टेंशन मत लो और हां एक काम करो,मैं तुम्हें सास-बहू सीरियलों के अलावे कुछ इधर-उधर मतलब न्यूज चैनलों को भी देखने की जो राय देता रहा,उसे भूल जाओ। तुम सास-बहू ही देखती रहो। हम तुमसे इसी पर बात करेंगे कि लाडो की सिया कैसे धीरज को बचा पाएगी, उतरन की तपस्या फिर किसके जाल में फंसेगी,गीत का सपना पूरा होगा भी या नहीं, ललिया की यादाश्त वापस आएगी कि नहीं?'

    bahut-bahut hi satik lagaa.

     

  11. jyoti sharma
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/09/blog-post_12.html?showComment=1284283095342#c7182473221940457820'> 12 सितंबर 2010 को 2:48 pm

    i agree.. u r right.. ein news walon ne shayad barish nahi dekhi isse pehle,, bechare kya karein pichle saal to sukha-sukha chila rahe the, ab pani apni raftar se barsa hai to achmbha to hoga hi na:)

     

  12. बी एस पाबला
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/09/blog-post_12.html?showComment=1284283953303#c8544130421668907639'> 12 सितंबर 2010 को 3:02 pm

    चलो अच्छा है हम टीवी नहीं देखते!
    क्या यमुना का चढ़ाव क्या तपस्या वाली उतरन

     

  13. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/09/blog-post_12.html?showComment=1284289200298#c8638790380540320211'> 12 सितंबर 2010 को 4:30 pm

    ये चैनल वाले जो न करायें। बड़ी बढिया रपट है।
    सब चैनलों पर भारी/ विनीत कुमार की सवारी।

     

  14. अजय कुमार झा
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/09/blog-post_12.html?showComment=1284308464993#c2696066389849131011'> 12 सितंबर 2010 को 9:51 pm

    लो कल्लो बात सब उलटा कर के रख दिए न आप ...हम तो सोचे थे कि जल्दी ही यमुना में तैरती हुई अपनी एक फ़ोटो लगा कर सबको बताएंगे कि देखो कैसे तैर तैर के डूब डूब के ब्लॉगिंग कर रहे हैं ...कौनो मजाक है का । आप सब पोल खोल दिए ..जाईये आपको पाप लगेगा ....ऐसा टीवी वाला सब कह रहा था

     

  15. रंजन
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/09/blog-post_12.html?showComment=1284370045052#c3881945986523629508'> 13 सितंबर 2010 को 2:57 pm

    मैं तो डीडी न्यूज देख पाता हूं..
    और लगता है..
    भारत में कोई समस्या नहीं है.
    सरकार ने पुरी तैयारी कर रखी है..

     

  16. Kewal Ram
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/09/blog-post_12.html?showComment=1284572513915#c8062805947479568778'> 15 सितंबर 2010 को 11:11 pm

    aachi notice li hai aapne in samachar chanlon ki aaj jayada tar vivad in chanlon ki wajah se ho rahe hain.choti si baat ko badha chadha kr pesh krna inki fitrat ban chuki hai
    aachi post ke liye badhai

     

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