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आजतक पर टीआरपी की चाबुक लगातार चल रही है और वो पछाड़ खाकर गिर रहा है। जिस टीआरपी के बक्से ने उसे मीडिया इन्डस्ट्री का बेताज बादशाह बनाया,पिछले कुछ हफ्तों से वही उसकी चमड़ी उधेड़कर रख दिया है। पहले से ही लहूलूहान हुए इस चैनल पर इन्डस्ट्री के अनुभवी पत्रकार नागार्जुन(बदलता हुआ नाम) मरहम-पट्टी करने के बजाय उनके जख्मों को और हरा कर दिया। उन तमाम मसलों पर बेबाकी से बात की जिसकी वजह से आजतक की ये हालत हुई है। नागार्जुन की नींबू निचोड़ शैली में अपनी बात रखने के बाद कहने को कुछ रह नहीं जाता लेकिन जो मसला हमें जरुरी लगा उसे मैंने आज मोहल्लालाइव पर शेयर किया। वो कमेंट और पोस्ट की शक्ल में मौजूद है। लिहाजा ये पोस्ट आपसे साझा कर रहा हूं-

डिस्ट्रीब्‍यूशन के सवाल पर हमें जो जानकारी मिली उसके अनुसार हमसे ही सवाल किया गया – आनेवाले पंद्रह दिन आजतक के साथ ऐसा ही रहेगा, पता है क्यों? मैंने कहा – नहीं, मुझे नहीं पता। विश्‍लेषण के आधार पर जो अटकलें लगा सकता था, उसे मैंने सामने नहीं रखा था। उनका जबाब था – डिस्ट्रीब्यूशन। आजतक ने अपना डिस्ट्रीब्यूशन दिल्ली सहित दूसरे शहरों में कम करके साउथ की तरफ इसे बढ़ाया है और बढ़ाने जा रहे हैं। आनेवाले समय में वो कुछ और चैनल उधर लांच करेंगे।
उनके हिसाब से आजतक की जो हालत हुई है, वो जान-बूझकर हुई है और आजतक के लोग भी इसे जानते हैं। ये तो बाहर के लोग बेवजह हो-हल्ला मचा रहे हैं। लेकिन किसी के लिए भी ये बात समझ से परे है कि कोई भी चैनल जमी-जमायी रिच को उखाड़कर दूसरी जगह डिस्ट्रीब्यूशन पर ध्यान जमाएगा। टीआरपी की शर्त पर दूसरे नये वेंचर नहीं खड़े किये जा सकते। ये इनहाउस संतोष कर लेने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है लेकिन आजतक की गिरती हालत को डिस्ट्रीब्यूशन की बहानेबाजी के तहत नहीं धकेला जा सकता है। हां, ये जरूर है कि अगर आजतक आनेवाले समय में मामूली रिसोर्सेज बढ़ाते हुए (जिसमें ट्रांस्पॉन्डर स्पेस भी शामिल हैं) नये वेंचर खड़ा करने की कोशिश करता है, तो परेशानी हो सकती है।
इसी क्रम में जो एक सवाल जो कि संभव है, थोड़ा सब्जेक्टिव हो वो ये कि अब आजतक के लोगों के बीच काम करने का उत्साह पहले जैसा नहीं रह गया है। उन्हें अब महसूस नहीं होता कि वो देश के सबसे बेहतर चैनल, सबसे तेज चैनल और नियम-कायदे से चलनेवाले चैनल में काम कर रहे हैं। नंबर वन बनाये रखने का जज्बा उनके भीतर से लगातार मर रहा है, जिसकी एक वजह तो ये कि इसे लीड करनेवाले लोग उन्हें अपने फैसले से जोश में बनाये रखने की स्थिति में नहीं हैं और दूसरी वजह जो कि ज्यादा ठोस हो सकती है – चार साल से कोई इनक्रीमेंट नहीं। इस साल एप्रेजल मिलेगा, अबकी बार तो पक्का, फिर आर्थिक मंदी का हवाला, फिर उबरने की कोशिशों के बीच चार साल तक लोगों ने बर्दाश्त किया। अब कोई जेनुइन वजह नहीं रह गयी और लोगों के बीच गहरा असंतोष है।
जेनुइन वजह तो तब भी नहीं थी जब विश्व आर्थिक मंदी का दौर चल रहा था। केपीएमजी की वार्षिक रिपोर्ट पर गौर करें, तो बाकी सेक्टर के मुकाबले इस सेक्टर पर कम असर हुआ। अगर आप टीवीटुडे नेटवर्क की बैलेंस सीट से मिलान करें तो संभव है कुछ वैसे ही नतीजे सामने आएंगे कि हाउस को कोई नुकसान नहीं हुआ। हां अनुमान लगाया जा सकता है कि इसी दौरान संस्थान ने नये वेंचर खड़ा करने और उसे विस्तार देने के फैसले लिये, इनवेस्ट किया। इसका मतलब कोई चाहे तो आसानी से निकाल सकता है कि जो पैसे वहां के लोगों के इनक्रीमेंट के खाते में जाने चाहिए थे, उसे वेंचर को विस्तार देने के काम में लगाया गया। ये तस्वीर अमिताभ के सिनेमा में मिल मजदूरों की दिखायी गयी हालत से कुछ अलग नहीं है। आर्थिक स्तर पर पूंजीवाद से कार्पोरेट में घुस आया हमारा विकास भले ही ज्यादा चमकीला दिखाई देता हो लेकिन शोषण का असर पूंजीवाद से कम बदतर नहीं है।
अब स्थिति ये है कि मीडिया इंडस्ट्री के भीतर का जो माहौल है, उसमें कोई भी सेफ जोन में नहीं है। वीओआई जैसे टाइटेनिक जहाज के डूबने, पीटर मुखर्जी के आइनेक्स को जहांगीर पोचा जैसे शख्स के हाथों बेचने, न्यूज24 के लड़खड़ाने जैसे मामलों के बीच लोगों को ये समझ आने लगा है कि महज पूंजी के बल पर मीडिया का धंधा करना आसान काम नहीं है। इस बीच बड़े-बड़े नामों के धुर्रे उड़ गये। जो कभी ऑडिएंस के दिलों पर राज करते रहे, कलेजे पर सवार रहे, उनका आज कोई नामलेवा नहीं है। किसी बड़े बाबा का हाथ थामकर आंख मूंदकर दूसरे चैनल में कूदने से क्या हश्र होता है, ये लोग पंडिजी के साथ जाकर लोग झेल चुके हैं और उसके शिकार अभी भी लोग भटक रहे हैं। कुल मिलाकर इंडस्ट्री के भीतर स्थिति इतनी आसान नहीं है कि कोई कहीं भी छोड़कर आसानी से चला जाए और वो भी आजतक से… तो सवाल है कि आदमी करे तो क्या करे? चार साल से जो जहां जिस पगार पर काम कर रहा है, कर रहा है। इन तीन-चार सालों में एक बड़ा मिथक टूटा है कि मीडिया इंडस्ट्री में अथाह पैसा है। ये बात कम से कम निचले और बीच के स्तर के लोगों पर तो अब लागू नहीं ही होती।
आजतक शुरू से दूरदर्शी चैनल रहा है। उसे इस बात का शुरू से आभास रहा है कि आनेवाले समय में टीमें टूट सकती हैं, लोग बिखर सकते हैं इसलिए जानकारी ही बचाव की तर्ज पर उसने अपनी नर्सरी में ही आजतक के मीडियाकर्मियों की पौध तैयार करनी शुरू की। टीवीटीएमआइ के जरिए हर साल 25-30 ऐसे मीडियाकर्मी तैयार किये जाते रहे हैं जो कि इंट्री के पहले दिन से ही टीआरपी के बताशे बनाने के बीच सांस लेना शुरू कर देते हैं। ये कितने काबिल मीडियाकर्मी हैं और होंगे (चार साल में हमने यहां से निकले एक का भी नाम नहीं सुना), इस बहस में न भी जाएं तो भी टीआरपी का खेल भंडुल न हो, इसकी तैयारी चैनल ने पहले से कर रखी है। यहां आनेवाला शख्स इस बात से खुश होता है कि करीब डेढ़ लाख देकर वो देश के सबसे तेज चैनल का मीडियाकर्मी बन ही जाएगा। असल जिंदगी में वो सबसे लद्धड़ भी रहा, तो फर्क नहीं पड़ता। जिस कॉनफ‍िडेंस के साथ वो ट्रेनी के कार्ड से चैनल का दरवाजा खोलता है, अच्छे से अच्छा पुराना मीडियाकर्मी उसके आगे मद्धिम पड़ जाए। वैसे भी जहां दूसरे संस्थान इससे कहीं अधिक पैसे लेकर इंटर्नशिप तक की गारंटी नहीं देते, उस लिहाज से तो ये इंस्‍टीट्यूट अच्छा ही है न।
लेकिन, यहां से पासआउट लोगों की हालत तो ऊपर के कसमसा रहे मीडियाकर्मियों से भी बदतर है। आये दिन खुलनेवाले नये चैनलों के झांसे में ही आकर सही, वो आजतक के नाम पर दूसरे चैनलों के बड़े पद पर फिर भी जा सकते हैं, चैनल लांच करानेवाली टीम का सेहरा अपने ऊपर बांध सकते हैं लेकिन इस संस्थान के लोग तीन साल से पहले कहीं नहीं जा सकते। इन्हें जो रकम इस दौरान दी जाती है और जिस कॉन्ट्रेक्ट पेपर पर साइन कराये जाते हैं, वो पीपली लाइव के सीन की याद दिलाता है। नत्था को लालबहादुर दिया जाता है। लालबहादुर यानी हरे रंग का एक चापानल। जो रंग नत्था के चेहरे पर हरियाली बिखेरने के बजाय चिंता बिखेरता है। पेपर पर अंगूठा लगाने के बाद वो आत्महत्या भी नहीं कर सकता, अगर करता है तो पैसे नहीं मिलेंगे। तो आजतक के भीतर एक बड़ी तादाद में लालबहादुर पा चुके मीडियाकर्मी काम कर रहे हैं, जिनका टीआरपी के बताशे बनाने में कितनी भूमिका है, नहीं पता – लेकिन उनकी हालत नत्था के करीब है।
इस तरह कहानी बनती है कि चैनल का बिजनेस, ब्रांडिंग और टीआरपी के लिहाज से जो हाल है, उसके लिए जिम्मेदार अगर मौजूदा टीम है, तो चैनल के लोगों की जो अंदरूनी हालत है, उसके लिए भी कौन जिम्मेदार है, इस पर बहस होनी चाहिए। बाहर से अनुमान लगाने की स्थिति में मेरी कई स्थापनाएं गलत हो सकती हैं, उसे आगे दुरुस्त किया जा सकता है। लेकिन आजतक के कई मिथक अगर टूटते हैं, सरकारी नौकरी की तरह ये निश्चिंत होकर काम करने का मीडिया संस्थान नहीं रह गया है तो इस मिथक के टूटने के तमाम कारणों पर भी विचार करने की जरूरत है। हम अपने सबसे पुराने चैनल को (कभी भी दूरदर्शन का दर्शक नहीं रहा, जिसके हिसाब से हम अपने उम्र की गिनती मिलाते हैं) इस तरह तार-तार होता नहीं देखना नहीं चाहते। इस लिहाज से इस पर बात करना, बहस करना जरूरी लगता है।
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3 Response to 'आजतक के कई नत्था "लालबहादुर" से काम चला रहे है'
  1. honesty project democracy
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/09/blog-post.html?showComment=1283585175264#c3365954854867441156'> 4 सितंबर 2010 को 12:56 pm

    अब इन चेनल वालों को अच्छे लोग मिलेंगे भी नहीं क्योकि इन्होने पत्रकारिता को बेच खाया है और असल पत्रकारों की इज्जत करना ये जानते नहीं ,इनकी हालत अब और बदतर होने वाली है क्योकि इनको अब दर्शक भी नकारने वाले हैं ,झूठ और तिकरम से पाई ऊंचाईयां ज्यादा दिन बरक़रार नहीं रहती ,आपको इस शानदार प्रस्तुती के लिए धन्यवाद ...

     

  2. प्रभात रंजन
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/09/blog-post.html?showComment=1283605895431#c8621782830824997146'> 4 सितंबर 2010 को 6:41 pm

    आपने नम्बर १ चैनल की अच्छी खबर दी है. पढ़ने से ज्ञानवर्धन तो हुआ ही आपके लिखने का अंदाज़, मज़ा आ गया.

     

  3. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/09/blog-post.html?showComment=1283910577456#c4863304447387126721'> 8 सितंबर 2010 को 7:19 am

    आज तक सबसे तेज चैनल है। चलते-चलते थक गया होगा।
    अंदर की बातें पता लगीं इस लेख से। जय हो।

     

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