पैर रहते रेंगना बहुत मुश्किल होता है,जुबान रहते चुप रहना मुश्किल होता है, दिमाग रहते गलत-सही सब मान लेना मुश्किल होता है लेकिन मुश्किल नहीं होता कहना- कर लो जो करना है। हम अपनी लिखें और उन्हें जो जी में आए करने दें, आएं व्यवस्थित समाज के बीच बर्बर समाज बनाए, कुछ आप तोड़े, कुछ तोड़-फोड़ हम मचाएं-हां जी सर,हां जी सर कल्चर के खिलाफ बिगुल बजाएं..... हमें मेल करें-vineetdu@gmail.com

Friday, June 19, 2009

बिहार को मुहावरा मत बनाइए खांडेकर साहब


अभिलाष खांडेकर(एमपी स्टेट हेड,दैनिक भास्कर) जब भोपाल को बिहार होने से बचाइए जैसी लाइन लिख रहे होंगे तो यही समझ रहे होंगे कि वो पत्रकारिता की दुनिया में एक नया मुहावरा, एक नया मेटाफर गढ़ने जा रहे हैं। उन्हें अपराध औऱ व्यवस्था के लिजलिजेपन की अभिव्यक्ति देने के लिए अब तक के मौजूदा सारे शब्द पुराने और असमर्थ जान पड़ रहे होंगे। लेकिन सवाल है कि क्या खांडेकर ये शब्द सिर्फ औऱ सिर्फ अपराध और अव्यवस्था को व्यक्त करने के लिहाज से प्रयोग कर रहे हैं। अगर ऐसा है तो हम इस बात पर सिर्फ अफसोस जाहिर कर सकते हैं कि खांडेकर जैसे पत्रकार की शब्द सम्पदा कितनी सीमित हैं और भाषा के मामले में कितने लाचार पत्रकार हैं।
लेकिन नहीं,दूसरी स्थिति ये भी है कि ये भाषाई प्रयोग और मेटाफर गढ़ने की आपाधापी नहीं है। निजी समाचार चैनलों की तर्ज पर खांडेकर ने जिस तरह की भाषा का प्रयोग किया है वो उनकी बिहार को लेकर व्यक्तिगत मानसिकता को स्पष्ट करता है। ये बताने के लिए कि वो एक खास तरह के क्षेत्रवादी मानसिकता से लैस पत्रकार हैं,ये लाइन पर्याप्त है। अपने पत्रकारीय जीवन में चाहे वो लाख बौद्धिकता का लबादा ओढ़े फिरते रहें लेकिन इस लाइन के प्रयोग से ये लबादा भी अब जगह-जगह से मसक गया है। अब उसके भीतर से जो कुछ भी झांक रहा है वो इतना खतरनाक,घृणित औऱ परेशान करनेवाला है कि इसे जगह-जगह से ढंकने के बजाय पूरे लबादे को चीरकर खांडेकर के असली चेहरे को पाठक को सामने लाकर पटक देना ही बेहतर होगा।
पत्रकारिता की दुनिया में ऐसे कामों के लिए व्यक्तिगत स्तर पर माफी मांगने और नैतिकता के आधार पर क्षमा करने की कहीं कोई गुंजाइश नहीं है। जो पत्रकार भोपाल में बैठकर ये मानकर चल रहा हो कि बिहार को लेकर अनर्गल लिखने से भोपाल के पाठक खुश होंगे,उनके उपर नैतिकता आधारित बातें करने के बजाय कानूनी स्तर की कार्यवाही अनिवार्य है। ये सिर्फ अभिव्यक्ति के स्तर पर हेरा-फेरी का मामला नहीं है बल्कि पत्रकारिता के नाम पर जान-बूझकर पक्षपात करने और घृणा फैलाने का दुष्चक्र है। खांडेकर को कानूनी धाराओं के अन्तर्गत सजा मिलनी चाहिए। पत्रकारों को जितना हो सके,इसके लिए प्रयासरत हों।

मोहल्लाlive पर मेरी टिप्पणी

आइए, खांडेकर की बिहार विरोधी मुहिम का विरोध करें
[19 Jun 2009 |

2 comments:

उपाध्यायजी(Upadhyayjee) said...

शर्म आती है ऐसे पत्रकारों पर. पहले तो एक समाचार के हेड पत्रकार को मालुम नहीं की जिस घटना से उब कर ये लिखें हैं वो मुंबई और दिल्ली के सड़को पर आये दिन होते रहती है. बिहार में तो इस तरह की घटना नहीं सुनाने को मिली है आजतक. उसकी घटिया मानसिकता इसी से जगजाहिर होती है. दैनिक भाष्कर समूह का ईमेल ID प्रकाशित कीजिये या भेजिए अपना विरोध दर्ज करना तो हक़ बनता है. अब तो तक तो छुट भैये नेता ऐसी हरकत करते थे लेकिन ये घटिया दर्जे का संपादक या हेड करने लगे तो बरदास्त से बाहर है.

"अर्श" said...

SHARMNAAK AUR NINDANIYA... KISI UCHE OHADE PE BAITHE SE TO KAM SE KAM YE UMMID NAHI KI JAA SAKTI... HASYSPAD ...



ARSH