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तुम,रवीश और युनूस इ सब फेसबुक पर आकर सेंटिया क्यों जाते हो। कोई मजहब को गैरजरुरी बताने लग जाते हो और कोई लिखते हो-हर आदमी एक उड़ाता हुआ बगूला था तुम्हारे शहर में हम किससे गुफ्तगू करते।

मौज में होता हूं तो ऑनलाइन रहे दोस्तों,सरजी और मैडमजी लोगों को छेड़ देता हूं। अभी गिरि(गिरीन्द्रनाथ झा)मिल गया। पूछा,फेसबुक पर रोज इस तरह से क्या सब लिखते हो। अब मेरे उपर इनलोगों का असर देखिए कि मैं भी लिख आया-आजकल देख रहा हूं कि सब सेंटी हो जा रहे हैं, इन्फैक्ट मैं भी,पता नहीं मौसम का असर है क्या। गिरि ने चैटबॉक्स पर ही जबाब दिया- क्या करें भइया, इ स्साला फेसबुकवा रोज पूछता है कि तुम्हारे दिमाग में क्या चल रहा है। दिल्ली जैसे शहर में घर से दूर,कोई बूढ़ा-बुजुर्ग पूछता नहीं कि कहां जा रहे हो, क्या सब चल रहा है तुम्हारें मन में,आगे का क्या प्लान है तो सोचते हैं इसी पर लिख दें। कम से कम तसल्ली तो रहे कि सोचने-समझने की कैपसिटी अभी खत्म नहीं हुई है। गिरि की बात समझ में आ गयी औऱ कुछ पुरानी यादें भी पाइपलाइन में लगकर खड़ी हो गयी कि इस पोस्ट में हमें भी शामिल करो।

इधर पेसबुक पर ही अविनाश ने लिखा-हमारे इलाके में थोड़ा अश्लील संदर्भ में ही सही, एक शब्द है - घंटा। कभी कभी किसी के सवाल पर जी चाहता है, कहें - घंटा, माइंड में क्या चलेगा? । अब गिरि अविनाश की दीवार पर लिख आया-घंटा बजाया भी जा सकता है.......घंटा..। फेसबुक पर जाते ही अक्सर एक लाइन याद आती है- बात निकली है तो दूर तलक जाएगी। कई बार तो एक बात को लेकर,एक ही साथ कई लोग अपनी-अपनी राय सूत्रधार की दीवार पर जाकर खोंसने लग जाते हैं तो लगता है कि किसी के अपने घर से बाहर खटिया,चौकी औऱ अब फोल्डिंग बेड निकालने भर की देरी नहीं होती कि लोग आकर बैठ जाते हैं। ये संचार की सबसे मजबूत मानसिकता है. आप गांव या कस्बों में जाइए और घर से फोल्डिग निकालिए औऱ फिर भी लोग नहीं बैठ रहे हैं, दो-चार मिनट रुककर नहीं बोल-बतिया ले रहे हैं तो समझिए की वो इलाका शहर होने की कगार पर है। जिस तरह गांव में कोई भी खटिया-मचिया घर से बाहर निकालता है तो निकालनेवाले को भी एग्जेक्ट पता नहीं होता कि कौन आएगा,कौन आकर बैठेगा, लेकिन कोई तो आएगा, ये उम्मीद बनी रहती है।
यही हाल फेसबुक की दीवारों का है। जिसको जैसा लगा, जिस भी काम में व्यस्त है,दीवार पर लिख दिया कि भइया इन दिनों मैं तिमारपुर के बुधवार बाजार से पाइरेटेड सीडी लाने में व्यस्त हूं। अब कोई आकर दीवार पर जानकारी ठोक जाए कि लाल किला के पास ऐसी सीडी मिलनी बंद हो गयी है। कोई कहे,हम तो पायरेसी कल्चर को सपोर्ट करते हैं, इससे आर्ट औऱ सिनेमा को लेकर एक डेमोक्रेटिक स्पेस बनता है। अजय ब्रह्मात्मज के शब्दों में कहें तो ये तब तक नहीं रुकेगा जब तक देश की हर ऑडिएंस बिना कोई क्लास डिफरेंस के अपने मामूली सिनेमाघरों में रिलीज हुए दिन ही सिनेमा देखने का अधिकार नहीं पा लेती। कोई इसके विरोध में मोर्चा खोल जाए। इस लिहाज से फेसबुक वर्चुअल स्पेस का बतकुच्चन और खिस्सा-गलबात करने की जगह के रुप में आकार ले रहा है। अभी तो ये डेलीलाइफ की शेयरिंग है लेकिन लोगों की प्रतिक्रिया इसे ब्लॉग के मिजाज की चीज बनाने जा रही है। मजे की बात है कि इसमें तीन-चार लाइन से ज्यादा लिखना चाहें तो टाइप ही नहीं होता। मतलब साफ है- उतना ही कहो,जितना तुम्हारा सच है। मेनस्ट्रीम की मीडिया में एक शब्द इस्तेमाल होता है, स्टोरी आइडिया क्या, ट्रीटमेंट की बात बाद में। कॉन्सेप्ट पर बात करो। यहां फेसबुक में एक-दो लाइन में कॉन्सेप्ट बता दें,आपके मन में जो चल रहा है,बस वही बता दें,हो गया आपका काम। अब इसके पीछे पूरी रामकहानी न सुनाने लगें।
फेसबुक पर लिखी लोगों की रोज की लाइनों पर गौर करें, फिलहाल तो साइज के ही हिसाब से। मुझे अपने स्कूल की डायरी याद आती है जिसमे रोज पापा से साइन कराने होते थे कि सारा काम दुरुस्त किया है कि नहीं मैंने। उस डायरी पर पापा को साइन करना होता था और मां को पढ़ना होता था कि कहीं सिस्टर ने ये तो नहीं लिखा है कि फटे मोजे पहनाकर क्यों भेज दिया, लंच में रोज ग्लैक्सो बिस्कुट क्यों भेजती हैं, आदि-आदि। इन सब बातों के साथ-साथ मुझे उपर लिखी लाइनें भी ध्यान में आ रही है-साइज के हिसाब से। साइज में ये फेसबुक की ही साइज की हुआ करती थी. कंटेंट में उन लोगों की लाइनें लिखी होती जिन्हें पढ़कर,जीवन में उतारकर महान बना जा सकता है। अगर कोई बच्चा इन लाइनों पर गौर करे या फिर किसी के मां-बाप इन लाइनों को उन बच्चों के भीतर आचरण के तौर पर ठूंसना चाहे तो रोज दूध पीने के लिए चिक-चिक करनेवाला बच्चा दूध पीना शुरु कर दे और कहे- एक-नहीं, दो नहीं तीन गिलास दूध पिला दो लेकिन इन लाइनों को आचरण में मत ठूंसों- ऑनेस्टी इन दि बेस्ट पॉलिसी।
जिन लोगों ने सरस्वती शिशु मंदिर से पढ़ाई की है उऩकी डायरी में कुछ औऱ ही लिखा होता। उनकी डायरी के आस-पास गीता प्रेस की डायरी भी फटकती रहती जो अक्सर उनके गुरुजी इस्तेमाल किया करते । हर पन्ने पर गीता की एक श्लोक। मुझे नहीं पता कि डायरी पर लिखे इन आदर्श वाक्यों में असल जिंदगी में कितना असर होता है लेकिन मैं ये सोचता हूं कि अगर कोई स्कूल ऐसी डायरी बनाए जिसमें जीवन के सूत्र वाक्य फेसबुक से उठाकर छाप दे तो कितना नैचुरल होगा और अपीलिंग भी,लगेगा ही नहीं कि कोई पाखंड है, लाइक, रवीश कुमार की ये लाइन- आदर्श सब टूट गया, संघर्ष सब छूट गया।.
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6 Response to 'फेसबुकवा रोज पूछता है स्साला,दिमाग में क्या चल रहा है'
  1. सुशील कुमार छौक्कर
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/03/blog-post_20.html?showComment=1237535160000#c6552920175021025067'> 20 मार्च 2009 को 1:16 pm

    पोस्ट पढकर कुछ लाईनों ने सोचने के लिए कहा। मसलन
    आप गांव या कस्बों में जाइए और घर से फोल्डिग निकालिए औऱ फिर भी लोग नहीं बैठ रहे हैं, दो-चार मिनट रुककर नहीं बोल-बतिया ले रहे हैं तो समझिए की वो इलाका शहर होने की कगार पर है।

    हर पन्ने पर गीता की एक श्लोक। मुझे नहीं पता कि डायरी पर लिखे इन आदर्श वाक्यों में असल जिंदगी में कितना असर होता है लेकिन मैं ये सोचता हूं कि अगर कोई स्कूल ऐसी डायरी बनाए जिसमें जीवन के सूत्र वाक्य फेसबुक से उठाकर छाप दे तो कितना नैचुरल होगा और अपीलिंग भी,लगेगा ही नहीं कि कोई पाखंड है,

    आदर्श सब टूट गया, संघर्ष सब छूट गया।

    सोचने वाले का स्माईली कैसा होता है पता नही। अगर आपको पता हो तो लगा देना।

     

  2. prabhat gopal
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/03/blog-post_20.html?showComment=1237535340000#c5893960281687597433'> 20 मार्च 2009 को 1:19 pm

    facebook kafi achi chiz hai bhai. acha raha analysis

     

  3. yunus
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/03/blog-post_20.html?showComment=1237558320000#c8056795090955181894'> 20 मार्च 2009 को 7:42 pm

    विनीत जहां मन का गुबार निकालने का मौक़ा मिलता है वहां सब आदमी सेन्टिया जाता है ।
    हम छोटे शहरों के लोग महानगरों में वईसे भी अपने मन में झांकने या अपने मन की बात कहने के चैनल खोजते हैं ।
    ई जो फेस-बुकवा है ना--ये सेन्टियाने का मेकेनिकल मीडियम लगता है हमको ।
    रोज सुबह खोलो तो एक बड़ा प्रश्‍नवाचक--आपके मन में क्या चल रहा है ।
    अब कोई पूछे तो हम का कहें--कहें कि ना कहें ।

     

  4. इरशाद अली
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/03/blog-post_20.html?showComment=1237579740000#c2344798530468798736'> 21 मार्च 2009 को 1:39 am

    kuch alag baat hae sir ji

     

  5. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/03/blog-post_20.html?showComment=1237601640000#c7500021173035066938'> 21 मार्च 2009 को 7:44 am

    फ़ेसबुक भी एक बवाल है। पूछता रोज एक सवाल है!

     

  6. राजेश उत्‍साही
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/03/blog-post_20.html?showComment=1262955738888#c7208369826357460780'> 8 जनवरी 2010 को 6:32 pm

    भाई जी मैं तो इधर साल भर से हूं बंगलौर में । एक रेडियो चैनल पर एक साहब हैं घंटासिंह वे रोज एक विज्ञापन पढकर विज्ञापन वाले से ऐसे सवाल पूछते हैं कि बस दिमाग भी घटिंया जाता है। और सामने वाला खुदई फोन बंद कर देता है।

     

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