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मोहल्ला की ताजा पोस्ट "‘आइए, दिल्‍ली चलकर मंगलेश डबराल राज्‍याभिषेक करें’" पर ब्लॉगर और पत्रकार जयंती कुमारी ने लिखा कि-
स‌ाधुवाद प्रकांड विद्वान अविनाश जी को। भई आप लोगों ने मोहल्ले के पाठकों को क्या स‌मझ रखा है कि वे भी स‌भी आपकी ही तरह विद्वान ही होंगे। अरे पोस्ट करने स‌े पहले ये तो बता दिया होता कि आखिर इस गाली-गलौज की वजह क्या है। और, स‌ंक्षिप्त में इन गाली-गलौज करनेवालों का ब्यौरा भी देना चाहिए था। कौन हैं विजय कुमार, कौन हैं मंगलेश डबराल, कौन हैं कर्मेदु शिशिर, अनूप स‌ेठी। आप क्या स‌मझते हैं कि इन लोगों को पूरी दुनिया जानती है और ये लोग इतने मशहूर हैं कि इनके बारे में कुछ भी लिखा-पढ़ा जाने लगे, तो लोग शाहरुख-अमिताभ विवाद की तरह इन्हें भी चटखारे लेकर पढ़ेंगे। असलियत तो यह है कि मैं भी इनमें स‌े कुछ लोगों को बहुत ही कम जानती हूं। चूंकि मेरा ब्लॉग और मीडिया स‌े ताल्लुक रहा है, इसलिए कुछ लोगों के नाम जानना कोई बड़ी बात नहीं।
मोहल्ला पर जिस मसले को लेकर पोस्ट लेकर लिखी गयी है फिलहाल उस बहस में न जाते हुए हम दूसरी बात कर रहे हैं।
अविनाश ने क्रम से चार साहित्यकारों का जिक्र इस पोस्ट में की है। विजय कुमार,अगर मैं गलत नहीं हूं तो अंधेरे समय में विचार,किताब के लेखक,मंगलेश डबराल हिन्दी के जाने-माने कवि और अखबार की दुनिया के एक बेहतर संपादक, कर्मेंन्दु शिशिर साहित्यकार-आलोचक। कर्मेन्दु शिशिर को रचना के स्तर पर बीए के दौरान मैंने दो किताब खरीदी थी, मतवाले की चक्की और मतलावे की बहक उन किताबों पर संपादक के रुप में इन्हीं का नाम था,सो बुकफेयर में मिलने पर फैमिलियर लगा। इसमें शिवपूजन सहाय और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के प्रयास से छपनेवाली पत्रिका मतवाला के हिस्से संपादित हैं। बाकी अधिक इनकों भी नहीं पढ़ा है। अनुप सेठी के बारे में सुना है कि साहित्यकार हैं लेकिन न तो कभी मिला हूं औऱ न ही इनकी कोई रचना ही पढ़ी है। अगर रचना और आलोचना सिलेबस में नहीं हो तो साहित्य पढ़ने की खदबदाहट मेरे भीतर कम ही उठती है, इसे आप मेरा कोढ़पना समझ कर फिलहाल वख्श दीजिए,प्लीज। खैर,

जयंती कुमारी ने अविनाश पर आरोप लगाते हुए जो जबाब तलब किया है उसे समझना जरुरी है। अब मुझे नहीं पता कि जयंती कुमारी किस तरह के विद्वानों की बात कर रही हैं क्योंकि एक विद्वान हिन्दी के प्रख्यात और स्वनामधन्य दोनों स्तर के साहित्यकारों को जाने ही, ऐसा जरुरी नहीं है। कई बार हम बहुत ही प्रभावी व्यक्तित्व को नहीं जानते क्योंकि हमारा उससे कोई सीधा कन्सर्न नहीं होता। मसलन कोई शेयर मार्केट के दिग्गजों का नाम लेने लग जाए तो उसे हम अपनी नोटबुक पर टांकने और नाम लेनेवाले का टुकुर-टुकुर मुंह ताकने के अलावे कुछ नहीं कर सकते। लेकिन अविनाश की तरफ से कोई भी सफाई न देते हुए भी यहां मामला शेयर मार्केट का नहीं है। जो भी लोग ब्लॉगिंग कर रहे हैं उन्हें कुछ रचनाकारों के नाम आसपास तैरते रहते हैं और साहित्य की दुनिया से सीधे न जुड़ने की स्थिति में भी वो इन्हें पहचानते हैं। अब देखना ये है कि जिन रचनाकारों के नाम लिए गए वो ब्लॉग की दुनिया में कीतनी फ्रीक्वेंसी के साथ तैर रहे हैं। यानी किसी व्यक्तित्व के साथ फैमिलियर होने(पहचान के स्तर पर)के लिए एक तो उसके फील्ड से कन्सर्न होने और दूसरा ब्लॉग की दुनिया में उसका नाम लेनेवाले का होना जरुरी है। तीसरा कोई आधार नहीं है कि कोई ब्लॉगर या कमेंट करनेवाले उसे जाने ही जाने।
जयंती कुमारी ने जो सवाल उठाया है वो मैथ्स के सेट थ्योरी के जरिए समझना आसान होगा। कुछ इस तरह से कि कुछ लोग साहित्य से जुड़े है, कुछ लोग ब्लॉग से जुड़े हैं, कुछ लोग दोनों से जुड़े हैं,लेकिन कुछ लोग ऐसे हैं जो केवल ब्लॉग से जुड़े हैं तो बताइए कि कुल कितने लोग साहित्य के लोगों को जानते हैं। अविनाश ने अगर इन लोगों का परिचय नहीं लिखा है तो संभव है कि वो मानकर चल रहे हैं कि ये इतने बड़े नाम हैं कि इनका अलग से कोई परिचय देने की जरुरत नहीं है। यह साहित्यकारों के सम्मान में है। ऐसा करके अविनाश ने डेस्कटॉप पर बैठे-बैठे पाठक की समझदारी और जानकारी का जायजा लेने का काम कर रहे हों,ऐसा है या नहीं, इसके सहित जयंती कुमारी के सवाल का जबाब अविनाश ही दें तो बेहतर होगा।
मैं बस इतना समझ पा रहा हूं कि अविनाश जिस उम्मीद से कि जो साहित्य औऱ ब्लॉग पढ़ते है वो इन रचनाकारों को जानते होगें उसमें जयंती कुमारी जैसी ब्लॉगर-पत्रकार सवाल उठाती है। इसके जरिए मैं दूसरे सवाल उठाना चाहता हूं।
एनडीटीवी इमैजिन पर एक प्रोग्राम आता है-ओय इट्स फ्राइडे। फरहान अख्तर इसमें हॉस्ट के तौर पर आते हैं। एक बार फरहान अपने स्पेशल गेस्ट रितिक रौशन को लेकर आते हैं, स्टूडियो के बाहर गेटकीपर उन्हें रोक लेता है। उसका कहना था कि बिना पास के आप अंदर नहीं जा सकते। रितिक को गुस्सा आया, उसके कहा- तुम जानते हो मैं कौन हूं.गेटकीपर ने कहा-नहीं। रितिक ने गॉगल्स उतारी- मैं रितिक हूं। गेटकीपर ने कहो न प्यार है का गाना ऐ मेरे दिल तू गाए जा के स्टेप किए और कहा,लो मैं भी हो गया रितिक, यहां सब ऐसे ही आते हैं। फरहान ने कहा,अरे ये आज के हमारे स्पेशल गेस्ट हैं। गेटकीपर ने फरहान से पूछा-तब तुम कौन हो. बाद में राजू लाइटवाले ने कहा-आने दे अपना दोस्त है। गेटकीपर ने कहा- तो ऐसा बोल न कि राजू के दोस्त हैं,तब से कहे जा रहा है रितिक हैं। ये सब सच नहीं चुटकुला था, महज ऑडिएंस को हंसाने के लिए।
लेकिन जयंती कुमारी ने जो सवाल खड़े किए हैं,अगर साहित्यकार इस बात को समझें तो उन पर ये जबरदस्त चुटकुला है। तीन-चार लेख लिखकर,दो-तीन कविताएं लिखकर और एकाध कहानियां लिखकर( जरुरी नहीं कि वो छपी भी हो)हम जैसे जो तुर्रम खां बने फिरते हैं,यह चुटकुला नहीं,आंख खोल देनेवाली घटना है। भईया,जो आदमी जिंदगी भर कविता,आलोचना,साहित्य और हिन्दी के पीछे अपने को झोंक दिया,पाठक उसे भी नहीं जान रही है तो हमारी तो बत्ती लगी समझो। पांच-पांच सौ रुपये के दो मनीऑर्डर लेते ही,पोस्ट ऑफिस के कागजों पर साइन करते ही अपने को जब प्रेमचंद की औलाद समझने लगते हैं,जयंती का ये सवाल उस खुशफहमी को चकनाचूर कर देता है। हमारी औकात बताने के लिए उसने बहुत बेहतर काम किया है। हम बाकियों की तरह ये नहीं कह सकते कि जिसे कुछ भी आता-जाता नहीं वो ही ऐसे सवाल करेगा कि कर्मेन्दु शिशिर कौन है।
बाकियों की तरह मैं ये भी नहीं कह सकता कि साहित्य के लोग, नाम हो जाए की लालसा से दूर हैं,वो स्वांतःसुखाय के लिए लिखते हैं, ये फालतू बात है। हर रचनाकार नाम और उसके जरिए सत्ता कायम करने के लिए लिखता है, लिखना अपने आप में सत्ता कायम करने की प्रक्रिया है जिसमें पैसे-कौड़ी से लेकर राज्य सभा तक की उम्मीदें शामिल हैं। मैं भी मम्मट का काव्य उद्देश्य पढ़कर आया हूं,मुझे भी कुछ-कुछ पता है। अब जयंती मुझसे सवाल करे कि ये मम्मट कौन है,बताए देता हूं- काव्यशास्त्र सिद्धान्त के बहुत बड़े विद्वान जिनके सिद्धान्त आज भी काफी हद तक प्रासंगिक हैं।
सच बात तो ये है कि ब्लॉग में नामचीन लोगों को रिडिफाइन करने की जरुरत है जो कि जयंती जैसे पाठकों के सवालों को देखते हुए जरुरी जान पड़ता है। यहां तक कि प्रिंट,ओरल कम्युनिकेशन और मठवाद के जरिे स्थापित हो गए हैं,किए गए हैं, ब्लॉग की दुनिया में उन्हें ने सिरे से परिचित कराने की जरुरत हैं।
| edit post
4 Response to 'हम नहीं जानते जी, किसी कवि-ववि और हिन्दी आलोचक को'
  1. भुवनेश शर्मा
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/03/blog-post_17.html?showComment=1237309560000#c4414799697985608430'> 17 मार्च 2009 को 10:36 pm

    भाई मोहल्‍ले से अपन तो दूर ही रहते हैं....इसलिए अपने पल्‍ले कुछ नहीं पड़ा

    मोहल्‍ले के नियमित पाठक शायद कुछ टिप्‍प्‍णी कर सकें....

     

  2. अविनाश वाचस्पति
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/03/blog-post_17.html?showComment=1237310580000#c8175085282809938543'> 17 मार्च 2009 को 10:53 pm

    इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

     

  3. अविनाश वाचस्पति
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/03/blog-post_17.html?showComment=1237310700000#c5383342743947563104'> 17 मार्च 2009 को 10:55 pm

    जो अखबार नहीं पढ़ते
    या नहीं पढ़ते हैं हिंदी
    वे नहीं जानते कि
    कवि शब्‍द में नहीं
    लगती या लगाई
    जाती है बिंदी।

    जो सिर्फ टी वी देखते हैं
    वे भी कहां जानते हैं
    सबको, बड़े और छोटे परदे के सिवाय
    अब कर लो चाहे जितनी भी हाय हाय
    नहीं जानते तो नहीं जानते।

    किया है जिनका जिक्र
    उनकी रचनाएं स्‍कूल में पढ़ी भी होंगी
    तो अब तक गए होंगे भूल
    वो था जमाना जब जाते थे स्‍कूल
    पेपर देना था इसलिए की होगी पढ़ने की भूल।

    अब अगर नहीं पढ़ते हैं तो
    बतलायें कि कौन सा काम रूकता है
    जिंदगी का पहिया तो
    अनपढ़ों का भी खूब तेजी से चलता है।

    अब जो नहीं पढ़ रहे हैं ब्‍लॉग
    वे नहीं जानते कौन कौन हैं ब्‍लॉगबाज
    तो इसमें किसकी क्‍या गलती है
    जयंती की जय जय तो जय हो तक चलती है।

    पर सारी दुनिया जय हो से भी परिचित हो
    ऐसा भी नहीं है
    ऑस्‍कर मिलने से
    यह आस करना जरूरी तो नहीं
    कि सब जानते ही हों
    या जानेंगे ही
    बिना इसके भी दुनिया चलती है।

    कह सकते हैं कि खूब अच्‍छी चलती है
    किसी को जानो या न जानो
    जानो तो भी मानो या न मानो
    पर मन पर बोझ कहां संभलता है
    किसी का न हिलता हो
    पर पेड़ का पत्‍ता तो हिलता है।

     

  4. डॉ .अनुराग
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/03/blog-post_17.html?showComment=1237382460000#c3631886708407480068'> 18 मार्च 2009 को 6:51 pm

    किसने कहा आपसे की ब्लॉग जगत में पढ़े लिखे सूधि पाठक है ???

     

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