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मेनस्ट्रीम मीडिया के पार द्वार

Posted On 10:17 am by विनीत कुमार |

क्या ब्लॉगिंग को वेब पत्रकारिता कहा जा सकता है ? गॉशिप अड्डा के ब्लॉगर सुशील कुमार सिहं के लिए जब मैंने वेब पत्रकार शब्द का प्रयोग किया तो यही सवाल लोगों ने हमसे पूछा। इसके साथ ही एक और भी सवाल को जोड़कर देखें कि ब्लॉग जो कि वर्चुअल मीडियम है, उसकी विश्वसनीयता कितनी है।
ब्लॉगिंग के शुरुआती दौर में आप इसे पत्रकारिता तो किसी भी हाल में नहीं कह सकते थे। इसके लिए लोगों ने इंटरनेट डायरी लेखन शब्द गढ़ लिया था। शुरुआती दौर में अधिकांश ब्लॉगर अपने निजी अनुभव और एक खास तरह की भावुकता हमारे सामने आते रहे हैं. कई बार तो पढ़कर लगता कि- कोई नहीं मिला है बोलने बतियाने के लिए तो हमारे पास आ गए हैं। पोस्ट पढ़कर ही लगता, कि इन्हें अदद एक शेयर करनेवाले की तलाश है, एक कंधे की खोज है, जिसपर अपना सिर टिकाकर अपने दिल की बात कह सकें, खुद को हल्का कर सकें।
लेकिन इसके बाद बहुत जल्द ही जिसे कि मैंने अपने एक लेख में ब्लॉगजगत का दूसरा दौर कहा है, वहां लोग अपने लेखन को लेकर ज्यादा कॉन्शस होते चले गए। इसकी एक बड़ी वजह थी कि ब्लॉग की बढ़ती लोकप्रियता के साथ-साथ रीडर उनकी लिखी बातों की अच्छी-खासी नोटिस लेने लग गए। और सिर्फ रीडर ही नहीं, मेनस्ट्रीम की मीडिया भी उनके बारे में कुछ-कुछ लिखने छापने लग गए। कुछ चैनलों ने इन पर स्टोरी की। यानि ब्लॉग जिसे कि अब तक अभिव्यक्ति का कोना भर माना जाता रहा, धीरे-धीरे वो आकाश का रुप लेने लग गया। इसलिए अब लोग भी बहुत ही स्ट्रैटिजिकली लिखने लग गए। जाने-अनजाने ऐसी दो-तीन घटनाएं हो गयीं कि जिसमें ब्लॉग का असर साफ दिखाई देने लगा। इसलिए लोगों में एक भरोसा भी जमा कि यहां पर लिखने से भी कुछ हलचल हो सकती है। कोई चाहे तो कह सकता है कि जैसे-जैसे हलचल पैदा करने के लिए, चाहे वो साकारात्मक हो या फिर नाकारात्मक, ब्लॉग लिख जाने लगे, वैसे-वैसे इसकी स्वाभाविकता खत्म होती चली गयी।
लेकिन यह भी सच है कि ब्लॉगिंग कोई इंसानी दुनिया से बाहर की चीज नहीं है कि उसमें रोजमर्रा के जीवन शामिल नहीं होते। और वही हुआ। शुरुआती दौर में जिस ब्लॉग पर जी भरकर भावनाओं के तोते उड़ाए गए, सिनिकल होकर छोटी-छोटी बातों पर कीबोर्ड तानते रहे, अब वही धीरे-धीरे व्यावहारिक होता चला गया, यथार्थपरक होता चला गया। इतना अधिक यथार्थपरक की एटॉमिक डील से लेकर आतंकवाद तक पर जमकर लिखा जाने लगा। उन सब चीजों पर, बातों पर लिखा जाने लगा, जिसे कि अब तक इसलिए छोड़ा जाता रहा कि अरे, इस पर तो अखबारों में बात होती ही रहती है, चैनल तो दिनभर इस पर स्टोरी किया ही करते हैं. ब्लॉग में इसे दोहराया जाना जरुरी नहीं है।
मेनस्ट्रीम की मीडिया में जिन मुद्दों पर बात की जाती, उसे फिर से ब्लॉग पर लाने का मतलब कभी-कभी तो ये रहा कि जो लोग इस बात को मिस्स कर गए होगें, उन्हें यहां से जानकारी मिल जाएगी, ये काम अभी भी हो रहा है। लेकिन इससे आगे भी दो बड़ी वजह है-

एक तो ये कि मुद्दे को लेकर मीडिया का क्या रवैया रहा, किस अखबार और चैनल ने उसे किस रुप में देखा, इस पर बात हो सके। यानि मीडिया के साथ जोड़कर मुद्दों का विश्ललेषण। इसे आप चाहें तो मेनस्ट्रीम की मीडिया से आगे की चीज कह सकते हैं। दूसरा कि स्वयं मेनस्ट्रीम की मीडिया ने ब्लॉग को न्यूज माध्यम के रुप में स्वीकार कर लिया। कई अखबारों ने इससे उठाकर छापना शुरु कर दिया। मतलब ये कि ब्लॉग मेनस्ट्रीम की मीडिया के लिए पूरक भी बना और एक हद तक उसके आगे की चीज भी। पहले के पोस्टों के मुकाबले आप अभी के पोस्टों पर गौर करें, आपको अंदाजा लग जाएगा कि कितना बड़ा फर्क आया है। ये अलग बात है कि शुरुआती दौर में कोई भी व्यक्ति ब्लॉग की पुरानी परिभाषा के आधार पर भावुक और बहुत ही पर्सनल किस्म की बातों को लिखता है, लेकिन बहुत जल्द ही उसे यहां का मंजर देखकर समझ में आ जाता है कि- मामला बस इतना भर नहीं है।
आगे भी जारी...
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6 Response to 'मेनस्ट्रीम मीडिया के पार द्वार'
  1. ambrish kumar
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/10/blog-post_29.html?showComment=1225259880000#c3195887215006618879'> 29 अक्तूबर 2008 को 11:28 am

    gossip adda blog nahi web site hai.aur web site aur unke patrkaro ko pib se lekar kai sarkare manyata de chuki hai.blog aur web site me abhi fark hai.web site swanta sukhai ki bajai der saber munafe ke liye suru ki jata hai jaise akhbar.sushil kumar singh 20 salo se mukhyadhara ki patrarita me hai.jansatta me salo bureau chief rahe to ndtv aur sahara tv me aur bade pad per.her pradesh aise patrkaro ko alag se manyata deta hai.

     

  2. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/10/blog-post_29.html?showComment=1225268220000#c5610282359848454564'> 29 अक्तूबर 2008 को 1:47 pm

    आगे के लेख का इंतजार है!

     

  3. संगीता पुरी
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/10/blog-post_29.html?showComment=1225276380000#c427270068007738365'> 29 अक्तूबर 2008 को 4:03 pm

    सही कह रहे हैं आप। आगे का भी इंतजार रहेगा।

     

  4. मैथिली गुप्त
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/10/blog-post_29.html?showComment=1225279020000#c2331023892043878654'> 29 अक्तूबर 2008 को 4:47 pm

    ब्लागिंग तो कैसी भी पत्रकारिता है ही नहीं.
    हिन्दी ब्लागिंग में पत्रकार अवश्य हैं लेकिन उनके लेखन का चरित्र ब्लागर के तौर पर न होकर के पत्रकार के तौर पर ही है. फिलहाल हिन्दी ब्लागिंग में जो पत्रकार हैं वो इसलिये हैं कि उनके पास वेबसाईट बनाने और चलाने सम्बन्धित तकनीकी योग्यता नहीं है. उनके लिये ब्लागर पर खाता खोलकर लिखना बहुत आसान है, इ़सीलिये पत्रकारों को ब्लागस्पाट पर होने की वजह से ब्लागर माना जा रहा है.

    इसके अतिरिक्त हिन्दी में ब्लाग पर आधारित लिखने पर एग्रीगेटर के कारण तुरन्त पाठक मिल जाते हैं जो किसी स्वतंत्र वेबसाईट को नहीं मिलते. कुछेक एक वेबसाईट ने तो अपने लेखों के लिंक देने के लिये ही ब्लाग बना लिये हैं.

    जब भी ये पत्रकार किसी वेबसाईट चलाने जितनी तकनीकी व वित्तीय क्षमता प्राप्त कर लेंगे तब वह ब्लागर से माइग्रेट होकर अपने खुद के डोमेन पर जा विराजेंगे. कुछ तो जा भी चुके हैं, कुछ जाने वाले हैं, इसलिये अपवादों को छोड़कर जो पत्रकार ब्लागर के तौर पर हैं वे यहां टैम्प्रेरी हैं.

    ब्लागर ब्लागर होते हैं और पत्रकार पत्रकार. दोनों अलग अलग हैं. आजकल सारी दुनियां में ब्लागर अधिक विश्वसनीय माने जारहे हैं. ब्लाग की विश्वसनीय होने के कारण ही गूगल को किसी सर्च को केवल ब्लाग तक लिमिटेड करने का आप्शन देना पड़ा है.

    ब्लाग तो भावना की ही वस्तु है. आप यह सोच रहे हैं कि यह धीरे धीरे व्यावहारिक होता जा रहा है तो गलत है. यहां तो भावनाओं के तोते ही उड़ेगे. व्यावहारिक होने वाले पंछी फसली हैं, असली नहीं. यहां चिपलूनकर, ममता, घोस्टबस्टर या सिर्फ एक टूथपेस्ट की ट्यूब खाली होने की बात जितने पाठक पाती है या बहसियाई जाती है वह एजेंडे को लेकर लिखी गई व्यावहारिक पोस्ट नहीं.

    कहने को बहुत है.
    फिलहाल यहीं तक, शेष कभी मौका मिला तो लिखूंगा.

     

  5. ambrish kumar
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/10/blog-post_29.html?showComment=1225281300000#c2855699529621186287'> 29 अक्तूबर 2008 को 5:25 pm

    maithili ji se mera parichaye nahi hai per hindi blog ki dunia pahali bar mujhe dhang ki aur mahatvapurn tippani mili hai jiska mai post me istemal bhi karunga .web patrkarita ki bahash me yeh meel ka pathtar sabit hogi.yeh sahi hum patrkar ki post per patrkarita ki chaya padi rahati hai.yeh bhi sahi hai ki web site blog ki duniya me foran pathak pane ke liye aate hai.

     

  6. nadeem
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/10/blog-post_29.html?showComment=1225292580000#c1388127215857399555'> 29 अक्तूबर 2008 को 8:33 pm

    विनीत जी आपकी पोस्ट ने एक बेहतरीन बहस छेड़ी है, आपकी पोस्ट पढ़कर मुझे ऐसा लगा जैसे के आप कुछ एक जाने माने ब्लोग्स ही पढ़ते हैं जिनको या तो कुछ पत्रकार लिखते हैं और उन्ही के बारे में समय समय पर अख़बारों में लिखा जाता है. अख़बारों में अक्सर उन्ही ब्लोग्स को जगह मिलती है जो या तो सीधे प्रकार बिरादरी से जुड़े हुए हैं या उनके साथीगण इस माध्यम में हैं. इन ब्लोग्स पर अक्सर पत्रकारिता की छाया का होना इसी कारण से है. मैथिलि गुप्त जी के अधिकांश तर्कों से मैं काफी हद तक सहमत हूँ. हाँ मैं ये बात मानता हूँ के अब ब्लोग्स और उनके लेखों का असर हमें देखने को मिलता है और जो शुरुआती तौर पर भावनाओ को व्यक्त करने मात्र के लिए शुरू किये गए थे अब वे परिपक्व होते जा रहे है और भावनाओ के परे भी सोचने और लिखने लगे हैं.
    मगर मैं इस परिपक्व होते ब्लॉग समाज से ये अपेक्षा ज़रूर करता हूँ के वो और भी ज़िम्मेदारी के साथ लिखे. अंत में ब्लॉग को पत्रकारिता से अलग एक भावनाओ और बहस का मंच मानना चाहूँगा जहाँ सब अपने अपने मत रखते हैं और इस पर बहस करते है.

     

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