.


दीपावली के दो-तीन दिन पहले मां हाथ में सूप, बटरी और चाबी लेकर पूरे घर में उसे पटक-पटककर बजाती थी। मां कहती कि इससे घर का दलिद्दर यानि कंगाली भाग जाती है और घर में लक्ष्मी के आने का मामला शत-प्रतिशत तय हो जाता है। जब मैं छोटा था तो मैं भी अलग से हाथ में सूप और चाबी लेकर मां के पीछे-पीछ बजाता। इस दौरान कोई घर में आया होता तो कहता, देखो चाची के साथ-साथ घर की छोटी बहुरिया भी कंगाली भगाने में लगी हुई है। लेकिन जैसे-जैसे बड़ा होता गया, मां के साथ बाकी चीजों के छूटने के साथ ही ये सारी चीजें भी छूटती चली गयीं। बड़ा होने पर तो मैं यहां तक कहने लगा था कि- ये सब ढोंग क्यों करती हो। रात में बजाती हो और मैं डिस्टर्ब हो जाता हूं। कंगाली भगाने के मां के इस तरीके पर मुझे रत्तीभर भी भरोसा नहीं होता। क्योंकि इसी दीपावली में मैं जब भी कुछ लाने कहता- पापा टाल जाते. कहने लगते- अच्छा बताओ, इसकी एकदम से अभी जरुरत है। और अगर एक ही साथ तीन-चार चीजें लाने कहता तो उसमें ऑप्षन दे देते- सबसे जरुरी सामान कौन-सी है. मैं पापा के जाने पर झल्लाकर कहता-तुम दिन दिनों से कंगाली भगा रही हो और फिर भी मेरे लिए घर में लक्ष्मी आ ही नहीं रही है. बोर्ड के बाद घर छूटा और एक खास रकम के साथ आजादी मिल गयी कि इतने पैसे भेजा जाएगा। अब इसमें तुम चाहो तो किताबें खरीदो, कमरे का किराया दो या फिर ऐश करो। यकीन मानिए, अगर किसी को इस तरह की आजादी मिलती है तो वो ज्यादा बंधा-बंधा महसूस करता है। वो कतर-ब्योंत की कला में इतना माहिर हो जाता है कि बिना पचास बार सोचे कुछ भी खरीद नहीं पाता। ये अलग बात है कि उसमें बचत के संस्कार आ जाते हैं लेकिन साथ में जो कइंयापन आ जाता है उससे वो जीवन भर मुक्त नहीं हो पाता। पैसे रहने पर भी वो उसे खर्च करने में पचास बार सोचता है।

मेरे दिल्ली रहने पर मां मेरे लिए सबकुछ करती है। अलग से पूजा-पाठ करती है और पता चल जाए कि इन दिनों मैं बीमार चल रहा हूं तो पूजा की अवधि बढ़ा देती है लेकिन मेरे हॉस्टल के कमरे में आकर दलिद्दर और कंगाली भगाने का काम नहीं कर पाती। मैंने कभी भी कंगाली भगाने का काम नहीं किया है। परेशान होने पर भी पूजा-पाठ और अगरबत्ती नहीं जलाया। मां के हिसाब से यही वजह है कि हर साल दीपावली के पहले मेरे सामानों की चोरी हो जाती है। अबकी बार मां ने विजयादश्मी के समय ही कहा था- अबकी बार सूप पर चाबी पटककर जरुर बजाना। मां को बताया कि दिल्ली में सूप कहां से लाउं। और फिर तुम तो जानती ही हो कि मैं इन सब चीजों में विश्वास नहीं करता। मां बोली- नय मानते हो तो मत मानो, ऐसे बोलोगे तो भइया जा रहा है, एक सूप भेज देती हूं। मैंने कहा-नहीं, रहने दो। गिनकर तो पैसे मिलते हैं और जिंदगी भर ऐसे ही गिनकर मिलेंगे, अब इसमें क्या दलिद्दर भगाना औऱ लक्ष्मी को बुलाना, येसब काम घर में ही करो, जब लाख-दो लाख की जरुरत होगी तो तुम्हीं से मांग लूंगा। मां बेमन से बोली- जो जी में आए करो।

तीन दिनों के प्रयास के बाद भी जब नतीजा कुछ भी नहीं निकला, तब अंत में जाकर मैंने मां को बताया। मेरी तबीयत जानने के लिए रोज फोन किया करती है। मैंने कहा- मां तबीयत तो ठीक हो गयी लेकिन इस साल फिर धक्का लगा है। मैं बीमार था, सो मेरी हालत देखकर नीरज मुझे अपने कमरे पर इंदिरा विहार ले गया। मेरी हालत कुछ ज्यादा ठीक नहीं थी, सो देखने एक-दो और दोस्त आ गए। हम चार थे और दो बजे तक बातचीत करते रहे। सुबह सब आठ-साढे आठ बजे सोकर उठे। देखा-हम सबों के मोबाइल गायब हैं। आधे घंटे ध्यान आया- अरे मेरी तो घड़ी भी गायब है। बाकियों के नकदी और आइडी येसब सब। रात में हमलोगों को स्प्रे करके एक गुट ने तीस-पैंतीस हजार का चूना लगा दिया था। मेरा करीब नौ हजार का नुकसान हो गया है। यही वही स्विस घड़ी है जिसे मैंने कइंयापन को तोड़ने के लिए खरीदी थी। बताओ मां लक्ष्मी के आने के पहले ही दलिद्दर धम-मदाडा़ हो जाता है।नीरज की मां फोन पर लगातार कह रही थी- हम तुमको बोले थे कि नवरात्र में ढोड़ी में तेल डाल लेना, ग्रह-गोचर कटेगा, तुम नहीं माने। मेरी मां कह रही थी- सबकुछ जानने-सुनने पर भी उपाय नहीं करते हो तो क्या होगा. फिर आस्था और भगवान पर सात मिनट पर बोलती रही। ये भी कहा कि- मृत्युंजय पंडिजी से पूछकर बताएंगे, क्या हुआ. अंत में कहा-जाने दो, जान तो बचा....ऐसा-ऐसा घड़ी और मोबाइल केतना आता है, केतना जाता है।

| edit post
2 Response to 'दीपावली के पहले दलिद्दर भगा लिया करो'
  1. जितेन्द़ भगत
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/10/blog-post_20.html?showComment=1224482400000#c1489966571485751665'> 20 अक्तूबर 2008 को 11:30 am

    अब तक यही देखा गया है कि‍ जब कोई घटना-दुर्घटना लगातार होने लगती है, तब लोग आस्‍था का दामन थाम लेते हैं।

     

  2. भुवनेश शर्मा
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/10/blog-post_20.html?showComment=1224519240000#c2527857826283025649'> 20 अक्तूबर 2008 को 9:44 pm

    कोई बात नहीं नुकसान तो लगा रहता है पर स्‍वास्‍थ्‍य का खयाल करो गुरू....ऐसे कैसे चलेगा

     

एक टिप्पणी भेजें