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रेडलाइट होते ही राजघाट पर विकलांग श्रद्धा का दौर शुरु हो जाता है. टिन्टेड ग्लासेज पर दे बाबू की गुहार के साथ थपकियां पड़े कि इसके पहले एक साथ कई सैमसंग गलैक्सी और आइफोन के फ्लैश चमक उठते हैं. शायद टीवी चैनलों में ऐसे नजार दिखते न हों तो घरेलू स्तर पर न्यूज एजेंसी खड़ी करने के लिए,एफबी या ट्विटर पर शेयर करने के लिए या फिर यूट्यूब पर इस नजारे की वीडियो अपलोड करने के लिए. हमारी आंखें आसपास की इन हरकतों पर नजर बनाए रखने में व्यस्त रहती है कि अचानक एक काया सामने आकर खड़ी हो जाती है. जोर से आवाज बिना किसी बाबू, भायजी, मालिक के संबोधन के. ऐसे जैसे किसी शिकारी ने तीर चलायी हो और क्रौंच पक्षी जमीन पर तड़पकर जान देनेवाला हो.

 मौत के अंतिम क्षण की ध्वनि निकालना कितना मुश्किल काम है और वो भी आगे जीने की मुराद पूरी करने के लिए. रात के करीब बारह बजे इस काया को देखकर सिहरन होती है. न बर्दाश्त करने के लिए हाथ जेब की तरफ जाती है लेकिन उधर से कोई हाथ नहीं उठते..एक बार फिर से वही क्रौंच पक्षी के तड़पने जैसी आवाज और सीने को एकदम आगे सटा देने की कोशिश. हम बेबस इसका मतलब समझ नहीं पाते..बिना हाथ पसारे भीख मांगना एक पूरे मुहावरे के लुप्त हो जाने की घटना है लेकिन भीख मांगना लुप्त घटना नहीं होगी शायद कभी. लालबत्ती पर पर 12,11,10,09 संख्या घटती चली जाती है और हम कुछ करने के बजाय भीतर ही भीतर ललित निबंध लिखने लगते हैं कि

सामने दूसरी काया खड़ी नजर आती है. जिसके हाथ इतने आगे बढ़ते हैं कि जैसे पहलेवाले के हाथ बढ़ाने की क्रिया इसमें जुड़ गयी हो लेकिन एक पैर ही नहीं है.वो आगे औऱ बढ़ नहीं सकता. लेकिन पैर की एवज में हाथ आगे बढ़ाना जारी है. कोई कुछ न करे सिर्फ इन अलग-अलग कारणों से अपने शरीर का कोई हिस्सा गंवा देने पर स्टोरी करे तो एक साथ कितनी कहानियां निकलकर आ जाएगी.

 बचपन में हमारी निब की कलम में किसी की निब, किसी की जीभ,किसी का ढक्कन खराब हो जाया करते थे. तब हम मिला-जुलाकर दो बेहतर सेट बना लेते और एक कलम को साइड कर देते. इन दोनों के बारे में हाथ और पैर को लेकर इसी तरह सोचने लगता हूं कि तीसरा जिसका न तो हाथ हैं और न ही पैर और वो ऑटो के नीचे कब और कैसे आ गया, पता ही नहीं चलता. बिना हाथ बढ़ाए,बिना पैर बढ़ाने कैसे आ गया यहां तक..उलझ जाता है मन.4,3,2,1...

जेब में पड़ा सुस्त हाथ सुबह से पड़ी डीटीसी की टिकट को बाहर निकालता है इसके पहले वो इन अलग-अलग जीवों की तरफ बढ़े की जीरो और फिर हरी बत्ती..उधर से तेजी से एक ट्रक, ऑटो को लगभग निकलने की मुद्रा में गुजर जाता है, जिसका हम सिर्फ पिछला हिस्सा पढ़ पाते हैं- लटक मत, पटक देगी, अंदर बैठ मजा देगी..हम ट्रक की इस लाइन को पढ़कर राष्ट्रवादी स्त्री विमर्श में उलझ जाते हैं. वो सारे जीव पहले की तरह कहीं दिखाई नहीं देते. 
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1 Response to 'राजघाट पर रेडलाइट और विकलांग श्रद्धा का दौर '
  1. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/05/blog-post_5.html?showComment=1367772704229#c7572608087085381576'> 5 मई 2013 को 10:21 pm

    लटक मत, पटक देगी, अंदर बैठ मजा देगी.. :)

     

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