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"ये जवानी दीवानी" के पीछे दिल्ली इस कदर दीवानी हो जाएगी कि ओडियन( बिग सिनेमा ) के एक टिकट की कीमत 1700 कर दिए जाने के बाद भी वो उश से बुश नहीं करेगी और फन से लेकर वेव तक में हम जैसे डिकार्पोरेट दर्शक के लिए कहीं कोई जुगाड़ नहीं होगा इसका अंदाजा मुझे इन सबों की वेबसाइट खंगालने के बाद हुआ. मैं दीपिका को लेकर थोड़ा सिनिकल हूं. मजाक में अक्सर कहा करता हूं- कोई फिल्म तीन घंटे तक सिर्फ उसकी स्टिल भी दिखाती रह जाए तो मैं पूरी फिल्म बैठकर देखूंगा और कहूंगा- क्या कमाल की एक्टिंग की है बंदी ने और एनर्जी-माशाअल्लाह. लेकिन सच तो ये है कि रणवीर को लेकर भी कुछ इसी तरह महसूस करता हूं लेकिन पॉलिटिकली करेक्ट होने के फेर में कभी जाहिर नहीं करता. बहरहाल, कुल मिलाकर कहानी ये है कि मैं इस फिल्म का लंबे समय से इंतजार कर रहा था. हम लाख बर्गमैन,अलपचीनो और इधर कला सिनेमा देख लें लेकिन भीतर जो एक सिटीमार आदिम दर्शक पैदा हो गया है, इसे हम अपने भीतर से निकालकर फेंक तो नहीं दे सकते न. सो इस आदिम दर्शक की खुराक के लिए ऐसी फिल्में भी उसी तत्परता से देखता हूं जिस तत्परता से बाकी फिल्में कल्चरल स्टडीज को समझने के लिए.

लेकिन इतनी भी दीवानगी तो नहीं कि हम महज एक फिल्म के लिए 1700-1200 फेंक आएं. पीवीआर जैसे मल्टीप्लेक्स का आलम ये है कि बड़ी-बड़ी कार्पोरेट कंपनियां अपने एम्प्लाय के लिए पूरा का पूरा शो कई बार बुक कर लेती है. इन सिनेमाघरों का बड़ा धंधा इसी से चलता है जो कि पैकेज की शक्ल में होता है. इस पैकेज के तहत कभी आपको फिल्में देखने का मौका मिला हो तो आपने महसूस किया होगा कि ये मल्टीप्लेक्स हमारे बाबूजी का है. सबकुछ लगेगा जैसे फ्री में बंट रही हो और गुरुद्वारे की तर्ज पर मनोरंजन की लंगर लगी हो. ये अलग बात है कि सैलरी सिल्प पर नजर डालेंगे तो उसमे इन सब तामझाम का पैसा भी कट चुका होगा. ये नई "सिनेइकॉनमिक्स" है जिस पर कि बात होनी चाहिए और हम सिनेमा पर बात करते हुए रील के भीतर के कंटेंट की व्याख्या करते हैं, उसका एक हिस्सा उसके बाहर का भी है जिसमे मीडिया पार्टनर से लेकर इवेंट पार्टनर और ऐसे कार्पोरेट पार्टनर तक के विश्लेषण किए जा सकते हैं. और जाहिर है इसमें हम दर्शकों की दीवानगी भी शामिल है जो इनके लिए एक राजस्व की शक्ल में कन्वर्ट हो जाती है जो अपने पसंदीदा कलाकारों,निर्देशकों की फिल्म पहले ही देखना चाहती है. इसमें उन एम्प्लाय पर की जानेवाली जबरदस्ती भी है जो फलां फिल्म न देखकर चिलां फिल्म देखना चाहते हैं. फलाना हॉल की जगह ढिमकाना हॉल में देखना चाहते हैं लेकिन चूंकि उनकी संस्था ने उस अमुक हॉल से टाइअप किया है सो ऐसा नहीं कर सकते. ऐसे में जो लोग मल्टीप्लेक्स के आने को सिनेमा देखने के लोकतंत्र बहाल होने े रुप में परिभाषित करते आए हैं, उन्हें फिर से इन तथ्यों पर अपनी राय कायम करनी चाहिए और बल्कि अंदरखाने के तथ्यों को जुटाकर हमसे शेयर करना चाहिए. एक तरफ आप पैसे खर्च करके भी टिकट नहीं पा सकते तो दूसरी तरफ जो नहीं देखना चाहते हैं उन्हें भी फिल्म देखनी होगी क्योंकि उनके देखन-न देखने से सैलरी स्लिप पर कोई खास फर्क नहीं पड़ने जा रहा. इन दोनों ही स्थितियों में कितना झोल है इसका अंदाजा आप तब बेहतर लगा सकते हैं जब आप किसी फिल्म के लिए दिल्ली जैसे शहर के तमाम फन,बिग,पीवीआर और वेब जैसे मल्टीप्लेक्स से निराश होकर सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों की तरफ मुड़ जाते हैं. ऐसा करते हुए आपको पिक्चर क्वालिटी, सो कॉल्ड चीप ऑडिएंस, साउंड एफेक्ट और काउच जैसी ुसुविधा की चिंता नहीं होती है. दिमाग में बस एक ही बात होती है कि आज की आज फिल्म देखनी है. तब आपको लगेगा कि इन मल्टीप्लेक्स ने कैसा जाल बिछाया है और एक खास किस्म की फैब्रिकेटेड क्राइसिस पैदा की है.

लिहाजा, मैं इन तमाम वेबसाइटों से थोड़ा निराश( कहां जल्दी उत्साह बनता है अब किसी चीज,फिल्म और मौके को लेकर उस अर्थ में) होकर बत्रा सिनेमा की लैंडलाइन पर फोन करके पूछा- अंकल, ये जवानी दीवानी की टिकट मिल जाएगी और उधर बड़े ही इत्मिनान से आवाज आयी- हां बेटे, मिल जाएगी और कुछ आगे पूछता कि फोन रख दिया. मिल जाएगी तो करना क्या है जाकर ले आते हैं. तीन-चार घंटे इस नशे में तो रहेंगे कि जिस शहर में लोग जिस फिल्म की टिकट न मिलने पर आयं-बांय, इधर प्रेस से हैं, हमहुं कटिहारे से हैं टाइप की जुगाड़ लगा रहे होंगे, उधर इन्टरटेन्मेंट बीट के बंदे से एप्रोच कर रहे होंगे, हम घर बैठकर मैंगो शेक पी रहे होंगे, अपना काम कर रहे होंगे और देर शाम जब वो कुछ नहीं तो चलो आज वीकएंड डे रंग-बिरंगा पानी पीकर ही काम चलाते हैं, उस वक्त फिल्म देखकर हम अपना नशा उतार रहे होंगे.

बत्रा सिनेमा,मुकर्जीनगर पर भी दीवानी चढ़ी है इस फिल्म को लेकर लेकिन थोड़ा ठहरकर,थोड़ा सुस्ताकर. गेट पर ही करीब 72-73 साल का एक बुजुर्ग रंगों के अलग-अलग डिब्बे लेकर,हौले से उसमें ब्रुश डालकर फिल्म की टाइमिंग लिख रहा था. पोस्टर तो पूरे देश के लिए एक ही तरह की छपती है लेकिन सबों की टाइमिंग अलग होती है सो हाथ से लिखने का चलन गया नहीं है. हो सकता है, देश के कुछ हिस्से में पूरा का पूरा पोस्टर ही हाथ से बनते हों. रास्ते से गुजरते हुए गोलचा सिनेमा,दरियागंज में तो अक्सर ऐसा दिख जाता है. खैर, वो बुजुर्ग इस कड़कती धूप में भी इतने इत्मिनान से टाइमिंग लिख रहा था कि कहीं से लग ही नहीं रहा था कि वो उस फिल्म की टाइमिंग लिख रहा है जिसका पहला शो अभी से बस आधे घंटे बाद शुरु होगा. भड़भड़ाती भीड़ जब घुसेगी तो इनका डिब्बा और ब्रुश कहां होंगे, पता नहीं लेकिन लगे हुए थे.

अंकल आप सीधे-सीधे भी तो लिख सकते हैं लेकिन इस तरह थोड़ा घिसटकर लिख रहे हैं कि लग रहा है कुछ गलती हो गई है और फिर ओवरराइटिंग कर रहे हों. दूर से देखने से ऐसा लग रहा है कि आपने ब्रुश से नहीं रस्सी डुबोकर लिख दी हो. तस्वीर लेते देख वो पहले से थोड़ा असहज हो गए थे लेकिन सोचा है कोई मेंटल तो जवाब भी उसी तरीके से दिया- ये सिनेमा बनने में करोड़ों रुपये लगा है. आर्ट है आर्ट. अब इस आर्ट में हम तो कुछ कर नहीं कर सकते तो पोस्टर में ही सही. उस बुजुर्ग की पूरी बॉडी लैंग्वेज से लग रहा था कि जरुर पहले पूरी फिल्म की पोस्टर बनाते होंगे और अब इसकी गुंजाईश नहीं रह गई तो बस टाइम लिखने का काम करने लग गए. क्या पता आगे छपी तारीख चिपकाने का क्रम जो कि अभी शुरु हो गए हैं तो अपनी दबी किन्तु अभ्यस्त कला का इतना भी इस्तेमाल न कर सकें.

जैसे मैं हल्दी छुड़ाकर टिकट लेने गया था वैसी मुझे कुछ और महिलाएं दिखीं. हवाई चप्पल में,घर के कपड़े में, कुछ भकुआए "यूपीएसिया एसपेरेंट". पीटी परीक्षा की खुमारी उतारने. कुल मिलाकर जिस फिल्म को लेकर पूरे शहर में इस कदर शोर और रेल-पेल मची हो वहां बहुत ही शांत ढंग से शाम के शो की तैयारी चल रही है. क्या ऐसा इसलिए कि बत्रा,अंबा,गोलछा जैसे सिनेमाघरों के साथ कार्पोरेट-साझा नहीं होता और वो अपने भीतर के सिनेमाघर को अभी भी बचाए हुए हैं. जो भी धक्का-मुक्की होगी शो के समय, वेबसाइट पर पीवीआर जैसी अफरा-तफरी नहीं. तभी तो मैं कहता हूं- पीवीआर,वेब में सिनेमा देखने जाना और लौटना मुर्दा फूंकने जाने जैसा है, सारी हाय-तौबा वेबसाइट पर ही हो जाती है तो वहां जोड़-जुगाड़,शर्ट फाड़ाफाडी और अफरा-तफरी के नजारे पैदा ही नहीं होते. हम सिनेमा देखने के बहुत ही श्रूय्ड काल में जी रहे हैं. लेकिन अगर अपनी दीवानगी को थोड़ा लो बजट की तरफ शिफ्ट कर देते हैं तो दो-चार-पांच साल के लिए इस दिल्ली शहर में भी छोटे शहर,कस्बे में सिनेमा देखने के अंदाज को एक्सटेंड कर सकते हैं और 1700 के मुकाबले सौ रुपये में बालकनी की टिकट लिए दिनभर नशे में घूम सकते हैं..:)
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5 Response to 'बत्रा सिनेमाः दीवाना तो ये सिनेमाहॉल भी है वट थोड़ा सुस्ताकर'
  1. दीपक बाबा
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/05/blog-post_31.html?showComment=1370006898083#c5849821295410492511'> 31 मई 2013 को 6:58 pm

    जी, मिलन और विशाल सिनेमा हाल भी अभी पुरातन अवस्था में है, .. मिलन पर तो समय ठहरा हुआ लगता है. पुराने स्वरुप में.

     

  2. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/05/blog-post_31.html?showComment=1370022142012#c3008431055554805193'> 31 मई 2013 को 11:12 pm

    खूब! आर्टिस्टिक लिखायी देखी और पैसे भी बचाये। बधाई!

     

  3. प्रवीण पाण्डेय
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/05/blog-post_31.html?showComment=1370168397543#c5474957924405728121'> 2 जून 2013 को 3:49 pm

    जब फिल्म देखने की होड़ में लोग गुल्लक फोड़ रहे हों तो यह तो लूट कर ले आये आप अपने चहेते सितारों को।

     

  4. sunil deepak
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/05/blog-post_31.html?showComment=1370449876449#c7967528511933739957'> 5 जून 2013 को 10:01 pm

    बत्रा, अम्बा, गोलचा पर लोग गाते और सीटियाँ भी किसी भी मल्टीप्लेक्स से अच्छी बजाते हैं, जो मज़ा सिंगल स्क्रीन में है, वह मल्टीप्लेक्स में कहाँ!

    (बत्रा, अम्बा के नाम तो याद हैं लेकिन यह सिनेमा हाल कहाँ हैं यह याद नहीं, बस गोलचा याद है. फ़िर भी जाने पहचाने नामों को देख कर अच्छा लगा):)

     

  5. विनीत कुमार
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/05/blog-post_31.html?showComment=1370543494106#c1843009368146022203'> 7 जून 2013 को 12:01 am

    बत्रा मुकर्जीनगर में और अंबा घंटाघर में हैं सुनीलजी. ये डीयू के पास का इलाका है.

     

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