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इस तरह सूंघ क्यों रहे हैं सर, ये सत्तू है, बाउनबीटा की लूज पैक नहीं है. दूकानदार ने काउंटर पर रखी सत्तू की पैकेट को सीधे उठाकर सूंघने पर अपनी नाराजगी जाहिर की. मुझे पता है कि सत्तू है लेकिन आपके इस टिपिकल दिल्ली के बाशिंदे,करोलबाग इलाके के बीच देखकर हैरानी हुई. क्या रावलपिंडी के राजमा-चावला और अमृतसरी नान खानेवाले लोग सत्तू भी खाते हैं ? मैंने ये बात बहुत ही हल्के मूड में कही थी लेकिन बंदे ने दिल पर ले लिया. आपसे ज्यादा खाते हैं. चलो छोड़ो, आपको मेरी बात बुरी लगी..अब दाम भी नहीं पूछता-दे दो  दो पैकेट.
आमतौर पर मुझे खुद भी खाने-पीने की चीजें सूंघना बिल्कुल भी पसंद नहीं है. लेकिन कुछ चीजों की क्वालिटी सूंघकर की पता की जा सकती है तो क्या करें और वो भी तब जब तुरंत चखने की गुंजाईश भी न हो..और फिर मैं तो सिर्फ सत्तू की क्वालिटी ही नहीं, उस साईकिलवाले की सत्तू की खुशबू से मिलान करना चाह रहा था, जिसके यहां की सत्तू खाकर करीब सात-आठ साल मार्निंग स्कूल गया.

मेरी स्कूलिंग सोहसराय, बिहारशरीफ के जिस पब्लिक स्कूल में हुई, अप्रैल आते ही सुबह की क्लासेज हो जाती. सुबह सात से साढ़े ग्यारह. कई बार साढ़े छह बजे से ही. क्लास शुरु होने से पहले रोज प्रिंसिपल ए के जमुआर का लघु व्याख्यान होता जिसे आप सुविधा के लिए "उस पब्लिक स्कूल का संपादकीय" कह सकते हैं. कभी-कभी दो छोटे-छोटे संपादकीय होते. एक तो पढ़ाई-लिखाई-चाल-चरित्र और देर से फीस देनेवाले बच्चों को हिदायत देते हुए ज्ञान और धन की देवी के अन्तर्संबंधों पर और दूसरा छात्र जीवन और दिनचर्या पर. मार्निंग स्कूल शुरु होने के अलगे ही दिन प्रिंसिपल इस दूसरी सेग्मेंट में सत्तू की महिमा पर लघु व्याख्यान देना न भूलते. मैंने सत्तू पर उनकी ये व्याखायान कम से कम पांच साल तक तो जरुर सुना होउंगा. खैर

रोज स्कूल आने से पहले एक गिलास सत्तू पीने की आदत डालने के पीछे वो इसके साकारात्मक असर पर गहन चर्चा करते जिनमें स्मरणशक्ति बढ़ने, दिमाग तेज होने, सूखी ककड़ियों जैसे हाथ-पैर के देखते ही देखते लहलहा जाने, धूप में सरसों-पालक साग जैसे मुरछाए चेहरे के खिले रहने से लेकर पौरुष-वृद्धि तक की खास चर्चा करते. तब मैं कक्षा पांच-छह में रहा हाउंगा. हिन्दी खासी कमजोर थी और सेक्स को लेकर रत्तीभर भी ज्ञान न था. लेकिन उस अज्ञानता के मुकाबले भीतर जिज्ञासा की बाढ़ भी उतनी उफान से आती रहती. लिहाजा जो कुछ भी मन में उठता, घर आकर सीधे मां से पूछता. मां ये सत्तू पीने से पौरुष बढ़ता है. ये पौरुष क्या होता है ? मां कहती- ताकत को ही पौरुष कहते हैं. मेरा आगे का सवाल होता- तो फिर सर सिर्फ ये क्यों कहते हैं कि लड़कों का पौरुष बढ़ता है, लड़कियों को सत्तू पीने से क्या फायदा होता है ? मेरी मां का जवाब होता- कपार फायदा होता है. उसको चूल्हा-चाकी का काम करने में ताकत बढ़ता है. तुम्हारा हेडमास्टर क्रेक है. बढ़िया अक्किल-बुद्धि देवे के बदले सतुए पर लेक्चर देता है.सीधे बोल नहीं सकता है कि पेट ठंडा रहता है, पढ़ाई में मन लगता है, समय पर भूख लगता है तो इ कोढ़ा-कपार बतावे के क्या जरुरत है.लखैरा कहीं का.बहरहाल, सत्तू और पौरुष के अन्तर्संबंधों पर मेरी जिज्ञासा जस की तस बनी रही लेकिन मां के लखैरा( चरित्र का ठीक नहीं) शब्द इस्तेमाल करने से इतना अंदाजा लगाता रहता कि ये बुरी चीज है. आज जब प्रिंसिपल की सत्तू पर दिए व्याख्यान के बारे में सोचता हूं तो लगता है- एक लाइन भी खुद से नहीं बोलते थे.सिरप शंखपुष्पी या फिर हीरो फार्मेसी का विज्ञापन हमारे आगे पढ़ देते थे..उनसे कहीं अधिक मेरी मां मौलिक तरीके से सत्तू के बारे में बताया करती जो कि छात्रोपयोगी भी थी..:)

लेकिन सत्तू पर दिए प्रिंसिपल के व्याख्यान का असर मेरे उपर इतना जरुर हुआ था कि जिसे मैं कभी हाथ न लगाता था, उसे धीरे-धीरे घोलकर पीना शुरु किया. असल में वो इसे बनाने की विधि इतने रस लेकर बताते कि ऐसे में सत्तू क्या, नाली का कीचड़ भी घोलकर पीने लग जाए. आप जिस टीचर को पसंद करते हैं, वो आपके उपर नशे जैसा असर करता है.आप उनकी तरह बात करने लग जाते हैं, उन्हीं की तरह कलम पकड़ना, हाथ हिलाना, उच्चारण करना.ब्ला,ब्ला. ऐसे में वो सत्तू पीने की सलाह देते तो हम उसे कैसे नकार देते. सच पूछिए तो हमने उनकी जैसी तोंद बढ़ाने के अलावा बाकी सबकुछ वैसी ही कोशिश लंबे समय तक की..लेकिन बहुत कोशिशों के बावजूद कर न सका जिनमे से एक पानी जैसी अंग्रेजी लिखना और बोलना भी शामिल है. संत जेवियर्स कॉलेज,रांची के आर एन सिन्हा के अलावे मुझे उनसे बेहतरीन अंग्रेजी किसी दूसरे शिक्षक की नहीं लगी. बहरहाल. वो सत्तू को एक रेस्टलेस ड्रिंक बनाने की चर्चा जिस अंदाज में करते, अफसोस होता है कि तब मेरे पास कैमरे क्यों नहीं थे और यूट्यूब पर अपनी अकाउंट क्यों नहीं थी कि ढाई मिनट की वीडियो अपलोड कर देता. घर आकर हम अपनी चचेरी बहना अल्पना के साथ उसी तरह से सत्तू बनाने की नकल करते और बारी-बारी से प्रिंसिपल की वीओ देते.

मेरे सत्तू,चना, घुघनी,लिट्टी जैसी चीजों के नापसंद किए जाने के पीछे खास वजह स्वाद की नहीं, इन सारी चीजों की पापा की बेइतहां पसंद होने के कारण थी. पापा बचपन से ही मेरे लिए विपक्ष रहे हैं. ऐसे में वो जिन मुद्दे को पहले से उठाते और पसंद करते आए हों, हमारी उससे दूरी अपने आप बन जाती. सत्तू भी उनमे से एक था. प्रिंसिपल की सत्तू परिचर्चा के कारण इस एक मुद्दे पर सहमति बनी तो थी लेकिन सत्तू में इतनी भी ताकत नहीं थी कि पापा विपक्ष के बजाय पार्टी विलय का हिस्सा लगने लग जाएं. हमने तब भी सत्ते के इस्तेमाल किए जाने पर अपनी स्वतंत्र पहचान कायम की थी.

पापा को सत्तू आमतौर पर कालीमिर्च पाउडर के साथ पसंद था. मां कहा भी करती- जब एक ही समय में तुम भी पीते हो और पापा भी तो एक ही साथ क्यों नहीं बना लेते. मां, पापा के लिए बनाए सत्तू की शर्बत देती तो मैं पीने से मना कर देता. मुझे जीरेवाली पसंद है, कालीमिर्च नहीं. मां कहती- इ मर्दाना तुम्हारा बाप नहीं, गोतिया है..एक मिनट भी लच्छन से लगता है, इहै तुमको पैदा किए हैं. हम पापा की तरह ही गर्मी के दिनों में सत्तू पीते लेकिन न तो उनकी देखादेखी, न ही उनकी तरह और न ही उनका बेटा बनकर. अपने प्रिंसिपल के बताने पर, उनसे प्रभावित होकर और उनका स्टूडेंट बनकर.

सत्तू के प्रति इस बढ़ते लगाव ने मुझे बिहारशरीफ में मिलनेवाले सत्तू के नए-नए ठिकानों की तरफ खींचा जिनमे पुलपर,खजांची मोहल्ला से लेकर सहोखर,सोहडीह,करुणाबाग, कल्याणी की मां के यहां का सत्तू आदि हैं. लेकिन अड्डापर के साईकिल वाले की सत्तू और उसकी खुशबू अभी भी जेहन में जस की तस बसी है जिसकी फोटकॉपी मिलाने के फेर में मैं करोलबाग की दूकान में रखी सत्तू पैकेट सूंघने से रोक न पाया था. हम और मेरे छोटे भैय्या उसके सत्तू के इतने बड़े मुरीद साबित हुए कि खरीद-खरीदकर दूसरों को भी देने बल्कि बेचने लग गए थे..अपने पैसे से खरीदकर उपहार देने की औकात कहां थी और अगर ऐसा करता तो पापा खाल उधेड़कर रख देते..लुटा दो पूरा घर...

साईकिलवाले की सत्तू का अपना अंदाज था और उस शख्स की अपनी ठसक. उसके आगे क्या यही है असली इंडिया कहनेवाला एमडीएच का मूंछधारी,पब्लिसिटीलोलुप मालिक होगा. उम्र पैंसठ से सत्तर के बीच होगी. साईकिल की पाइप के बीच फंसाकर सौ किलो की बोरी में सत्तू लाता और इत्मीनान से दूकान खोलता. हम जैसे ग्राहक पहले से लाइन लगाकर खड़े रहते. वो अपना सारा काम करता. फिर बिक्री शुरु. मैंने कभी भी उसकी दूकान से दो किलो से कम सत्तू लेते नहीं देखे. जिसे कहते हैं न गुड्डी की तरह उड़ जाना. इस काम में उसे घंटे भर भी नहीं लगते. ग्यारह बजे वो दूकान बढ़ाकर चल देता.

सत्तू इतना चिकना कि अगर रंग छोड़ दें तो पाउडर दूध( व्हाइटनर) की तरह ही चिकना. पानी में घुलने में उतना ही समय लगता जितना कि प्लास्टर ऑफ पेरिस या ग्लूकॉन डी को. कोई छिलके की बुरादें नहीं जमती ग्लास की पेंदी में. मां बिहारशरीफ छूटने पर जमशेदपुर की चौथी मंजिल की फ्लैट में अक्सर उस सत्तू को याद करती और विस्थापन की स्थायी कचोट की व्याख्या में इस सत्तू को प्रमुखता से शामिल करती है.

बिहारशरीफ छूटा, रांची अगले पांच साल के लिए स्थायी ठिकाना बना. गर्मी और सत्तू फिर भी पर्यायवाची शब्द बने रहे. मेरी रजनी दीदी जाने पर अक्सर सत्तू बैग में डाल दिया करती..साथ में जोड़ती- हमको पता है न, और कुछ देंगे तो लेगा नहीं, भाषण झाड़ेगा सो अलगे से तो कम से कम सत्तू ही. भाई-बहन के रिश्ते के बीच सत्तू राखी की तरह चलता रहा. रांची में उस तरह व्यक्ति आधारित दूकान के सत्तू के बजाय जालान सत्तू बहुत मशहूर और स्टैब्लिश ब्रांड की तरह था. बाजार की औसत कीमत से बीस-पच्चीस रुपये ज्यादा..वो भी पैकेट में ही जीरा,नमक मिलाकर देने की शोशेबाजी के लिए बस. मुझे एक दो बार हैरानी हुई कि डॉक्टर ने गैस के मरीज की दवाई लिखते वक्त नीचे जालान सत्तू लिख दिया. ये ठीक उसी तरह से था जैसे कि बिहारशरीफ के डॉक्टर दवाई की पर्ची में ही हार्लिक्स लिख देते जिससे के गरीब इसे दवाई की तरह ही जरुरी मानकर खरीदे. बाद में तो जालान सत्तू दवाई दूकानों पर आसानी से मिलने लगे जैसे अब अंग्रेजी दवाई बेचने की लाइसेंस लिए फार्मेसी बाबा रामदेव की गोली,चूरन धडल्ले से बेच रहे हैं.

एम ए के लिए दिल्ली आने पर लगा कि सत्तू प्रेम छूट जाएगा और बस नास्टैल्जिया का हिस्सा बनकर रह जाएगा. लेकिन हुआ इसका उल्टा. डीयू हॉस्टल में मैं बिहारी दोस्तों से घिरा था. ज्यादातर पटना के आसपास के लोग. तभी जाना कि रांची के जालान सत्तू की तरह ही पटना में कमल मार्का सत्तू बहुत प्रसिद्ध है. शुरुआत में कुछ लोगों ने एकाध पैकेट दिए लेकिन आगे बाकायादा जितना कहता घर जाने पर लेकर आते. इधर दो साल बाद राहुल( युवा आलोचक,कहानीकार) भी जेएनयू से एम.फिल् करने आ गया था और मेरे मुकाबले कई गुना ज्यादा घर जाता. कहें तो जैसे रिफ्यूजी में अभिषेक बच्चन प्रेम में पड़कर हिन्दुस्तान-पाकिस्तान को एक कर दिया था और डेली अप-डाउन करता, राहुल ने उतना नहीं तो उससे थोड़ा ही कम हटिया-दिल्ली को. अंकल को पता था कि मैं सत्तू का पुराना आशिक हूं. राहुल की घर से कुछ भी लाने की आदत नहीं थी. कुछ लाता भी तो उसे उत्सवधर्मी माहौल बनाकर मेरी तरह खाने-खिलाने की नहीं. लेकिन मैं मुंह खोलकर सत्तू लाने कहता और अंकल को अलग से फोन भी कर देता. वो बिला नागा हमेशा राहुल के साथ धुर्वा बस स्टैंड से सत्तू( जो कि उनके घर से कोई सात किलोमीटर है) खरीदकर भेजते.मैं उनके लगाव को शिद्दत से महसूस करता. राहुल का दिल्ली छूटा लेकिन इससे पहले उसके सत्तू लाने का सिलसिला.

इसी तरह गर्मी की दुपहरी थी. प्रभात सर( प्रभात रंजन) से सत्तू को लेकर चर्चा छिड़ी. उन्होंने दिल्ली के कुछ उन इलाकों की चर्चा की जहां कि एक नंबर सत्तू मिलने की संभावना क्या बल्कि गारंटी होती है जिनमे न्यू अशोकनगर से लेकर त्रिलोकपुरी तक शामिल है. मैंने कहा भी कि कहां भटकूंगा सर..उनका वादा उधार कहें या फिर भूली-बिसरी बातें अभी तक बरकरार है. 

इधर अक्सर गोगिया सरकार का जादूवाली रंगों से रंगी पोस्टर पर सत्येन्द्र सत्तू लिखा दिल्ली के रिक्शे के पीछे दिख जाता है. कई बार मन किया- जाकर दो-चार किलो ले आउं लेकिन याद, आलस्य और साईकिलवाले के सत्तू की खुशबू से फोटोकॉपी जैसी मिलान करनेवाली आदत की वजह से कभी गया नहीं. जमाने बाद टकराया भी तो करोलबाग के एक दूकानदार से जिसके सत्तू में चना के छिलके का बुरादा इतना अधिक है कि पीना थोड़ा मुश्किल है.

इस बीच मां गर्मी की इस दुपहरी में बेहिसाब याद आती है. उसकी नसीहतें याद आती रहती है जिसे लेकर वो आश्वस्त है कि मैं सीरियसली नहीं लेता. रोज सत्तू पीने से ठंडा रहता है, बाकी इ नहीं कि पी लिए त नस्ता में सधा दो, अलग से भी कुछ बनाना. पापा और सत्तू के बीच विपक्ष का संबंध नहीं रहा, उनका भी अब मेरी ही पार्टी में विलय हो गया है. पब्लिक स्कूल के प्रिंसिपल ए.के.जमुआर को ये नालायक स्टूडेंट पता नहीं याद भी होगा या नहीं लेकिन हां- आज बैचलर्स किचन पर "सत्तूः ए रेस्टलेस ड्रिंक" का कब्जा रहा. ब्रेकफास्ट और डिनर के बीच यानी बतौर ब्रंच.

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8 Response to 'सत्तू छोड़िए, बिहारी भाउनबीटा समझते हैं न ?'
  1. arvind mishra
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/05/blog-post_3.html?showComment=1367569848118#c5389314309212344389'> 3 मई 2013 को 2:00 pm

    इस सत्तू पुराण पर आज की दुपहरी चली गयी

     

  2. प्रवीण पाण्डेय
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/05/blog-post_3.html?showComment=1367570246064#c9110141513446440166'> 3 मई 2013 को 2:07 pm

    ऐसा फास्टफूड न कभी आया है न कभी आयेगा।

     

  3. ब्लॉग बुलेटिन
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/05/blog-post_3.html?showComment=1367595619370#c5058466664543391479'> 3 मई 2013 को 9:10 pm

    आज की ब्लॉग बुलेटिन तुम मानो न मानो ... सरबजीत शहीद हुआ है - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

     

  4. jaydevbarua
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/05/blog-post_3.html?showComment=1367611967459#c6477089995743591685'> 4 मई 2013 को 1:42 am

    अभिषेक बच्चन प्रेम में पड़कर हिन्दुस्तान-पाकिस्तान को एक कर दिया था waah waah...

     

  5. संगीता पुरी
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/05/blog-post_3.html?showComment=1367652384778#c9119525563330562090'> 4 मई 2013 को 12:56 pm

    वाह सत्‍तू पर भी इतना बढिया लेख लिखा जा सकता है ..
    लेखकीय क्षमता हो तो किसी टॉपिक को रूचिकर बनाना कठिन नहीं ..
    आपातकालीन स्थिति में हमारे लिए तो सत्‍तू बहुत ही मददगार सिद्ध होता है !!

     

  6. काजल कुमार Kajal Kumar
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/05/blog-post_3.html?showComment=1367670223815#c934701047033318691'> 4 मई 2013 को 5:53 pm

    वास्तव में ही हमारे जीवन पर अघ्यापकों बहुत गहरा असर पड़ता है विशेषकर उनका जो हमें प्रभावित किया करते थे.

     

  7. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/05/blog-post_3.html?showComment=1367774113471#c9213956535358807514'> 5 मई 2013 को 10:45 pm

    कल इसको देखा था लेकिन पढ़ा आज इत्मिनान से।

    बहुत आनन्दित हुये सत्तू पुराण बांच के। खासकर ये हिस्से:

    १.तुम्हारा हेडमास्टर क्रेक है. बढ़िया अक्किल-बुद्धि देवे के बदले सतुए पर लेक्चर देता है.सीधे बोल नहीं सकता है कि पेट ठंडा रहता है, पढ़ाई में मन लगता है, समय पर भूख लगता है तो इ कोढ़ा-कपार बतावे के क्या जरुरत है.लखैरा कहीं का.

    २.इ मर्दाना तुम्हारा बाप नहीं, गोतिया है..एक मिनट भी लच्छन से लगता है, इहै तुमको पैदा किए हैं.

    ३.उस शख्स की अपनी ठसक. उसके आगे क्या यही है असली इंडिया कहनेवाला एमडीएच का मूंछधारी,पब्लिसिटीलोलुप मालिक होगा.

    ४.पापा और सत्तू के बीच विपक्ष का संबंध नहीं रहा, उनका भी अब मेरी ही पार्टी में विलय हो गया है. पब्लिक स्कूल के प्रिंसिपल ए.के.जमुआर को ये नालायक स्टूडेंट पता नहीं याद भी होगा या नहीं

     

  8. डॉ. अजीत कुमार
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/05/blog-post_3.html?showComment=1373629828195#c1450515189907220010'> 12 जुलाई 2013 को 5:20 pm

    पटना का श्री कमल चना सत्तू कहिये विनीत भाई.. अच्छा साथ रहा है इसका भी पर हम तो अपने घर के बना सत्तू खूब खाते रहे और यहाँ दिल्ली में लगभग छूट गया. पर जब घर सेआता हूँ तो लेताआता हूँ.

     

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