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सॉरी दिल्ली की पहली बारिश !

Posted On 10:47 pm by विनीत कुमार |

सॉरी दिल्ली की पहली बारिश ! मैं तुम्हारे साथ रेन डांस नहीं कर सका. तुम्हारे साथ भीगते हुए, नाजायज सी दिखती टमी को अंदर करके, सीने को लपलपाती जीभ सी आगे करके, लोकट शार्टस और स्लीवलेस टी में इरॉटिक पिक खिंचवाकर एफबी वॉल पर नहीं टांग सका. मुझे न त पकौड़े का ध्यान आया और न ही कॉफी की तलब हुई.


जब तुम बरस रही थी, मैं "सबसे तेज" की गलियों से गुजर रहा था. वहां ऑफिस में तब एंकर ब्रेकिंग न्यूज की कडाही में गर्मागरम खुशखबरी तल रहे थे. क्या पता चैनल का एक धड़ा इंडिया गेट,जीके-1, बसंत कुंज में बॉक्स पॉप लेने चला गया हो. मैं डीटीसी की ठुकदम-ठुकदम चाल से आजीज आकर पैदल ही चलने लग गया था. बाइक पर रेंगती हजारों गृहस्थियों को बड़े गौर से निहार रहा था. हाथ में दूध की थैली, कागज के ढोंगे पर तेल के निशान, क्या पता अंदर समोसे या पकौड़े हों. सैकड़ों माएं चिकनी फैब्रिक की सलवार सूट पर से फिसलते बच्चे को तौलिए की तरह खींच-खींचकर गोद में अटकाने की कोशिश कर रही थी. 

तभी ठीक बगल से होंडा सीटी, तवेरा गुजरती और पेशाब,थूक,खखार, गोबर, पोट्टी से सनी सेनेटरी नैपकिन से छनकर आयी तुम्हारी बूदें उनके चेहरे पर जाकर थप्पड़ से लगते. वो एक हाथ से बच्चे और दूध की थैली संभालती और दूसरे हाथ से पोछने की कोशिश करती..मैं धक्क से कर जा रहा था. वो गिर जाती तो ? क्या पता, आज घर जाकर फिर अपने जीवनसाथी को उलाहने देगी- कब से कह रही हूं, अपनी हैसियत बढ़ाओ, चौपाया गाड़ी लो. आखिर मैं कब तक जिसके-तिसके गू-मूत को चेहरे पर झेलती रहूंगी ? तुम रिक्शेवाले के पसीने के साथ ऐसे घुल-मिल गयी थी कि उसका कोई अस्तित्व ही नहीं रह गया था. गाड़ियों के बाहर से लगातार पों-पों की आवाज आ रही थी और भीतर से बैनचो.. ये रिक्शेवाले भी न ... की लौड़ी, कहां बीच में अटका देते हैं. तुम्हारे आने पर सबसे ज्यादा यही परेशान नजर आ रहे थे.

पिंड बालुची में बिरयानी और फ्राइ चिकन के लिए लगी लाइन देखकर लगा सबके सब एफ एम चैनलों से मिले जैसे मुफ्त के टोकन इन्कैश कराने आए हों. सामने की फुटपाथ पर पड़ी मुन्नी बुझे कोयले के बीच से अधपके भुट्टे समेटकर जाने की तैयारी कर रही थी. एफ एम की लगातार कमेंटरी और ठहाकों के बीच मैं अपने इस अपडेटस को घुसाना चाह रहा था लेकिन गुंजाईश नहीं थी. 

विडियोकॉन टॉवर की भट्टी से निकले डे शिफ्ट के मीडियाकर्मी कॉफी में थकान घोलने में लग गए थे. मैं उनके चेहरे पर नजर टिकाए था. मन किया पूछूं- क्या चला रहे हो उपर ? सिर्फ हैप्पी-हैप्पी और यूट्यब के बताशे और बैक से रोमैंटिक गाने या फिर इन हजारों रेंगती गृहस्थी के विहवल कर देनेवाले नजारे भी. फिर लगा- पता नहीं उनमें से कोई कह दें- अव्वल दर्जे का फ्रस्टू है. गर्मी होती है तो एफबी रंग देता है और अब बारिश हुई तो विधवा विलाप लेकर बैठ गया..

लेकिन एक बात बताउं. तुम जब तक नहीं आती हो न, यहां के लोग,मीडिया से लेकर सरकार तक तुम्हारा ऐसा इंतजार करते हैं, जैसे तुम पेड न्यूज जैसी बेशकीमती हो. गर्लफ्रैंड या ब्ऑयफ्रैंड से भी ज्यादा मोहब्बत है तुमसे. जैसे कि सारी राजनीति तुम पर ही टिकी हो. लेकिन देखो न. कायदे से तुम्हें आए दो घंटे भी नहीं होते हैं कि लोग बेहाल हो जाते हैं. सड़कें जाम हो जाती है, शहर हांफने लग जाती हैं. सरकार की सारी धोखेबाजी सीवर,सड़कों और गलियों में तैरने लग जाती है. मीडिया की सारी काबिलियत और जुमले टांय-टांय फिस्स हो जाते हैं. लोग बेदम हो जाते हैं. ये शहर तुम्हारे साथ फ्लर्ट करता है कि उसे तुम्हारे आने का बेसब्री से इंतजार रहता है. तुम शाम आयी नहीं कि शीघ्रपतन का शिकार हो गया. इस शहर में तुम्हें कैरी करने की हैसियत ही नहीं है, बस हवाबाजी करता है.
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5 Response to 'सॉरी दिल्ली की पहली बारिश !'
  1. Shridharam
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/07/blog-post_06.html?showComment=1341601599968#c1964828888711076564'> 7 जुलाई 2012 को 12:36 am

    क्या बात है.. बेजोड़.. श्रृंगार... अद्भुत...भयानक..और वीभत्स रस के साथ व्यंग रस भी..

     

  2. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/07/blog-post_06.html?showComment=1341620031745#c652454906175064033'> 7 जुलाई 2012 को 5:43 am

    वाह! बहुत खूब!

     

  3. मसिजीवी
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/07/blog-post_06.html?showComment=1341632727318#c8544238945682981930'> 7 जुलाई 2012 को 9:15 am

    काहे सुबह सुबह हमारे शहर पर पिले पड़े हो...जब बरखा से फ्लर्ट हो रहा था तब भी गरमी रानी से कोई सुखद दांपत्‍य नहीं बसा था...शहर (कोई भी शहर) पैसे की अंकशायनी ओर विपन्‍न का सौतेला बाप होता है... दिल्‍ली दूसरों से कुछ कम ही बेमुरव्‍वत ठहरेगा।
    पर चलो चंद बूंदे बरसी, तुम्‍हें शहर से अदावत कहने का मौका मिला :)

     

  4. प्रवीण पाण्डेय
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/07/blog-post_06.html?showComment=1341638213394#c6376636973259747375'> 7 जुलाई 2012 को 10:46 am

    बारिश में जो कुछ भी था, बरस गया..

     

  5. संगीता स्वरुप ( गीत )
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/07/blog-post_06.html?showComment=1341654142439#c246219073345444410'> 7 जुलाई 2012 को 3:12 pm

    दिल्ली पर आपके शब्दों की बौछार भी खूब हुई ... रोचक

     

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