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रुपक कभी मरते नहीं पुष्पा

Posted On 4:00 pm by विनीत कुमार |

दोस्तों और अपनी पत्नी के काका और हमारे राजेश खन्ना हमारे बीच नहीं रहे. महेश भट्ट के शब्दों में आज थोड़े-थोड़े हम भी मरे हैं. मेरी आंखें भी छलछला गई हैं. सिर्फ राजेश खन्ना के लिए नहीं, सत्तर-अस्सी के दशक में शादी हुई उन दीदी और बुआ के लिए जिनसे एक बार बिना पूछे कि उनके पापा और भाईयों ने एक अंजान शख्स से जिंदगी भर के लिए बांध दिया. आज वो हम सबसे ज्यादा रोएगी, वो आज राजेश खन्ना को कुछ ज्यादा ही मिस करेगी.


अरेंज मैरिज का चलन ऐसा जिसमें फूल जैसी दीदी, मासूम,निर्दोष लेकिन पढ़ी-लिखी तेजतर्रार दीदी का पल्लू उमरदराज, आगे के उड़े हुए बाल, एक पैर से भटक कर चलनेवाला, एक आंख से तिरछी देखनेवाला, थुलथुल मोटे और इन सबसे कहीं ज्यादा हैवान के साथ बांध दिया जाता. इन दीदीयों को जब विदा होते देखता तो वो बछड़े की तरह मां से, हमसे बिलख-बिलखकर रोती. मेरे घर के आगे गायें काटी जाती थी तो मैं उस सीन से अक्सर इस विदाई के दृश्य को जोड़कर देखता था. कितना चिपटकर रोती थी दीदी हमसे. बुआ लोगों का अल्हड़पन कैसे इस अकेली एक घटना के बाद हमेशा के लिए खत्म हो जाता था. आज देश में जिन-जिन महिलाओं का बेमल विवाह हुआ है, उनकी इच्छा को जाने बिना या उसके विरोध में हुआ है, वो सबके सब राजेश खन्ना की मौत पर बहुत रोएगी. वो ये सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाएगी.

दीदी,बुआ बुझे मन से पहली बार मायके आती. उन्हें अपनी सहेलियों से जीजाजी,फूफा को मिलवाने में शर्म आती. क्या कहेंगी,मोहल्ले की लड़कियां ? ये जानते हुए भी कि सबों के साथ लगभग ऐसा ही होना है, फिर भी कितनी चिंतिंत रहती दीदी. कई बार बिना बुलाए ही मोहल्ले की लड़कियां इस नए-नवेले जीजाजी से मिलने आ जाती..मैंने कई बार जब दूसरे के घरों में होता तो उनकी मांए हिदायत देती- जा रही हो जूली,जीजाजी अधभैसु( दीदी से उम्र में लगभग दुगुना) हैं, कुछ ऐसा हंसी-ठठ्ठा मत कर देना कि मीरा अफड़ने लगे( बिलख-बिलखकर रोने लगे). ऐसा सबों के साथ होता..लेकिन जब एकमुश्त दस-बारह सालियां जुटती तो ये हिदायतें कहां याद रह जाती हैं. हां उन लड़कियों को इस बात का ध्यान जरुर रह जाता कि जीजाजी कि किसी एक बात की ऐसी तारीफ की जाए कि दीदी को लगे कि ये शख्स मेरे लिए सही है...और किसी भी एक खूबी को बताने के लिए उदाहरण देती- दीदी, जीजाजी तो बिल्कुल राजेश खन्ना हैं.

आज अगर एक पैर से भटककर चलनेवाले या सिर के बाल उड़े हुए जीजाजी के बारे में कोई साली कह दे कि दीदी, जीजाजी तो बिल्कुल शाहिद कपूर या जॉन इब्राहिम लग रहे हैं तो दीदी इस अश्लील मजाक से सदमे में आ जाएगी लेकिन राजेश खन्ना से तुलना करने का मतलब ऐसा नहीं था. राजेश खन्ना से तुलना करने का मतलब होता था कोई एक ऐसी बात है जो जीजाजी में कि वो बिल्कुल राजेश खन्ना जान पड़ते हैं. उनकां हंसना, उनका बोलना, दर्जनों सालियों के बीच भी बात करने का एक खास सलीका. कुछ नहीं तो बाल ही, बाल न सही तो अपनी बात पर गौर फरमाने के लिए दीदी की ठुड्डी पकड़कर उपर की ओर उठाना. अधेड़ उम्र का, अनपढ़, दीदी के आगे राक्षस दिखनेवाला शख्स कैसे एक रुपक से इतना बेहतर दिखने लग जाता कि दीदी जब मायके से विदा होकर जाने लगती तो कहती- जाने दो, जो हैं जैसे हैं, जिंदगी तो इन्हीं के साथ बितानी है न. ऐसे में आप कह सकते हैं कि राजेश खन्ना ने ऐसी हजारों,लाखों लड़कियों के मन में अरेंज मैरिज के प्रति आस्था बनाए रखा और उसका विस्तार ही किया. तब आप राजेश खन्ना को शायद माफ भी नहीं कर पाएं. लेकिन एक अकेले रुपक के भरोसे इन लड़कियों पूरी जिंदगी अपनी पसंद से बिल्कुल उलट शख्स के साथ बिता देना स्वयं राजेश खन्ना के व्यक्तित्व का कितना बड़ा जादुई हिस्सा है, इस पर सोचने की जरुरत है.

क्या दीदी और बाकी लड़कियां राजेश खन्ना के बाल, मुस्कराहट,चलने के तरीके, छवि, आवाज आदि से तुलना किए जाने भर से अपने उस जीवनसाथी से प्यार करने लग जाती थी जिसे कि न तो उसने चुना था और न पहले कभी जाना था. जो दीदी स्कूल-कॉलेज के अच्छे से अच्छे और एक से एक स्मार्ट लड़के को फटीचर कहकर हड़का दिया करती, एक से एक होनहार और मेधावी लड़के को बात-बात में गदहा कहा करती,आखिर वो सचमुच के लद्दड़, घाघ से बंधकर कैसे पूरी जिंदगी काटती आयी ? नहीं, ये सिर्फ राजेश खन्ना कद-काठी और हुलिए से की जानेवाली तुलना का असर नहीं था. आखिर दीदी मासूम जरुर होती, इतनी भी वेवकूफ नहीं कि जिसके पति के सिर पर बाल ही नहीं, वो राजेश खन्ना की तुलना पाकर कैसे खुश हो जाती. सच बात तो ये है कि कभी चाचियों के साथ, कभी दबे-छुपे ढंग से सहेलियों के साथ राजेश खन्ना की उन सारी फिल्मों को देखती आयी थी जिसमें राजेश खन्ना एक भरोसा हुआ करता- इस शख्स से प्यार करोगे तो जिंदगी भर निभा ले जाएगा, दगा नहीं देगा. अभी चंकी पांडे की बाइट सुनी. उन्होंने कहा- जो एक बार राजेश खन्ना का हो गया, किसी और का हो ही नहीं सकता. सत्तर-अस्सी के दशक की दबी और अपनी इच्छाओं की दबाकर रखनेवाली हमारी दीदी कभी कह नहीं सकती थी खुलकर कि वो राजेश खन्ना की दीवानी है लेकिन हां उसके भीतर के बनने और परिपक्व होनेवाले सपने में किसी भी शख्स को राजेश खन्ना मानकर तो देखा ही जा सकता था न. इसकी क्रेडिट आप चाहें तो उस दौर की फिल्मों को दे लें जहां प्यार,समर्पण,एकनिष्ठा,प्रतिबद्धता एक दूसरे से इस कदर गुथे होते कि लगभग एक-दूसरे के पर्याय जान पड़ते. इसे प्रेम का मूल्य भी आप प्रस्तावित कर सकते हैं जो कि अब विमर्श की दुनिया में बौद्धिक पिछड़ापन और प्रेम जैसा बुनियादी विद्रोह कर्म करते हुए भी दकियानूस हो जाना है.

लेकिन दीदी, प्यार के इस रुप और निभा ले जाने की क्रेडिट निर्देशक को नहीं दे सकती थी. सिनेमा में जो हीरो है, वही सबकुछ है कि तर्ज पर राजेश खन्ना का व्यक्तित्व उनके दिलोदिमाग पर छाया रहता. वो दो ही काम कर सकती थी या तो अपने जैसे-तैसे जो भी मिले पति को राजेश खन्ना मान ले या फिर भीतर की उस भावना को संजोए जीती रहे- जाने दो, जीना ही है न, इसी के साथ जी लेती हूं, राजेश खन्ना से प्यार करने से हमें कौन रोक सकता है ? आप सोचें तो राजेश खन्ना ने कैसा असर अपने इन दर्शकों पर छोड़ा जो कि आज के सलमान,शाहरुख, ऋतिक के खंड़ित व्यक्तित्व और क्रश से बिल्कुल जुदा है. आपको मैचोमैन पसंद है तो जॉन इब्राहिम,चॉकलेटी पसंद है तो शाहिद कपूर, फैमिली-फैमिली मैरिज मटिरियल भाता है तो शाहरुख खान..राजेश खन्ना को जिसने पसंद किया,टुकड़ों-टुकड़ों में नहीं, एक कम्प्लीट मैन के रुप में जिसका एक हिस्सा भी अपने जीवनसाथी से मैच कर जाए तो जिंदगी निकाल ली जा सकती है.

अभी से लेकर कल-परसों तक न्यूज चैनलों पर उनकी फिल्मों की क्लिप्स चलेंगी, फिल्माए गाने चलेंगे, वॉलीवुड की दिग्गज हस्तियों की बाइट चलेगी. पूरा का पूरा वीकिपीडिया टीवी स्क्रीन पर तैरने लग जाएगा लेकिन उन महिलाओं की बात शायद ही हो जो अपने जीवनसाथी में राजेश खन्ना का अक्स देखकर उसके साथ निभाती रही..जिसका मुर्झाया चेहरा सिर्फ इस एक रुपक से खिल गया कि दीदी,जीजाजी तो राजेश खन्ना जैसे दिखते हैं. जिन मांओं का कलेजा सूप की तरह बड़ा हो गया कि पड़ोस में सबसे ज्यादा डाह रखनेवाली ने भी कमेंट किया- खुद ही चाहे कितनी भी लड़ाकिन हो लेकिन दामाद राजेश खन्ना खोजकर लाई..देश के लाखों राजेश खन्ना, आज तुम्हारी पत्नी तुम्हारे थोड़े-थोड़े मरने का मातम मना रही है, उसे एकदम से मर जाने मत देना. 
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10 Response to 'रुपक कभी मरते नहीं पुष्पा'
  1. Sandip Naik SAM
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/07/blog-post_18.html?showComment=1342607868275#c7918854336206351687'> 18 जुलाई 2012 को 4:07 pm

    अदभुत है विनीत तुम्हारी मेधा और लेखन की शक्ति दोनों कमाल की है बहुत ही वस्तुनिष्ठ तरीके से लिखा गया एक आलेख.............

     

  2. Pawan K Shrivastava
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/07/blog-post_18.html?showComment=1342617366194#c1825474686084521633'> 18 जुलाई 2012 को 6:46 pm

    bahut achha likha hain aapne ..adbhut hain aapka drishtikon.

     

  3. Arvind Mishra
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/07/blog-post_18.html?showComment=1342618316200#c3637331702258256536'> 18 जुलाई 2012 को 7:01 pm

    ओह!

     

  4. अभिनव उपाध्याय
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/07/blog-post_18.html?showComment=1342619718215#c8703644460126505460'> 18 जुलाई 2012 को 7:25 pm

    ek behatrin aatmiy aalekh

     

  5. संगीता पुरी
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/07/blog-post_18.html?showComment=1342621092024#c7886914673827223789'> 18 जुलाई 2012 को 7:48 pm

    बहुत बढिया लेख लिखा आपने ..
    राजेश खन्‍ना को जिसने पसंद किया कंप्‍लीट मैन के रूप में किया ..
    समग्र गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष

     

  6. sajhamorcha
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/07/blog-post_18.html?showComment=1342622831302#c6552100513770511333'> 18 जुलाई 2012 को 8:17 pm

    विनीत जी आपके लेखन का कायल हो गया. क्या लिखा है आपने!

     

  7. sajhamorcha
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/07/blog-post_18.html?showComment=1342622980563#c2562846935126855689'> 18 जुलाई 2012 को 8:19 pm

    विनीत जी मुझे आज भी याद है मेरी माताजी क ये कहना की जब मेरी बारात आ रही थी तो बंद वाला जो गाना बजा रहा था वो था 'मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू' और ये बताते हुए उनकी आँखे चमक उठती हैं आज भी. मेरा पहला नाम उहोने राजेश ही रखा था ...

     

  8. Vishal
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/07/blog-post_18.html?showComment=1342634905985#c8093239447269925449'> 18 जुलाई 2012 को 11:38 pm

    Wah............Adbhut

     


  9. वन्दना
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/07/blog-post_18.html?showComment=1342693342918#c3998056504130062662'> 19 जुलाई 2012 को 3:52 pm

    ्शानदार आलेख्।

    "आनन्द" मरा नही करते
    अनन्त "सफ़र" पर चल देते हैं
    फिर चाहे "दाग " लगाये कोई
    "अमर प्रेम" किया करते हैं
    "आराधना " का दीया बन
    "रोटी " की ललक मे
    "अवतार " लिया करते हैं

    एक बेजोड शख्सियत
    जो आँख मे आँसू ले आये
    वो ही तो अदाकारी का परचम लहराये ……नमन !

     

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