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कल रात एनडीटीवी इंडिया के कार्यक्रम "हमलोग" में लेखक-अभिनेता-गायक पीयूष मिश्रा ने सिनेमा,थिएटर,जिंदगी और तरक्की पर बात करने के अलावे मार्क्सवाद से अपने संबंध और मौजूदा हालात में मार्क्सवाद की शक्ल को लेकर भी टिप्पणी की. यकीन मानिए, जिस बेफिक्राना अंदाज में उन्होंने मार्क्स को लेकर टिप्पणी की, यही काम किसी सेमिनार में अगर कोई गैर मार्क्सवादी ने किया होता तो संभव है कि तथाकथित प्रतिबद्ध मार्क्सवादी और सद्यआक्रांत मार्क्सवादी( जो नया-नया इस शौक के अधीन हुआ है) उन पर थप्पड़ जड़ देता. जेएनयू के हमारे सक्रिय साथी शायद हाथ-पैर तक तोड़ देते.


 कई बार पीयूष मिश्रा जैसे भूतपूर्व मार्क्सवादी को सुनकर लगता है कि ऐसे लोगों की इस विचारधारा( हालांकि पीयूष मिश्रा इसे कोई विचारधारा न मानकर राजनीतिक पार्टी भर मानते हैं) बिना कार्ल मार्क्स को पढ़े मार्क्सवाद पर बात करनेवालों से कहीं ज्यादा सपाट होती जा रही है. ये भी है कि हम उनकी ईमानदारी पर लहालोट भी होने लगें कि बंदे ने आजाद ख्याल के नाम पर जिस मार्क्सवाद को देखा-जिया, वो दरअसल इतना लिजलिजा है कि उसे बार-बार कहने की जरुरत पड़ती है कि हां मैं मार्क्सवादी नहीं हूं. था जब था लेकिन अब नहीं. 

पीयूष मिश्रा ने अपनी पूरी बातचीत में जिस तरीके से इसकी व्याख्या की और अपने को इससे अलग किया, उससे समझना मुश्किल नहीं है कि बाजार के तरल प्रवाह के बीच एक समय के बाद इस पार्टी से अपने को अलग कर लेना न केवल जरुरी होता है बल्कि इसकी घोषणा नए किस्म की संभावना पैदा करती है. ये गैंग्रीन हो जाता है जिससे काटकर अपने को अलग कर लेना ज्यादा फायदेमंद है. खैर, यहां हम इस बात पर बहस करने के बजाय कि थिएटर की दुनिया से आए पीयूष मिश्रा में वॉलीवुड की सीढ़ियों पर चढ़ने के बाद मार्क्सवाद का कितना हिस्सा मौजूद रह गया है, इस पर बात करें कि उन्होंने जो कुछ भी कहा, उसका आशय क्या है और इसके जरिए हम क्या अंदाजा लगा सकते हैं ?

कल के कार्यक्रम में रवीश कुमार ने दो-तीन बार कोशिश की. इधर-उधर किसी भी तरह से कि मार्क्सवाद को लेकर उनके अनुभव और समझ को हम दर्शकों के आगे किसी तरह से लाया जाए. पीयूष मिश्रा जिस बेफिक्राना अंदाज में इसके जवाब दे रहे थे और लगभग इससे बचने की कोशिश कर रहे थे, हमें हैरानी हो रही थी कि जिस शख्स ने एक खास समझदारी और विचारधारा के साथ सालों तक अपनी जिंदगी की सबसे उर्वरा अवस्था को जिया, वो इसे चंद जुमलों में आखिर क्यों निबटा देना चाह रहा है ? उन्होंने कहा- 1. मैं कम्युनिस्ट नहीं हूं. पहले जब था, तब था. जो गलत है, उसका प्रतिरोध कोई भी कर सकता है और इसके लिए जरुरी नहीं कि कोई मार्क्सवादी ही हो 2. माफ कीजिएगा, मार्क्सवाद कोई विचारधारा नहीं बाकी दूसरी पार्टियों की तरह ही राजनीति पार्टी है. और 3. समय के साथ-साथ मार्क्स और भी बौने होते जा रहे हैं.

 पीयूष मिश्रा ने कल जो कुछ भी कहा, उसमें नया कुछ भी नहीं है. अकादमिक दुनिया में शामिल लोग ये बात पिछले पन्द्रह सालों से कहते आ रहे हैं लेकिन उनकी ये बात अवसरवादिता है, वैचारिक स्तर की दगाबाजी है, समझदारी के नाम पर भद्दा मजाक है. इसी बात को उत्तर-आधुनिक स्थिति बताकर विश्लेषित किया गया तो तर्क प्रस्तावित किए गए कि जिस देश में अभी ठीक से आधुनिकता ही नहीं आयी हो, वहां उत्तर-आधुनिकता की बात करना हास्यास्पद है. लेकिन अब आप और किस तरह की उत्तर-आधुनिकता के चिन्ह देखना चाहते हैं जहां एक शख्स सालों से जिन सिद्धांतों को, विचारधारा को एक समय तक जीवन जीने की पद्धति मानकर जीता रहा, उसके भीतर लड़ता-जूझता रहा, अब वो उसके लिए वो सबकुछ एक राजनीति पार्टी भर का हिस्सा रह गया है, इससे आगे कुछ नहीं है. इससे अपने को अलग करने की घोषणा उतनी ही स्वाभाविक है जैसे कोई मोबाईल प्लान खत्म होने पर दोबारा रिचार्ज न कराना चाहता हो, जीवन बीमा की पॉलिसी की मैच्योरिटी हो जाने पर आगे बढ़वाना नहीं चाहता हो. इन सबसे अलग अगर वो जीने के दूसरे तरीके की तरफ जाता हो तो आप इसे उत्तर-आधुनिक स्थिति नहीं तो क्या दगाबाज कम्युनिस्ट मानकर कोड़े बरसाएंगे और ये शख्स कोड़े खाने के लिए आपकी पकड़ के भीतर होगा. ?

इस कार्यक्रम के बहाने विचारों की प्रतिबद्धता और मार्क्सवाद को लेकर मेरी फेसबुक वॉल पर जो बहस चल रही थी, उसमें कुछ आंशिक और पायरेटेड टाइप के कम्युनिस्ट साथियों ने टिप्पणी की- पीयूष मिश्रा हद तक अपने से कम्युनिज्म को झाड़ने की कोशिश करते हैं लेकिन ये उनके भीतर इतने गहरे तक धंसा है कि निकल ही नहीं पा रहा. दूसरे साथ की टिप्पणी थी कि उन्होंने जो भी बातें कही है वो बहुत ही व्यावहारिक है. फिर देखिए तो उनके काम में( संवाद,गीत और स्वर ) मार्क्सवाद की समझ उतनी ही गहराई से मौजूद है, जैसे पहले हुआ करती थी.

 मैं इन साथियों की मनःस्थिति समझ सकता हूं. ये ओथेलो की वो पीड़ा है जिसमें वो प्यार और धोखे के बीच झूलता रह जाता है. वो ऐसे कम्युनिस्ट को अपने से पूरी तरह कैसे अलग कर दें जो संगठन के स्तर पर( जिसके लिए आइबीएन7 के प्रबंध संपादक आशुतोष मार्क्सवाद में घेटोवाद शब्द का इस्तेमाल करते हैं) अपने को बिल्कुल जुदा घोषित कर दे लेकिन अपने कॉमरेड साथियों को दर्शक,श्रोता और पाठक की हैसियत से अपने साथ लेकर चलना चाहता है..ऐसे में ऑथेलो की ये पीड़ा मनोरंजन उद्योग में शिफ्ट होती है और हमारे कॉमरेड साथियों का तर्क मजबूत होता दिखाई देता है कि कोई बात नहीं अगर हमारा साथी जीवन के स्तर पर कम्युनिस्ट नहीं रह गया लेकिन उसके काम के भीतर तो वही विचारधारा दौड़ रही है, हमें उनका साथ देना चाहिए. उनका हौसला बढ़ाना चाहिए. लेकिन

इस पूरे तर्क और समझदारी का दूसरा पहलू कुछ और है. अगर आप मीडिया और सिनेमा के भीतर ऐसे भूतपूर्व किन्तु काम के लिहाज से वर्तमान कम्युनिस्ट की मौजूदगी पर गौर करें तो आप बहुत ही दिलचस्प नतीजे तक पहुंचेंगे. आपको लगेगा कि पूंजीवाद और बाजार के तामझाम अब मनोरंजन के भीतर चमकीली दुनिया रचने में थक गया है. उसने पूंजीवाद के तमाम बड़े दैत्य और सुपरमैन दिखा दिए. लोग उससे प्रभावित भी हुए और गिरफ्त में भी आए और एक तबका उदासीन भी होता गया. अब आगे क्या ? आप समझिए कि पूंजीवाद के पास चटख रंग पैदा करने की क्षमता कम गयी, वो ऐसा करते-करते थककर चूर हो गया है. वो जो कुछ भी रच रहा है, उसमें एकाकीपन है, मोनोटोनस होता जा रहा है. अब जरुरी है कि इस काम में मार्क्सवाद और प्रगतिशील विचारों से उकताए लोगों को काम पर लगाया जाए.

 क्या ये अकारण है कि जिस यूटीवी और वायकॉम18 ने देशभर के मनोरंजन उद्योग का बड़ा हिस्सा घेरा हुआ है, जिसमें वही सब तरह से आजमाए बाजार की नीरसता का अंबार लगा है, वही दूसरी तरफ प्रगतिशील डिफरेंट उत्पाद को प्रोत्साहित कर रहा है. सही बात है कि जब ऐश्वर्य का बाजार थक गया है तो विपन्नता अपने भीतर बाजार क्यों न पैदा करे ? ये दरअसल उस ताकतवर बाजार के भीतर की उब है जहां बार-बार घोषणा किए जाने के बाद भी कि मैं मार्क्सवादी नहीं हूं, काम और सांस्कृतिक उत्पाद के नाम पर वहीं की सोच काम में लायी जा रही है. दूसरा कि बाजार को एक हद तक अपने भीतर पैदा हुई उब से मुक्ति का रास्ता मिलता दिखाई देता है, वही दूसरी ओर एक ऐसा पाठक-दर्शक वर्ग जिसने उसे आदिम जमाने से अपना और सरोकारी समाज का दुश्मन मान बैठा है, उसकी न केवल स्वीकृति मिल जाती है बल्कि वो खुद भी ऐसे उबनिरोधक कम्युनिस्ट सांस्कृतिक उत्पाद के मुख( mouth) प्रचारक बनते हैं. बाजार और थके-हारे पूंजीवाद को इसका दोहरा लाभ मिलता है जिसे कि हमारे कॉमरेड साथी सम्मोहन में पूंजीवाद/बाजार के भीतर प्रगतिशील विचारधारा की स्वीकार्यता समझ रहे हैं.

इस बात को स्वीकार करने में अगर थोड़ी भी दिक्कत होती हो तो आप ऐसे डिफरेंट सांस्कृतिक उत्पाद में फर्क करने के अलावे इसके वितरण, लागत, पैकेजिंग, उसके भीतर की प्रतिस्पर्धा पर गौर करें, आपको बाकी कहीं से कुछ भी अलग नहीं लगेगा. ये वही उत्तर-आधुनिक स्थितियां है जिसे तथाकथित प्रतिबद्ध कम्युनिस्ट या तो दगाबाजी करार देता है और वो इसलिए कि इस सांस्कृतिक उत्पाद का लाभ संगठन की झोली में न जाकर पूंजीवाद की झोली में गिरता है या फिर उन तमाम कॉमरेड के लिए एक मॉडल पेश करता है जहां उसे एक समय के बाद वहां और इसी तरीके से पहुंचना है.

 इन सबके बीच जल्दीबाजी का निष्कर्ष हो सकता है कि मार्क्सवाद( जाहिर है इन प्रैक्टिस) पूंजीवादी ढांचे के भीतर सांस्कृतिक उत्पाद को स्वयं पूंजीवाद के दिमाग से पैदा हुए उत्पाद से अलग,बेहतर और खूबसूरत बनाने का तरीका है जिसका असल काम बाजार की निरसता को भंग करते हुए उसे पहले से और मजबूत करना है. ऐसे में पीयूष मिश्रा या किसी भी भूतपूर्व कम्युनिस्ट को मार्क्सवाद से अपने को अलग बताना उतना ही जरुरी और व्यावहारिक है जितना कि पूंजीवाद के नए करिश्मे के भीतर नए कामगारों का एक समय तक कम्युनिस्ट बने रहना या फिर न भी बन सकें तो उसके आवरण के इर्द-गिर्द रहना.

 जो बात हम कभी मजाक में सुना करते थे कि पच्चीस साल तक जो कम्युनिस्ट नहीं है वो बेकार है और जो पच्चीस साल के बाद भी कम्युनिस्ट रह जाता है वो और भी बेकार है दरअसल ये महज चुटकुला होने से कहीं ज्यादा बाजार के बदलने पैटर्न की अनिवार्यता है क्योंकि रहना तो हर किसी को बाजार में ही है, समाज तो उसकी इच्छा और सहूलियत से बसाई जानेवाली चीज है. इस समाज में तब टीनएज के बुनियादी पाठ का - विचारों की प्रतिबद्धता और दक्षिणपंथियों से हिकारत व्यावहारिक होने के बीच घुल-मिल जाना स्वाभाविक है. तब आप अपने उन तमाम कम्युनिस्ट साथियों पर खुलकर हंस सकते हैं जो सामाजिक स्तर पर तो दक्षिणपंथी-वामपंथी का स्पष्ट विभाजन कर लेते हैं लेकिन जैसे-जैसे उसका सिरा बाजार की तरफ बढ़ता है वे इ देखो, ये रहा दक्षिणपंथी, उधर देखो दक्षिणपंथी जैसे स्थूल विभाजन की काबिलियत खो देते हैं, कई बार उसी बाजार में खुद भी विलीन हो सकते हैं जबकि जो प्रतिबद्ध है वो लथपथ ही रह जाता है.(रवीश से उधार के शब्द)

कार्यक्रम की वीडियो देखने के लिए चटका लगाएं-  एक शाम पीयूष मिश्रा के नाम
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4 Response to 'पीयूष मिश्रा के बहाने चितकबरे कम्युनिस्ट पर एक बहस'
  1. चंदन कुमार मिश्र
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/07/blog-post_09.html?showComment=1341842678108#c5420526542518089660'> 9 जुलाई 2012 को 7:34 pm

    हाल ही में फिल्मों के वामपंथ पर लिखा था। ... ... अच्छा लगा यहाँ भी।

     

  2. शिवम् मिश्रा
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/07/blog-post_09.html?showComment=1341850404417#c2461803471355718184'> 9 जुलाई 2012 को 9:43 pm

    पीयूष जी हमेशा से मेरे पसंदीदा कलाकार रहे है ... उनका राजनीति से कितना क्या लेना देना है मुझे इस की कोई जानकारी नहीं है ... न मैं लेना चाहता हूँ ... मैं उनको एक कलाकार के रूप मे जानता हूँ और मेरे लिए इतना ही बहुत है !

    आपके इस खूबसूरत पोस्ट का एक कतरा हमने सहेज लिया है कहानी सिक्कों की - ब्लॉग बुलेटिन के लिए, पाठक आपकी पोस्टों तक पहुंचें और आप उनकी पोस्टों तक, यही उद्देश्य है हमारा, उम्मीद है आपको निराशा नहीं होगी, टिप्पणी पर क्लिक करें और देखें … धन्यवाद !

     

  3. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/07/blog-post_09.html?showComment=1341885097726#c5347038300925751505'> 10 जुलाई 2012 को 7:21 am

    यह पोस्ट पढ़ना शुरु करने के बाद पहले एनडीवी की साइट पर पीयूष मिश्रा का कार्यक्रम देखा। फ़िर लौटकर लेख देखा। लेख अच्छा लिखा है। लेकिन शब्दावली बड़ी उलझाऊ है भाई! उलझाऊ घेट्टोवाद!

     

  4. प्रवीण पाण्डेय
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/07/blog-post_09.html?showComment=1341888136678#c5881748462425288587'> 10 जुलाई 2012 को 8:12 am

    अपने आप को सहसा अलग खड़ा कर लेना बहुत कठिन है, मानसिक पीड़ा होती है..भले ही बुद्धि अलग होने के लिये कहे।

     

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