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विनायक सेन को आजीवन कारावास की सजा के खिलाफ दिल्ली में जो भी विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं,उसकी रेगुलर मेल मुझे मिल रही है। मैं विनायक सेन के साथ हूं, आज भी और आज से चार साल पहले भी। मुझे अच्छा लगता है कि लोग कोर्ट और सरकार के रवैये के खिलाफ एकजुट हो रहे हैं। ऐसे दौर में जबकि कला,साहित्य और पत्रकारिता  सत्ता के लिए अंगरखे से ज्यादा कुछ भी करार न दी जा रही हो,इनसे जुड़े लोग सत्ता के खिलाफ खड़े हो रहे हैं। लेकिन मुझे एक बात लगातार परेशान कर रही है। एक ही तारीख को होनेवाले विरोध-प्रदर्शन की मेल मुझे अलग-अलग मार्क्सवादियों की मेल आइडी से मिल रही है। ऐसे मार्क्सवादियों की मेल आइडी से जिन्होंने आज दिन तक समाज के किसी भी मसले पर कोई मेल नहीं भेजी। क्या ऐसे लोगों के आसपास कभी भी किसी स्त्री का शोषण नहीं हुआ होगा,किसी के साथ गुंडागर्दी नहीं हुई हो,किसी का हक नहीं मारा गया होगा या फिर किसी की आवाज नहीं दबा दी गयी होगी? लेकिन ऐसे मार्क्सवादियों ने कभी मेल जारी करके क्यों नहीं कहा कि हमारे इलाके में एक महिला के साथ अन्याय हुआ है,एक दलित को मकान मालिक ने आधी रात घर से निकाल दिया है, उसकी जाति जान लेने के बाद उसे पीट-पीटकर उल्टे थाने में बंद करवा दिया? ऐसे मौके आए तो होंगे लेकिन मेरे ये मार्क्सवादी साथियों ने तब कोई मेल क्यों नहीं भेजी? विनायक सेन के संदर्भ में संभव है कि ये सवाल बकवास और अप्रासंगिक लगे लेकिन ऐसे सवालों से टकराए बिना हम हर स्थिति में यानी 24x7 समाज में प्रतिरोध की ताकत पैदा कर सकते हैं,हम सत्ता को इस बात का एहसास करा सकते हैं कि कुछ भी गलत होने पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और उन्हें चुनौती झेलनी पड़ेगी?

खास मौके पर खड़े होनेवाले मार्क्सवादी जो कि विचार से सामंती,अवसरवादी और जातिवादी अवधारणाओं के बीच सने हुए हैं,जो पार्टी ऑफिस की टिकिया चाटकर अपने को मार्क्सवादी करार देते हैं,ऐसे मार्क्सवादी देश के लिए तो बाद में,पहले खुद मार्क्सवाद के लिए सबसे खतरनाक हैं। ये किसी भी घटना को एक बड़े संदर्भ तक बनने का इंतजार करते हैं। वो तब तक इंतजार करते हैं जब तक कि मामला स्थानीयता की जमीन छोड़कर राष्ट्रीय या ग्लोबल न बन जाए। ऐसा होते ही उनकी आवाज बुलंद होनी शुरु होती है क्योंकि इससे किसी भी तरह का नुकसान होने का खतरा नहीं होता। वो समस्या तब समस्या न होकर एक ब्रांड बन जाती है और जिसके साथ खड़े होने पर मार्क्सवाद का फैशन अपने परवान चढ़ता है। इससे समस्या का हल कितना होता है ये तो नहीं मालूम लेकिन हां इस समस्या से अपने को जोड़कर देखना एक स्टेटस सिंबल का हिस्सा बन जाता है। इस देश में मार्क्सवाद का एक बड़ा हिस्सा इसी फैशनपरस्ती की तर्ज पर पसर रहा है। आज समस्या इस बात कि नहीं है कि किसी बात को लेकर आवाज नहीं उठायी जाती,समस्या इस बात को लेकर है कि मुद्दों को हाटकेक बनने तक का इंतजार किया जाता है। मौकापरस्त मार्क्सवादी इसी का इंतजार करते नजर आते हैं। आज सबसे ज्यादा मुश्किल है अपने आसपास की समस्याओं पर खुलकर बात करना,प्रतिरोध दर्ज करना लेकिन सुधार की गुंजाईश भी यहीं से बनती है।

इन मार्क्सवादियों के लिए कोई भी समस्या जब तक व्यापक संदर्भ हासिल नहीं कर लेती,समस्या ही नहीं है। ऐसे में छोटी-छोटी और घरेलू स्तर की समस्याएं व्यक्तिगत और पर्सनल इश्यू के खेमे में चली जाती है। एक शराबी मार्क्सवादी कवि के लिए अपनी पत्नी को पीटना पर्सनल इश्यू है लेकिन यही काम एक मजदूर करे तो सामाजिक समस्या है. इस शराबी कवि की कविताओं से क्रांति पैदा होती है लेकिन व्यवहार से क्या,ये सवाल पूछनेवाला कोई नहीं है? टिकिया चाटकर मार्क्सवादी होनेवाले लोगों के लिए ये एप्रोच उनके बीच जबरदस्त तरीके से अवसरवाद और निजी हित की संस्कृति को बढ़ावा देता है। इस अवसरवाद का रंग ऐसा है कि आप इसे किसी भी विचारधारा के तहत ठीक-ठीक विश्लेषित नहीं कर सकते। उनके सारे मानक अपने पाले की तरह बदलते रहते हैं।

मैंने जिस दौर में हॉस्टल में रहकर पढ़ाई की। एमए और यूजीसी के लिए कुत्ते की तरह अपने को रगड़ा,अपने तमाम मार्क्सवादी साथियों के लिए मजाक,दया और कई बार आक्रोश का पात्र था। क्यों? क्योंकि मैं एम ए में अच्छे नंबर लाना चाहता था,यूजीसी निकालना चाहता था और दूसरी तरफ मार्क्स की विचारधाराओं का समर्थन भी करता था। मैं उनकी निगाह में असरवादी निम्न मध्यवर्ग की मानसिकता में जीनेवाला शख्स था। उन्हें एमए में करते हुए नंबर लाने के प्रति द्रोह था,यूजीसी की परीक्षा को गुलाम मानसिकता का हिस्सा मानते,इससे उनकी प्रतिभा को ठेस पहुंचती। आज मैं अपने उन मार्क्सवादी साथियों की तरफ नजर दौड़ाता हूं तो अधिकांश सिस्टम के कल-पुर्जे बन हुए हैं। उन्हें यूजीसी सिस्टम से विरोध था लेकिन अब बिना यूजीसी निकाले सिस्टम का हिस्सा बन जाने से विरोध नहीं है। उन्हें एम ए में नंबर लाने के प्रति द्रोह था लेकिन बैकडोर से सिस्टम में घुस आने पर कोई विरोध नहीं है। एक खास समय के लिए मार्क्सवादी अवधारणाओं को अपनी सुविधा के अनुसार लचीला बनाकर फिर सिस्टम में घुस जाना,मार्क्सवाद के भीतर के प्रतिरोध को कितना जड़ बनाता है,इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है मार्क्सवदियों के लाख मुर्दाबाद के नारे के बीच सत्ता और स्टेट मशीनरी हक की लड़ाई होने देने से पहले ही कुचलने में देर नहीं लगाती। उन्हें पता है कि इस देश का मार्क्सवादी एक खास समय के लिए वैलिडिटी पीरियड तक काम करता है,उसके बाद उसकी हैसियत स्क्रैच की गयी रिचार्ज कूपन की ही हो जाती है। इस देश में ऐसे ही मार्क्सवादियों से आंदोलन की जमीन कमजोर हुई है।

विनायक सेन के साथ खड़े होने के लिए मेरे जो मार्क्सवादी साथियों ने मुझे जो मेल भेजे हैं,उनसे मैं एक बार फिर सवाल करना चाहता हूं क्या कभी सीलमपुर,शहादरा,नांगलोई में किसी की आवाज नहीं दबा दी जाती,उसके खिलाफ फैसले नहीं होते,आप कभी मेल भेजोगे उसे लेकर या फिर विनायक सेन के बहाने अपनी ही ब्रांडिग करते फिरोगे? पार्टी लाइन ही अगर किसी मार्क्सवादी या प्रगतिशील शख्स के भीतर संवेदना पैदा कर सकती है,पार्टी ही अगर तय करती है कि लंबे समय के बाद विनायक सेन के पक्ष में खड़ा होना है या नहीं तब तो ऐसे में हमें संवेदना और मानवीयता के सवाल पर नए सिरे से विचार करना होगा। दूसरी तरफ अपना खेल खराब न हो,इस चिंता के साथ आवाज बुलंद करना या दबा देना है तो यकीन मानिए,ऐसे मौकापरस्त मार्क्सवादियों से सबसे बड़ा खतरा है।
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8 Response to 'ऐसे मार्क्सवादी सचमुच खतरनाक हैं'
  1. दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
    http://taanabaana.blogspot.com/2011/01/blog-post_18.html?showComment=1295316093203#c6717336881944804069'> 18 जनवरी 2011 को 7:31 am

    विनीत भाई!
    आप से सहमत हूँ।
    विनायक के साथ खड़े होने वालों को विनायक से सीखना चाहिए। फिर जिस चरित्र के लोगों को आप यहाँ मार्क्सवादी कह रहे हैं क्या वे वाकई मार्क्सवादी हैं भी?

     

  2. प्रभात रंजन(मॉडरेटर)
    http://taanabaana.blogspot.com/2011/01/blog-post_18.html?showComment=1295330623415#c7323944675825637247'> 18 जनवरी 2011 को 11:33 am

    विनीत जी आपने हम जैसे बहुतों के दिल की बात लिखी है. एक बार सत्ता के गलियारों में ताकत तलाशने वाले अपने एक प्रगतिशील मित्र पर व्यंग्य किया कि आप तो मार्क्सवादी हैं फिर व्यवस्था में क्यों घुसना चाहते हैं. उनका जवाब था कि प्रगतिशील हैं इसलिए प्रगति करना चाहते हैं.

     

  3. डॉ .अनुराग
    http://taanabaana.blogspot.com/2011/01/blog-post_18.html?showComment=1295330690149#c6798137652557602022'> 18 जनवरी 2011 को 11:34 am

    विचारणीय लेख......ईमानदारी से भरा ...दरअसल मार्क्सवादी ही नहीं ...अब पढ़े लिखे वर्ग भले ही वो साहित्य कार हो के भीतर कई विचारधाराए बंटी हुई है .जहाँ .विचार से ज्यादा व्यक्ति महत्वपूर्ण हो जाता है.......असहमतिया अब लम्बे समयतक लोग दिमाग में रखते है .....कागजो में नहीं छोड़ते ......सरोकार बड़ी सतर्कता ओर माप तौल से चुने जाते है ...बाकि .समझदारी भरी तटस्थता की चुप्पी तो है ही......
    जिस कवि की आप बात कर रहे है ....उनकी कविता एक आदरणीय मित्र ने अपने ब्लॉग पर लगायी....मैंने कमेन्ट किया... कागजो ओर निजी जीवन में इंसान अलग अलग क्यों दिखता है ....उन्होंने कमेन्ट पबिलिश नहीं किया .....
    महत्वपूर्ण बात यही है के अब प्रान्त ....वाद ओर व्यक्ति को देख कर नहीं ....सच ओर झूठ को माप कर हमें उसके समर्थन में विचार व्यक्त करने चाहिए

     

  4. डॉ महेश सिन्हा
    http://taanabaana.blogspot.com/2011/01/blog-post_18.html?showComment=1295357512136#c4881690316466511298'> 18 जनवरी 2011 को 7:01 pm

    मौकापरस्त प्रीपैड मार्क्सवादी, सही विश्लेषण

     

  5. mukti
    http://taanabaana.blogspot.com/2011/01/blog-post_18.html?showComment=1295361717903#c560689180326595277'> 18 जनवरी 2011 को 8:11 pm

    डॉ. अनुराग की बात सही है. ना सिर्फ़ मार्क्सवादी, बल्कि ये प्रवृत्ति लगभग हर पढ़े-लिखे वर्ग में रही है.
    आपकी इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ कि ज्यादातर लोगों के लिए मार्क्सवादी होना फैशन है. एक निश्चित पैटर्न के तहत वो सार्वजनिक जीवन जीते हैं और व्यक्तिगत स्तर पर दूसरी तरह से व्यवहार करते हैं.
    ये भी बात बिल्कुल सही है कि छद्म मार्क्सवादी किसी भी मुद्दे के राष्ट्रीय बनने का इंतज़ार करते हैं, स्थानीय मुद्दे उनके लिए महत्त्वपूर्ण नहीं होते.
    मार्क्स के विचारों से मैं भी बहुत प्रभावित हूँ, पर इस तरह की फैशनपरस्ती से चिढ़ है.

     

  6. पुष्कर
    http://taanabaana.blogspot.com/2011/01/blog-post_18.html?showComment=1295376070932#c7677700015596056220'> 19 जनवरी 2011 को 12:11 am

    विनीत मुश्किल यह है कि ऐसे मार्क्सवादी जिसका आपने जिक्र किया है कि तादाद तेजी से बढ़ी है. मार्क्सवाद की मूल विचारधारा गौण हो गयी है. मुझे कई कथित मार्क्सवादियों को लेकर ताज्जुब होता हैं कि सार्वजनिक जीवन ज्ञान की बड़ी - बड़ी बातें करते हैं. लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर सारे कुकर्म करते हैं. दरअसल प्रगतिशील विचारधारा का ढोंग रचा अपनी प्रगति करना ही इनमें से अधिकतर का लक्ष्य होता हो.

     

  7. amitesh
    http://taanabaana.blogspot.com/2011/01/blog-post_18.html?showComment=1295378842246#c4745149679125982920'> 19 जनवरी 2011 को 12:57 am

    you are right but why only marxist ? there are so many activist..we may say them pseudo activist hide in you and me. could we stand for seelampur,sahadara...and maye for. we have to think...

     

  8. आशीष सिंह
    http://taanabaana.blogspot.com/2011/01/blog-post_18.html?showComment=1296138757475#c7570500674700082451'> 27 जनवरी 2011 को 8:02 pm

    पुष्कर की टिप्पड़ी कि ये लोग व्यक्तिगत जीवन में एकदम अपने ही विरोधी नज़र आते हैं एकदम सटीक लगती है. फेसबुक पर लाइक करना और शेयर करके "टोकन" प्रोटेस्ट में हिस्सेदारी ही विरोध दर्ज करने का माध्यम बन चुका है..

     

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