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अपने ब्लॉग पर पोस्ट लिखे मुझे छ दिन हो गए। ब्लॉग खोलकर देखा तो सोचा- बाप रे,छ दिन जब हो गए. मेरे साथ ऐसा पहली बार हुआ है कि मैं दिल्ली में हूं,कमरे में लिखने की सारी सुविधा है,फिर भी छह दिनों तक कुछ लिखा ही नहीं। अब ऐसा भी कुछ नहीं था कि मैं कोई पहाड़ तोड़ रहा था। आमतौर पर ब्लॉगरों की राय होती है कि वे फुर्सत में होते हैं, तभी ब्लॉगिंग करते हैं। मेरे साथ थोड़ी दूसरी स्थिति है। मैं फुर्सत में होता हूं तो चाहे जो कुछ भी कर लूं लेकिन ब्लॉगिंग नहीं करता. बहुत ही व्यस्त समय में ब्लॉगिंग करता हूं। जब खूब अच्छी पढ़ाई चल रही होती है,प्रिंट के लिए डेडलाइन होती है कि इतने दिनों में देना है, ऐसे समय में ब्लॉगिंग करता हूं। व्यस्त होने की स्थिति में मेरा सब कुछ रेगुलर हो जाता है, लोगों से चैट करने से लेकर ब्लॉगिंग करने तक।
लेकिन अबकि बार स्थिति दूसरी हो गयी। व्यस्त तो रहा,अपनी पीएचडी का कुछ काम भी किया,नया ज्ञानोदय के लिए मर-गिरकर लेख भी लिख दिया,लोगों से चैटिंग भी की,फेसबुक पर लिखी रवीश की सस्ती शायरी का जबाब भी दिया जिसे कि मेरी एक दोस्त दूतरफी चुतियापा कहती है,सब कुछ किया लेकिन ब्लॉगिंग नहीं की। मन करता है कि कोई हमसे सवाल करे- छ दिन तक तुम्हें ब्लॉगिंग नहीं की, मन नहीं किया कि कुछ लिखें, कैसे रह गए तुम छह दिनों तक.
मन किया,एक-दो नहीं,बहुत बार किया। अभी लिखने बैठा तो पांच ड्राफ्ट पड़े थे,सबके सब अधूरे। किसी पोस्ट की पांच लाइन,किसी की चार लाइन,किसी की दो लाइन,एक की तो सिर्फ शीर्षक ही। मैं चाहता तो अब तक ये पांचों पोस्ट प्रकाशित हो गयी होती। मैं लिखता औऱ फिर मिटा देता। मैंने बहुत कोशिश करके इसे नहीं प्रकाशित होने दिया, बहुत दबाना पड़ा इसके लिए अपने को।
पिछले दिनों जब मैं अपने दोस्तों सहित बाकी के लोगों से मिला तो सबने यही कहा- यार बहुत लिखते हो तुम,इतना क्यों लिखते हो। ये बात किसी ने तारीफ में नहीं कही। किसी ने मेरी तुलना राजकिशोर औऱ आलोक पुराणिक से करनी शुरु कर दी तो किसी ने कहा- क्या-क्या पढ़े तुम्हारा लिखा। एक ने कहा- तुम लिख देते हो और जब चर्चा होती है तो लोग पूछते हैं- विनीत की फलां पोस्ट पढी तुमने, मैं कहता हूं नहीं. यार,जबरदस्ती एक प्रेशर क्रिएट करते हो,लिखते हो तो पढ़ना पड़ता है। अच्छा, लिखते हो तो लिखो, उसे दीवान(सीएसडीएस,सराय का हिन्दी चिट्ठा मंच)पर मत डाला करो। इन सब लोगों की बात मुझे थोड़ी लग गयी। मुझे सबसे ज्यादा ये बात लगी कि मेरी तुलना किसी से की जाने लगी है, वो भी कंटेंट को लेकर नहीं, लिखने को लेकर। ये किसी भी स्ट्रग्लर राइटर के लिए खतरनाक स्थिति होती है। मैंने मन को मजबूत किया औऱ सोचा,अब कम लिखा जाए।
आज दोपहर,आनंद प्रधान सर से चैटबॉक्स पर बात हो रही थी। फेसबुक पर उन्होंने अपने एक स्टूडेंट के सवाल को चस्पाया है कि इस लोकसभा चुनाव के बाद मीडिया की क्रेडिबलिटी खत्म हो जाएगी। ऐसा इसलिए कहा कि खबर है कि अखबारों में पैसे लेकर खबरें औऱ प्रत्याशियों के इंटरव्यू छापे जा रहे हैं। मैंने कहा- सर मैं इसी के उपर पोस्ट लिखना चाह रहा हूं। उन्होंने कहा- हजार शब्द का एक लेख ही लिख दो,शाम तक। मैंने अभी-अभी उन्हें वो लेख मेल कर दिया। पोस्ट फिर भी लिखना नहीं हो सका. आज की पोस्ट का विषय तो प्रिंट के लिए चला गया।
इन दिनों जब मैं कुछ-कुछ प्रिंट के लिए लिखने लगा तो लगा कि ब्लॉगिंग छूट जाएगी। जब लिखने के पैसे मिल रहे हैं तो फिर मुफ्त में क्यों ब्लॉग पर जान देता रहूं। लेकिन मैंने महसूस किया कि मैं प्रिंट के लिए लाख लिखूं, जब तक पोस्ट नहीं लिख लेता,तब तक बेचैनी बनी रहती है। मैंने सोचा, आज उसी वजह को आपके सामने रख दूं।
क्यों है ऐसा, दिन-दिनभर रिसर्च की थीसिस और लेख लिखते रहने के बाद भी ब्लॉग लिखने की छटपटाहट क्यों बनी रहती है। कई बार मैंने महसूस किया है कि जिस दिन मैं पोस्ट लिखने बैठता हूं और कोई कहता है इस मसले पर लेख लिखो तो उसके बाद भी मैं पोस्ट लिखता हूं। इसे हिन्दी समाज ब्लॉगिया जाना कहता है। अगर बीमारी है तो इलाज के लिए सोचना होगा। क्या कोई डॉक्टरी इलाज संभव है। तब उस हरकत का भी इलाज होगा, जब बछड़ा,रस्सी तोड़कर मां के पास जाने के लिए छटपटा जाता है। सात महीने की नन्हीं अपनी मां को देखते ही दूसरे की गोद से उस पर कूद जाती है,खुशी का भी इलाज कराना होगा, जब मेरे पापा की पेट पर फुटबॉल खेलने के लिए मचल उठती है।
लिखने के मामले में,मैं शुद्ध रुप से ब्लॉगिंग की पैदाइश हूं। ब्लॉग पर मैंने लिखना सीखा। यही आकर समझा कि बेमतलब का लिखना कैसा होता है। खट-खट टाइप करते हुए यहीं मॉनिटर पर कभी प्रेमचंद के अक्श दिखाई दिए तो कभी लिख-लिखकर कागज फाड़ते हिन्दी रचनाकारों की कतार दिख गयी। अभी तक मेरा मन नहीं कहता कि तुम्हें कोई बीमारी हुई है और अगर तुम्हें फिर भी लगता है कि कि बीमारी है तो उसका एक ही इलाज है- पहले की तरह ही लिखो,लिखते रहो।
पाठकों,मेरे दोस्तों मुझे जीवन में स्वस्थ रहना है, ये मेरे लिए सबसे बड़ी चुनौती है औऱ स्वस्थ रहने के लिए मुझे लिखते रहना होगा। अब तुम्हारे जो जी में आए कहो- मुझे लिखना है,मुझे झेलने के अलावे कोई उपाय है तो खोज लो प्लीज।.
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3 Response to 'ब्लॉगिंग की पैदाइश हूं,पोस्ट लिखे बिना मर जाउंगा'
  1. अनिल कान्त :
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/04/blog-post_24.html?showComment=1240575180000#c6259240988290443814'> 24 अप्रैल 2009 को 5:43 pm

    आप यूँ ही लिखते रहो ...लिखने से कम से कम स्वास्थ्य तो ठीक रहेगा

    मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

     

  2. सुशील कुमार छौक्कर
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/04/blog-post_24.html?showComment=1240575600000#c2200447676230411675'> 24 अप्रैल 2009 को 5:50 pm

    उपाय, वो क्या होता है? वैसे बंधु जी अब कैसे है।

     

  3. सतीश पंचम
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/04/blog-post_24.html?showComment=1240589580000#c5670658518107738534'> 24 अप्रैल 2009 को 9:43 pm

    लिखो यार...लिखने पर टैक्स नहीं लगता :)

     

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