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 फिल्म रांझणा में सिर्फ जेएनयू नहीं है. उसमे बनारस है, अलीगढ़, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय है, एक छटांक लखनउ, थोड़ा इलाहाबाद ,साईनबोर्ड में काशी है और इन सबके बीच ग्रेवी बनकर दिल्ली तो है ही..ठीक उसी तरह जैसे फिल्म दिल , दोस्ती,एटसेट्रा में सिर्फ डीयू नहीं था लेकिन इतना डीयू तो जरुर था कि आप इसे डीयू कैंपस पर बनी फिल्म कह सकते थे..तो इस हिसाब से आप रांझणा को देखने के बाद इतना जेएनयूजरुर पाते हैं कि फिल्म की बाकी एंगिल से हटकर सिर्फ उस पर अलग से बात कर सकें.

फिल्म देखकर निकलने के साथ ही एफबी टाइमलाइन पर जैसे ही मैंने कुछ स्टेटस अपडेट किए, अलग-अलग तरह के कमेंट आने शुरु हो गए जिनमे एक कमेंट ये भी था कि मेरे एक संघी मित्र को इस फिल्म को लेकर खासा उत्साहित और स्टेटस अपडेट करते देख रहा हूं, संघियों को ये फिल्म रास आ रही है, इसका मतलब ये जरुर घटिया फिल्म होगी.



 जेएनयू के संदर्भ को लेकर बनाई जा रही फिल्म देखकर अगर संघियों का उत्साह बढ़ रहा है तो इसका साफ मतलब है कि इसमे वामपंथी पार्टियों की जमकर आलोचना की गई होगी या उनका मजाक उड़ाया गया होगा ? कंमेंटकर्ता के लिखने का आशय भी यही था शायद..लेकिन अगर जेएनयू का मतलब सिर्फ वामपंथी पार्टियों की मौजूदगी( भले ही आलोचना और उपहास के संदर्भ में ही क्यों न हो) है तो इसमे आरएसएस और दूसरे दक्षिणपंथी ब्रिगेड को खुश होने के बजाय माथा पीट लेने की बात है कि उनके लगातार सुलगते,उबलते रहने के ,अच्छी संख्या में वन्दे मातरम् के नारे लगाते रहने और संकल्प लो,सुदृढ़ बनो जैसी गतिविधियों के चलाते रहने के बावजूद जेएनयू वामपंथी पार्टियों के पर्याय के खांचे से खिसककर उनकी तरफ नहीं बढ़ा. ऐसे में ये संघियों के लिए खुश होने की बात है या फिर मुरझा जाने की, ये सवाल आप उन संघी मित्रों से करें जिनका उत्साह छलक-छलककर फेसबुक तो कभी आपसी बातचीत में प्रकट हो रहा है.

इधर वामपंथी पार्टियां अगर रांझणा देखकर लौट चुकी है तो इस सवाल पर सिरे से विचार करे कि क्या इस फिल्म और आनंद राय के खिलाफ मोर्चागिरी की जाए, पर्चे लिखे जाएं और सरेआम पूतले फूंके जाएं कि आपने जेएनयू को इस तरह रिड्यूस करके पेश क्यों किया ? अव्वल तो कभी यहां की वामपंथी पार्टियों ने सत्ता में आने के लिए यहां के किसी भी मुख्यमंत्री के साथ ऐसी घिनौनी साजिश नहीं रची( ये अलग बात है कि जिस जेनएयू को क्रांतिकारियों की फैक्ट्री के रुप में देखा-समझा जाता रहा और हाल ही में जिसे लेकर प्रोफेसर अपूर्वानंद ने ये कहते हुए कि जब दिल्ली में आवाज लगाए जाने पर कोई नहीं आएगा तो जेएनयू आ जाएगा, अनूठा कैंपस है, पिछले दस सालों में राजनीति को कभी भी इस विश्वविद्यालय से खतरा महसूस नहीं हुआ), उसे आपने इस तरह से कैसे दिखा दिया ? खालिस राजनीति और आंदोलन के स्तर पर अगर इस फिल्म पर सवाल खड़े किए जाएं तो एक झटके में इस निष्कर्ष तक पहुंचा जा सकता है कि आनंद राय को जेएनयू को लेकर कोई गहरी क्या बेसिक समझ तक नहीं है और वो अकेले ऐसे फिल्म निर्देशक नहीं हैं जिन्हें दुर्भाग्य से राजनीति की भी समझ नहीं है. मटरू की बिजली का मंडोला बनाकर विशाल भारद्वाज ने खासा परिचय पहले दे दिया है बल्कि इस फिल्म को देखने के बाद तो वामपंथ का एक स्वतंत्र संस्करण"कैंपस का वामपंथ" पर अध्ययन-अध्यापन की जरुरत पड़ती दिखाई देती है. खैर

आनंद राय ने जिस चश्मे से जेएनयू को देखा है उसकी फ्रेम भले ही अनुराग कश्यप जैसी थोड़ी ठोस हो लेकिन दोनों ग्लास चुलबुल पांडे की निकालकर लगाया लिया या यों भी कह सकते हैं कि उन्होंने इसके लिए आंख से कहीं ज्यादा कान को निर्देशन के काम में लगाया है. कुछ नहीं तो दो-चार साल के एडमिशन और एलेक्शन की फुटेज देख लेते, रिपोर्ट पढ़ लेते, पर्चे-पोस्टर जुटा लेते तो जेएनयू उन्हें देश का बेहतरीन विश्वविद्यालय के बजाय मैला आंचल का मेरीगंज नहीं लगता. इस फिल्म को देखते हुए मुझे तो मैला आंचल की शुरुआती पंक्तियां बरबस याद आ गयी और फिर हिन्दू कॉलेज में डॉ रामेश्वर राय के लिखाए नोट्स- गांव में ये खबर आग की तरह फैल गई कि मलेटरीवालों ने बहरा चेथरु को गिरफ्फ कर लिया है और लोबिन लाल के कुएं से बाल्टी खोलकर ले गए..आशय ये कि मेरीगंज, एक ऐसा गांव जो अतिश्योक्ति,किंवदंतियों और अफवाहों में जीता है. आनंद राय के रांझणा में मेरीगंज के ये तीनों तत्व पुरकस ढंग से मौजूद हैं..साफ लगता है कि उन्होंने जेएनयू को जानने के बजाए, इससे संबंधित जानकारियों की आउटसोर्सिंग की है..पूरबिया भाषा में कहूं तो लग्गी से घास काटने की कोशिश. ये कुछ मुद्दे हैं जिस पर चाहें तो जेएनयू के वामपंथी साथी पर्चे तैयार कर सकते हैं. लेकिन

उनके ऐसा किए जाने से जेएनयू जिस तरह सिनेमा में आया है, उसकी प्लास्टर जहां-तहां से बहुत जल्द ही झड़ जाती है और लगता है कि या तो ये दुनंबरिया सीमेंट का इस्तेमाल है या फिर रात मारे प्लास्टर और सुबह फहराए झंड़ा टाइप से पन्द्रह अगस्तिया कार्रवाई है. जैसा कि बाकी सुधी फिल्म समीक्षक इस पक्ष में तर्क दे रहे हैं कि दरअसल उनका उद्देश्य जेएनयू की राजनीति को गहरे जाकर दिखाना नहीं रहा है..ठीक बात है, जब गहरे नहीं दिखाना है तो क्या उथले में उसे इस तरह उथला कर देंगे कि जिस विश्वविद्यालय की राजनीति समझ को लेकर साख है, वो दो घंटे बीस मिनट में ऐसे भरभराकर गिर जाएगी. अगर आनंद राय ने इस कैंपस को बारीकी से पकड़ा होता तो अव्वल राजनीतिक पार्टी के नाम पर सिर्फ ऑल इंडिया सिटिजन पार्टी जो कि अपनी पूरी मौजूदगी में वामपंथी पार्टी से छिटककर बनी स्वतंत्र पार्टी ही नजर आती है के अलावे यूथ फॉर एक्वालिटी, एबीवीपी, समाजवादी पार्टी की छात्र इकाई भी दिखाई देते...और एनएसयूआई जो कि डीयू की तरह ही धीरे-धीरे प्रभाव बढ़ा रहा है, उसकी मौजूदगी अदने एक झंड़े दिखाकर न कर दिया होता..पिछले दो-तीन सालों से विजयादशमी के मौके पर महिषासुर को लेकर जो नई किस्म की दलित राजनीति हो रही है, उस पर भी ध्यान जाता. यहीं पर आकर आपको लगता है कि राय साहब ने ये कहानी भी लगता है जेएनयू के किसी पुराने चावल से सुनी है,घटनाएं भले ही हाल के डाल दिए हों..उतना काम तो गूगल सर्चइंजन से भी किया जा सकता है. अब जेएनयू मतलब वामपंथी पार्टी का जो पर्याय उन्होंने गढ़ा, ये उनके वामपंथ के पुराने प्रेम की वजह से था या मीडिया में जेएनयू इसी तरह दिखता है, इस कारण..ये एक अलग मसला है. बहरहाल

हड़बड़ी और पन्द्रह अगस्तिया प्लास्टर चढ़ाए जाने के कारण बीच-बीच से जो झड़ता है, उससे जेएनयू की वो तस्वीर निकलकर आती है जो कि नए प्लास्टर से शायद ढंक जाती..अव्वल तो ये कि ये जेएनयू में ही संभव है कि कुंदन जिसके पास वहां के किसी भी स्कूल की आइडी नहीं है, चाय बेचता है लेकिन राजनीति में न केवल सक्रिय है बल्कि छात्रों द्वारा पूरी तरह अपना लिया जाता है.उसे बराबर से अधिक का महत्व दिया जाता है क्योंकि उसके पास अपनी समझ है. कुंदन के अपना लिए जाने में उसका ब्राह्मणवाद पर गहरी आस्था और अपनी वेद-पुराण से लोगों को डराते-धमकते रहने की स्वीकारोक्ति जितना कुंदन को उत्तर-आधुनिक ब्राह्मण बनाता है, उससे कहीं ज्यादा जेएनयू की वामपंथी पार्टी को उत्तर आधुनिक वामपंथी पार्टी जिसमे जाति, सामंतवाद, ब्राह्मणवाद और यहां तक कि स्त्री के प्रति महीन किन्तु आदिम नजरिया के जस के तस बने रहने के बावजूद प्रगतिशील होने के स्कोप बचे हते हैं  एक तस्वीर ये भी है कि उस खाटी डाउन-डाउन के नारे,पोस्टर बैनर के बीच भी कैंपस का परिवेश कुछ इस तरह से है कि झाडू लगानेवाली से लेकर,चाय पहुंचानेवाले छोटू की भी अपनी एक पहचान, महत्व और सम्मान है यानी जेएनयू में कुछ बेसिक बची हुई दिखाई देती है.

इस राय साहब के उखड़े हुए प्लास्टर से जो चीजें झांकती है वो दूसरी तरह की दिक्कत और सवाल पैदा करते हैं   और ये सवाल राजनीतिक,वैचारिक स्तर के विमर्शों में उलझने के बजाय सीधे उस दिए जानेवाले तमगे पर चोट करती है कि अगर जेएनयू में वामपंथ है, प्रगतिशीलता है और यही कारण है कि जो भी यहां आता है वो जिंदगी और समाज को लेकर नए किस्म से सोचता है तो फिर जोया का मुस्लिम होने के कारण मुस्लिम से ही शादी करने का आग्रह कैसे बचा रह जाता है. बचपन में हिन्दू कुंदन को इसी बिना पर रिजेक्ट किए जाने पर जेएनयू में अकरम से प्रेम होने और बाद में उसके पंजाबी दलजीत होने पर नस काटने की जरुरत क्यों पड़ जाती है ? दूसरी तरफ, दलजीत जो न केवल जेएनयू छात्रसंघ का नेता है बल्कि अपनी स्वतंत्र पार्टी जिसकी वैचारिकी वामपंथ की है दिल्ली का मुख्यमंत्री तक बनने की सोचता है, क्यो जोया से अपनी जाति और धर्म छुपाता है ?..और स्त्री को लेकर उसका नजरिया तो आप ऑपरेशन टेबल तक पहुंचने तक देख ही रहे होंगे..हां अगर आप इससे निकालकर अभय देओल अलग कर लें तो वो इन दिनों जी टीवी पर कनेक्टेड हम तुम के जरिए स्त्रियों के प्रति अपनी ठस्स समझ दुरुस्त करने में लगे है. हां फिल्म में अरविंद गौड़ का अस्मिता थिएटर ग्रुप जो जेएनयू का स्पोक्स पर्सन बनकर सामने आता है, उसने न केवल जेएनयू की बल्कि खुद अपनी और मंजे रंगकर्मियों की टोली होने के सबूत को काफी हद तक धुंधला किया.
 मतलब ये कि राजनीतिक स्तर पर जेएनयू में जो एक चौड़ी सड़क दिखाई देती है( हालांकि ऐसा बाकी पार्टियों के शामिल न किए जाने के कारण है), बनारस में प्रेम की जो गली खुलती ही नहीं है, प्रेम की वो गली सड़क बनकर मौजूद तो है लेकिन जाति-धर्म वहां भी बनारस-अलीगढ़ की चट्टान बनकर क्यों खड़ा है ? अच्छा जो जेएनयू चायवाले,झाडूवाली,आसपास के समुदाय के प्रति इतना संवेदनशील होने के लिए प्ररित करता है, वहीं से आयी जोया अपने घर में उन तमाम सामंती ढांचे में कैसे सहज हो जाती है ? मतलब ये कि आनंद राय ने जो सुनी-सुनाई कहानी की प्लास्टर चढ़ाने की कोशिश इस फिल्म में की है, उसकी एक परत राजनीतिक संदर्भों को तो छूती-झाड़ती है ही जिस पर चाहें तो हम दलील दें कि राजनीति में ये सब सब चलता है लेकिन जाति, परंपरा, धर्म, सामंतवादी नजरिया..इन सबों को लेकर जो जैसा घर से लेकर जाते हैं, वैसा ही रह जाता है, उसका क्या करेंगे ? और ये वो सवाल हैं जो जेएनयू की पूरी अवधारणा और "अनूठे कैंपस" को झटके में कटघरे में लाकर खड़ी कर देते हैं. जाहिर है, ऐसा ठीक इसी तरह होता नहीं है लेकिन फिल्म में राजनीति को सतही स्तर पर दिखाए जाने के बावजूद व्यवहार के स्तर पर ये मजबूती से स्थापित तो हो जाता है और तभी

क्रांति,बदलाव, प्रतिरोध,सरोकार राजनीति ही नहीं उससे बहुत पीछे जाकर व्यक्तिगत स्तर के निजी संबंधों और स्वार्थों में जाकर टक्कर मारते हैं. वो दर्शक को झटका देते हैं कि आप जिसे राजनीति का हिस्सा समझ रहे हो, दरअसल वो दो लोगों के बीच का आपसी मामला है जिसे कि क्रांति की लपटों में तब्दील करके पेश किया जा रहा है और यहीं पर आकर फिल्म इस कैंपस को जातिवाचक विश्वविद्यालय में तब्दील कर जाता है. जेएनयू की सारी विशिष्टता, स्वतंत्र व्यक्तित्व का निर्माण और जीवटता चैरिटी की जिकजैक में जाकर फंसने-उलझने लग जाती है. ऐसे में जो लोग मार्क्सवाद का मशीनी पाठ करने के अभ्यस्त रहे हैं, उन्हें कई ऐसी बारीकियां फिर भी नजर आ जाएगी जो इसके भीतर बचे रहने के संकेत देंगे लेकिन प्रगतिशीलता और जातिवाद की कॉकटेल, चैरिटी और सामतंवाद की टूटी-फ्रूटी..इसका क्या किया जाए ?

जाहिर है, जब हम राजनीति के हिस्से को आनंद राय की सुनी-सुनाई बातों का फिल्माई संस्करण मान रहे हैं तो इस हिस्से को भी उसी खाते में डाल दें लेकिन असल जिंदगी में जो संदर्भ पहले इसी सिनेमा की तरह दिखाई दिए, यानी सिनेमा बनने से ठीक पहले हूबहू वैसे ही जिसे कल तक हमने पसीना चुंहचुहाते देखा नहीं, उसमे शामिल हुए थे और अब अचानक से हम उन सबके दर्शक हो गए और वो अभिनेता, इस सच का क्या किया जाए ? 16 दिसंबर की दिल्ली की गैंग रेप घटना पर जेएनयू छात्र संगठन के विहाफ पर जिन चेहरों को जंतर- मंतर पर नारे लगाते देखे और जिनकी तस्वीर इंडियन एक्सप्रेस में देखे, अब वो चेहरे एक्टिविज्म के एक्टर बनकर रुपहले पर्दे पर हैं, इसकी व्याख्या कैसे की जाए ?

जेएनयू को एक विश्वविद्यालय नहीं, अवधारणा और विचार के रुप में देखने की काबिलियत तो हममे से कईयों के पास है और इसके अचानक से शहर के बीचोंबीच आ जाते हुए देखने की तीक्ष्ण दृष्टि भी लेकिन जिस कैंपस की राजनीति की चौड़ी सड़क, पर्सनल इच्छाओं और आकांक्षाओं की गली वहीं पर जाकर खुल जाती है जहां से कि उनका सदा से न केवल विरोध रहा है बल्कि उन्हें खत्म करना ही आखिरी मकसद भी...आनंद राय साहब के प्लास्टर झाड़ दिए जाने के बावजूद भी जेएनयू की दीवारों पर ये सवाल तो फिर भी बचे ही रहेंगे न कि - थक चुके, हार चुके और काफी हद तक उब चुके पूंजीवाद को प्लेजर की नयी प्लेट सजाने के अलावे प्रतिरोध की राजनीति आखिर क्या कर रही है और यहां रहकर जिस जाति,धर्म,सामंती रवैया ध्वस्त करने की मुठ्ठियां तानकर नारे लगाए...ध्वस्त तो उनमे से कुछ नहीं हुआ, न ही पूंजीवाद बल्कि वो सबके सब संस्कृति उत्पाद का हिस्सा बनकर नए किस्म की रिसाइक्लिंग प्रोसेस में समाती गयी. 


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3 Response to 'रांझणा का जेएनयूः क्रांति इतनी पर्सनल तो नहीं होती ?'
  1. ravindra vyas
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/06/blog-post_23.html?showComment=1371968041938#c6374538468194344359'> 23 जून 2013 को 11:44 am

    bahut achha vishleshan!

     

  2. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/06/blog-post_23.html?showComment=1371992019737#c3764920092100717488'> 23 जून 2013 को 6:23 pm

    लेख पढ़कर पिक्चर देखने का मन करने लगा। लेख पूरा समझने के लिये पिक्चर देखना जरूरी है।

    बाकी पिक्चर में जे.एन.यू.मेरीगंज जैसा दिखाया है- सच्ची? देखना है।

    मामू का ढाबा वाले मामू की तर्ज पर कुंदन आये होंगे जे.एन.यू. में! :)

     

  3. दीपक की बातें
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/06/blog-post_23.html?showComment=1371994088735#c9032473008688780743'> 23 जून 2013 को 6:58 pm

    badhiya hai sir

     

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