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मूलत: प्रकाशित- जनसत्ता; 14 जून  2013

इसमे दो राय नहीं है कि दिल्ली सरकार ने तिपहिया वाहन पर किसी भी तरह के पोस्टर नहीं लगाने और "कलर कोड" जारी करने की जो बात उठाई है, वह राजनीति से प्रेरित और आम आदमी पार्टी के प्रचार अभियान को हतोत्साहित करने के लिए है. वरना दिल्ली सरकार के नुमाइंदों को बेहतर पता है कि तिपहिया के अलावा सड़क, संस्थान और सार्वजनिक स्थलों की जानकारी देनेवाले सरकारी बोर्ड और सूचना पट्ट भी किस तरह पोस्टरों से रंग दिए जाते हैं. कभी विश्वविद्यालय और कॉलेज परिसरों के आसपास मेट्रो और सार्वजनिक स्थलों की बोर्ड को लेकर मुआयना करें तो अंदाजा लगाया जाएगा कि कैसे नियमों की सरेआम धज्जियां उड़ाकर  सरकारी पार्टी के लोग पोस्टर चिपकाने का काम करते हैं.


किसी भी शहर में अलग-अलग सूचनाओं के लिए जो होर्डिंग और "कीऑस्क" लगाए जाते हैं वे महज सूचना का हिस्सा नहीं होते. उसकी अपनी एक स्वतंत्र पहचानसंस्कृति और भाषा होती है. इन पर मनमाने ढंग से पोस्टरों के चिपकाए जाने से न केवल लक्ष्य सूचनाएं बाधित होती है, बल्कि देखकर ही एक अराजक संस्कृति के पसरने का बोध होता है. उत्तरी दिल्ली के मुकर्जीनगर इलाके में प्रशासनिक सेवाओं के कोचिंग संस्थानों के बड़े-छोटे पोस्टरों के अलावे कहीं कुछ आसानी से दिखाई ही नहीं देते. जिनके अपने मकान है, उसके लिए उन्हें पैसे मिलते होंगे और जो नगरपालिका के होर्डिंगों की जगहें हैं, उसके लिए भी शायद पैसे चुकाने होते होंगे. टेलीफोन से लेकर बिजले के खंभेसार्वजनिक बोर्ड और इमारतों पर जो पोस्टर और बैनर लगाए जाते हैंसार्वजनिक शौचालय की दीवार बाहर से दिखाई नहीं देती, उस पर सरकार ने कब कार्रवाई की है ? ये कोचिंग संस्थान देश के आइएस-आइपीएस पैदा करने के दावे करते हैं और देखिए कि कैसी अराजकता और सूचना के स्तर पर अपने संस्थान के आगे दहशत फैलाने का काम करते हैं.



दिल्ली विश्वविद्यालय में चुनाव और दाखिले के समय पोस्टर चिपकाने की ये हरकतें इस हद तक बेहूदी हो जाती है कि दीवार की एक इंच जगह भी कोरी दिखाई नहीं देती और न ही सड़क का रंग काला दिखाई देता है. बदहवाश सा एक ही उम्मीदवार के एक ही जगह सैंकड़ों पोस्टर चिपका दिए जाते. लिहाजा तीन-चार साल पहले विश्वविद्यालय प्रशासन ने "डेमोक्रेसी वॉल" नाम से परिसर की दीवारें निर्धारित की और निर्देश दिया कि इसके अलावे कहीं और पोस्टर नहीं लगने चाहिए. लेकिन कुछ समय बाद सब पहले जैसा.  कमोवेश यही हाल पूरे शहर का है.


हर संस्थानविभागसार्वजिनक स्थलों को बताने-समझाने के लिए उनके खास रंग के बोर्ड और सूचना पट्ट रहे हैं. मसलन दिल्ली में ब्लू और लाल साथ देख कर ही आप दिल्ली पुलिस की बोर्ड का अंदाजा लगा लेते हैं, हरे-पीले से सीएनजी का बोध होता है. सिर्फ हरे और सफेद से वन विभाग का. लेकिन अब ये रंग अपने खास संदर्भ और अर्थ खो दे रहे हैं. तिपहिए वाहन पर "आप" के पोस्टर की छोड़िएदिल्ली पुलिस के वाहनों पर एयरटेल के विज्ञापन चिपके हैं. कई बार बसों पर बड़े विज्ञापन बोर्ड लगे होते हैं या फिर विज्ञापनों से एक तरह से ढंकी होती है. रिहायशी कॉलोनियों के बोर्ड पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों से लेकर उन सारे ब्रांडों के होर्डिंग लगे होते हैं, जिनमें कॉलोनी के नाम इतने छोटे होते हैं कि पढ़ने में न केवल मुश्किल होती है बल्कि इन ब्रांड "सिग्नेचर कलर" के आगे खो जाते हैं.

हर शहर की एक पहचान होती है, जो उसके साइनबोर्ड से लेकर सूचनापट्ट आदि से भी प्रेषित होती है. इस तरह के पोस्टर और होर्डिंग उस शहर की इस पहचान को बाधित करते हैं. देश के किसी भी हिस्से में कुछ लोग रंगों के आधार पर संस्थानों के बोर्डसंकेतों को पहचानते हैं, क्योंकि वे पढ़ नहीं सकते. अगर सभी बोर्ड में वोडाफोन या एयरटेल के लाल, बैकों के ब्लूलालसफेद और रियल इस्टेट के सीमेंट-हरे रंग के होंगे तो वे रंगों के आधार पर पहचान पाने में अक्षम हो जाएंगे.

सरकार अगर आम आदमी पार्टी के बहाने इन सब बारीकियों को ध्यान में रखते हुए कोई ठोस कदम उठाने जा रही है और उसके पास स्पष्ट रणनीति है कि शहर में बैनर और पोस्टरों के लगाए जाने को लेकर क्या तरीके और प्रावधान हों, तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए. ऐसे में आम आदमी पार्टी को भी ऑटो के पीछे पोस्टर चिपकाने से बाज आना चाहिए, वहीं थोड़ी-सी वह जगह होती है, जहां पारदर्शी प्लास्टिक लगा होता है  और पीछे चल रहा व्यक्ति भी यह देख सकता है कि ऑटो में बैठी सवारी के साथ कुछ गलत तो नहीं हो रहा. यह सुरक्षा की दृष्टि से भी जरुरी है. आम आदमी पार्टी को सरोकारों के दावे के बीच इस पर भी विचार करने की जरुरत है. दूसरी ओर, दिल्ली सरकार को उन पोस्टरों पर भी गौर करना चाहिए जो शर्तियां ईलाज से लेकर मर्दांनगी बढ़ानेयौवन लौटाने और जोश बढ़ाने के झूठे दावे करते नजर आते हैं.

तस्वीर 1 साभार- द इंडियन एक्सप्रेस


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3 Response to 'आम आदमी पार्टी के ऑटो विज्ञापन के बहाने'
  1. ब्लॉग बुलेटिन
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/06/blog-post_14.html?showComment=1371191553828#c2233249658887608062'> 14 जून 2013 को 12:02 pm

    ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन रक्तदान है महादान - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

     

  2. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/06/blog-post_14.html?showComment=1371198780384#c4773437432683839350'> 14 जून 2013 को 2:03 pm

    सही लिखा! इस पर तो रवीश कुमार को अपने शो में आपत्ति उठानी चाहिये। तमाम साहित्य भी चिपकता है पोस्टर में भाई!

     

  3. प्रवीण पाण्डेय
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/06/blog-post_14.html?showComment=1371200515872#c3876740619056960374'> 14 जून 2013 को 2:31 pm

    कितना संवाद रुक जायेगा तब तो।

     

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