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मैं( अशोक वाजपेयी) अपना आत्मविश्वास तो बहुत पहले खो चुका हूं, अब तो मेरे पीछे बैठे इन युवाओं( हमलोगों की तरफ इशारा करते हुए) को आत्मविश्वास हासिल करना है. जाहिर है अशोक वाजपेयी जैसे आभिजात्य कवि-आलोचक ने ये बात किसी कॉमेडी सर्कस या हंसोड़ दंगल में नहीं कही. ये बात उन्होंने भारतीय भाषा कार्यक्रम,सीएसडीएस से शुरु होनेवाली पत्रिका प्रतिमान के आलोक में समय,समाज और संस्कृति पर होनेवाली परिचर्चा के दौरान कही जिसमे समाजशास्त्री आशीष नंदी से लेकर राजनीति विश्लेषक योगेन्द्र यादव, इतिहासकार शाहिद अमीन, राजनीतिक वैज्ञानिक आदित्य निगम सहित देश के अलग-अलग हिस्से से आए करीब चालीस समाज वैज्ञानिक और अध्येता मौजूद थे. जाहिर है अशोक वाजपेयी जिस हल्केपन से ये बात कही, उनका इरादा इन अध्येताओं को चुटकुला सुख नहीं देना था बल्कि हम जैसे युवा की ओर से पूछे गए सवाल का उपहास उड़ाने के लिए था. लेकिन ऐसा करते हुए उन्होंने शायद ये बात समझ नहीं आयी होगी कि उनकी इस हरकत से हिन्दी देव-आलोचकों को लेकर एक बार फिर वही राय बनी जो कि वर्षों से बनी हुई है. उनकी इस हरकत से एक बार ये स्पष्ट हो गया कि हिन्दी के इन देव-आलोचकों के प्रवचन दिए जाने के बाद आप सवाल करते हैं( वैसे तो हिन्दी के सेमिनारों में इस तरह से सवाल किए जाने की परंपरा अभी तक विकसित नहीं हुई लेकिन आयोजक अगर ऐसा प्रावधान रखते भी हैं तो) तो आपका खुलकर उपहास उड़ाया जाएगा, अगर अपनी मां की भाषा में कहूं तो आपके सवाल को पाद धरकर उड़ा दिया जाएगा. अशोक वाजपेयी ने ऐसा ही किया.

जिस सत्र में अशोक वाजपेयी अपनी बात रख रहे थे उसमें सवाल भाषा, विषयवस्तु से हिलते-टहलते पठनीयता तक आ गयी और अशोक वाजपेयी ने इस पर बात करने के क्रम में डॉ. नगेन्द्र के लिखे की चुटकी ली. ये वही डॉ. नगेन्द्र हैं जिनका एक जमाने में सिर्फ हिन्दी विभाग ही नहीं पूरे दिल्ली विश्वविद्यालय में आतंक रहा है और संभव है कि स्वयं अशोक वाजपेयी उनके आतंक से आतंकित रहे हों. अशोक वाजपेयी ने डॉ. नगेन्द्र के लिखे को अपठनीय करार दिया और आगे बहुत व्यंग्य में कहा कि पता नहीं इससे क्या निकाला भी जा सकता है ? देश और दुनिया के साहित्य की तथाकथित गंभीर समझ रखनेवाले अशोक वाजपेयी के सामने पठनीयता और दुरुहता को लेकर सैंकड़ों उदाहरण होंगे लेकिन माहौल देखकर और सीएसडीएस की दिल्ली विश्वविद्यालय से बहुत ही कम दूरी जानकर शायद लगा हो कि यहां उनके चेले-चपाटी होंगे तो क्यों न चुटकी लेकर पिनका जाए. वैसे भी अशोक वाजपेयी अपने पूरे स्वभाव में इस तरह की मसखरई के लिए ख्याति प्राप्त आलोचक -वक्ता रहे हैं. बहरहाल,

अशोक वाजपेयी ने जब अपनी बात पूरी कर ली और लोगों ने उनसे सवाल करने शुरु किए जिनमें कि एक मैं भी शामिल था तो एक तो उन्होंने अपने हिस्से की जिम्मेवारी शाहिद अमीन के आगे डालनी चाही लेकिन जब उन्हें भी बोलने कहा गया तो बालविहीव सिर के बीच का हिस्सा खुजलाते हुए  पहली पंक्ति में ही घोषित कर दिया- मुझे तो याद भी नहीं है कि लोगों ने क्या सवाल किए ?  मुझे क्या किसी को भी हैरानी हो सकती है कि जहां भाषा,साहित्य,संस्कृति और समाज को लेकर इतनी गंभीर बहस चल रही हो वहां अशोक वाजपेयी जिसे कि लिटरेचर फेस्टीवलों ने ब्रांड एम्बेस्डर बना दिया हो ने सवाल ध्यान में रखने तक की जरुरत महसूस नहीं की. नहीं कि तो नहीं, इस लायक भी नहीं समझा कि उस पर अपनी राय दे सकें. इतना ही नहीं, इन सवालों पर कुछ भी बोलने के बजाय अलग से एक स्वतंत्र लघु प्रवचन पेश कर दिए जिसका कि सवालों से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं था.

हमने अशोक वाजपेयी की इस समझ पर सवाल किए थे कि एक तरफ तो आप कह रहे हैं कि हिन्दी समाज बौद्धिक और सांस्कृतिक रुप से बहुत विपन्न है और दूसरी तरफ आपका कहना है कि कविताओं में बाजारवाद पर, भूमंडलीकरण से लेकर बाकी मुद्दों पर बहुत गंभीरता से बातें हो रही है तो इस विरोधाभास को लेकर आपकी क्या राय है, कहीं ऐसा तो नहीं कि हिन्दी में लोग इन मुद्दों पर बात तो जरुर कर रहे हैं लेकिन इसमें एकहरापन है. मसलन हिन्दी सेमिनारों में जाने से पहले ही हम हिन्दी चालू फिल्मों की कहानियां को लेकर अंदाजा लगा लेते हैं कि यहां सिरे से बाजार को कोसा जाएगा और इनसे जुड़े मुद्दों पर विश्लेषण के बजाय अर्थ स्थिरीकरण होगा और दूसरा कि क्या पठनीयता का संबंध परिवेश और काल संदर्भ से नहीं है ? आखिर ऐसा क्यों है कि एक छात्र जो चार-पांच महीने पहले देरिदा-फूको पढ़ता है( अपूर्वानंद के हिसाब से कोई नहीं पढ़ता है और जाहिर है ये बात उन्होंने अपने अनुभव के आधार पर ही कहे,ये अलग बात है कि हममे से कुछ छात्रों को उनसे बहुत कुछ पढ़ने-लिखने और समझने का मौका मिला. बॉमन से लेकर ग्राम्शी, वॉल्टर बेंजामिन सबों के बारे में पहली बार उन्हीं से सुना-समझा. समझ का बड़ा हिस्सा अपूर्वानंद जैसे शिक्षक के विभाग में होने की वजह से ही बनी है.खैर) वही परीक्षा के पन्द्रह दिन पहले चैम्पियन और अशोक प्रकाशन जो कल तक उसके लिए कूड़ा होता है, वो पठनीय हो जाता है. मतलब ये कि क्या पठनीयता का संबंध सिर्फ भाषाई कुशलता और संप्रेषणीयता भर से है. संदर्भ के तौर पर मैंने बजट के दौरान हिन्दी चैनलों के मुकाबले अंग्रेजी चैनल बेहतर समझ आने की बात कही थी. जाहिर है कि जिस तरह से अशोक वाजपेयी बाकी के सवालों को भूल गए, उसी तरह से इस सवाल को भी. लेकिन तंज अंदाज में,उपहास में और व्यंग्य में हम युवाओं पर टिप्पणी करना याद रहा.

समाज विज्ञान और भाषा को लेकर हो रही परिचर्चा के बीच इस तरह से प्रश्नकर्ता को युवा और खुद को वृद्ध बताने की क्या जरुरत पड़ गई, ये बात मुझे अचानक से आने की वजह से समझ नहीं आयी और मुझे समझने के लिए समाज विज्ञान पर आधारित इस परिचर्चा से अपने को निकालकर उसी टिपिकल हिन्दी संगोष्ठी में ले जाना पड़ा जहां देव-आलोचकों से सवाल किए जाने की परंपरा नहीं रही है..गर किसी ने सवाल कर भी दिए तो उसे लौंड़े-छौंड़े मानकर खिल्ली उड़ाते हुए चलता कर दिया जाता है. सवाल है कि ऐसे देव-आलोचक साहित्य  की दुनिया में तो बतौर सत्ता काबिज हैं लेकिन परिचर्चा में शामिल होते ही वृद्धा पेंशनवाली मुद्रा में क्यों आ जाते हैं और अक्सर ऐसे माहौल बनाने में सफल हो जाते हैं जिसमें बुजुर्ग मानकर नजरअंदाज कर देने की नसीहतें मिलनी शुरु हो जाती है.  ये कुछ-कुछ उसी तरह का है जैसे हमारे हिन्दी सिनेमा में किसी इज्जतदार की महफिल में हमारा कुली पहुंच जाता है और दरबान इसे धक्के मारकर बाहर करो जैसे सीन फिल्माए जाते हैं. उस वक्त संवेदना उस कुली के बजाय इज्जतदार के प्रति ज्यादा होता है. ऐसे में ये स्वाभाविक सवाल है कि आखिर क्या कारण है कि हिन्दी समाज की दुनिया विमर्श की दुनिया बनने के पहले ही युवा-वृद्ध के खांचे में विभाजित हो जाते हैं. क्या विमर्श की दुनिया में इस तरह के बायलॉजिकल सेपरेशन जरुरी है और बिना इसके हम बात नहीं कर सकते. ऐसे में तो अगर स्त्री सवाल करे तो वो गदहइया( अशोक वाजपेयी के जुमले से उधार) करार दी जाएगी और गर दलित से सवाल कर दिया तो बाप मर गया ठंड से और बेटा दाम पूछे एयरकंडीशन का जैसे जुमले उछाले जाएंगे या फिर वैसा व्यवहार किया जाएगा ?

मुझे लगता है कि अशोक वाजपेयी जैसे देव आलोचक का युवाओं के प्रति इस तरह का रवैया अपनाने की एक ठोस वजह शायद ये भी रही होगी कि युवा टिप्पणीकारों की एक बड़ी जमात उनके सान्निध्य में लगभग चाटुकारों जैसा व्यवहार करती आयी है, ऐसे में उन्होंने युवा को जातिवाचक संज्ञा के रुप में मान लिया है और उस हिसाब से उनसे पेश आने की एक पैटर्न विकसित कर ली है. संभव है कि उनका ये नजरिया आए दिन चैम्पियन मार्का युवा विशेषांक से गुजरती हुई पत्रिकाओं पर जाती रही होगी और इन्हें गुर्गे में तब्दील किए जानेवाले मास्टरमाइंड के प्रति हिकारत के भाव पनपते होंगे जिसका प्रतिबिंबन इस परिचर्चा में दिखा. एक बात, दूसरी बात ये कि ये एक किस्म का सामंती एप्रोच नहीं तो और क्या है कि आप चाहे जो भी सवाल कर लें, हम उसकी नोटिस नहीं लेंगे और फिर बाद में जो मन होगा, वही बात करेंगे. नहीं तो उसी परिचर्चा में आशीष नंदी, शाहिद अमीन, अभय कुमार दुबे, चारु गुप्ता सवालों को, मुद्दे को नोट कर रहे थे और एक-एक करके या तो उसकी जवाब दे रहे थे या फिर मौका मिलने पर टिप्पणी कर रहे थे.

मेरे ख्याल से अशोक वाजपेयी के जिंदगी में ऐसे सैंकड़ों सेमिनार और नजारे आए होंगे जहां एक से एक विद्वत जनों से बहुत ही सामान्य पाठक,श्रोता ने सवाल किए होंगे लेकिन उन स्थापित लेखक-वक्ताओं ने इस परिचर्चा की तरह ही ठहरकर बड़े ही अदब से जवाब दिए होंगे..फिर ऐसा क्या है कि अशोक वाजपेयी ने उसे कभी भी अपने व्यक्तित्व का हिस्सा नहीं बनाया. इसे उनके व्यक्तित्व की कमजोरी के बजाय टिपिकल मठाधीशी देव-आलोचना परंपरा के प्रति कट्टर प्रतिबद्धता कहना ज्यादा सही होगा क्या ?
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2 Response to 'मैं अशोक वाजपेयी, अपना आत्मविश्वास खो चुका हूं'
  1. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/02/blog-post_27.html?showComment=1361991664782#c2838504741354893317'> 28 फ़रवरी 2013 को 12:31 am

    ऐसे देव-आलोचक साहित्य की दुनिया में तो बतौर सत्ता काबिज हैं लेकिन परिचर्चा में शामिल होते ही वृद्धा पेंशनवाली मुद्रा में क्यों आ जाते हैं
    खूब लिखा। बाकी देव आलोचक वही करते हैं जो मां की भाषा में तुमने बताया।

     

  2. प्रवीण पाण्डेय
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/02/blog-post_27.html?showComment=1362194641263#c7870811242386988060'> 2 मार्च 2013 को 8:54 am

    बड़े आत्मविश्वास से कही गयी आत्मविश्वासहीनता की स्थिति कुछ और ही इंगित करती है, निहितार्थ समझने होंगे, संकेत स्पष्ट हैं।

     

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