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हम भी बात कलेंगे. पापा,हम भी बात कलेंगे. मम्मी हमको भी हैलो बोलना है. हम हैलो बोलके फोन वापच कल्ल देंगे. विनीत चाचा छे हम भी बात कलेंगे. हैलो, विनीत चाचा..क्या कल्ल लहे हैं आप ? मैं बाबू, मैं होमवर्क कर रहा हूं और तुम क्या कर रहे हो ? हम कुच नहीं कल्ल लहे हैं..अरे बाबू, दो फोन. कोई फोन करता है तो तुम चाटने लग जाते हो उसको, इधर दो..नय,हम भी बात कलेंगे, हम भी,हम भी,हम भी, मम्मी हम भी.

सुबह सात बजे से लेकर रात के ग्यारह-साढ़े ग्यारह बजे जब भी घर फोन करो, क्षितिज की ये आवाज कॉलर ट्यून की तरह पीछे से सुनाई देती है. कई बार हम उसकी इस आदत पर झल्ला जाया करते हैं. ठीक उसी तरह जैसे किसी बूढ़े-बुजर्ग की मोबाईल में सेवा देनेवाली कंपनी या घर का कोई शरारती बच्चा अपने मन से "चिकनी चमेली" या "हलकट जवानी" की कॉलर ट्यून लगाता देता है और वो झल्ला उठते हैं. कई बार बहुत ही जरुरी बात करनी होती लेकिन वो शुरु हो जाता- हम भी बात कलेंगे. भैय्या, भाभी, मां उसकी इस आदत से अक्सर परेशान होकर कहते- रुको, जब क्षितिज सो जाएगा तब दोबारा कॉल करते हैं. रुको, दूसरे मोबाईल से कॉल करते हैं, दूसरे कमरे में जाकर कॉल करते हैं, घर से बाहर निकलते हैं तो कॉल करते हैं.....मेरी मां कहती- ये क्षितिज नहीं, ठाकुरबाड़ी का घंटा है, कभी भी फोन करो तो पहिले इसको हिलाना पड़ेगा. मां कहती, रुको तुमको भी भेज देते हैं विनीत चाचा के पास,रहना वहीं. हम सब कोई नहीं रहेंगे. बोलो, जाएगा ? उसकी आवाज आनी बंद हो जाती. मैं यहां दिल्ली में बैठकर अनुमान लगा रहा होता- बेचारा,पिद्दी सा बच्चा डर गया होगा. मां और दादी से दूर होकर भला कहां जी पाएगा ? पापा तो अक्सर उसे इस तरह से डराते कि मुझे खुद भी डर लगा रहता है कि बड़ा होने पर क्षितिज से उसकी क्लास टीचर उनकी तस्वीर दिखाकर पूछेगी कि ये कौन है तो कहीं वो पापा की तस्वीर देखकर ये न कह दे- टेर्ररिस्ट( आतंकवादी).

पिछले दो दिनों से उसकी कॉलर ट्यून बजनी बंद हो गयी है. इन दो दिनों में मैंने कम से कम बारह से चौदह बार भैय्या,भाभी,मां और पापा से बात की होगी. पीछे से कोई आवाज नहीं. एकदम ही सन्नाटा. हम जो भी बात करते वो लोग सुन रहे होते और मां को बार-बार ऐं,ऐं नहीं बोलना पड़ता. क्षितिज की पीछे से कोई आवाज न आने से लगता है जैसे जमशेदपुर शहर का सबस बड़ा शोर वही है.

कल पापा का फोन आया.कैसे हो, क्या सब चल रहा है और फिर धीरे-धीरे बात क्षितिज तक चल गयी. उसकी हरकतों पर बात करते हुए लग रहा था कि अब वो रो देंगे. बदमाशिए बहुत करता है. बहुत मना करते रहे लेकिन मानता कहां है, पैर में चक्करघिन्नी लेकर घूमता है. एक मिनट स्थिर नहीं. अब बस जब दूकान जाने लगते हैं तो बेड पर पड़े-पड़े रोता है- बाबा हम भी तलेंगे,हम भी जाएंगे..हमको भी ले तलिए. मेरे पापा के भीतर भावनाओं की बहती एक नदी है जिसे मां ने सालों पहले सरस्वती घोषित कर दिया है और मैं भी उसे लुप्त नदी मानकर बैठ गया था..लेकिन इधर कुछ महीनों से देखता हूं कि वो नदी बिना शोर किए बहती चली जा रही है, फिर से पानी का सोता फूटा है या फिर हम उस तह तक जाकर समझ नहीं सके, पता नहीं लेकिन उस सोते से मुझे कई बार फोन पर ही हहाती हुई सी आवाज सुनाई देती है. खैर,

क्षितिज, जिसे कि मैंने उसकी दो साल की आयु में सिर्फ एक बार देखा है. दुबला-पतला, अपनी मां की ही तरह सुंदर,बड़ी-बड़ी आंखें और रग-रग में बदमाशी भरी हुई. आप पूरे घर को सजा-सवांर दें, झाडू-पोछा मार दें, उसे उस सजे-संवरे घर को "घटनास्थल", "दंगाक्षेत्र" में तब्दील करने में दस मिनट भी नहीं लगेंगे. उसका मन करेगा तो उन तस्वीरों के आगे भी अपनी धार छोड़ सकता है जिसके आगे मां गंगाजल चढ़ाया करती है. बहुत बदमाश है, बहुत बदमाश की जयकार से घर गूंजता रहता. दीदी, मां,भाभी सबके सब एक सुर से उसके इस यश का गान करते और बीच-बीच में बेचारे को पुरस्कार( धमाधम) भी मिलते. मैं चुपचाप देखता रहता, मुस्कराता रहता. मेरी किताबें पलटता रहता और नामवर सिंह की "दूसरी परंपरा की खोज" के पन्ने पलटते हुए जोर से बोलता- ए,बी,छी,डी.मन किया कि उसकी इस हरकत को कैमरे में कैद कर लूं,नामवर सिंह से इस पर प्रतिक्रिया लूं या फिर यूट्यूब पर इसकी वीडियो डालकर लोगों के कमेंट्स का इंतजार करुं. दिनभर मेरे बैग में पता नहीं क्या-क्या खोजता रहता और कुछ निकालकर कहता- दीदी, ये क्या है ?

भाभी मुस्कराती देख पूछती- आपको गुस्सा नहीं आता है इसकी बदमाशी देखकर ? मैं कहता नहीं तो और उल्टे उसे जो जैसे बिगाड़ रहा होता, करने देता. हां देर रात जब वो जोर-जोर से रोता तो जरुर मन करता कि पुरस्कार दूं. वैसे मैं भाभी को इतना जरुर कहता- इसकी वीडियो बनाकर किसी हेल्थड्रिंक कंपनी को दे दें, आपको वो बहुत पैसे देगा. इतनी एनर्जी कहां से आती है इसमे. बिल्कुल भी सोता नहीं, दिनभर हमलोगों के पीछे-पीछे डोलता फिरता है. मैं दिनभर में उसे दो-चार बार अचानक गोद में उठाता और जोर से किस करके वापस जमीन पर उतार देता..वो अवाक सा रह जाता फिर अपने कालजयी कर्म में लग जाता.

भाभी ने जब फोन पर बताया कि क्षितिज का पैर टूट गया है तो ये सब सोचकर मन उदास हो गया. वो अपनी मां के साथ लुकाछिपी खेल रहा था. कहां घुस गया,पैर में क्या लग गया कि अचानक से फिसलकर घिर गया. पहले तो मामूली दर्द मानकर सहज करने की कोशिश की लेकिन फिर डॉक्टर ने बताया कि पैर ही टूट गए हैं. हालांकि ये कोई बड़ी बात नहीं है, महीने-दो महीने में सबकुछ पहले की तरह सामान्य हो जाएगा और उसकी कॉलर ट्यून से फिर से मुझे परेशानी होगी लेकिन अभी उस बेचारे को कितनी बेचैनी होती होगी, कहीं आ-जा नहीं सकता. किसी के पीछे लग नहीं सकता और जो उसे जितनी चॉकलेट दे,संतोष करना होगा..अपनी दीदी खुशी और सौम्या से लड़ नहीं सकेगा.

अब घर बात करते हुए पीछे से कोई शोरशराबा नहीं होता है. आप जिससे बात करना चाहें, वो आसानी से बात करेंगे..हम भी बात कलेंगे की जिद और आपकी बातचीत में दखल देनेवाला कोई नहीं मिलेगा. क्षितिज अपने बिस्तर पर लेटा होता है, रोता है, मां से हमेशा पास रहने की जिद करता है. लेकिन शांत होकर क्षितिज ने घर में जो सन्नाटा पैदा किया है, उससे घर के लोगों के बीच अजीब किस्म की बेचैनी हो गई है. वो दूकान जाते वक्त अक्सर पापा के पैर पकड़कर ही खड़ा हुआ करता- बाबा, हम भी तलेंगे और पापा मां या भाभी से गोद लेने कहते. कभी प्यार से पुचकारकर वापस बिस्तर पर बिठा देते. अब फोन पर बस इतना ही कहते हैं- बहुत चंचल है. कैसे कहें कि रोज दूकान पहुंचने में लेट करनेवाला क्षितिज बाबा के समय पर पहुंच जाने पर भी समय पहले से कहीं ज्यादा खराब कर रहा है ? कैसे कहें कि उसका हम भी तलेंगे कि जिद और उनकी झल्लाहट के बीच एक लत पकड़ती जा रही थी..और इसके बिना बाबा और पोता दोनों बेचैन है.

क्षितिज की ढेर सारी तत्वीरें मेरे मोबाइल में थी. स्क्रीन खराब होने की स्थिति में, एक भी तस्वीर सेव नहीं कर पाया..बहुत मन था कि इस पोस्ट के साथ उसकी कोई प्यारी सी तस्वीर लगाउं लेकिन फोटो खींचने पर रोनेवाले क्षितिज की तस्वीर हम नहीं डाल पा रहे..
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5 Response to 'वो नामवर सिंह की किताब पलटता,जोर से बोलता- ए,बी,छी,डी'
  1. Prabhat Ranjan
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/09/blog-post_27.html?showComment=1348727456673#c2197277342051802846'> 27 सितंबर 2012 को 12:00 pm

    क्या लिखते हैं आप विनीत जी. रश्क होता है!

     

  2. रचना
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/09/blog-post_27.html?showComment=1348733913019#c5853330190717809758'> 27 सितंबर 2012 को 1:48 pm

    i hope the child gets well soon
    an excellent piece as blog post

     

  3. naveen raman
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/09/blog-post_27.html?showComment=1348740762799#c2092430462600261030'> 27 सितंबर 2012 को 3:42 pm

    भावुक कर देते हो.मन की अनकही कह देते हो.छू लेते हो भावनाओं को.

     

  4. Dipti
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/09/blog-post_27.html?showComment=1348748937809#c3861910566558433234'> 27 सितंबर 2012 को 5:58 pm

    bahut bhawuk

     

  5. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/09/blog-post_27.html?showComment=1348799108579#c6252700123659703365'> 28 सितंबर 2012 को 7:55 am

    बहुत आत्मीय पोस्ट! बच्चे को शुभकामनायें कि जल्दी ही फ़िर से भागने-दौड़ने लगे।

     

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