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आज वीडियोकॉन टावर,झंडेवालान में "आजतक" समाचार चैनल का आखिरी दिन है. इसके बाद से ये चैनल बल्कि टीवी टुडे नेटवर्क कंपनी नोएडा में बनी अपनी दैत्याकार बिल्डिंग में शिफ्ट हो जाएगी. आजतक के इन्टर्न के तौर पर मैंने इस इलाके में कोई तीन महीने गुजारे. ढेर सारी यादें हैं, ढेर सारी कसक,सपने, उम्मीदें, तमीज और बदतमीज होने की प्रक्रिया से गुजरना हुआ. लिहाजा लप्रेक( लघुप्रेम कथा) लिखे बिना अपने से रहा नहीं गया. तो आप भी पढ़िए. टीवी टुडे के अधिकारियों से अपील और उम्मीद है कि इसमें वो किसी भी तरह की वैधानिक पेंच न खोजने लगेंगे- विनीत

नीलिमा, चल न आज शाम वीडियोकॉन टावर चलते हैं. वीडियोकॉन टावर, अचानक ? लेकिन हमने आज शाम तो बर्फी की प्लान बनायी  थी न. तूने मीडियाखबर पढ़ा नहीं क्या ? क्यों क्या हो गया ? अरे आज वीडियोकॉन में आजतक का आखिरी दिन है. आखिरी दिन यानी हमारे टीनएज के सपनों की ठिकाने के बदल जाने की जगह. याद है, जब भी हम करोलबाग की तरफ से गुजरते थे,मैं तुम्हें दूर से ही वीडियोकॉन टॉवर के उन फ्लोर की तरफ उंगली से इशारा करके बताता था- इसी पर आजतक की ऑफिस है. हम मास कॉम करेंगे और उसके बाद यहीं काम करेंगे और थोड़े ही वक्त के लिए सही, किया भी. हां-हां याद है निखिल..और सोच न तू इस बिल्डिंग को लेकर कितना पागल रहता है अब भी. हमें जाना होता है सीपी और तू बीच में ही उतरकर इसके पास से गुजरता है. बिल्डिंग की मेन गेट पर तेरी आंखें ऐसे जाकर धंस जाती है कि खोदकर किसी न किसी परिचित को ढूंढ निकालेगी.

 और तू भी तो नीलिमा. वॉलेट में चाहे जितने पैसे हों, किसी न किसी बहाने इस बिल्डिंग में लगी आइसीआइसीआइ की एटीएम मशीन से पैसे निकालने लग जाती है. वैसे तो मैंने एक्सिस और एसबीआई के अलावे किसी दूसरे बैंक की एटीएम से पैसे निकालने कहता हूं तो साफ मना कर देती है- यार निखिल, अपने एक-एक रुपये मेहनत से आते हैं यार, क्यों दूसरी मशीन से निकालकर बीस-पच्चीस बर्बाद करेगा? निखिल, मैं इस बिल्डिंग की एटीएम मशीन से पैसे कहां निकालती हूं बल्कि उन यादों की रिवीजन करती हूं जब दिन में चार-पांच बार मिनी स्टेटमेंट निकाला करते थे फिर भी हिसाब नहीं लगा पाते थे कि आखिर डेढ़ हजार रुपये गए कहां ?

 तू एक ब्लैक कॉफी के लिए भी कह देता था तो सौ रुपये निकालती थी एटीएम से. अपना लो बजट का प्यार भी तो यही डेवलप हुआ न. ऐसे में इतना तो बनता है न कि रुककर पैसे निकाल लूं. मतलब तू यहां पैसे निकालने नहीं,सजदा करने आती है, हा हा. सही है. निखिल, लेने लगा  न मजे. अच्छा फिर तू बता. मैं जब भी कहती हूं कि दिल्ली प्रेस वाली सड़क से चलो, ज्यादा भीड़-भाड़ रहती है, इस साइड..मना क्यों कर देता है ? क्यों कहता है कि उधर गाड़ियां इतनी रफ्तार से चलती है कि टक्कर लगने का डर बना रहता है, जैसे कि दिल्ली में हम बाकी जगह पगडंडियों पर से होकर जाते हैं. ओह नीलिमा, वो तो इसलिए कि इधर से मेट्रो शार्टकट पड़ती है. मेट्रो शार्टकट पड़ती है लेकिन जब आइटेन में होते हो तब भी तो. जहां खिलौनेवाली बाइक का क्रॉस करना मुश्किल हो वहां अपनी गाड़ी अटक जाती है, आसान कहां होता है ? मेरी तो छोड़ लेकिन फिर तू क्यों सामने के पार्क में चक्कर लगाने लग जाती है और बेचैन हो जाती है जैसे कि तेरी इयर रिंग गुम हो गई हो ?

 नीलिमा, अब छोड़ न. इतनी बहानेबाजी से तो अच्छा है न, क्या हम ये एक्सेप्ट नहीं कर सकते कि हमदोनों इस वीडियोकॉन टावर को बहुत मिस्स करते हैं. होगा ये जमाने के लिए भीड़भाड़ का इलाका और एक-दूसरे की मारकाट मचानेवाली ऑफिस लेकिन अपने लिए ये कभी ऐशगाह थी बिल्डिंग. प्यार,करिअर और थोड़े पैसे सब तो यही उगे थे,खिले थे,बढ़े थे. हम इससे गुजरते कहां है, इस कोशिश में होते हैं कि इसे ज्यादा से ज्यादा अपने भीतर भर लें ताकि सात-आठ दिनों तक यादों की रसोई में,धीमी आंच में पकते रहें ख्याल.

 नीलिमा,नीलिमा..यार तू ऐसे आंखों में आंसू लेकर वीडियोकॉन टावर को याद करोगी ? क्या हुआ ? कुछ नहीं निखिल. ये वही पार्क है जहां मैं आकर बहुत रोई थी, उस कमीने प्रोड्यूसर की एटीट्यूड पर जो मुझे बुरी तरह घूरता था और हमें सुनाते हुए कहा था- अरे, लड़कियां मीडिया में सक्सेस होने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है...स्साली सब प्रोस्टी.. मैंने उसी दिन तय कर लिया था कि मुझे नहीं रहना मीडिया में, नहीं बनना एंकर..लेकिन तूने इस पार्क में आकर घंटों समझाया था और एक ही बात कई बार कही- तुम मीडिया छोड़कर मठ जाकर संतई भी करोगी न नीलिमा तो जमाने का नजरिया नहीं बदल सकती. तुम अपने को बना-बदल सकती हो, इन कमीने को नहीं. चुपचाप काम करती हो..पता नहीं तुम्हारी बात का असर था या फिर माहौल कुछ ऐसा बना कि मैं उस दिन के बाद से सिर्फ एंकरिंग के बजाय प्रोडक्शन,पैकेजिंग सबमें दिलचस्पी लेने लगी.

तुम्हारी शिफ्ट खत्म हो गई थी, तुम वापस घर चले गए थे नाइट शिफ्ट में थककर और सुबह आते ही मेरी बकवास और रोना-धोना सुनकर..मैंने उस दिन ऑफिस में बहुत काम किया था लगातार और एक बात कहूं- तीन बार सौ-सौ रुपये निकाले थे इसी एटीएम से और तीन बार कॉफी पी थी. तुम्हारी बातें ब्लैक कॉफी के साथ घुलकर मिंट सा असर कर रही थी. तुम्हारी रोज की आदत थी कि शिफ्ट खत्म होते ही मुझे मेल करने की और हमेशा की तरह उस दिन भी तुमने मेल किया था-

 नीलिमा, मुझे लगता नहीं कि मैं मीडिया की इस वाहियात दुनिया में ज्यादा दिनों तक टिक पाउंगा. मेरी सारी काबिलियत,सारा पढ़ा-लिख इस बात पर आकर टिक गया है कि कमीने और हरामी लोगों के बीच मैं कैसे और बड़ा कमीना बन सकता हूं जबकि मेरी पूरी ट्रेनिंग एस.पी.सिंह से और बेहतर,माथुर साहब से और धारदार लिखने-सोचने और कम से कम कल्पना करने की तो रही ही है. शायद ये मेरा आखिरी दिन हो. मैं मेल पढती जा रही थी और भीतर ही भीतर रोती जा रही थी कि पास बैठे त्रिपाठी सर को अंदाा न लगे कि मुझे कुछ हुआ है. मैं उस दिन कई बार वाशरुम गई और अजीब सा सन्नाटा पाया. लेडिज वॉशरुम के बाहर कोई खड़ी होती,आहट पाकर मुझे इम्बैरेस लगता कि क्या सोच रही होगी कि ये लड़की इतनी देर अंदर क्या करती है लेकिन तुम खड़े होते तो इत्मीनान रहता कि निखिल को इन सबसे फर्क नहीं पड़ता. तुम्हें दिन में ही फोन किया था,ये जानते हुए कि नाइट शिफ्ट करके के बाद तुम थककर सो गए होगे लेकिन तुमने पहली ही बार में फोन उठा लिया था- हां नीलिमा बोलो,सब ठीक तो है न ?

नहीं निखिल,कुछ भी ठीक नहीं है. तुम मुझे चील-कौव्वे के बीच अकेला छोड़कर क्यों जाना चाहते हो और कितनी बड़ी बकवास की है तुमने मेरे साथ..खुद जाने का फैसला ले लिया और मुझे स्त्री विमर्श का ज्ञान देते रहे. तुमने गलत किया निखिल,एक्चुअली यू आर चिटर. यार, क्या सोचकर इतना घटिया मजाक किया मेरे साथ ? तुम चुपचाप सुनते रहे और आखिर में बस इतना कहा- काम ज्यादा है क्या ? श्मशान वाली मंदिर में आ सकती हो जहां हम लंच के बाद जाया करते हैं. मंदिर में तुम फिर ज्ञान देने लगे थे और कहा था- तुम्हारे लिए मीडिया छोड़ना, एक सपने से छूटना है, उससे हमेशा से दूर हो जाना है..याद करो न मीडिया की वो डमी शूट- कैमरामैन निखिल के साथ मैं नीलिमा, दिल्ली आजतक..

क्या तुम इसे यूं ही छोड़ दोगी ? नो, नेवर.. लेकिन मेरे लिए मीडिया छोड़ना,सपने का छूटना नहीं है, उसकी शिफ्टिंग भर है. मैं तुम्हारी तरह स्क्रीन पर पीटीसी न देकर भी अक्सर कहूंगा- कैमरापर्सन नीलिमा के साथ मैं निखिल, जिंदगीभर...है न नीलिमा..तुमने तब आगे कोई जवाब नहीं दिया था और जाड़े की मासूम दुपहरी में मुझसे लदकर सो गयी थी. पुजारी ने हमेशा की तरह यही समझा- ये मीडिया भी गजब की चीज है, अच्छे-भले मासूमों की नींद,चैन और रात छीन लेते हैं.
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2 Response to 'कैमरामैन निखिल के साथ- नीलिमा,दिल्ली आजतक'
  1. roshanromani
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/09/blog-post_18.html?showComment=1347949079406#c6977021756745148249'> 18 सितंबर 2012 को 11:47 am

    badhiya hai

     

  2. naveen raman
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/09/blog-post_18.html?showComment=1347964870262#c3888222563514833340'> 18 सितंबर 2012 को 4:11 pm

    कमेंट करके इसका जायका खराब करने की कोई मंशा नहीं है

     

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