.


हीरोईन फिल्म देख ली. मैं भीतर से डरा हुआ हूं कि इस फिल्म के बाद मधुर भंडारकर की हालत रामगोपाल वर्मा जैसी न हो जाए. उनकी तरह ही मधुर की फिल्म से शॉट्स,डायलॉग के होने-न होने के तर्क तेजी से खत्म हो रहे हैं और कहीं वे सिनेमा बनाने के लिए सिनेमा न बनाते रह जाएं. हीरोईन में इसकी शुरुआत हो चुकी है. देखते हुए मुझे बार-बार ग्वायर हॉल हॉस्टल की सब्जियों की ग्रेवी की याद आ रही थी. चाहे मटर पनीर हो, मलाई कोफ्ता,अंडा करी या फिर चिकन या मछली ही क्यों न हो, सबों की ग्रेवी एक ही होती..बस अलग से दो पीस मछली के या कोफ्ता डाल दिए जाते. मधुर भंडारकर ने भी ऐसा ही करना शुरु कर दिया है. 

हीरोईन, फैशन से आगे और अलग नहीं बढ़ पाती है बल्कि कार्पोरेट, फैशन की राइम्स पढ़ती हुई डर्टी पिक्चर में जा धंसती है. कोई बारीकी नहीं, कोई गंभीर रिसर्च नहीं. एक लापरवाह परीक्षार्थी की तरह भंडारकर ने इसे हम दर्शकों के बीच परोस दिया कि हमने तो सारी पढ़ाई पहले ही कर ली है, अब अलग से परीक्षा की तैयारी क्या करनी ? सिनेमा के भीतर सिनेमा बनते हुए "तरन्नुम जान" को लेकर उम्मीद जगी थी कि शायद चमेली से आगे की कोई चीज देख सकेंगे लेकिन उसमें तपन दा को इस टिपिकल तरीके से दिखाया गया कि फिल्म के भीतर फिल्म देख न सके और रिलीज ही नहीं हो सकी. आप कह सकते हैं कि जब कार्पोरेट,फैशन इन्डस्ट्री और वॉलीबुड की लाइफ स्टाइल और उसकी बिडंबना एक सी है तो आखिर कितना नया और अलग दिखेगा ? लेकिन फिर तो इस देश में मजदूर,किसान, निम्न मध्यवर्ग..सबों की स्थिति एक सी ही है तो फिर रोटी,जंजीर से लेकर पीपली लाइव तक दर्जनों फिल्में बनाने की क्या जरुरत है ? 

इन सबके बावजूद इस फिल्म को वॉलीबुड से कहीं ज्यादा "मीडिया की छवि" कैसी बनाई गयी है, इसके लिए देखनी चाहिए..मैंने कभी कथादेश के मीडिया विशेषांक में एक लेख लिखा था- सिनेमा का नया खलनायक मीडिया, ये बात इस फिल्म में मजबूती से दिखाई देती है..सिनेमा के लोग चर्चा में बने रहने के लिए,पब्लिसिटी के लिए मीडिया का इस्तेमाल किस तरह से करते हैं और खुद भी होते हैं,ये अलग से समझने की जरुरत नहीं है लेकिन हिन्दी सिनेमा उसे लगातार एकतरफा ढंग से पोट्रे कर रहा है..रण,शोबिज जैसी फिल्में तो इसकी नकारात्मक छवि को बताने के लिए ही बनी है..बाकी पा,पीपली लाइव जैसी कम से कम दर्जन भर फिल्में हैं जिनमें मीडिया खलनायक की भूमिका में दिखाया-बताया गया है. 

मीडिया के चरित्र खासकर समाचार चैनलों से गहरी असहमति रखने के बावजूद महसूस कर रहा हूं कि अब कुछ ज्यादा हो रहा है..ये एकतरफा हो रहा है और अगर ये आगे भी होता रहा तो संभव है कि कोई "मीडिया पॉजेटिव" को लेकर फिल्म बनाए.

सिंगल स्क्रीन थिएटर या सिनेमाहॉल  में सिनेमा देखना का अपना सुख है. पीवीआर,मल्टीप्लेक्स में फिल्में देखते वक्त लोग इतने चुप्प रहते हैं मानो स्क्रीन पर कोई फिल्म नहीं चल रही, लाश जल रही हो और दर्शक दाह-संस्कार के लिए जुटे हों. सिंगल स्क्रीन में अधिकांश लोग कुछ न कुछ बोलते हैं..आपको शायद ये शोर लगे लेकिन मैं जब भी बत्रा,अंबा,लिबर्टी जैसे सिनेमाहॉल में फिल्में देखता हूं तो लगता है मैं चारों तरफ हुडदंगिए दर्शकों से नहीं,सिनेमा समीक्षकों से घिरा हूं. सभ्य समाज से आनेवाले दर्शकों को ऐसी टिप्पणी परेशान कर सकती है कि सिर्फ टनाका माल होने से काम नहीं चलता है वेवो, प्यार पाने के लिए बहुत कुछ खोना पड़ता है, बहुत कुछ छोड़ना पड़ता है..तुम सोचोगी कि एकै साथ अर्जुनवा को भी पटाए रखें और उसको मोहरा बनाके डायरेक्टर को चूतिया बनाकर एक के बाद एक फिलिमो साइन करते रहें तो बाकी पब्लिक चूतिया नहीं है...

लेकिन इन टिप्पणियों से गुजरते हुए आप समझ पाते हैं कि जिन फिल्मों में संवाद और अर्थ तेजी से मर रहे हैं,ध्वस्त हो रहे हैं, उनके बीच ऑडिएंस कैसे संप्रेषण की संभावना खोज पाती है. संभव है कि ऐसी ऑडिएंस निखत,शुभ्रा और राजीव मसंद की रिव्यू पढ़कर सिनेमा देखने नहीं आती और पीवीर की ऑडिएंस की तरह मन ही मन उससे सिनेमा का मिलान करती हो लेकिन "स्टडी विफोर वॉचिंग" के बिना भी वो कदम-दर-कदम टिप्पणी करने से बाज नहीं आती..ये एक किस्म की लाइव समीक्षा होती है और अगर कोई इसी नीयत से मल्टीप्लेक्स,ओडियन,वेव और पीवीआर को छोड़कर टिपिकल सिनेमाहॉल में जाकर इन टिप्पणियों को नोट करे तो बड़ी ही दिलचस्प स्टडी निकलकर सामने आएगी..कोई बॉलकनी,डीसी की अलग से और रीयल स्टॉल,नीचे की अलग-अलग नोट कर सके तो टिकट में महज पच्चीस रुपये की फर्क के बीच कई स्तरों पर फर्क समझ सकता है.

| edit post
5 Response to 'हीरोईनः डर लग रहा है, कहीं भंडारकर राम गोपाल वर्मा न बन जाएं'
  1. दीपक की बातें
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/09/blog-post_24.html?showComment=1348493769766#c1608682942076548798'> 24 सितंबर 2012 को 7:06 pm

    Sahi kaha aapne. Madhur ab realistic hone ka bojhh dhote se prateet ho rahe hain.

     

  2. प्रवीण पाण्डेय
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/09/blog-post_24.html?showComment=1348493913130#c1532673762853257224'> 24 सितंबर 2012 को 7:08 pm

    सच हो सकता है डर..

     

  3. kanu.....
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/09/blog-post_24.html?showComment=1348575374258#c1879143961604083519'> 25 सितंबर 2012 को 5:46 pm

    सिंगल स्क्रीन थिएटर या सिनेमाहॉल में सिनेमा देखना का अपना सुख है. पीवीआर,मल्टीप्लेक्स में फिल्में देखते वक्त लोग इतने चुप्प रहते हैं मानो स्क्रीन पर कोई फिल्म नहीं चल रही, लाश जल रही हो और दर्शक दाह-संस्कार के लिए जुटे हों....om shanti shanti shanti

     

  4. naveen raman
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/09/blog-post_24.html?showComment=1348584838185#c2031866182193900639'> 25 सितंबर 2012 को 8:23 pm

    राम नाम सत्य हो.
    हीरोईन-ही ही ही रो रो रो ई ई ई न न न

     

  5. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/09/blog-post_24.html?showComment=1348799284990#c3634303661173025814'> 28 सितंबर 2012 को 7:58 am

    अगर गये पिक्चर देखने तो- सिनेमा देखने को जाने के पहले फ़िर से बांचेंगे यह पोस्ट! :)

     

एक टिप्पणी भेजें