.



आज की तारीख में रचना और पाठक के बीच इतनी एजेंसियां उग आयीं हैं कि पाठक और रचना के बीच सीधा और स्वाभाविक रिश्ता नहीं रह गया है। एक पाठक हालिया प्रकाशित रचनाओं को जिन माध्यमों के जरिए जान पाता है वो विश्वस्नीय नहीं रह गए हैं। अखबारों में थोक के भाव में जो पुस्तक परिचय,किताबों की समीक्षाएं छपती है वो पाठकों के बीच रुचि पैदा करने से कहीं ज्यादा मार्केटिंग करते नजर आते हैं। दुनियाभर के हिन्दी के आलोचक बाजारवाद और छोटे-मोटे स्वार्थों के विरोध में दिन-रात लिखते हैं,भाषण देते हैं जबकि रचना को लेकर पाठक के प्रति ईमानदार नहीं रह पाते। आपसी संबंधों,जुगाड़ों और मिली भगत की राजनीति के तहत रचना और किताबों को चढ़ाने और गिराने का काम करते हैं। उनका ये रवैया किताबों के बारे में लिखते समय साफ तौर पर झलकता है। नतीजा हमारे सामने है- रचना के बारे में आलोचकीय समझ के साथ लिखने के बजाय विज्ञापन करने में देश का तथाकथित महान से महान आलोचक अपनी ताकत झोंक दे रहा है। इधर रचनाकार से लेकर प्रकाशक तक नहीं चाहते कि उनकी छपी किताब या रचना की निर्मम किन्तु सच्ची आलोचना करे। इसलिए तटस्थ होकर लिखनेवालों की खेप लगातार घटती चली जा रही है और जो हैं उन्हें हाशिए पर धकेल देने में ही भलाई समझा जाता है। इस पूरे गुणा-गणित के बीच पाठक और रचना के बीच जो संबंध बनते हैं वो ग्राहक और उत्पाद का संबंध होता है जिसमें आस्वाद से कहीं ज्यादा बाजार के अधीन होकर पढ़ने और खरीदने का फार्मूला काम कर रहा होता है।

पेंग्विन इंडिया और यात्रा बुक्स ने प्रकाशक की हैसियत से पाठक और रचना के बीच सीधा संबंध कायम हो,इस गरज से पहल की है। "कुछ नया कुछ पुराना" नाम से शुरु किए जानेवाले सीरिज में रचनाओं का साभिनय पाठ होगा। इसके पीछे मकसद है कि उन पुरानी रचनाओं को पाठकों के सामने एक बार फिर से सामने लाए जाएं जो कि स्थायी महत्व रखते हों। दूसरी तरफ नयी रचनाओं का साभिनय पाठ के आधार पर पाठक किसी एजेंसी के आधार पर राय कायम करने के बजाय सीधे रचना से गुजरकर राय बना सकें। ऐसा होने से आलोचकों की विश्वसनीयता को जांचने-परखने का सही मौका मिल सकेगा और रचना को बेहतर और बदतर करार दिए जाने की उनकी इजारेदारी एक हद तक टूटेगी। यह संभव है कि पेंग्विन और यात्रा बुक्स का ये प्रयास काफी हद तक मार्केटिंग का हिस्सा हो लेकिन इतना जरुर है कि पाठक को रचना और राय के बीच एक विकल्प मिल सकेगा। सीधे संवाद के पैटर्न पर राजकमल प्रकाशन की भी अपनी सीरिज है लेकिन वो लेखकों से संवाद है,सीधे-सीधे रचना से नहीं।
पेंग्विन और यात्रा बुक्स ने इस पहल के तहत साभिनय पाठ के लिए इस बार हिन्दी-उर्दू के मशहूर रचनाकारों- मोहसिन हामिद,ज़किया ज़हीर,राजी सेठ,चित्रा मुद्गल और विलियम डेलरिम्पल की रचानाओं को चुना है। इन रचनाओं का साभिनय पाठ के लिए एनएसडी से पासआउट प्रसिद्ध रंगकर्मी सुमन वैद्य को विशेष तौर पर आमंत्रित किया है। आपलोगों में जिनलोगों ने भी एम.के.रैना द्वारा निर्देशित "बाणभट्ट की आत्मकथा" देखी है वो बाणभट्ट यानी सुमन वैद्य की अदाकारी पर जरुर फिदा हुए होंगे। राजेन्द्र नाथ के निर्देशन में घासीराम बने सुमन वैद्य को जरुर सराह रहे होंगे। आज एक बार फिर उन्हें नए अंदाज में देखने-सुनने का मौका मिलेगा। पेंग्विन और यात्रा बुक्स ने इस साभिनय पाठ की स्थायी योजना तय की है जिसके तहत महीने में एक बार इस कार्यक्रम का आयोजन करेगी। हर बार पुरानी औऱ नयी रचनाओं का पाठ होगा। हम उम्मीद करते हैं कि इससे रचना और पाठक के बीच नए सिरे से गर्माहट पैदा होगी।
नोट- कार्यक्रम को लेकर डिटेल कार्ड में दिया गया है जिसे कि आप क्लिक करके बड़े साइज में देख सकते हैं।


नाटकों में भूमिका के तौर पर सुमन वैद्य का परिचय-
Play Name Role Director
Short cut Arun Bakshi Sh. Ranjeet Kapoor
Antral Kumar(Mohan Rakesh) Sh. Ranjeet Kapoor
Janeman Panna Nayak Sh.Waman Kendre
Ban Bhatt Ban Bhatt Sh. M.K. Raina
Batohi Batohi(Bhikari Thakur) Sh. D.R.Ankur
Gunda Gunda Nanku Singh Sh.Chittranjan Giri
Ghasiram Kotwal Ghasiram Sh. Rajender Nath
Chanakya Vishnugupt Chandragupt Sh Souti Chakraborty
1857 Ek Safarnama Shamsuddin Ms Nadira Zaheer Babbar

निर्देशन-
Death Watch in Hindi written by Jian Genet in Nainital (1992)
* Kajirangat Hahakar (Assamese) with Children in Nagaon
Assam (2007),and in TIE Company(NSD)’s Children Theatre Festival 2009
* Kaath Gharat Bhagwan (Assamese Translation of a Hindi
Play written by Shri Krishna) in Nagaon Assam.(2008).
| edit post
4 Response to 'ताकि पाठकों के बीच सांस ले सके रचनाएं..'
  1. समयचक्र
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/12/blog-post_30.html?showComment=1262153877740#c6980929374022201037'> 30 दिसंबर 2009 को 11:47 am

    आपके विचारो से काफी हद तक सहमत हूँ .... आभार

     

  2. neeta
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/12/blog-post_30.html?showComment=1262165504837#c3726980300829918861'> 30 दिसंबर 2009 को 3:01 pm

    Very good coverage. thank you!

     

  3. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/12/blog-post_30.html?showComment=1262168248384#c2706075830761511845'> 30 दिसंबर 2009 को 3:47 pm

    वस्तुस्थिति का सही विश्लेषण किया आपने। मजबूरी यह है कि जब किताब को बेचना जरूरी समझा जाएगा तो उसे बाजार में ले ही जाना होगा, और बाजार में जाने पर बाजार की शक्तियाँ अपना काम तो करेंगी ही।

     

  4. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/12/blog-post_30.html?showComment=1262168835833#c4317644082947373348'> 30 दिसंबर 2009 को 3:57 pm

    वस्तुस्थिति का सही विश्लेषण किया आपने। मजबूरी यह है कि जब किताब को बेचना जरूरी समझा जाएगा तो उसे बाजार में ले ही जाना होगा, और बाजार में जाने पर बाजार की शक्तियाँ अपना काम तो करेंगी ही।

     

एक टिप्पणी भेजें