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विस्फोट.कॉम के मामले में संजय तिवारी के इकरारनामा की शुरुआती पंक्तियों को पढ़कर मेरी तरह कोई भी पाठक भावुक हो जाएगा। उसका भी मन करेगा कि वो उनके पक्ष में संवेदना जाहिर करे,सहानुभूति के कुछ ऐसे शब्द सामने रखे जिससे उन्हें लगे कि वो संजयजी के साथ है। ये शब्द गहरे तौर पर साबित करे कि फिलहाल विस्फोट.कॉम के काम को रोक देने के फैसले से न सिर्फ संजयजी का नुकसान हुआ है बल्कि एक पाठक की हैसियत से उनका भी भारी नुकसान हुआ है,पूरी पत्रकारिता को एक गहरा झटका लगा है। इसलिए नीचे मिली टिप्पणियों में आप ऐसे शब्दों के प्रयोग को देख रहे हैं तो इसमें कहीं कोई अचरच ही बात नहीं है। वैसे भी हिन्दी समाज इस स्तर पर अभी तक संवेदनशील बना हुआ है कि जब कोई इंसान यहां आकर अपना कलेजा निकालकर सामने रख दे तो सामनेवाले की आंखों के कोर अपने आप भींग जाते हैं। ऐसी स्थिति में दोस्त-दुश्मन से उपर उठकर भावना के स्तर पर एक हो जाना बुहत ही कॉमन बात है। यह बहुत ही स्वाभाविक स्थिति है। संजयजी के प्रति लोगों के संवेदना के स्वर इसी भावना के स्तर पर एक हो जाने का नतीजा है।

लेकिन इस संवेदना के शब्द से भला उनका क्या होना है। स्वयं संजय तिवारी के शब्दों में बात करें तो- विस्फोट के कारण बहुत सारे ऐसे लोगों से मिलना हुआ जो मानते हैं कि यह अच्छा और निष्पक्ष प्रयोग है और किसी भी कीमत पर यह बंद नहीं होना चाहिए. उनकी इच्छा और सद्भावना भी सिर आखों पर. लेकिन केवल सद्भावना से अच्छे काम चल जाते तो आज देश समाज की हालत ऐसी नहीं होती.

यह सहानुभूति बटोरने के लिए नहीं बल्कि अपने समर्पित पाठकों के सामने अपनी वास्तविक स्थिित बयान कर रहा हूं. मैं थक चुका हूं. इसलिए इस काम को फिलहाल अस्थाई तौर पर रोक रहा हूं.
। जाहिर है खुद संजय तिवारी भी ये नहीं पसंद करते कि कोई खालिस संवेदना जाहिर करे। ये उन्हें मानसिक स्तर पर लगातार काम करने के लिए उर्जा तो दे सकता है लेकिन साधन के स्तर पर इससे कोई इजाफा नहीं होनेवाला है।......अच्छे कामों को चलने के लिए भी धन की जरूरत होती है. साधन की जरूरत होती है. आज विस्फोट जितना काम कर रहा है यह हमारे पास मौजूद साधन का अधिकतम उपयोग है. लेकिन अब मैं भी छीज गया हूं. कुछ बचा नहीं है. महीने दर महीने का संघर्ष अब रोज-ब-रोज के संघर्ष में बदल गया है. हालांकि चतुर खिलाड़ी की तरह इतना खोलकर हमें बात नहीं करनी चाहिए लेकिन आप हकीकत को कब तक छिपा सकते हैं? किसी न किसी दिन सच्चाई को स्वीकार करना ही होता है. और हमारी सच्चाई यह है कि अब हम इस काम को स्तरीय और सम्मानजनक तरीके से चलाये रखने में असमर्थ हैं.

लेकिन इंटरनेट और डॉट कॉम के जरिए पत्रकारिता में एक बड़ी संभावना देख रहे लोगों के लिए संजय तिवारी का ये इकरारनामा भावुक होने से ज्यादा चिंता पैदा करनेवाला है। पूरी पोस्ट को पढ़ने के बाद गश खाकर गिर जानेवाला है। जुम्मा-जुम्मा अभी दो-तीन साल ही हुए है जब हिन्दी डॉट कॉम चलानेवाले लोग मैंदान में उतरे हैं और अगर इंटरनेट हिन्दी पत्रकारिता की बात करें तो ये दुधमंहा बच्चा ही है। ऐसे में अभी ये पांव पसारने की गुंजाइश पैदा कर ही पाता कि ये खबर मिल रही है कि विस्फोट.कॉम जैसी चर्चित साइट को फिलहाल के लिए रोका जा रहा है लोगों के बीच क्या संदेश पैदा करता है,इस बात पर विचार किया जाना जरुरी है। इस सवाल पर विचार करने के क्रम में जाहिर है कि न तो संजय तिवारी की समझ को और न ही भड़ास4मीडिया के यशवंत सिंह के समर्थन को कि-आज के दौर में 100 फीसदी इमानदारी से जीना बहुत मुश्किल है, वो भी दिल्ली में खासकर को एक मानक स्थिति मानकर सोचा जा सकता है। इन लोगों के अनुभव,तर्क और नजरिए पर जरुर विचार किए जाने चाहिए लेकिन बार-बार ईमानदारी का झंड़ा लहराने से पहले इस बात पर जरुर समझ विकसित करनी होगी कि क्या अगर कोई डॉट कॉम,साइट या पत्रकारिता का कोई भी रुप व्यावसायिक और प्रसार के स्तर पर सफल होता है तो उस पर बेइमान हो जाने का लेबल चस्पा देने चाहिए। क्या ऐसा करना जायज होगा? सफल होने का उदाहरण पेश करनेवाले यशवंत भी मेरी इस बात के पक्ष में होगें। हिन्दी की ये वही मानसिकता है जहां पर आकर हम हर सफल पुरुष को बेइमान,दो नंबर का आदमी और हर स्त्री को किसी न किसी के साथ समझौता करनेवाली मान लेते हैं। संभव है कि एक हद तक इसमें सच्चाई भी हो लेकिन इसे पर्याय या मानक के तौर पर स्थापित तो नहीं ही किया जा सकता है कि हर सफलता का मतलब है बेइमान हो जाना, झूठा और मक्कार हो जाना। इसका तो यही मतलब होगा कि जो असफल है वो सबसे बड़ा इमानदार है और जब तक उसने जो भी कुछ किया, सौ फीसदी ईमानदारी के स्तर पर किया। क्या पत्रकारिता करते हुए या फिर जीवन जीते हुए इस तरह की फिलटरेशन हो पाता और ऐसा होना संभव भी है?

चुनाव शुरु होने के पहले विस्फोट.कॉम की तरफ से ये घोषणा की गयी कि उन्हें इसकी कवरेज के लिए पत्रकारों की जरुरत है। खबर लाने,खोजने,लिखने और विश्लेषण करने के स्तर पर इस काम के लिए उन्हें मानदेय दिए जाएंगे। कुछ उत्सुक और जरुरतमंद लोगों ने एप्रोच भी किया। विस्फोट.कॉम ने इस बीच विज्ञापन जुटाने की भी कोशिशें की। जाहिर है ये सब कुछ व्यावसायिक शर्तों के आधार पर ही होता रहा। बाद में पैसे के अभाव में मानदेय देने की बात टाल दी गयी। विज्ञापन को लेकर भी विस्फोट.कॉम को कोई खास सफलता नहीं मिल पायी,ये तो इकरारनामा से ही साफ हो जाता है। आज विस्फोट व्यावसायिक तौर पर असफल हो गया लेकिन संजयजी इस असफलता को सिर्फ अच्छा काम के बंद हो जाने का मलाल के रुप में जाहिर कर रहे हैं। क्या आपको नहीं लगता कि हिन्दी पत्रकारिता में ऐसा करते हुए व्यवसाय और पत्रकारिता को एक-दूसरे से घालमेल करते हुए ऐसी स्थिति पैदा कर दी जाती है कि अंत आते-आते एक महान कार्य के अंत होने की घोषणा करने में सुविधा हो। क्या ये सही तरीका है कि कोई इंसान भगवान की मूर्तियों की दूकान खोले और जब मूर्तियां नहीं बिके तो हर सामने गुजरनेवाले बंदे से इस बात की उम्मीद करे कि वो भगवान के दर्शन के नाम पर कुछ चढ़ावा चढ़ाता चला जाए ? विस्फोट पत्रकारिता के स्तर पर एक बेहतर काम करता आया है, इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता लेकिन इसकी व्यावसायिक असफलता को अच्छी पत्रकारिता के असफल हो जाने का करार देना ज्यादती होगी। हम ये मानकर क्यों नहीं चल पाते कि हम पत्रकारिता के नाम पर जो भी कुछ कर रहे हैं वो बाजार की बाकी गतिविधियों की तरह ही एक हिस्सा भर है और हमें उसे व्यावसायिक शर्तों के आधार पर ही चलाए रखना होगा। ये बातें सभी क्षेत्रों में समान रुप से लागू होती हैं। साधना,संस्कार और दूसरे धार्मिक, आध्यात्मिक कंटेट को लेकर चलनेवाले चैनल भी बाजर की शर्तों को फॉलो करते हैं न कि आध्यात्म और प्रवचन के शब्दों को। पत्रकारिता करते हुए ये साफ करना देना होगा कि ये न्यूज प्रोडक्शन और डिस्ट्रीव्यूशन से जुड़ा व्यवसाय है। एक पत्रकार के तौर पर महान होने और बदलाव की आवाज बुलंद करनेवाले मसीहा के रुप में अपने को प्रोजेक्ट करने का मोह हर हाल में छोड़ना ही होगा।

सच्चाई ये है कि बेबसाइट की संभावना और पत्रकारिता के लंबे अनुभव को साथ लेकर जिस उत्साह से कुछ नया और बेहतर करने की उम्मीद से हमारे पत्रकार मैंदान में उतरते हैं,बाजार,विज्ञापन,मार्केटिंग और रीडर रिस्पांस को लेकर उतना होमवर्क नहीं करते। यही वजह है कि अच्छा काम करते हुए भी मार खा जाते हैं। अचनाक से या तो कर्मचारियों की छंटनी या फिर उस काम को बंद करने की ही नौबत आ जाती है। हम इस उम्मीद में क्यों रहें कि किसी को सपना आएगा कि फलां पत्रकार बहुत बेहतर काम कर रहा है तो चलो उसकी मदद की जाए. ऐसा सोचनेवाले लोग तो अपने हिसाब से कमेंट और सामग्री के स्तर पर सहयोग तो करते ही हैं लेकिन जिनके पास साधन है उन्हें ये सपने न के बराबर आते हैं। उन्हें सपने आते भी हैं तो कुछ इस तरह से कि अगर हमने फलां डॉट कॉम की मदद की तो उसकी सीधा लाभ हमें क्या मिलनेवाला है? पत्रकारिता करते हुए हमें ऐसे लोगों को साधने की जरुरत है।

आज संजय तिवारी ने विस्फोट.कॉम का काम कुछ दिनों के लिए रोक देने की बात की. ये उनका व्यक्तिगत फैसला है। लेकिन फर्ज कीजिए कि उनके इस काम से दस-बारह नौजवान पत्रकार जुड़े होते तो उनके भरोसे का क्या होता? वो अभी कहां जाते, उनके पास तो कोई खास अनुभव भी नहीं होता कि यहां छूटते ही कहीं और लग जाते। एक बेहतर पत्रकार होने के नाते हममें से किसी की भी जिम्मेवारी सिर्फ खबर जुटाने, बेहतर लिखने और बोलने भर तक नहीं है। हमारी जिम्मेवारी इस बात की भी है कि इस प्रोफेशन में आनेवाले उन तमाम लोगों के बीच ये भरोसा कायम रखने की भी है कि पत्रकारिता से अच्छा कोई दूसरा प्रोफेशन नहीं है और तुम्हें इसे औऱ आगे ले जाने के लिए जी-जान से जुटे रहना होगा। अब इस लिहाज से आप वेब पत्रकारिता की संभावना पर बात करते हुए सिर्फ भावुक होना चाहेंगे या फिर इसे पत्रकारिता की असफलता मानने के बजाय मार्केटिंग के स्तर पर दुरुस्त होना चाहेगें।...
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12 Response to 'संजय तिवारी की बात पर भावुक होना जरुरी है ?'
  1. आशीष कुमार 'अंशु'
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/05/blog-post_15.html?showComment=1242379920000#c2887956162971015300'> 15 मई 2009 को 3:02 pm

    विनीत भाई वह पुरानी बात हो गई, संजय जी का विस्फोट पर आज प्रकाशित लेख पढिए:-
    'राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के प्रमुख गोविन्दाचार्य ने कहा है कि पंद्रहवीं लोकसभा के गठन के लिए कांग्रेस और भाजपा दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों को मिलकर सरकार बनानी चाहिए. यह बात आज उन्होने नई दिल्ली स्थित प्रेस क्लब में संवाददाताओं से बात करने के दौरान कही.

    राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के प्रमुख गोविन्दाचार्य ने कहा कि "मैं दोनों प्रमुख दलों से अपील करता हूं कि वे व्यक्तिगत या दलगत अहंकार को छोड़कर राजनीति में मुद्दों, मूल्यों को वापस लाने के लिए मिलकर सरकार बनायें." गोविन्दाचार्य का मानना है कि इसी से राजनीति में मूल्यों और मुद्दों की वापसी होगी.

    गोविन्दाचार्य मानते हैं कि छोटे राजनीतिक दल जिस तरह से जोड़-तोड़ की राजनीति कर रहे हैं उससे पार पाने के लिए जरूरी है कि दोनों बड़े राजनीतिक दल मिलकर स्थाई सरकार बनाने की दिशा में पहल करें.

    गोविन्दाचार्य कहते हैं कि इस बार सरकार बनाने में राष्ट्रपति के भी साहस की परीक्षा होगी. इसलिए उन्होंने राष्ट्रपति से अपील की है कि वे आगामी सरकार को बनाने के लिए किसे निमंत्रित करेंगे इसके मापदण्ड पहले से सार्वजनिक करें. उन्होंने नयी सरकार के गठन के लिए तीन मापदण्ड सुझाए हैं. पहला मापदण्ड है सबसे बड़े दल को निमंत्रित किया जाए, दूसरा सबसे बड़े चुनाव पूर्व गठबंधन को निमंत्रित किया जाए या फिर जिस दल या गठबंधन के पास 272 सांसदों के समर्थन का पत्र हो उसे सरकार बनाने के लिए निमंत्रित किया जाए. गोविन्दाचार्य मानते हैं कि अगर राष्ट्रपति पहले से अपना मापदण्ड निर्धारित कर देंगी तो परिणाम आने के बाद पाला बदल और जोड़-तोड़ की राजनीति पर रोक लग सकेगी.

    चुनाव आयोग द्वारा शांतिपूर्ण मतदान पर सवालिया निशान लगाते हुए गोविन्दाचार्य ने कहा कि इसे सफलता मानना गलत होगा. उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग के वर्तमान मापदण्डों के तहत ही संजय दत्त, आजम खान, लालू प्रसाद और वरुण गांधी जैसे लोग इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भागीदार हो जाते हैं. उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग एक नख-दंत विहीन संस्था बनकर रह गयी है जिसका उपयोग सत्ताधारी तंत्र अपनी मर्जी के अनुसार करते हैं.

    गोविन्दाचार्य का मानना है िक पंद्रहवी लोकसभा के लिए जो चुनाव संपन्न कराए गये वे पूरी तरह से मुद्दा विहीन थे. उनका कहना है कि राजनीति में अवसरवादिता चरम पर है और उससे निपटने के लिए अब कांग्रेस और भाजपा को मिलकर सरकार गठन की दिशा में प्रयास करना चाहिए.'

    (अब इस विषय पर कुछ कहिए:)

     

  2. संजय बेंगाणी
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/05/blog-post_15.html?showComment=1242379920001#c5830825172576741974'> 15 मई 2009 को 3:02 pm

    आप किसे दोषी मानते हो?

     

  3. यशवंत सिंह yashwant singh
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/05/blog-post_15.html?showComment=1242384180000#c8144754861929399091'> 15 मई 2009 को 4:13 pm

    विनीत जी,
    आजकल मैं कुछ इस तरह से सोचता हूं...मान लीजिए कि एक दुनिया है, जिसमें दो तरह के लोग होते हैं, एक मालिक लोग, दूसरे मालिक की कंपनियों में नौकरी करने वाले लोग। ये जो मालिक लोग हैं, उनका सोचने का तरीका बिलकुल अलग होता है। उनके घर पैदा हुआ लौंडा बचपन से ही बिजनेस, कंटेंट, प्रोडक्ट, मार्केटिंग, रेवेन्यू, मैन पावर, रिसेसन, प्राफिट, शेयर, सेंसेक्स, वेंचर, प्रोजेक्ट, इनवेस्टमेंट, शेयरहोल्डिंग, इनफ्रास्ट्रक्चर, इकानामिक पालिसी जैसे दर्जनों विशिष्ट शब्दों को सुनते-सीखते बढ़ता है और फिर सहज स्वाभाविक रूप से अपने बाप के अब तक के सफल (पूंजी के लिहाज से) काम को और ज्यादा सफल बनाने के लिए हर माडर्न हथियार (टेक्नालाजी, मैनेजमेंट, विजन..) का इस्तेमाल करते हुए जुट जाता है। इस मालिक की कंपनियों में काम करने वाले जो दूसरे तरह के लोग होते हैं उनके लौंडे बचपन से गांधी जी, सत्य, अहिंसा, ईमानदारी, नौकरी, सिपाही, डिप्टी कलेक्टर, किसानी, भाईचारा, नैतिकता जैसे धीर-गंभीर शब्द सुनते-सीखते हैं और जब बड़े होकर बाजार में उतरते हैं तो अपने को या तो इस बाजार में फिट नहीं पाते या फिर बाजार को कोसते हुए खुद को अलग कर लेते हैं। जो बाजार में घुस जाते हैं वे काफी लंबे समय तक बाजार के फंडे को सीखने बूझने में ही वक्त लगा देते हैं और जब तक सीख समझ पाते हैं तब तक उनके रिटायरमेंट की उम्र आ जाती है। गांव में जिस गाय-भैंस खरीदकर पशु मेले में बढ़े दाम पर बेचने वाले को दलाल कहा जाता है, इसी मुनाफे के शहरी, नियोजित और आधुनिक खेल खेलने वालों को इंटरप्रेन्योर, उद्यमी या शेयर ब्रोकर कहा जाता है। जब कोई हिंदी वाला देसज मालिक लोगों की श्रेणी में आने की कोशिश करता है तो उसकी पहली लड़ाई खुद उसी की विचारधारा से होती है। जो इस वैचारिक जंग में जीतने के बाद ही आप स्पष्ट विजन और लक्ष्य के साथ आगे बढ़ पाते हैं। मुनाफे और लाभ की कोई नैतिकता नहीं होती। यह मुनाफा और लाभ कमाने वाले के उपर होता है कि वह अपने मुनाफे और लाभ को कितना कानूनी व सामाजिक दिखा पाता है। जितना नंबर एक में दिखा पाया, दिखा दिया, बाकी दो नंबर के धन के बारे में कितना कुछ कहा लिखा जा चुका है, सब जानते हैं।

    संजय जी 24 कैरट वाले पत्रकार और मनुष्य हैं। वे जिस सदभावना और नेकनीयती की अपेक्षा समाज से रखते हैं, वो सदभावना और नेकनीयती अब समाज की मानसिकता में बची नहीं क्योंकि समाज की सदभावना और नेकनीयती को अतीत में ढेरों चिटफंड कंपनियों, नेताओं, अफसरों, चोरों, उचक्कों, दलालों ने कई कई बार ठगा है इसलिए सहज रूप से किसी पर भरोसा न करने की जो प्रवृत्ति डेवलप हो रही है, वह बाजार अनुकूल जरूर है लेकिन समाज व मनुष्यता विरोधी है। पर क्या करा जाए पार्टनर, लाख गाल बजाने के बावजूद आप और हम, इसी बाजार के कल पुर्जे हैं। ऐसे में हर आदमी को खुद अपने लिए तलवार की धार तय करना है कि वह कितना बाजारू बनेगा, कितना अनैतिक बनेगा और कितना सामाजिक रहेगा, कितना मानवीय रहेगा, कितना लोकतांत्रिक रहेगा, कितना नैतिक रहेगा। इन्हीं तलवार की धारों को हर मीडिया हाउस अपने लिए अलगअलग व्याख्यायित करता है। एनडीटीवी अपने चेहरे को ज्यादा मानवीय और नैतिक बताकर प्राफिट ज्यादा कमाने में जुटा है तो वायस आफ इंडिया खुल तौर पर पैसे उगाहने में जुटा है। काम दोनों एक ही कर रहे हैं लेकिन दोनों के आंडबर अलग अलग हैं। दोनों की शब्दावलियां और दोनों के बाडी लैंग्वेज अलग अलग हैं। कुछ उसी तरह जैसे एक प्रोफेशनल काल गर्ल प्रोफेशनल तरीके से क्लाइंट पटाकर ज्यादा कमा लेती है और ट्रेडिशनल वैश्या कुछ नोटों पर तन देने के लिए तैयार बैठी रहती है लेकिन उसके उसकी तरफ मुश्किल से ही ग्राहक पहुंच पाते हैं।

    मैं इन सारे विषयों पर अलग से लिखने के मूड में हूं क्योंकि हिंदी वाले देसज लोगों के माइंडसेट में बदलाव की जरूरत है। हम नहीं कहते कि आप बेइमान बनिए लेकिन किसी बेइमान के अंडर में ईमानदारी से काम करते हुए भी आप कितने इमानदार रह पाते हैं, कहना मुश्किल है। आप फिर कहीं न कहीं उस बेईमान के धंधे को ही बढ़ाने का काम कर रहे हैं और इस प्रकार आप भी बेईमानों की जमात में शामिल हैं। तो ये जो ईमानदारी और बेईमानी जैसे शब्द हैं, इनकी माइक्रो व्याख्या की जरूरत है।

    इस मुद्दे पर काफी कुछ कहना चाहता हूं लेकिन कमेंट में ही पोस्ट लिखने की स्थिति आ चुकी है, इसलिए विराम दे रहा हूं। उम्मीद करता हूं कि इस बहस को स्वस्थ उद्देश्य के लिए आगे बढ़ाएंगे, खुद को अति ईमानदार और अति विद्वान साबित करने के परंपरागत और सामाजिक मोह-आग्रह के बगैर।

     

  4. शैलेश भारतवासी
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/05/blog-post_15.html?showComment=1242384480000#c3599338931016823624'> 15 मई 2009 को 4:18 pm

    विनीत जी,

    मैं आपकी बात से पूरी तरह से सहमत हूँ। मैं पिछले 3 वर्षों से हिन्द-युग्म डॉट कॉम चला रहा हूँ और व्यवसायिक तौर पर सफल नहीं हो पा रहा हूँ। इसमें कहीं न कहीं बाज़ार की कच्ची समझ, संपर्कों का आभाव, बिकने वाली चीजों का अभाव, प्रबंधन का अभाव आदि शामिल हैं। इंटरनेट पर हिन्दी भाषियों का पेनीट्रेशन, मार्केट-प्लॉनर का हिन्दी पाठकों का गरीब मानना आदि बहुत कुछ सामिल है।

    संजय जी, संवेदना नहीं बटोरी है। बल्कि यह स्वीकार किया है कि केवल ऊर्जा लगाने से ही धन उगाही नहीं हो पायेगी, बल्कि कुछ और तौर-तरीके खोजने होंगे। अभी 2 महीने पहले मेरी उनसे मुलाक़ात हुई थी। मेरे विचार से वे सफल होंगे, ज़रूर बेहतर योजना बनाने की दिशा में सोच रहे होंगे।

    अगर विस्फोट कुछ दिनों के लिए कम सक्रिय भी होता है तो उससे दुख जताने से अधिक यह बात सोचने की है कि जब कोई और इस तरह के प्रयास करे तो बाज़ार की सभी संभावनाएँ तलाश ले।

     

  5. शैलेश भारतवासी
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/05/blog-post_15.html?showComment=1242384900000#c375426662235703081'> 15 मई 2009 को 4:25 pm

    यशवंत जी ने शहरी उद्यमी और हमारे जैसे देशज उद्यमी के बीच का अंतर बहुत अच्छे से स्पष्ट किया है। हम विचाराधारा की लकीर के फ़कीर होकर खुद को दाँच पर लगा सकते हैं, लेकिन उसे व्यवसायिक उपक्रम बनाना मुश्किल है। मुझे फिर भी लगता है कि ऐसे में एक मध्यम मार्ग को खोजने की ज़रूरत है। इससे पहले की हम बूढ़े हों, बड़े-बड़े बाजार के गुंडे हिन्दी के इंटरनेटीय धन पर कब्जा जमायें, कुछ न कुछ तो करना होगा बॉस। क्या? यही उत्तर सबको खोजना है।

     

  6. यशवंत सिंह yashwant singh
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/05/blog-post_15.html?showComment=1242387960000#c6739005248844689394'> 15 मई 2009 को 5:16 pm

    विनीत जी, एक बात और, आपने लिखा है...

    ...............इस सवाल पर विचार करने के क्रम में जाहिर है कि न तो संजय तिवारी की समझ को और न ही भड़ास4मीडिया के यशवंत सिंह के समर्थन को कि....आज के दौर में 100 फीसदी इमानदारी से जीना बहुत मुश्किल है, वो भी दिल्ली में खासकर... को एक मानक स्थिति मानकर सोचा जा सकता है......

    उपरोक्त जो न्याय करने की आपकी बौद्धिक मुखमुद्रा है, वह दिक्कत पैदा करने वाली है और बहस को आगे बढ़ाने से रोकती है। यह खुद को पंच, महंत और मठाधीश मानकर कही गई बात है। संजय तिवारी, यशवंत सिंह, शैलेश भारतवासी ये सभी लोग अगर कोई पहले से ही कोई धीर-गंभीर महंतई नुमान निष्कर्स निकालकर प्रयोग करेंगे तो तय मानिए पिटेंगे। आप जब प्रयोग करते हैं तो आपको बेहद खुले दिल दिमाग से सब कुछ रिसीव करना होता है और उन्हें एनालाइज करना होता है। कई बार डाक्टर किसी को बता देते हैं कि आपको एड्स के लक्षण हैं, आपको हेपाटाइटिस है लेकिन जब वो बारीकी से ठीक जगह चेक कराया जाता है तो पता चलता है कि कहीं कुछ नहीं है लेकिन वो बेचारा मरीज खुद को एड्स व हेपाटाइटिस का मरीज मानकर अपना आधा खून सुखा चुका होता है।

    आपने एक लाइन में इस छोर और उस छोर वाली जो नारेबाजी युक्त सरलीकृत लाइन खींच दी है उससे आपने लोगों को मजबूर कर दिया है वे न खुलें और इसी लाइन रूपी मानक के इर्द गिर्द अपने विचार प्रकट करें। हो सकता है कोई मेरे जैसा हो जो साफ-साफ बताना चाहे कि वो अपने मार्केटिंग व बिजनेस के एक्सपीरियेंस के दौरान किस तरह कंपनियों के साथ बातचीत करता है, उनसे एसोसिएशन बनाता है, तो वो तो कुछ नहीं करेगा क्योंकि उसे लगेगा कि यहां तो गांधी जी की औलादें बैठी हैं और वो बेचार कहां धन कमाने के लिए यहां वहां भटकने वाला सामान्य सा आदमी।

    भाई, कौव्वों की तरह किसी पर तुरंत लेबल लगाने का काम अगर मेरे चिर विरोधी कर रहे होते तो उन्हें मैं कुछ नहीं कहता क्योंकि चरम मूर्ख को आप कुछ सिखा ही नहीं सकते और न ही उनसे कोई उम्मीद कर सकते हैं। मूर्ख कहीं जाएगा तो सबसे पहला काम वो अपनी मूर्खता का प्रदर्शन करेगा, वो अपनी बात नहीं करेगा, दुनिया जहान और दूसरों की बात पेलेगा। हो सकता है एकाध मूर्ख मेरे लिखे पर गरियाने इस ब्लाग पर भी कमेंट देने आ जाएं :) लेकिन जब बात विनीत कुमार की हो रही है तो उम्मीद बंधती है कि चलो अपने समय में एकाध दो ऐसे लड़के खड़े हो रहे हैं जो चीजें को बेहद रीयलिस्टिक, माडर्न एप्रोच और तटस्थ तरीके से एनालाइज करने की कोशिश कर रहे हैं। ध्यान रखिए, जल्दबाजी कभी मत करिए। किसी सूचना व तथ्य पर जब तुरंत कोई निष्कर्स निकालते हैं तो वो कुछ और होगा और थोड़े बहुत नए इनपुट व एंगल के बाद थोड़ा ठहरकर निकालेंगे तो कुछ और निकलेगा। तर्क मैथ और साइंस की तरह नहीं होता जिसमें आप दो दूना चार कर देते हैं और चैलेंज कर देते हैं कि दो दूना चार के अलावा कुछ हो ही नहीं सकता। एक ही चीज के लिए लाख तरीके के निष्कर्स निकाले जा सकते हैं, यह तर्क की खूबी और खराबी होती है। यह तर्क करने वाले पर होता है कि उसे साबित क्या करना है। तो कोशिश यही हो कि चीजें ज्यादा रीयलिस्टिक और माइक्रो एनालिसिस लिए हुए हों, निष्कर्स निकालने का काम हमेशा पाठकों पर छोड़िए। जनता की तरह पाठक भी बहुत समझदार होता है, वो हर गाली और हर आशीर्वाद का मतलब समझता है।

    न्याय करने वाली हम हिंदी बौद्धिक लोगों की प्रवृत्ति जिसमें हम किसी को तुरंत चोर और किसी को तुरंत महान बता देते हैं, दरअसल यह भी मालिक के नौकर वाली मानसिकता व माहौल की उपज है। उसी पाखंड की उपज है जिसमें आमतौर पर चोर महाराज अपने अपराधबोध को कम करने के लिए महान की मुद्रा में होते हैं और जो वाकई ईमानदार है वो अपनी ईमानदारी के आत्विश्वसा में ऐसा कुछ कर कह जाता है कि उस पर बेईमान का लेबल चस्पा हो जाता है। यही जल्दबाजी, न्यायपूर्ण और पाखंड भरी मुखमुद्रा आप लोगों से कभी भड़ास डाट काम पर दलाली होती है तो कभी यशवंत बलात्कारी हिंदी की महान शैतान कथा जैसी पोस्टें लिखाने पर मजबूर करती हैं। आमतौर पर हम हिंदी वाले इन फतवों से बहुत डरते हैं लेकिन जिस दिन इन फतवों को जीवन का जरूरी हिस्सा मानकर सहज रूप से लेते हुए अपने को एकाग्र कर आगे चलने की कोशिश करना सीख लेते हैं, उस दिन लगने लगता है कि यार हम अब तक कहां और किस तरह के माइंडसेट के लोगों के बीच जी रहे थे!!!!!!!

    संजय जी के आर्टिकल पर किसी पवनसुत ने एक लाइन का कमेंट किया है कि चुनाव में माल कमाने के बात दुकान बढ़ा रहे हो भाई। ये कमेंट संजय जी को विचलित कर गया। यह संजय जी का आंतरिक द्वंद्व है जिसमें वो किसी भीड़ की तरफ से उछाले गए जुमले से प्रभावित हो जाते हैं। आप ये मानकर चलिए कि जब आप भीड़ से थोड़ा उपर उठते हैं तो भीड़ आपको अपने हिसाब से एनालाइज करती है। कुछ बताएंगे कि चोरी से बढ़ा है, कुछ कहेंगे कि दलाली किया है, कुछ कहेंगे कि मेहनती और प्रतिभाशाली था, इसलिए बढ़ा है, कुछ कहेंगे कि कोई विकल्प नहीं था इसलिए मजबूरी में बढ़ गया है..... जाकी रही भावना जैसी।

    संजय तिवारी जी की पोस्ट पर मैंने जो कमेंट किया है, उसमें संजय जी के दर्द को ही आगे बढ़ाया है, अपने अऩुभव को उड़ेलते हुए। संजय जी अपनी पीड़ा कह गए, हो सकता है यह पीड़ा शैलश जी और मैं कुछ दिन बाद कहूं या फिर हो सकता है कि हम लोग हाथ पांव मारकर अपने को जिला ले जाएं ...कुछ भी हो सकता है क्योंकि हम नए और कच्चे खिलाड़ी हैं बाजार के खेल के।

    पता नहीं आपको मालूम है कि नहीं, रिलायंस और धीरूभाई अंबानी पर उस जमाने में भ्रष्टाचार के इतने आरोप, किस्से, चर्चे क्यों थे.....??? मेरे एक वरिष्ठ उद्यमी मित्र ने बताया कि धीरूभाई अंबानी देश के बड़े उद्यमियों की जमी-जमाई जमात में अच्छे खासे तरीके से घुसपैठ कर रहे थे और उन स्थापित व परंपरागत अरबपतियों के धंधे को चुनौती पेश कर रहे थे इसलिए उन सभी ने मिलकर प्रेस व सत्ता पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए धीरूभाई को खलनायक साबित कराने की भरसक कोशिश की और इसमें काफी हद तक सफल भी हुए। उस मित्र का कहना है कि धीरूभाई ने उतना ही या उससे भी कम भ्रष्टाचार किया था जितना वे जमे-जमाए उद्यमी करते थे लेकिन धीरूभाई आरोपी इसलिए बन गए क्योंकि उन्हें बाजार के स्थापित दिग्गज यूं ही अपने बराबर खड़ा देख पाने के लिए तैयार नहीं थे। उन्हें अपनी दुनिया में किसी देसी और नए का घुसपैठ मंजूर नहीं था। उनकी इलीट मेंटलटी उन्हें उकसा रही थी कि इस नए उद्यमी को नष्ट करो वरना हम सबके धंधे को चौपट कर देगा। बड़ी बड़ी कंपनियां सत्ता और विपक्ष में बैठे लोगों को अरबों-खरबों का चंदा इसलिए देती हैं क्योंकि उन्हें सरकारों से अपने अनुकूल नीतियां बनवानी होती हैं। यह एक रुटीन और सहज कार्य है जो हर देश में संपादित किया जाता है लेकिन यह इतना उच्च भ्रष्टाचार होता है कि इस भ्रष्टाचार को सीबीआई रा सीआईडी जैसी तमाम खुफिया संस्थाओं के ईमानदारी के राडार कैच ही नहीं कर पाते। ऐसा क्यों है कि अनिल और मुकेश अंबानी चुनाव नतीजों से ठीक पहले आडवाणी समेत तमाम दिग्गज नेताओं से मिलने लगे हैं, क्योंकि सरकार बनवाने गिराने में इन धनपशुओं का बहुत बड़ा रोल रहता है। तो ये काम उद्यमी बहुत पहले से करते रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे क्योकि इनके टर्मनोलोजी में यह सब कुछ करना कतई भ्रष्चाचार नहीं होता बल्कि यह उनके जीवन जीने के हिस्से का अनिवार्य 'नैतिक अंग' होता है। नीत्शे को मैं सपोर्ट नहीं करता लेकिन उनकी जो बात है, गुलाम मानसिकता और प्रभु मानसिकता, वो काफी कुछ आधुनिक लोकतंत्रों में देखने को मिल जाता है। नीत्शे के हिसाब से देखें तो हम लोग ब्लाग पर ये जो कुछ अल्ल बल्ल सल्ल कर रहे हैं ये गुलाम मानसिकता वालों की चोंचलेबाजी है जो अपना जीवन आदर्श व सिद्धांतों के द्वंद्व के बीच ही गंवा-गुजार देते हैं। नीत्शे के मुताबिक प्रभु मानसिकता वालों के एजेंडे में ये ईमानदारी, नैतिकता, मानवीयता, करुणा जैसे शब्द होते ही नहीं। उन्हें हमेशा विजेता रहना है इसलिए वे किसी भी तरह विजेता रहना चाहते हैं और विजेता बनने के लिए वो सब कुछ करते हैं जिससे विजेता बनने की राह आसान होती हो। पर नीत्शे को सपोर्ट नहीं किया जा सकता। नीत्शे जैसे लाखों दर्शनशास्त्री हैं और इन्हें पढ़कर केवल यह जाना जा सकता है कि मनुष्यों के दुनिया देखने के तरीके कितने हैं और हमारा खुद का तरीका क्या है।

    तो विनीत जी, आपसे गुजारिश है कि बहसों का निष्कर्स शुरू में ही मत निकाला करिए। यह गलती पहले मैं भी करता था लेकिन मुझे अब लगने लगा है कि मैं कुछ नहीं जानता। मुझे बहुत कुछ जानना सीखना है। जिस दिन यह समझ गया उस दिन से मैं अब कहीं भी खुद के विचार लिखने से परहेज करने लगा हूं क्योकि मैं वो नहीं लिखना चाहता जो मैं महसूस नहीं करता और जो जीता नहीं।

    आभार के साथ
    यशवंत

     

  7. संजय बेंगाणी
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/05/blog-post_15.html?showComment=1242391860000#c6520609971987906547'> 15 मई 2009 को 6:21 pm

    लम्बा लिखना अपने बस का नहीं, मगर मैनें गाँव से निकल कर सफल होते लोगो को देखा है. वह भी नैतिकता को बिना खोये.

    बात यह है की मकान वास्तुविद बना सकता है, इलाज चिकित्सक कर सकता है. वैसे ही व्यापार व्यवसायी कर सकता है. यह एक गुणवत्ता है, समझ है. हिन्दीभाषी इसी कौम को गालियाँ देते हुए बड़े हुए है. यह बात इन्हें समझ आ जाए तो बेहतर है. वेपार कोई मुनाफाखोरी या अपराध नहीं होता और न ही पूँजी घटिया चीज है. समाजवाद और साम्यवाद ने देश को बर्बाद ही किया है.

     

  8. बी एस पाबला
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/05/blog-post_15.html?showComment=1242392460000#c1090545776525891393'> 15 मई 2009 को 6:31 pm

    एक प्रोफेशनल काल गर्ल प्रोफेशनल तरीके से क्लाइंट पटाकर ज्यादा कमा लेती है और ट्रेडिशनल वैश्या कुछ नोटों पर तन देने के लिए तैयार बैठी रहती है लेकिन उसके उसकी तरफ मुश्किल से ही ग्राहक पहुंच पाते हैं। प्रोफेशनल होना भी एक कला ही है।

     

  9. स्वप्नदर्शी
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/05/blog-post_15.html?showComment=1242404760000#c915221264339014736'> 15 मई 2009 को 9:56 pm

    Thanks vineet raising this issue. I think personally that visfot.com is a bold experiment, and in such experiments "walking and running is not a option, you have to vitually dig your path".

    Thanks to Mr. Yashwant for worthwhile analysis. I feel the view point which Mr. Yashwant brought here, is coming from real life experience and very valuable.

     

  10. शैलेश भारतवासी
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/05/blog-post_15.html?showComment=1242411780000#c8012175800067789017'> 15 मई 2009 को 11:53 pm

    विनीत भाई,

    मुझे लगता है कि यशवंत भाई के दूसरे कमेंट से बातें और साफ हुई हैं। शायद जब आप अगली पोस्ट लिखें तब सम्भवतः आप खुद भी इस घटना के अन्य पहलू देख पायें।

     

  11. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/05/blog-post_15.html?showComment=1242438480000#c1481560560334368804'> 16 मई 2009 को 7:18 am

    अच्छा लेख लिखा। प्रतिक्रियायें तो पोस्टें हैं भाई। संजय बेंगाणी की बात जमी। समाज जैसा है उसके अनुसार अपनी योजनायें बनाकर ही काम करना होगा। अनुभव सिखायेगा बहुत कुछ!

     

  12. संजय तिवारी
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/05/blog-post_15.html?showComment=1242490980000#c7517549480664838274'> 16 मई 2009 को 9:53 pm

    सवाल पूंजी का नहीं, बल्कि पूंजी के दर्शन का है. अपने दस बारह साल के पत्रकारीय कैरियर में मैं कहीं नौकरी नहीं कर पाया. कभी कोशिश ही नहीं की. जब कोशिश की तो पता चला कि आप जो करना चाहते हैं वह नहीं कर सकते, हां आपको धन की चिंता नहीं होगी.

    ऐसे में अचानक ही इंटरनेट का एक हथियार के रूप में मिल जाना वरदान से कम नहीं था. मैं इसका यही उपयोग कर सकता था इसलीए मैंने यही उपयोग किया. मैंने कोई सोची-समझी रणनीति के तहत इस काम को आगे नहीं बढ़ाया है. हकीकत यह है कि मैंने कभी कोई प्लानिंग नहीं की है. जब जो ठीक लगा करते गये और देखते ही देखते इसका एक स्वरूप सामने आ गया.

    मैंने पैसे की जो बात उठायी है उसके निहितार्थ हैं. उसके निहितार्थ न तो सतही हैं और न ही फौरी. आज मैं जिस सवाल से दो-चार हो रहा हूं आनेवाले वक्त में और लोग भी होंगे. इसलिए अगर एक व्यवस्था यह विकसित हो जाती है कि लोग मिलजुलकर कोई काम कर सकते हैं तो आनेवाले दिनों में आम लोगों के बीच से ऐसे प्रयोग बढ़ेंगे जो सही मायने में कारपोरेट मीडिया को सही तरीके से जवाब दे सकेंगे.

    मेरे सामने कल भी पूंजी निवेश के व्यावसायिक प्रपोजल थे और आज भी हैं. प्रपोजल भी अच्छे खासे हैं कि आराम से काम हो जाएगा. लेकिन वह रास्ता किसी संजय तिवारी को समर्थ और सक्षम बना सकता है लेकिन भारत के उस दर्शन को नुकसान पहुंचाएगा जो कहता है कि पूंजी नहीं बल्कि प्रभाव से अपनी सफलता का आंकलन करो.

    अगर लोग सहयोग करके राम कथा आयोजित कर सकते हैं, धर्मकाम कर सकते हैं तो फिर आपस मे मिलकर पत्रकारिता क्यों नहीं कर सकते? कंपनी से विज्ञापन लेकर जनवादी पत्रकारिता करना हमेशा दिवास्वप्न होता है. इस बारे में मैं विस्तार से एक दो दिन में लिखूंगा कि क्यों बड़ी पूंजी से पत्रकारिता का बेड़ा गर्क हो जाता है. मुझे लगता है उसमें मैं थोड़ा और अपनी बात विस्तार से लिख पाऊंगा.

     

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