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उसने फोन पर जैसे ही बताया कि-सर,बधाई हो आपकी क्लासमेट श्वेता सिंघल का यूपीएससी में 17 वां रैंक आया है,मैं एकदम से आज से पांच साल पीछे जाकर सोचने लग गया। सुबह-सुबह उठकर कुछ गंभीर काम करने के मूड में था। इस खबर के सुनने के बाद से पूरा मन ही बदल गया। मैंने फोन पर ही इस खबर के साथ कुछ ज्ञान-व्यान की बातें चेंपी और अपने दोस्त से कहा- देखो,यार सफल लोगों के कुछ अलग से सींग नहीं उगे होते,वो भी हमारे-तुम्हारे बीच के ही लोग होते हैं। बस जरुरत होती है,अपने-आप को समझने की। मैंने उसे यूपीएससी पीटी परीक्षा की शुभकामनाएं देते हुए लगे रहने की बात कहकर फोन रख दिया।

मेरे पास क्लास के हिसाब से अलग-अलग छोटे-छोटे बक्से हैं। लैपटॉप,टाटा स्काई औऱ गारमेंट्स के खाली बक्से। इन बक्सों में अलग-अलग क्लास औऱ कोर्स के नोट्स के साथ-साथ उस दौरान की जुड़ी यादें हैं। मसलन मीडिया के बक्से में लड़कियों के लिखे कमेंट,नोट्स,साथ की तस्वीरें,मेरी लिखी स्क्रिप्ट और स्टोरी की सीडी औऱ टेप्स। एमए के बक्से में एमए प्रीवियस की नोट्स के साथ तस्वीरें,ग्रिटिंग कार्ड्स औऱ फ्रैंडशिप बैंड्स। मैं करीब चालीस तस्वीरों से गुजर गया। इस बक्से में श्वेता की कोई तस्वीर नहीं मिली। एमए फाइनल के बक्से में एक तस्वीर मिली,फेयरवेल की तस्वीर। विभाग ने सौ रुपये लिए गए थे इस आयोजन के लिए औऱ दोस्तों के बहुत समझाने-बुझाने के बाद मैं ये रकम देने के लिए राजी हुआ था। इन तस्वीरों को देखते हुए दर्जनों लड़की दोस्त की तस्वीरें और उनके भाव याद हो आए। इनमें से बहुत कम के नंबर अब मेंरे पास है। बड़ी मुश्किल से हच के पुराने सिम कार्ड में चार नंबर मिले हैं,सबों को फोन करुंगा।

श्वेता सिंघल की इस बेहतरीन सफलता की खबर सुनने के बाद कई बातें एक साथ दिमाग में घूमने लगी। ऐसा लगा जैसे कि पहले से ही स्टैंडबाय पर कई सारे वीडियो टेप दिमाग में पड़े हैं और अब सब एक्शन मोड में हैं। हम सब लोगों(करीब एक दर्जन लोग)को टीचर और सीनियर की तरफ से कई बार कम्प्लीमेंट मिल चुके थे कि ये बच्चे बहुत आगे तक जाएंगे,कुछ अलग करेंगे। हममें से अधिकांश लोग इसे अपनी पूरी ताकत से साबित करने में जुटे थे। हिन्दी साहित्य पढ़ते हुए नौकरी की संभावना बहुत सीमित होती है। इसलिए हमलोगों के दिमाग में बस एक ही बात होती,किसी तरह से यूजीसी जेआरएफ निकालो,उसके बाद जो भी कुछ करना हो करेंगे। वैसे भी हम जिस सर्किल में जीते आए,वहां जेआरएफ नहीं निकलने पर एक खास तरह की मानसिक पीड़ा झेलनी पड़ती। हममें से सारे लोग दो से तीन एटेम्पट देने के बाद बुरी तरह फ्रशट्रेट हो चुके थे। किसी का कुछ भी नहीं हो रहा था। चूंकि हम सारे लोग एक ही तरह के काम में लगे थे इसलिए कुछ अलग या खास होने का सवाल ही नहीं था। हम सीनियर औऱ टीचर से नजर मिलाने से बचने लगे थे। हमारा मन रखने के लिए वे यूजीसी और सिस्टम में खोट बता देते लेकिन ये भी था कि जिन सीनियर का जेआरएफ था उनको खास तबज्जो देते। डेढ़ साल के भीतर तक हम दर्जन भर लोग सामान्य साबित कर दिए गए। हममें कोई खास बात नहीं थी,अब हम जीवन में कुछ भी नया औऱ बेहतर नहीं कर सकेंगे। हमारी सारी काबिलियत यूजीसी जेआरएफ पर आकर टिक गयी थी।
आप जिस सब्जेक्ट से एमए करते हैं उसमें अगर आप यूजीसी क्लियर नहीं कर पाते हैं तो भीतर से एक ग्लानि बोध पैदा होता है। नहीं भी होता तो पैदा कराने की कोशिशें जारी रहती है। वाबजूद इसके इस यूजीसी से हमलोगों का धीरे-धीरे मोह भंग होने लग गया था। मैंने सोच लिया कि अब एकेडमिक में कुछ नहीं हो सकता। यूजीसी की अंतिम बार परीक्षा देकर मीडिया कोर्स करने में जुट गया। बाद में इस फील्ड में पूरी तरह रम गया। एक-दोस्त सीआरएल की बैठक में रुचि लेने लग गए। कुछ लड़कियों ने हारकर शादी कर ली। उनकी भाषा में कहें तो समय रहते उन्होंने अपनी पढ़ाई को इन्कैश किया। कुछ के भीतर जेआरएफ का मोह पहले की तरह बरकरार था.

हमलोगों के पहले तक डीयू के हिन्दी विभाग से एम.फिल् के बाद पीएचडी करना कोई मुश्किल बात नहीं थी। लगे रहो...(टीचर के साथ) हो जाएगा लेकिन अब मामला कठिन होता गया। इसलिए जिन लोगों का पीएचड़ी में हो गया,उनकी जेआरएफ की पीड़ा कम हुई और वो इसे ही जीवन की उपलब्धि मानकर एक हद तक खुश हो लिए,संभावना उनकी मरी नहीं थी। बाकी वो लोग जिनका न तो यूजीसी ही निकल पाया और न ही पीएचडी में हो पाया,उनके लिए अब कोई संभावना नहीं रह गयी थी। दोहरी हताशा को न झेल पाने की स्थिति में कुछ औऱ लड़कियों ने शादी कर ली। अगर विश्वविद्यालय के नजरिए से न देखें तो उनमें बड़ी संभावना थी। वो हिन्दी ऑफिसर हो सकती थी,मीडिया में अच्छा कर सकती थी,अनुवाद में बेहतर कर सकती थी लेकिन वो इन सबके लिए तैयार नहीं थी। उन लोगों ने शादी कर ली।
यह जानकर कि उसे एक लड़का हुआ औऱ पैदा होते ही मर गया, मैंने उसकी मां को सांत्वना दिया औऱ कहा- क्यों झोंक दिया अभी से ही उसे गृहस्थी के पचड़े में। किसी के बारे में सुनता हूं कि वो अपने पति के न रहने पर डेयरी की दुकान में बैठती है,छुट्टे पैसे गिनती है। कुछ ने शादी तो कर ली लेकिन क्लासमेट की सफलता पर अफसोस करती है- गलती कर दिए विनीत,थोड़ा और रुक जाते तो कुछ न कुछ हो जाता।

ये वो लड़कियां हैं जो एक बड़ी संभावना से जुड़ी थी। हिन्दू,हंसराज औऱ रामजस जैसे कॉलेजों से ग्रेजुएशन औऱ एमए किया। ये देश की उन लड़कियों से अलग थीं जिसने कभी कॉलेज का मुंह तक नहीं देखा। कभी-कभार कुछ लड़कियां अपने बाबूजी के साथ होता औऱ हमसे पूछती भी कि यही है हिन्दू कॉलेज,हंसराज तो मैं जबाब में कहता- अभी तो यहां एडमीशन नहीं होता। वो जबाब देती-बहुत नाम सुना है,बस देखने आए हैं। लेकिन इन लड़कियों ने अपनी एक बड़ी संभावना को अपने हाथों खत्म कर दिया। बार-बार इस बात का हवाला देते हुए कि-हम लड़कियों को परिवार के हिसाब से सोचना पड़ता है। वो दिल्ली में रहकर,परिवारवालों के साथ रहकर भी भरोसा नहीं दिला सकी कि मैं कुछ कर सकती हूं। सफलता और असफलता के बीच के फासले को उसने बहुत फर्क के साथ देखा। वो हड़बड़ा गयी। पढ़ाई के हिसाब से अपने को मानसिक रुप से तैयार नहीं कर पायी।

इधर लगातार लगे रहनेवाले लोगों के बारे में बातें होती है तो सबों की कहानी अलग-अलग है। कुछेक लेकचरर बन गए हैं,कुछ बनने की प्रक्रिया में हैं। कुछ मीडिया में बेहतर कर रहे हैं। सबकी कहानी अलग-अलग। इसी अलग-अलग कहानी में श्वेता सिंघल की सफलता की कहानी। तीन साल से कोई खबर नहीं सुनी उसके बारे में। एक दिन अचानक पता चला कि उसने पीटी निकाल लिया है। उसके बाद की कोई खबर नहीं। फिर सीधे आज कि- उसका 17 वां रैंक है। बतानेवाले दोस्त ने कहा-एक बार आप कन्फर्म कर लें। यूपीएससी की साइट पर साफ लिखा है- 17.श्वेता सिंघल।
लड़कियों की ये समझ कि वो सिर्फ अच्छा पति पाने के लिए नहीं पढ़ रही,शादी करने के बाद उसके साथ विदेश भाग जाने के लिए नहीं पढ़ रही,दूध नापकर पति का हाथ बटाने के लिए नहीं पढ़ रही बल्कि ये साबित करने के लिए हम भी तुम पुरुषों की तरह काबिल हैं,हम भी बदल सकते हैं अपनी तकदीर,हम भी उबर सकते हैं अपनी असफलता और फ्रशट्रेशन से,उसे भीड़ से अलग करती है।..जाहिर तौर पर शादी करके दूध की बोतलें भरनेवाली लड़कियों की तरह नहीं,श्वेता सिंघल की तरह। आप उस मौके को याद कीजिए जब आपके साथ पढ़नेवाली लड़की सीधे नेशनल चैनल पर आती है,छ साल बाद मिलने पर टी-सीरिज से जारी अपना एलबम पकड़ाती है,मेल करके पेरिस से बिजनेस ट्रिप की तस्वीरें भेजती है,जिस मैगजीन को पढ़कर हम सब बड़े हुए उसकी कवर पेज पर सफल उम्मीदवार के तौर पर उसकी तस्वीरें छपती है। आप भावुक हुए बिना नहीं रह सकते। कुछ-कुछ मेरी तरह। फिलहाल,श्वेता सिंघल को एक क्लासमेट की तरफ से ढ़ेर सारी शुभकामनाएं औऱ बधाइयां।.....
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7 Response to 'लड़कियां, जो संभावनाओं को मरने नहीं देतीं'
  1. mahashakti
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/05/blog-post_08.html?showComment=1241770080000#c4584497132218972329'> 8 मई 2009 को 1:38 pm

    श्‍वेता जी को बधाई, उनकी दृढ़ इच्‍छाशक्ति को ईश्‍वर सफलता दें।

    आपने अपने लेख में बाधे रखा मजा आया पढ़ने में

     

  2. गिरीन्द्र नाथ झा
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/05/blog-post_08.html?showComment=1241770680000#c4937185789000900140'> 8 मई 2009 को 1:48 pm

    श्वेता ज को मेरी से भी बधाई। एक बात तो जब आपके दोस्त इतनी शानदार सफलता हासिल करते हैं तो उसकी खुशी भी शानदार ही होती है और शायद उसे बयां करान मुश्किल भी होता है।

     

  3. सुशील कुमार छौक्कर
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/05/blog-post_08.html?showComment=1241785740000#c3877132803485398552'> 8 मई 2009 को 5:59 pm

    विनीत भाई पोस्ट का टाईटल बहुत पसंद आया। उनकी मेहनत को सलाम और सफलता के लिए बधाई।

     

  4. आलोक सिंह "साहिल"
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/05/blog-post_08.html?showComment=1241800320000#c1673600600297412512'> 8 मई 2009 को 10:02 pm

    अच्छी पोस्ट विनीत भाई,
    श्वेता जी को बहुत बहुत बधाई...
    आलोक सिंह "साहिल"

     

  5. संगीता पुरी
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/05/blog-post_08.html?showComment=1241846760000#c3800664529588591852'> 9 मई 2009 को 10:56 am

    वास्‍तव में श्वेता सिंघल की सफलता से अन्‍य लडकियों का उत्‍साह बढेगा .. इसके लिए उन्‍हें बधाई और शुभकामनाएं।

     

  6. राजकुमार ग्वालानी
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/05/blog-post_08.html?showComment=1241847420000#c4512539239275205232'> 9 मई 2009 को 11:07 am

    श्वेता जी को बहुत बहुत बधाई | इतनी अच्छी खबर के लिए आपको भी बधाई | मेरे ब्लॉग पर "तू बेटियों की है सरताज -सबको तुझ पर है नाज" पढें

     

  7. sushant jha
    http://taanabaana.blogspot.com/2009/05/blog-post_08.html?showComment=1241854380000#c5540276178343649063'> 9 मई 2009 को 1:03 pm

    बेहतरीन...अच्छा लिखा आपने...

     

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