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जहाज से देखो गुजरात

Posted On 9:16 pm by विनीत कुमार |

लेफ्ट, राइट, कमल, पंजा, कलम और टीवी पता नहीं किस-किस चश्मे से अब तक आपने गुजरात को देखा। बहुत हो गया, अब जरा चश्मा उतार फेंकिए और गुजरात को जहाज पर चढ़कर देखिए, आपको सब जगह हरियाली नजर आएगी।
एनडीवी पर गुजरात की गद्दी प्रोग्राम में अपने रवीश गुजरात में आणंद के लोगों से बात कर रहे थे। सब कुछ तो सामान्य ही था, जैसा कि और कार्यक्रमों में हुआ करता हैं। शुरुआत में कुछ मुद्दों पर बहसा-बहसी और फिर बाद में किसी एक बात को लेकर आपसी सहमति। लेकिन यहां एक नयी बात हो गई कि जब कांग्रेस ने बीजेपी यानि मोदी को पानी, बिजली के मुद्दे पर घेरना चाहा तो बीजेपी के एक बंदे ने एकदम से हटकर तर्क दे ड़ाला वो ये कि- गुजरात में अगर हरियाली देखनी है तो लोग जहाज पर बैठकर देंखे, सब जगह हरियाली नजर आएगी। और जब हरियाली है तो क्या वो बिना पानी बिजली के आ गयी। ऐसी बात को साहित्य में हमलोग वक्रोक्ति अलंकार कहते है। यहां कोई भी बात सीधे-सीधे नहीं कही जाती, कुंतक का पूरा दर्शन है इसके उपर। बंदे ने जब ऐसा कहा तो रवीश को भी अच्छा लगा कि बंदा कुछ क्रिएटिव किस्म का है। वैसे रवीश को एक महिला पहले ही क्रिएटिव मिल गई थी, जिसे कि कविता करने का सुझाव दिया, अच्छा बोल रही थी।खुश होकर एक छोटा-सा ब्रेक ले लिया।

हिन्दी में एक उपन्यास है रेणु का मैला आंचल। आपमें से कई लोगों ने पढ़ा भी होगा। रेणु ने पूर्णिया (बिहार) के एक छोटे से गांव मेरीगंज की चर्चा की है। एक तरह से यही उपन्यास का नायक भी है औऱ इसकी आंचलिक उपन्यास के रुप में पहचान बनी।
मुझे याद है जब हिन्दू कॉलेज के मास्टर साहब इसे पढ़ाया करते तो शुरु करने के पहले अक्सर कहा करते, इसे पढ़ने के लिए आपको मेरीगंज में बस या मोटर पर बैठकर नहीं पंगडंडियों पर चलकर समझना होगा, गांव को रेल की खिड़की से झांककर नहीं देखा जा सकता। तब बात समझ में नहीं आती और जिनकी पृष्ठभूमि शहर की होती उनको तो ये उपन्यास ही बहुत बकवास लगता। साल में मैला आंचल और राग दरबारी एक बार पढ़ना हो ही जाता है। बंदे ने जब ऐसी बात कर दी तो चीजें फिर से हरी हो गयी.
भाई साहब, आप जहाज से गुजरात देखेंगे। आप अगर नेता आदमी हैं तब तो देख आइए, लेकिन आम जनता के साथ बहुत परेशानी है।
क्या गुजरात वाकई इतना विकास कर चुका है कि मोदी अपना गदा और मुकुट बेचकर फ्री में बस चलवा रहे हैं तो अब जहाज भी चलवा लेंगे।
जनाब सरकार की तरह जनता जायजा नहीं लेना चाहती जो कि हवाई दौरे से ली जाती है, वाकई पानी-बिजली चाहती है।
उबाल में तो आप बोल गए कि जहाज पर से देखो गुजरात को तो ये काम तो आप गुजरात नरसंहार के समय भी कर सकते थे। एक और बताउं-
मैं झारखंड से हूं, आप जहाज तो छोडिए, बस में बैठकर खिड़की से झांकेंगे तो पूरा झारखंड खूब हरा-भरा दिखेगा लेकिन सब जगह फसल नहीं है, कहीं जगहों पर तो सिर्फ झाडियां ही झाडियां ही है और लोगों के बीच खाने-पीने की किल्लत बनी रहती है। मैं ये नहीं कहता कि आपका गुजरात भी ऐसा ही है, है और होगा खुशहाल लेकिन भइया ढंग का तर्क दो। सिर्फ ताली पिटवाने के लिए आए थे तब तो कोई बात नहीं लेकिन मुद्दों पर बात करने आए थे तो कभी तो वोटर या जनता की तरह बात करो, अपना तो कुछ रहा ही नहीं, परेशानी रहते हुए पर भी सबों की जुबान पर नेता वचन इतना क्यों हावी है भाई।।।
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1 Response to 'जहाज से देखो गुजरात'
  1. राकेश
    http://taanabaana.blogspot.com/2007/12/blog-post_14.html?showComment=1197814860000#c3455991098932256616'> 16 दिसंबर 2007 को 7:51 pm

    सही फरमाया दोस्त. पर क्या करेंगे मोदी ने अपने शासन काल में विकास-उकास जो किया होगा, किया होगा. पर एक चीज़ ज़रूर किया है और वो है भरम और भरमाने वाले की एक पूरी पीढी तैयार कर दिहिन है भैया मोदी ने.

    सही लिखे. लिखते रहें.

     

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