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लेखक ब्लॉगर हैं

Posted On 8:48 pm by विनीत कुमार |

आशीष दो पेज की अखबारनुमा पत्रिका निकालते हैं- मीडिया स्कैन। मुझे पता नहीं था कि उसमें क्या और किस ढंग का मटेरियल छापते हैं और न ही पहले कभी इनसे मेरी मुलाकात या बातचीत ही हुई। लेकिन मेरी एक पोस्ट पढ़कर जब इन्होंने कहा कि क्या इसे मैं मीडिया स्कैन में छाप दूं तो बिना कोई जिरह के मैंने कहा छाप दीजिए। वैसे भी जहां मीडिया शब्द जुड़ा हो और बंदा भी तो मैं किसी भी बात के लिए आमतौर पर मना नहीं करता।
मीडिया स्कैन का अंक मिला। मेरी पोस्ट टीवी में फोटो तो आएगा सरपी थी। और साथ में मेरा परिचय भी । परिचय के तौर पर लिखा था लेखक ब्लॉगर हैं। पहले तो थोड़ा गुस्सा आया। नाम के लिए मरनेवाले हर किसी को गुस्सा आएगा कि इतना रगड़ा है और एक बंदा मेरा परिचय ब्लॉगर के रुप में छाप रहा है। सोचा था कि कुछ जोड-जाड़कर अच्छा परिचय देगा। लेकिन लिखा है लेखक ब्लॉगर हैं। बेकार कह दिया था छापने को।
बाद में इस लाइन का ढ़ंग से, ठंडे दिमाग से मतलब समझने की कोशिश की। तो कई बातें एक साथ याद आ गयीं।
सबसे पहले तो जनसत्ता में ब्लॉग लिखी में मुम्बई से आए अनिल रघुराज की मायूसी कि दिल्ली में उन्हें नियमित ब्लॉग लिखने के बावजूद भी किसी ने खास तब्बजो नहीं दी। अनिलजी को दुख इस बात का रहा होगा( मेरे हिसाब से) कि दिल्ली पढ़ने-लिखनेवालों की जगह है। ऐसी जगह जहां दिल्ली के घरों का कूड़-कचरा निकलकर जब दरियागंज तक पहुंचता है तो दुर्लभ किताबो की शक्ल में तब्दील हो जाता है और लोग उसे बीन-बीनकर पढ़ते है। धूल-धक्कड की बिना परवाह किए और यहां हम रोज ताजा माल दे रहे तो भी इज्जत नहीं। यहां तो जिसका स्क्रीन जितना कीमती होगा, माल में उतनी चमक होगी। अनिलजी की चिंता जायज है। अपने कैंपस की बात कहूं, किसी लेखक या कवि को तब तक महान नहीं माना जाता, जब तक कि दो-चार मास्टरजी कह न दे या फिर जनसत्ता में कुछ छप न जाए। और फिर देखिए कैसे बंदे कैंसर की दवाई की तरह उस लेखक की किताब खोजते फिरेंगे। कई बार तो मैंने देखा है कि किताब छपी है उनकी १९९२ में और बंदा परेशान होकर मेरे से पूछ रहा है कि फलांजी की नई किताब आयी है देखे हो और अगर बता दिए तो दर्जन के भाव में फोटो कॉपी करा ली जाती है। तो ऐसे हमारे कैंपसे में कोई लेखक फेमस होता है। लेकिन मास्टरजी वाला कम्पल्शन तो हर जगह (दिल्ली) में नहीं होनी चाहिए। तो फिर । तो फिर क्या संसंद और विधान-सभा का भी तो असर है भइया हिन्दी जगत में। आप बम्बै से आकर फेमस हो जाओ रातो-रात और कला,साहित्य, फिल्म आदि की तरह ब्लॉग में विशेष योगदान के लिए राज्य सभा के लिए मनोनित भी हो जाओ औऱ जो बंदा सालों से दिल्ली में बैठकर इसी तोड़-जोड़ में लगा है वो क्या कच्चू छिलेगा। हो गया, आप यहां आए, लोगों से मिले-जुले, इतना बहुत है। बाकी बम्बै दिल्ली से ज्यादा से सेफ है, वहीं कुछ देखिए।
ब्लॉग लिखते-लिखते एक बार हमें भी गलतफहमी हो गयी थी कि मैं लेखक होने की प्रक्रिया से गुजर रहा हूं क्योंकि कमोवेश मैं भी तो सभ्यता समीक्षा ही कर रहा हूं।( मुक्तिबोध की कविता,लेखन को सभ्यता-समीक्षा कहा जाता है, उस हिसाब से सभ्यता समीक्षक हुए) । सो मैंने अपने एक साथी से, जो कि हिन्दी की लब्ध प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में छपते रहते ,कहा- यार मैं भी कहीं छपना चाहता हूं, मास्टरी की नौकरी के इंटरव्यू में कुछ तो दिखाने लायक रहेगा। ब्लॉग देखकर तो नौकरी मिलने से रही, और फिर कौन देखेगा, लैपटॉप खोलकर। जब तक सेट करुंगा, तब तक सब साफ। साथी का जबाब था-
छपने को तो छप सकते हो लेकिन दिक्कत ये है कि जो संपादकजी हैं वो ब्लॉगरों से बहुत चिढ़ते हैं औऱ फिर तुमही सोचो न, इस तरह से लिखना भी कोई राइटिंग है।
मतलब साफ था कि मैं लेखक नहीं हूं। छपने का इरादा छोड़ दिया। लेकिन जब आशीष ने ब्लॉगर के पहले लेखक छापा तो अच्छा लगा और भविष्य के लिए उम्मीद भी जगी। अनिलजी चाहें तो अपने इस छोटे दोस्त के लेखक का दर्जा पाने पर साथ में खुश हो सकते हैं। वैसे दुविधा और शर्तें अब भी बाकी है।
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5 Response to 'लेखक ब्लॉगर हैं'
  1. Raviratlami
    http://taanabaana.blogspot.com/2007/12/blog-post_12.html?showComment=1197446460000#c8400847564522175819'> 12 दिसंबर 2007 को 1:31 pm

    बढ़िया विश्लेषण है. परंतु जे के रोलिंग और सुरेन्द्र मोहन पाठक को भी कौन साहित्यकार मानता है! और, क्या वे सफल नहीं हैं? वे तो घोर सफल हैं.

    किसी दिन हिन्दी ब्लॉगर भी सफल होगें ऐसे ही. तब लोगों के मुंह बन्द होंगे.

    इट इज जस्ट ए मैटर ऑफ टाइम...

     

  2. rajivtaneja
    http://taanabaana.blogspot.com/2007/12/blog-post_12.html?showComment=1197447180000#c3553943574124211947'> 12 दिसंबर 2007 को 1:43 pm

    लिखते रहें आने वाला कल आपका है....
    आपके लेखन का तरीका कुछ कुछ अपुन के स्टाईल से मिलता है....

    मैँ तो ट्रेन में अपने साथी दैनिक यात्रियों के मुझे राईटर कह के पुकारने से ही खुश हो लेता हूँ...

    चलो कुछ तो दिया है ऊपरवाले ने बाकियों से अलग...

     

  3. Sanjeet Tripathi
    http://taanabaana.blogspot.com/2007/12/blog-post_12.html?showComment=1197459000000#c3772004907540229244'> 12 दिसंबर 2007 को 5:00 pm

    बढ़िया!! जैसा कि रवि रतलामी जी ने कहा, उनसे सहमत हूं।

     

  4. राकेश
    http://taanabaana.blogspot.com/2007/12/blog-post_12.html?showComment=1197464880000#c7476107906471422162'> 12 दिसंबर 2007 को 6:38 pm

    भइया, जुगाड़ लगवाओ, हम भी लेखक ब्लॉगर है टाइप छपास के भूखे हैं. मज़ा आया:)

     

  5. अनिल रघुराज
    http://taanabaana.blogspot.com/2007/12/blog-post_12.html?showComment=1197515460000#c4963978149509446894'> 13 दिसंबर 2007 को 8:41 am

    विनीत जी, ये ब्लॉग लिखी में क्या छप गया, मुझे तो पता ही नहीं। मैं तो दिल्ली नितांत अपने काम से गया था और सायास पुराने मित्रों के अलावा किसी से नहीं मिला। ब्लॉगरों से संपर्क करने को तो सवाल ही नहीं उठा। मेरे पास किसी ब्लॉगर से मिलने का समय ही नहीं था। केवल सृजन शिल्पी से जिज्ञासावश मिला जैसा मैं अपने ब्लॉग पर बता चुका हूं।
    ऐसे में किसी से खास तवज्जो नहीं दी, यह किसके दिमाग की उपज है, मुझे समझ में ही नहीं आ रहा। मैं तो आपकी सूचना पढ़कर बड़ा आहत महसूस कर रहा हूं। अगर आपके पास जनसत्ता की वह ब्लॉग लिखी हो तो मेरे मेल पर किसी तरह भेज दें, बड़ा आभार होगा।

     

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