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हमारे कुछ ब्लॉगर साथियों को एग्रीगेटर पर भरोसा नहीं है,हमारे उपर भरोसा नहीं है, जो वो लिख रहे होते हैं,उस पर भरोसा नहीं है इसलिए वो लगातार ऐसा कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि जो भी लोग ब्लॉगिंग कर रहे हैं वो एग्रीगेटर से वाकिफ नहीं हैं,उन्हें लगता है कि जो ब्लॉगिंग कर रहे हैं वो अपनी पोस्ट लिखने के बाद किसी का कुछ नहीं पढ़ते,उन्हें लगता है कि अगर औरों का पढ़ते भी हैं तो शायद मेरी पोस्ट नहीं पढ़ते। शायद इसलिए वो नई पोस्ट लिखते ही मेल जारी करते हैं। एक लाइन में पोस्ट की इन्ट्रो देकर पूरी पोस्ट पढ़ने का अनुरोध करते हैं। कईयों की प्रस्तुति तो विज्ञापननुमा होती है कि अगर आप उनकी पोस्ट नहीं पढ़ रहे हैं तो बहुत बड़ी चीज मिस कर रहे हैं। आप क्यों हरेक पोस्ट के बाद मेल करते हैं।
आपको क्यों लगता है कि आपकी पोस्ट इतनी अलग,यूनिक है कि दुनियाभर के लोगों को इसे पढ़ना चाहिए। ये अहं की पराकाष्ठा है। आपको क्यों लगता है कि आपने इतनी बेकार पोस्ट लिखी है कि किसी की उस पर शायद नजर ही नहीं गयी हो और चलता कर दिया गया हो,आत्मविश्वास की इतनी अधिक कमी, ब्लॉगिंग तो आत्मविश्वास से लवरेज लोगों के लिए है,ऐसे में तो हिट नहीं मिलने पर भी आप बहुत परेशान होते होंगे। इतनी बड़ी दुनिया है, कोई न कोई आपको लगातार पढ़ रहा होगा, इतनी छटपटाहट क्यों मची रहती है। क्यों बेचैन रहते हैं कि मेरी पोस्ट,कमेंट से लद जाए।
चलिए,आपके अनुरोध पर,आपके मेल पर हमने पोस्ट पढ़ भी ली। फिर आप पूछते हैं, कैसी लगी। अच्छी लगी तो क्या चाहते हैं कि ब्लॉग की दुनिया में मुनादी करवा दें कि फलां की पोस्ट मुझे बहुत अच्छी लगी या फिर ये चाहते हैं कि अपने पैसे लगाकर जनसत्ता में आपके नाम इश्तहार छपवा दें। ब्लॉगिंग को स्वाभाविक क्यों नहीं रहने देना चाहते आप? जो लोग भी ब्लॉगिंग कर रहे हैं,मैं मानकर चलता हूं कि उनके बीच पढ़ने-लिखने की पर्याप्त भूख है,उस भूख को बढाने के लिए हमारे-आपके जैसे कोई उत्प्रेरक की जरुरत नहीं है।
मैं खुद ब्लॉगर कम्युनिटी से हूं और ब्लॉगरों को लेकर कहीं कोई कुछ हल्के ढंग से कहता है तो मैं लड़ पड़ता हूं लेकिन एक बड़ी सच्चाई है कि कुछ ब्लॉगर, ब्लॉगिंग कर रहे लोगों को एक ऐसी जमात में ढकेलने में लगे हैं कि उसे इरिटेटिंग समाज का हिस्सा मान लिया जाएगा। हम लाख सह्दय होते हुए जैसे अनचाहे फोन कॉल,मैसेज,बैंकों और मोबाइल के प्लानों को सुन-सुनकर परेशान हो जाते हैं,यही हाल अब ब्लॉगरों द्वारा भेजे गए एसएमएस और मेल का है। जब भी जीमेल खोलिए दर्जन भर मेल पड़े हैं। सब में एक ही बात,इसे पढ़िए,उसे पढ़िए। हम ब्लॉगिंग भीतर की बेचैनी को कम करने के लिए कर रहे हैं,हल्का होने के लिए कर रहे हैं, इस माध्यम के जरिए रोजमर्रा की हलकान को कम करने की कोशिश कर रहे हैं, अब इससे भी बेचैनी होने लगे तब तो दिक्कत है।
आप खुद महसूस कीजिए न कि आपके बिना बताए लोग आकर आपके ब्लॉग की तारीफ करते हैं, पोस्ट पर कमेंट करते हैं,अखबार या पत्रिका में छापने की बात करते हैं तो कितना अच्छा लगता है, कितने स्वाभाविक तरीके से आप खुश होते हैं। लेकिन नहीं,इसे पता नहीं लोग शेयर बाजार बनाना चाहते हैं या फिर आजादपुर सब्जी मंडी की मार मेल पर मेल भेजे जा रहे हैं। अभी तो थोड़ी कम परेशानी लग रही है लेकिन नेट पर आपके नाम से लोग उतने चिढ़ेगे,जितना की एक सेल्समैंन के कॉलबेल बजाने पर चिढ़ते हैं, तब मानवता और आदर्श की बड़ी-बड़ी बातें धरी की धरी रह जाएगी और हम तुरंत लतखोर जमात के लोग करार दिए जाएंगे।
मुझे पता है कि कोई हमें कहे कि इतनी सी बात को लेकर इतना ज्ञान क्यों दे रहे हो या तो बिना पढ़े डिलीट करो या फिर स्पैम की व्यवस्था करो। लेकिन मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि ब्लॉग पर अच्छा-बुरा,महान,घटिया जो मन में आए लिखा जाए लेकिन पोस्ट लिखकर फेरी लगाने का काम न हो तो बेहतर होगा। ऐसा करने से लोग बेहतर चीजों को भी बिना पढ़े डिलीट कर देते हैं,डिफैमिलिएशन का ये रवैया ब्लॉगिंग के लिए सही नहीं होगा।
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फोन पर वो लगभग गुस्से में थे। गुस्सा शब्द इस्तेमाल करने से वो भाव पैदा नहीं हो रहा जो भाव मैं उनसे बात करते हुए महसूस कर रहा था। इसके लिए अपनी तरफ शब्द इस्तेमाल करते हैं,बमके हुए थे, कबड़ गए थे या फिर बमककर फायर हो गए थे...जो भी हो,कथादेश में गिरि यानी उऩके बारे में कुछा लिखा गया है, लोगों द्वारा फोन पर ये बताए जाने के बाद वो ऐसे ही कुछ हो गए थे। फोन पर तो हमें कुछ बोलते बना ही नहीं कि क्या कहा जाए,बाहर थे सो इतना ही कहा-आप ध्यान से पढ़िए,ऐसा कुछ नहीं लिखा है आपके बारे में और वो तो आपके लिए है भी नहीं,वो तो गिरीन्द्र के बारे में लिखा है जो उनसे फेसबुक पर बात हुई थी। कथादेश में सिर्फ गिरि छपा देखा तो मन में खटका हुआ था कि कहीं झमेला न हो जाए, बेकार में निगेटिव पब्लिसिटी न हो जाए। अब मेरे दिमाग में एक ही सवाल बार-बार आ रहा था कि किसी को प्यार से पुकारने में भी झमेला हो सकता है? किसी को प्यार से पुकारने में भी कन्फ्यूजन हो सकता है। खैर,रात में दोबारा फोन करके डीटेल में सबकुछ बताया और साथ में कहा भी कि आप मेरे से बड़े हैं,आप हमें भइया क्यों कहेंगे,तब जाकर मामला नार्मल हुआ।

गिरीन्द्र को मैं प्यार से गिरि कहता हूं,वो मुझे भइया कहता है। ये भइया संबोधन,लड़कियों के उच्चारण भय्या से बिल्कुल अलग होता है। पहले मुझे लगा कि संस्कारवश मुझे ऐसा कहता है इसलिए मैंने टोका भी लेकिन बाद में देखा कि ये संस्कार से ज्यादा लगाव का मामला है तो मैंने कुछ नहीं कहा। वैसे भी पच्चीस साल तक लोगों को भइया-भइया बोलते मेरी जीभ घिस गयी,बदले में दोनों कानों को सिर्फ नसीहतें,आदेश और फटकार ही नसीब हुए तो अब गिरि से भइया सुनने से कानों को राहत मिलती है,सो मैं कुछ कहता नहीं।
आपका किसी से लगाव होता है तो अमूमन पहला काम करते हैं कि उसके नाम को कुछ अपने अंदाज में बदल देते हैं या कोई नया नाम देते हैं। प्रेमी-प्रेमिकाओं के मामले में सिनेमा के जरिए आप सैंकड़ों उदाहरण जुटा सकते हैं। जिस लड़की के मां-बाप ने कुछ और नाम रखे हैं, उसका लड़का दोस्त कुछ अलग नाम से बुलाता है। कई बार तो सेंटी सीन इसी आधार पर बनते हैं कि वो हमें स्वीटी नाम से बुलाता रहा,लेकिन अब...। गांवों में जिस स्त्री का पति पहले मर जाता है तो वो चूड़ी फोड़ते हुए चिल्लाती है- राजा रे राजा, अब हमरा मलकिनी के कहतै रे राजा,छः साल के बेटे को अपनी ओर खींचती है,फिर...राजा रे राजा,अब ऐकरा(इसको)धन्नू(असली नाम धीरज) के कहतै रे राजा। अपने भावों को, प्यार-लाड़,दुलार को जाहिर करने के लिए नाम का बदलना या अपने हिसाब से कोई नया नाम देना आम बात है। कई बार इसी से मूड़ का पता चलता है,महौल औऱ हालात का पता चलता है। कई बार लड़की जब सर्टिफिकेट के नाम से बुलाती है,तब समझ जाइए कि पास में उसका बाप-भाई मौजूद है या फिर वो ऐसी जगह पर है जहां उसकी नोटिस ली जा रही है। मूड़ खराब होने की स्थिति में अपनी ओर से दिया गया नाम लेना आसान नहीं होता,गुस्से को जाहिर करने का संकेत ही होता है कि उसे सर्टिफिकेट के नाम से बुलाया जाए और सुनकर अटपटा लगे।
बचपन में हमारे कई नाम होते हैं,यानी हमारे कई पर्यायवाची शब्द होते हैं,एक ही बच्चे के आधे दर्जन नाम। उसकी हर अदा को लेकर एक नाम,उसके हर ऐब को लेकर एक नाम। दोस्तों की ओर से दिए गए नाम,मां,बाप,पड़ोस,मौसी,चाची औऱ बुआ-फुआ की ओर से दिए गए नाम। इसलिए नाम की कई श्रेणियां बनतीं। पुकरुआ नाम यानी जिस नाम से पुकारा जाता हो,दुलरुआ नाम जिसे कि आमतौर पर मां-बाप रखते हैं,घऱेलू नाम जिसे कि आसपास के लोग जानते-पुकारते हैं। असली नाम जो कि स्कूल में दर्ज होता है। नाम रखने की एक और कोटि होती। गांव-घर में कईयों के यहां बच्चा पैदा होते ही या कुछ दिन के बाद मर जाता,बहुत दिनों तक बच्चा होता ही नहीं,मन्नतें मांगनी पड़ती जिसको मांगल-चांगल बच्चा कहते। ऐसी स्थिति में उसके नाम प्रेम और भावुकता के आधार पर नहीं सुरक्षा के लिहाज से रखे जाते,एकदम हेय समझे जानेवाले नाम जैसे फेकुआ(फेका हुआ),नेटवा(नाक की गंदगी),अघोरी(जो हमेशा गंदा,श्मशान में रहता है)। ऐसे नाम रखने के पीछे की समझ होती कि इससे भगवान को भी घृणा हो या फिर उसे लगे कि ये बच्चा मां-बाप के लिए मामूली है और मारने के लिहाज से नजरअंदाज कर जाए। कुछ लोगों के नाम अपभ्रंश करके बुलाए जाने लग जाते हैं जिसे लोग अपने नसीब का नाम मान लेते हैं। अब दिल्ली दूर नहीं फिल्म में घसीटाराम(नसीब के घिस जाने पर)अपने नाम का तर्क इसी आधार पर बताता है।
इसलिए आप देखते होंगे कि बचपन में आपसे पूछा जाता होगा-आपका क्या नाम है और आप जबाब देते होंगे-रिंकू,चिंटू,मन्नू,मुन्नी,सुल्ली,बेबी या फिर फेकू तो आपसे दुबारा पूछा जाता होगा- ये तो घर का नाम है,असली नाम क्या है। असली नाम माने स्कूल का नाम। तब आप मेहनत-मशक्कत करके बताते होंगे-धीरज,राजेश,सुभाष,माधुरी,रजनी,अर्चना आदि-आदि। मतलब ये कि घर के नामों में भावुकता या अपनापा झलकने पर भी इसे असली नाम नहीं माना जाता क्योंकि जीवन भावुकता से नहीं,व्यावहारिकता से चलती है, इसलिए इसके लिए असली नाम चाहिए होते हैं,यानी स्कूली नाम। जब हम बड़े होते हैं तो एक अदब आने लग जाती है,इगो सेंस पैदा होता है, हम चाहते हैं कि लोग हमें अपने असली नाम से पुकारे,अकेले में गर्लफ्रैंड जानू,तानी पार्टनर कह ले लेकिन समाज में असली नाम ले,मां-बाप भी ऐसा ही करे। इसलिए कई बार बड़े हुए बच्चे पिंकू,झुनकी कहने पर तुनक जाते हैं- मां अब हम बड़े हो गए हैं, सबके सामने आप ये नाम बोलती हैं, अच्छा नहीं लगता। पड़ोस की लड़की के घर का नाम स्कूल में दोस्तों को बता दो तो वो शर्म से पानी-पानी हो जाती है। मेरी एक लड़की दोस्त ने मजाक में कहा करती है आगे से जहां तुम हमको टिनिया बोले तो चार जूता मारुंगी.ये अलग बात है कि शहर में उसका ये नाम उसे अपनापा-सा लगता है।
बड़े होकर हम चाहते है कि कोई हमारा दुलरुआ नाम न ले,पुकारु नाम न ले,घरेलू नाम न ले, इससे हमारे बड़े होने का एहसास खत्म होता है,हमारा कद छोटा होता है, हमारे बैग्ग्राउंड का पता चल जाता है, जिसे कि हम धो-पोछकर खत्म कर देना चाहते हैं। लेकिन यहां का तो झमेला ही अलग है- एक ही नाम लिया गिरि जिसके लिए ये दुलरुआ नाम है, वो इतरा रहा है,खुश हो रहा है और दूसरा जिसका कि असली नाम है,बबमकर फायर है। अब किसी को है हिम्मत कि कहे-भइया नाम में क्या रखा है।
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वो अपने टिस्स के हॉस्टल(टाटा इन्स्टीट्यूट ऑफ सोशल साइन्सेज,मुंबई)का कमरा छोड़कर,एनेक्जायटी डिस्ऑर्डर की स्थिति में,एम.फिल् कर रहे एक सीनियर दोस्त के कमरे में दसों दिनों तक पड़ा रहा। चुपचाप,गुमसुम,बिना किसी को कुछ बताए, किसी बात पर अपनी प्रतिक्रिया जाहिर किए बगैर...। अगर उसी के शब्दों में कहूं तो

टिस्स में सबसे ज्यादा विजिवल लड़का,ऐसा कैसे कर सकता है, सोचता हूं तो ताजुब्ब होता है। लेकिन इन सबके बीच ये भी एक सच है कि कभी शराब को नहीं छूनेवाला,सिगरेट को जिसने कभी हाथ तक नहीं लगाया और उस दिन पूरी की पूरी बोतल पी गया, कितना पानी या सोड़ा मिलाया पता नहीं, आठ सिगरेट एक के बाद एक पी गया, कितनी कश मारी और कितने को फिल्टर तक आने पर भी कश खींचता रहा, कुछ भी याद नहीं। बस इतना याद करता हूं कि अगर मैं ट्रेन से सफर करने जा रहा हूं और चढ़ने के पहले ही लड़खड़कर गिर जाउं तो मेरी जिंदगी का सबसे बेहतरीन दिन होगा। मरने की स्थिति में इसके लिए न तो कोई जिम्मेवार होगा औऱ न ही बच जाने की स्थिति में आत्महत्या के प्रयास में फिर से मौत को दोहराने जैसी जिंदगी जीनी पड़ेगी। भैय्या, सबकुछ भूल जाने की स्थिति में मैं अब भी इस बात को याद करता हूं, ऐसे जैसे कि ये मेरे साथ घटित हुआ है या फिर इसका कुछ न कुछ हिस्सा अभी भी किस्तों में जी रहा हूं। ये एक टिस्स से महीने भर में सोशल वर्क की डिग्री लेकर दुनिया में समाज बदलने के जज्बे को लेकर संस्थान से बाहर आनेवाले छात्र का सच है।

यह एक उस छात्र का सच है जिसने तीन साल तक मीडिया की पढ़ाई की, अखबारों में जमकर लिखा, आजतक में 45 दिनों तक आर्थिक खबरें लिखीं,दिल्ली की समस्याओं पर "जनपथ" जैसे कार्यक्रमों में अपनी रुचि से जाता रहा...हर बार एक नए विचारों के साथ,एक नयी बहस के साथ और एक नए अंदाज में हमसे टकराता रहा,घंटों विडियोकॉन टावर के नीचे चार रुपये की मूंगफली पर हमें दुनियाभर की नसीहतें देता रहा और अंत में कहता आया- भैय्या,आप तो मेरे से बड़े हैं,आप बेहतर जानते हैं। ये उस साथी का सच है जो एक समय में मीडिया के जरिए समाज को बदलने के लिए नहीं तो कम से कम बेहतर करने के लिए बेचैन रहा और बाद में और अधिक योगदान देने की नीयत से किसी चैनल में नौकरी करने के बजाय,एमए करने सीधे टिस्स मुंबई चला गया। वहां जाकर वो लगातार मीडिया के उन माध्यमों पर काम करता रहा, वर्कशॉप में जाता रहा जो कि कम लागत में लोगों को जागरुक कर सके, कभी सामुदायिक रेडियो को समझने, एक महीने के लिए अहमदाबाद चला जाता,कभी हैदराबाद तो कभी "सेवा" के लोगों के साथ वैकल्पिक मीडिया को लेकर प्रोजेक्ट पर काम करने लग जाता। मैं उससे एक ही बात कह पाता- तुम जितना काम करते हो और वो भी अलग-अलग जगहों पर जाकर,मेरे लिए तो काम करना तो दूर, सिर्फ वहां चला जाउं तो ही बहुत है। फोन पर तो कम ही लेकिन ऑनलाइन होने पर एक ही बात कहता- एक बार समाज को लेकर सोचिेए तो आप भी कर लेंगे। हमेशा भीतर एक आग, कुछ करने की छटपटाहट,एक ही बात- दिल्ली लौटूंगा भईया,और बेहतर होकर, और जोरदार तरीके से। आज वो बताता है कि उसे लो ब्लडप्रेशर हो गया है और वो दो दिनों तक हॉस्पीटल में भर्ती रहा। ये टिस्स में पढ़ रहे उस छात्र का सच है जो कल कहीं भी जाएगा तो बीस-पच्चीस लोगों के लिए गाइडलाइन तय करेगा कि समाज को बेहतर बनाने के लिए क्या करने चाहिए, जैसा कि संस्थान का दावा है। वो पढ़ाई के जरिए सिर्फ बेहतर इंसान बनने नहीं गया, बेहतर इंसान बनाने की समझ विकसित करने गया। आज वो देर रात कह रहा है, चैट करते हुए कितना कहूं,क्या कहूं भइया और फिर उसने फोन ही कर दिया। उखड़ी हुई आवाज,बार-बार बातों का टूटता क्रम और भीतर से एक डर भी कि कहीं आसपास कोई है तो नहीं,बात करते हुए अब रो देगा कि तब।
भइया, ऐसी जगहों पर आकर हमारा कितना बड़ा मिथक टूटता है,हम छोटे शहरों से आकर डीयू में पढ़ते हैं,टिस्स में पढ़ते हैं,मन के भीतर औऱों से अलग और फिल्टर्ड होने का भाव होता है। हम यहां आकर जातिवाद को खत्म करना चाहते हैं,सामाजिक भेदभाव को दूर करना चाहते हैं। दुनिया हम जैसे लोगों को गरियाती है कि मोटी रकम देकर पढ़ने के बाद लोगों के खून चूसकर जमा किए पैसे को सैलरी के तौर पर लेगा और कहता है कि समाज बदलेंगे। गुस्सा तो बहुत आता रहा कि लोगों को ऐसा कहने का क्या अधिकार है लेकिन अब लगता है कि लोगों को गरियाने का पर्याप्त अधिकार है। वो क्यों न गरिआएं, हम किसकी स्थिति सुधारने में लगे हैं। किसके बीच से जातिवाद खत्म करना चाहते हैं,कौन-सा सामाजिक भेदभाव दूर करना चाहते हैं, किसके लिए गाइडलाइन तय करने की ट्रेनिंग ले रहे हैं, अपने लिए या फिर उन गरीबों के लिए, देश की गटर में पैदा होकर दम तोड़नेवालों के लिए जो कल एनजीओ में जाने पर वो हमारी भाषा तक नहीं समझेंगे।..औऱ हमारे लिए जाति,भेद,उंच-नीच,ब्राह्मण-राजपूत, सब कुछ पहले से तय भेदभावों के आधार पर चलता रहेगा।

आगे भी जारी.....
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इलेक्सन के एक दर्जन नारे

Posted On 1:28 am by विनीत कुमार | 7 comments


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1.
खिला कमल है आर्कुट पर,
वोट न डालो चिरकुट पर
(जनहित में जारी)

2. लालूजी,लालूजी क्या हुआ आपको
कुर्सी के चक्कर में सटा लिए सांप को
(बिहार की जनता)

3. तूफां आए या आ जाए आंधी
कभी न आएगा कोई गांधी
(सोनिया का फैसला)

4. भाजपा के शासन में
चावल पैंतीस रुपये बोरी होगा
जागो रे प्रजा दुखारी
धान के खेत में चोरी होगा
( विदूषक)

5. जनता की आस्था का, खुलेआम व्यापार होगा
लालकृष्ण के राज में,श्रीराम का अवतार होगा
( विपक्षी पार्टियों का अनुमान)

6. सौगंध राम की खाते हैं
मंदिर वही बनाएंगे
वोट मांगने लेकिन तब भी
मस्जिद में भी जाएंगे।
(बीजेपी की चुनावी घोषणा)

7. सरकार व्यस्त है नैनो में
झाकों नेता हमरी नयनों में
(कारविहीन देश की जनता)

8. स्विस बैंक काला धन
अपने देश में लाएंगे
काला-केसरिया फेंट-फेंटकर
उजला उसे बनाएंगे।
(बीजेपी कार्यकर्ता की योजना)

9. देश का पीएम कैसा हो
ऑडियो टेप जैसा हो
मनमोहन सिंह को लाएंगे
पलट-पलटकर बजाएंगे।
(कांग्रेस की योजना)

10. अमर सिंह को है आनंद
मिल गए उनको देवानंद
फिलिम पर्दे पर जब आएगा
होम मिनिस्टरी मिल जाएगा
( सपा कार्यकर्ता हैं निश्चिंत)

11. कांग्रेस,बीजेपी गो अवे
कम अगेन अनगर डे
बहनजी नाउ वॉन्ट्स टू प्ले
(यूपी पाठ्यक्रम की नयी राइम्स)

12. राजनीति के खेल में
सब उल्टा हो जाता है
मुन्नाभाई एमबीबीएस का भी
यहां तेल हो जाता है।
( राजनीति का सच)

( सारे नारे स्वरचित है। ये किसी भी राजनीति पार्टी से वित्त प्रदत्त नहीं है।)
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कहीं ये अश्लील तो नहीं

Posted On 11:27 am by विनीत कुमार | 14 comments


शोरुम के आगे लगी प्लास्टिक की एक कठपुतली की हिप पर हाथ फिराते हुए उस लड़के ने कहा- क्या सामान है!आगे साथ चल रही दो लड़कियों ने जल्दी से पीछे मुड़कर देखा कि कहीं पीछे से कोई मनचला उस पर कमेंट तो नहीं कर रहा। तब तक उसके साथ के दूसरे लड़के ने हाथ फिराते हुए कहा- सचमुच यार। लड़कियां समझ गयी कि ये उसे नहीं कहा जा रहा है बल्कि कठपुतलियों को देखकर कहा जा रहा है,सच्चाई ये भी है कि हमें देखकर कठपुतलियों को कहा जा रहा है। लेकिन सीधे-सीधे वो उनसे बहस करने के बजाय इतना ही कहा- फ्रस्टू है स्साला। अपने इलाके की लड़कियां होती तो शायद कहती, घर में मां-बहन नहीं है क्या।

कमलानगर में दो दूकानें ऐसी हैं जहां गार्मेंट से ज्यादा उनके यहां कठपुतलियां हैं,ये मुहावरा हो सकता है लेकिन वाकई उनके यहां बहुत सारी कठपुतलियां हैं औऱ सबों को वो फैशन के हिसाब से ड्रेस पहनाकर शोरुम के आगे लगाए रहते हैं। एक शो रुम है बेसमेंट में है, उसके उपर कलर प्लस और किलर का शोरुम है। यहां कम से कम बीस-पच्चीस कठपुतलियां तो जरुर होगी। अक्सर इन्हें बहुत छोटे कपड़े पहनाकर आगे लगाते हैं,स्कर्ट या फिर शार्ट पैंट। बदलते फैशन की झलक इस शोरुम से गुजरते हुए आपको आसानी से मिल जाएंगे। लड़कियों और कठपुतलियों को एक-दूसरे से जोड़कर लड़को को आपस में कोहनी मारते हुए,ठहाके लगाते हुए और कमेंट करते हुए सबसे ज्यादा यही देखता हूं।

एक शोरुम प्रेम स्टुडियो के सामने है। उस शोरुम में भी करीब 15-20 से बीस कठपुतलियां हैं। इन दिनों देखा कि सबों को हल्के पिंक कलर की नाइट शूट पहना रखा है। एक तो नाइटी, दूसरा कि प्रिंटेड कुर्ते और नीचे ढीला पायजामा। सबों का स्टफ बिल्कुल ट्रांसपेरेंट। एक बार साथ घुमते हुए पोल्टू दा ने कहा- सोने की चीज को पहनाकर इन लड़कियों को दुकानदार ने खड़ा क्यों कर रखा है,सही चीजें सही जगह पर ही होनी चाहिए। फिर वही ठहाकें।

मुझे याद है कि जब भी घर जाता हूं और दूकान पर बैठने का मौका मिलता है, आसपास के दूकानदार कठपुतलियों के कपड़े को शटर गिराकर बदलते हैं। अव्वल तो वो रात में ही बदलते हैं। लेकिन दुकानदारों में एक बेचैनी होती है कि जो आइटम नया-नया आया है उसे जल्दी से जल्दी से डिस्प्ले कर दो। उनका मानना होता है कि डिस्प्ले करने के दिन कुछ न कुछ वो आइटम तो बिकता ही है। अगर आइटम दोपहर को आया है तो ऐसी स्थिति में वो शटर नीचे गिरा देते हैं, फिर साइड में ले जाकर इन कठपुतलियों के कपड़े बदलते हैं। ये बहुत कॉमन है। मैंने कभी नहीं देखा कि वो पब्लिकली उनके कपड़े बदलते हों।

एक बार पास के एक दूकान में काम करनेवाले लड़के को कहते सुना- गजब ठरकी है स्साला बुढ़वा, हमसे कह दिया कि इस साड़ी का मैचिंग ब्लाउज लेकर आओ औऱ आए तो देखा कि कठपुतलिए पर हाथ फिरा रहा है। एक मानसिकता ये भी है। हमारे शहर में दिल्ली की तरह हाट लगता है,दिनों के नाम के हिसाब से इनके नाम होते हैं। इसमें से एक हाट का नाम होता है मंगला हाट। शहर में जिन लोगों के स्थानीय दूकान हैं,वो अपने पेंडिग माल के साथ दूकान के किसी एक-दो स्टॉफ को भेज देते हैं। इस हाट में चाहे कुछ भी कितना ही घटिया सामान ले जाओ, बिक जाएंगे। लड़के माल के साथ-साथ कठपुतलियां भी ले जाते हैं लेकिन वो पूरे नहीं होते। बस उपर का हिस्सा। एक तो लाने,ले जाने में परेशानी और फिर मंहगे भी होते हैं, हाट में इतनी धक्का-मुक्की होती है कि अगर गिर जाए तो बिजली-बत्ती गड़बड़ा जाती है। मंगला हाट में आमतौर शहरी लोग सिर्फ सब्जियों औऱ छोटी-मोटी चीजें खरीदने जाते हैं,वहां से कपडे,बर्तन,जूते जैसी चीजें नहीं खरीदते। इसे खरीदनेवाले कस्बों से आए लोग होते हैं। झुंड की झुंड लड़कियां, इन्हीं कस्बों और आसपास के गांव से आयी लड़कियां। लड़के जब ठीक-ठाक कपड़े बेच लेते हैं तब जोश में आ जाते हैं फिर लड़कियों को देखकर चिल्लाते हैं- ये लो,ये लो सामान के लिए बढ़िया सामान,बाजिब दाम में सामान के लिए सामान। हाट-बाजार में लगानेवाली हांक पर गौर करें तो उसका एक बड़ा हिस्सा ग्राहकों पर किया जानेवाला व्यंग्य होता है,दूकानदार चुटकी लेते नजर आते हैं।

कठपुतलियों को लेकर मसखरई औऱ लड़कियों पर फब्तियां कसे जाने के लिहाज से देखें तो 360 का सर्किल पूरा हो जाता है जिसमें किसी न किसी रुप में बाजार में शामिल अलग-अलग लोग आ जाते हैं, सामान बेचनेवाले दूकानदार से लेकर खरीदार तक,ये कहते हुए कि...स्साला अब ऐसी कठपुतली बनने लगा है कि लगता है सच्चोमुच्चो कोई लड़की खड़ी है और परपोज कर रही है
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