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तो तुम देहरादून के इस राजपुर रोड़ से अंडे लाने कहां जाते हो ? वाल्मीकिजी ने दून रीडिंग्स में जब देखा तो बिना कुछ पूछे पहला सवाल यही किया और जब तक मैं कुछ कहता, उनकी पत्नी चंद्रावतीजी ने जोर से हंसते हुए कहा- अच्छा, तो इस गर्मी में भी अंडे खाना जारी है..नहीं-नहीं, वो तो शिमला में खाया करता था न, सितंबर की ठंड से बचने के लिए, अप्रैल की इस गर्मी में थोड़े ही न. सच पूछिए तो शिमला में रहते हुए अंडे खाने जाना तो बहाना भर होता, हम तो किसी और नियत से रोज शाम कट लेते. वो काफी देर मेरी हथेली पकड़े रहे और पढ़ाई-लिखाई के पहले स्वास्थ्य को लेकर पूछते रहे. वाल्मीकिजी से ये मेरी दूसरी और आखिरी मुलाकात थी.

सितंबर 2010 में शिमला उच्च अध्ययन संस्थान( IIAS) ने दस दिनों के लिए हिन्दी की आधुनिकताः एक पुनर्विचार पर साहित्य और सामाजिक विज्ञान के अलग-अलग संदर्भों से जुड़े लोगों को बुलाया था जिसका एक सत्र माध्यमों पर आधारित था. कार्यक्रम के संयोजक अभय कुमार दुबे ने हमे भी टेलीविजन की भाषा पर पर्चा पढ़ने का मौका दिया था और बाकी विषयों के साथ-साथ स्त्री और दलित विमर्श पर पूरे-पूरे दिन के सत्र थे. ओमप्रकाश वाल्मीकि से वही मेरी पहली लेकिन सबसे लंबी और गहरी मुलाकात थी. इतनी गहरी और गाढ़ी कि इन सात दिनों में रोज शाम घंटों उनके साथ बैठकर उनके जीवन को सुनने की आदत सी पड़ गई थी..कभी यकीन ही नहीं होता था कि एक दिन ऐसा भी आएगा कि शिमला के राष्ट्रपति निवास का वो कमरा और वाल्मीकिजी के साथ की शाम एक साथ छूट सकती है.

 यकीन मानिए, उस कमरे में वाकायदा वाल्मीकिजी की चौपाल सजती थी. मैं, पटना से आए प्रमोद रंजन( फारवर्ड प्रेस के मौजूदा संपादक), शीबा असलम फहमी, राजीव रंजन गिरि, तब सीएसडीएस-सराय से जुड़े राकेश कुमार सिंह और फिलहाल अंतिम जन का संपादन कर रहे राजीव रंजन गिरि. इनमे एक-दो इधर-उधर हो जाते लेकिन अमूमन मैं और राकेशजी तो होते ही होते. चंद्रावतीजी के मुझ पर अतिरिक्त स्नेह किए जाने पर हम उनके मच्छरदानी लगाए जाने तक उनके ही कमरे में जमे रहते और वैसे भी निवास के उतने बड़े कमरे में मुझे अकेले सोने का मन भी न करता. खैर,

होता यूं था कि सुबह के दस बजे से लेकर शाम के छह बजे तक हम जैसे बच्चे दुबेजी की क्लास से छूटकर इधर शिमला के माल रोड की रंगीनियत देखने मचल उठते तो उधर हमसे बड़े बच्चे मसलन संजीव और रविकांत आचमन क्रिया के लिए..अब सारे सत्र खत्म होने के बाद भी ऑफटाइम जिरह न होने लग जाए, मैं तेजी से अंड़े खाने के बहाने से रोज माल रोड की तरफ भागता. इस बीच कोई मुझे खोजता कि चंद्रावतीजी पूरे आत्मविश्वास से कहती- वो तो अंडे खाने माल रोड गया है, आएगा तो इधर ही आएगा. और होता भी यही था कि मैं माल रोड से सीधे वाल्मीकिजी के कमरे पहुंच जाता. फिर धीरे-धीरे बाकी लोग भी या पहले से ही जमे रहते लोग.

फिर न जाने कितनी देर, जब तक मेस का खाना खत्म हो जाने का डर न सताने लग जाता, तब तक हम उनकी बातें, संस्मरण सुना करते..चार-पांच दिन लगातार सुनने के बाद हमने कहा भी- सर, आपको नहीं लगता, जूठन को फिर से लिखा जाना चाहिए. मेरा मतलब है जो बातें अभी आप कह रहे हैं, उसे भी शामिल कर दें.. हालांकि वो ज्यादातर बार अपनी बातें रखते हुए कहते- हम कुछ नया नहीं कह रहे हैं, सब कहीं न कहीं लिखा है. लेकिन उनकी जुबानी सारी बातें सुनकर लगता कि हम जूठन का न केवल पुनर्पाठ कर रहे हैं बल्कि स्वतंत्र एक ऐसी रचना से गुजर रहे हैं जो सिर्फ एक दलित लेखक की आत्मकथा नहीं है बल्कि एक ऐसे दुस्साहसी नागरिक की कहानी है जो जाति की जकड़नों से तो अपने को मुक्त कर ही रहा है साथ ही साथ नागरिक समाज की विसंगतियों को सीधे चुनौती दे रहा है..वो जितना धार्मिक सत्ता को चुनौती दे रहा है, उतना ही उन सार्वजनिक संस्थानों के रवैये को भी जिसका मारा और जिसके भीतर सिर्फ दलित ही नहीं पिसता है. जूठन, सलाम और अन्य कहानियों का पाठ करते हुए कई बार हम इसे अलग से रेखांकित नहीं कर पाते लेकिन थोड़े वक्त के लिए अगर लेखक का दलित होना हटाकर भी देखें( हालांकि ये राजनीतिक स्तर पर पूरी तरह गलत होगा) तो भी रचना और व्यवहार के स्तर पर जड़ हो चुके संस्थानों से सीधे टक्कर लेते ये एक असाधारण व्यक्तित्व के रुप में नजर आते हैं जो कि प्रत्यक्ष रुप से आसपास के रचनाकारों में ऐसे कम ही दिखाई देते हैं. ऐसे में उनकी पूरी रचनाधर्मिता को दलित के खांचे में लाकर देखने से एक स्वतंत्र और मजबूत पहचान तो बनी है लेकिन जीवन के स्तर पर जो व्यवहार और समझ की झलक बार-बार उनकी लंबी बातचीत से निकलकर आती रही, वो कायदे से रेखांकित नहीं हो पाया. ये लेखक अपने जीवन और रचना में ठीक वैसा ही था जैसा कि हम एक प्रतिबद्ध क्रिएटिव माइंड की कल्पना में देख पाते हैं..

खैर, जो वाल्मीकिजी अपनी हर आगे कही जानेवाली बात के पहले कहते आए कि ये मैंने पहले भी लिखा है, जूठन को फिर से लिखे जाने पर कहा- हां, सही कह रहे हो,यहां से जाने के बाद इस पर प्लान करते हैं..मुझे नहीं पता कि इस दिशा में उन्होंने फिर कुछ किया भी या नहीं लेकिन ऐसा किए जाने से जूठन और संवर्धित होती.

बेहद करीब से उनके साथ बिताए गई करीब ये सात शामों में मैंने साफ-साफ महसूस किया कि इस लेखक ने अपने जीवन में चाहे जितने भी अपमान, ऑफिस में भेदभाव सहे हों और एक हद तक साहित्यिक दुनिया में दुर्भावना के शिकार हुआ लेकिन जीवन के प्रति अद्मय उत्साह क्या होता है, कोई इनसे सीखता..अव्वल तो किसी भी काम या सम्मान के पीछे मैं-मैं नहीं...एक मामूलीपन लिए रंगमंच के चरित्र की शक्ल में अपनी बात रखने की अदा उन्हें हिन्दी के दिग्गज रचनाकारों से कितनी अलग कर जाती थी, ये बात मैं रोज शाम महसूस करता और अगली शाम का इंतजार करता.. उनके जाने की खबर के बीच जब मैं उन्हें याद करता हूं तो उसी मामूलीपन अदा के बीच विचारों की भव्यता का ध्यान आता है.

शिमला में वाल्मीकिजी ने दलित लेखन की आधुनिकता और सांस्कृतिक विरासत पर अपनी बात रखी थी. हालांकि सत्र की शुरुआत में ही अभय कुमार दुबे ने ये कहा था कि इस राष्ट्रपति निवास की छत इतनी उंची है कि किसी भी विचारधारा को,किसी भी मत से टकराने में कोई असुविधा नहीं होगी,ये विचारों का कारखाना है और हम सब यहां मिस्त्री हैं इसलिए जो चाहें,जैसे चाहें,स्वाभाविक तरीके से अपनी बात यहां रख सकते हैं।  लेकिन वाल्मीकिजी की बात के बाद माहौल में खासी गर्माहट पैदा हो गयी थी जो कि स्वाभाविक ही था..उन्होंने बेहद ही स्पष्ट तरीके से कहा था कि " अकादमिक जगत के हिन्दी साहित्य और हिन्दी के विद्वानों पर आरोप लगाते हुए कहा कि जो बदलाव के साहित्य है उसे अकादमिक जगत में,कोर्स में शामिल नहीं किया जाता औऱ इधर इन विद्वानों की सोच में दलित के लिए किंचित मात्र भी संवेदना का कोई अंश नहीं रहा है।..जिस मुख्यधारा का हिस्सा ये विद्वान और साहित्यिक लोग हैं,कम से कम उस मुख्यधारा से स्वयं को जोड़ने की मेरी कोई इच्छा नहीं है। हिन्दी के आलोचक,लेखक,बुद्धिजीवी,दलित साहित्य की आंतरिकता को समझने से पहले ही उस पर तलवार लेकर पिल पड़ते हैं। उसे अधकचरा,कमजोर शिल्पहीन जैसे आरोपों से सुसज्जित कर अपनी साहित्यिक श्रेष्ठता का दम्भ भरने लगते हैं। दलित लेखकों की बात को ठीक से सुने बगैर या बिना पढ़े वक्तव्य देने का रिवाज हिन्दी में स्थापित हो चुका है,इसकी चपेट में महान नाम भी आ चुके हैं जिन्हें हिन्दी जगत सिर आंखों पर बिठाये हुए है।" इस बात पर वहां जो बहस होनी थी वो तो हुई ही, उस शाम वो थोड़े अस्वाभाविक लेकिन ज्यादा तल्ख अंदाज में अपने संस्मरण सुना रहे थे.


मैं लगातार महसूस कर रहा था कि ये लेखक अपने लिखे शब्दों और कही बातों को लेकर कितना प्रतिबद्ध है, वो घालमेल की विचारना में रत्तीभर न तो खुद पड़ता है और न ही उस समुदाय के पड़ने की पीड़ा को किसी भी रुप में बर्दाश्त कर पाता है जिसे कि उत्थान के नाम पर उत्पाद की शक्ल में देखा-समझा जाता रहा है. ये वो शाम थी जिसमे हम देख पा रहे थे कि वो उनका व्यक्तिगत अनुभव और भोगा हुआ सच बहुवचन बनकर एक ठोस विमर्श की शक्ल में स्थापित हो पाया है. उन्हें ये बात खुलेआम कहने में कभी कोई संकोच नहीं हुआ कि जिस हिन्दी साहित्य पर मठाधीशों को नाज है, ये उनका साहित्य नहीं है..



किसी लेखक के साथ इतने लंबे और आत्मीय होने का इसके पहले और अब तक का कोई अनुभव नहीं रहा. बहुत ही भारी मन से और  रोने-रोन की हालत में उनसे विदा लेना हुआ था. देहरादून आना तो जरुर मिलना और आप दिल्ली आइएगा तो जरुर बताइएगा के साथ हम अपने-अपने ठिकाने पर लौट आए थे.



दून रीडिंग्स में लगभग सात महीने बाद एक बार फिर उन्हें सुनने का मौका मिला. अबकी बार विषय बहुत स्पष्ट तो नहीं लेकिन सत्र का नाम था- विंड ऑफ चेंज. इस सत्र में वाल्मीकिजी की बातों में शिमला से ज्यादा गर्माहट थी..ज्यादातर अंग्रेजीदां पत्रकार अब तक बेस्टसेलर और बेस्ट शोवर में ही डोल रहे थे,वाल्मीकिजी के बोलने के बाद उन्हें घेर लिया. हिन्दी के कुछ शब्दों को उन्होंने अलग से नोट किया था जिसका अर्थ हम जैसों से पूछने के बाद उनसे सवाल-जवाब करने लगे थे. इस सत्र में उन्होंने कहा था- हो सकता है कि संतों ने समाज में बयार लाने का काम किया जैसा कि भक्ति साहित्य बताता है लेकिन दलितों को बयार नहीं, चक्रवात लाने की जरुरत है और ये सामंजस्य से नहीं संघर्ष से आएगा.



वाल्मीकिजी को मैंने जितना पढ़ा और जो दो बार सुना उतने से ये समझ पाया कि उन्होंने सामंजस्य के नाम पर जबरदस्ती ग्रे एरिया पैदा करने की कोशिशें नहीं की बल्कि इस ग्रे एरिया के बीच भी स्याह-सफेद स्थिति को बारीकी से देख पाने की काबिलियत थी. वो जब हिन्दी साहित्य को अपने लिए गर्व की चीज नहीं और हिन्दू होना अपमानित होना है ( क्योंकि इसी ने अछूत करार दिया) मानते हैं तो उस स्पष्टता की ओर बढ़ते हुए एक समानांतर विमर्श और सत्ता कायम करने की तरह बढ़ते हैं जो कि अस्मितामूलक विमर्श का बीज बिन्दु है. हिन्दी के मठाधीशों ने विमर्श के इस रुप को या तो विरुद्धों का सामंजस्य वाली कलछी से घाटकर उसी तथाकथित कालजयी साहित्य में एक करने की कोशिश की या फिर सौन्दर्यशास्त्र और भाषा के स्तर पर नजरअंदाज करने की कोशिश की लेकिन इस संबंध में वाल्मीकिजी ने जो तर्क प्रस्तावित किए, उनका लगातार पाठ जरुरी है.



मुझे तो तब ज्यादा हैरानी हुई जब दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र, जूठन, सलाम से लेकर बाकी रचनाएं एक के बाद एक पढ़ता गया और भाषा-अभिव्यक्ति के उस धरातल पर इसे महसूस किया जो हमें अपने आरामदेह हॉस्टल के कमरे से उठाकर उस बस्ती की ओर धकेलती जान पड़ी जिसे पैदल चलकर न जा पाने और दूर से ही हिकारत रखते हुए संवेदना के नकली शब्द गढ़ने की कला सीखने की कवायद में लगे रह जाते हैं. हिन्दी के दिग्गजों को कुछ नहीं तो इस बात के लिए वाल्मीकिजी का शुक्रिया तो अदा करनी ही चाहिए थी कि उन्हें उन सडांध और गंदी बस्तियों में नाक पर रुमाल रखकर जाने की जहमत उठाए बिना उसके भीतर की दुनिया से अवगत करा दिया जिस पर "नक्काशी आलोचना" करके पहले से और नामवर हुआ जा सकता है. वाल्मीकिजी का लिखा आप कुछ भी पढ़ेंगे और फिर दलित साहित्य की भाषा और आत्मकथात्मकता से आगे न बढ़ने के आरोप से गुजरेंगे तो लगेगा कि आलोचना की दुनिया भी राजनीति की उस सुनियोजित एजेंड़े से अलग नहीं है जहां प्रक्रिया को गायब करके मुद्दे को पंक्चर करना विशेष कला योग्यता के अन्तर्गत आता है. यहीं आकर हमारी आलोचना की दुनिया खुला आसमान न होकर टांट की छेद से झांकता चाद नजर आता है.



इधर बतौर अकादमिक से सरकते हुए सोशल मीडिया में विमर्श का हिस्सा बन रहा दलित विमर्श जिसमे अन्वेषण से कहीं ज्यादा विमर्शों की डिब्बाबंदी ज्यादा है, एक अजीब किस्म की कठदलेली है, दलित चिंतक होने की शर्तों ने कुछ चालू फैशन स्टंट इजाद कर लिए हैं, वाल्मीकिजी का लिखा-पढ़ा इनके लिए बड़ी चुनौती मनकर सामने आते हैं. ऐसा इसलिए कि उनके लेखक और कथन की सबसे बड़ी ताकत पाठ-प्रभाव की एक पूरी प्रक्रिया रचती थी जिससे पहली बार गुजरते हुए आप बेहद भावुक,संवेदनशील हो उठते हैं, आंखों में आंसू छलक आते हैं लेकिन अगले ही पल वो आंसू पाठ की वैचारिकी से गर्भ हो भाप बनकर तीखे तर्क और अलग-अलग स्तर की व्यवस्था के प्रति असहमति और प्रतिरोध में बदलते चले जाते हैं. जो लोग वाल्मीकिजी जैसे लेखक के रास्ते को फार्मूलाबद्ध करने की फिराक में मैंदान में उतरें हैं, आप गौर करेंगे कि उनके पाठ से ये प्रक्रिया बनने के बजाय कोई आधी-अधूरी, फ्रैंक्चरड़ एक्सप्रेशन बनकर रह जाती है जो प्रतिरोध के बजाय वेवजह की हिकारत, इनो के बुलबुले पैदा करके रह जाते हैं..



आमतौर पर ऐसे लेखक के जाने के बाद एक मुहावरा सा इस्तेमाल होना शुरु हो जाता है- वो शरीरी रुप से हमसे दूर हुए हैं, वैचारिक रुप से नहीं. ऐसा करके हम उनके काम को अधिक महत्व देने की कोशिश करते हैं लेकिन ओमप्रकाश वाल्मीकि का शरीरी रुप से हमारे बीच से चले जाना उतना ही बड़ा नुकसान है क्योंकि ये लेखक अपने जीवन के स्तर के प्रतिरोध के बीच से जीता आया था, और जीता तो हम और प्रेरित होते...अपनी मौत की प्रोमो तो कुछ महीने पहले दे गया था, शायद ये एहसास कराने के लिए कि हिन्दी की दुनिया के पास मर जानेवाले लेखकों पर पत्रकाओं के विशेषांक निकालने के अलावे क्या और किस स्तर की तैयारी होती है..संरक्षण कोष और अशोक वाजपेयी की कोशिशें चर्चा में आयीं थी लेकिन हमने जब किसी के गुजर जाने के लिए दो-चार घंटे के मातम की फिक्स्ड डिपोजिट पहले से ही कर दी होती है तो बार-बार उसे लेकर भावुक होने का क्या तुक बनता है...हम इस क्रूर सच के बीच तब भी दुहराते हैं, वो शख्स हमें बार-बार यही कहता रहा- 




"मेरी जरूरतों में एक नदीं भी है… कागज, कलम और आस-पड़ोस।" 



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1 Response to 'ओमप्रकाश वाल्मीकिः जो डिब्बाबंद विमर्श के खिलाफ डटे रहे'
  1. नीलिमा शर्मा
    http://taanabaana.blogspot.com/2013/11/blog-post_19.html?showComment=1384973217843#c4417096094980602086'> 21 नवंबर 2013 को 12:16 am

    नमन

     

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