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सरकार निजी टीवी चैनलों के मामले में समय-समय पर जिस तरह के पैंतरे दिखाती है, एक आम दर्शक को लगता है कि वो निजी चैनलों के रवैये से खासा नाराज रहती है और चाहती है कि वो अपने भीतर पर्याप्त सुधार करे,सामाजिक विकास की दिशा में काम करे..लेकिन सच्चाई ये है कि खुद सरकार भी इन्हीं निजी चैनलों की एक बड़ी विज्ञापनदाता है जो इनकी हडिड्यां मजबूत करती है. दोनों के बीच सेवा प्रदाता और ग्राहक का रिश्ता है और कई बार इस रिश्ते की डो इतनी मजबूत दिखाई देती है कि निजी टीवी चैनल विज्ञापन के बदले उनके लिए संकटमोचन तक का काम करते हैं. ममता बनर्जी  के समर्थ न वापस लिए जाने की खबर के बाद भारत निर्माण विज्ञापन के जरिए सरकार ने कैसे इन्हीं चैनलों पर महज 12 दिनों में करीब पौने दस करोड़ रुपये लुटाए, इसका एक नमूना है. जिसके पीछे कोई ठोस तर्क नहीं है..आज जनसत्ता में छपे इस लेख से बेहतर समझ सकते हैं. इस दस करोड़ रुपये की कहानी प्रिंट,रेडियो और दूसरे माध्यमों पर लुटाई गई राशि से अलग है. संभव है वहां ये राशि अधिक ही हो.

 
इस देश के कॉरपोरेट टेलीविजन का इस्तेमाल सामाजिक विकास की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में किस हद तक किया जा सकता है, यह बहुत संश्लिष्ट न होते हुए भी बहस का मुद्दा जरूर है। और यह मुद्दा कहीं न कहीं भारतीय टेलीविजन को लेकर बिल्बर श्रैम की दी गई उस अवधारणा के कारण है, जिसके अनुसार भारत जैसे गरीब और अशिक्षित समाज के लिए इसका उपयोग अनिवार्यतया सामाजिक सरोकार के लिए किया जाना चाहिए। नहीं तो कॉरपोरेट टेलीविजन क्या, सरकारी प्रसारण के तहत काम करने वाले टेलीविजन के संदर्भ में इतना समझने में भला किसे मुश्किल हो सकती है कि यह अपने शुरुआती दौर से ही सरोकार का मुखौटा डाल कर भीतर ही भीतर मुनाफे के एक ऐसे खेल में शामिल रहा, जिसके व्यवस्थित उद्योग की शक्ल न लेने के बावजूद एक धंधे का विस्तार हो रहा था। 

इस धंधे में जब कभी मंदी आती, वह मजबूती से सरोकार का मुखौटा पहन लेता और लाभ होने की स्थिति में उसे उपलब्धि के रूप में पेश करता। बाद में निजी टेलीविजन ने मुनाफे के इस धंधे को अपना मुख्य उद्देश्य बनाया, जबकि सरोकार और सामाजिक विकास को सरकारी प्रसारण की तरह ही मुखौटे की शक्ल में अपने से चिपकाए रखा। अगर यह खेल शुरू से ही लोगों के बीच स्पष्ट हो गया होता तो हम जैसे करोड़ों लोगों के बीच यह भ्रम शायद ही रह पाता कि टेलीविजन सामाजिक सरोकार का माध्यम है।

सरकारी प्रसारण का अपने पक्ष में जम कर प्रयोग किए जाने के बावजूद सरकार अगर निजी और कॉरपोरेट टेलीविजन चैनलों का इस्तेमाल तथाकथित सामाजिक विकास के लिए करती है तो इसका क्या आशय है, इसे समझने की जरूरत है। उसके ऐसा करने से सामाजिक जागरूकता के स्तर में किस हद तक बढ़ोतरी होती है, इस पर शायद ही कभी सर्वे या शोध कार्य उनकी तरफ से किए गए हों। लेकिन कॉरपोरेट टेलीविजन ने सरकार के हाथों एक फार्मूला जरूर पकड़ा दिया है कि इसमें जितने पैसे झोंके जाएंगे, टेलीविजन उनकी उपलब्धियों और समाज की उतनी ही चटकीली तस्वीर पेश करेगा।

सामाजिक स्तर पर भले हत्या, बलात्कार, महंगाई, भ्रष्टाचार और आए दिन सहयोगी दलों के साथ गठबंधन टूटने और खुद सरकार के गिरने का खतरा बना हो, लेकिन अंधाधुंध पैसे झोंकने की बदौलत टेलीविजन स्क्रीन पर जिस परिवेश की निर्मिति होगी, उनमें इन सबका कहीं कोई नामोनिशान नहीं होगा। उसमें वही सब कुछ होगा जैसा सरकार चाहती है या फिर उसके सपने में देश की जैसी शक्ल दिखाई देती है। टेलीविजन के इस फार्मूले के तहत सरकार की ओर से किए जाने वाले सामाजिक विकास का एक नमूना उसका ‘भारत निर्माण अभियान’ विज्ञापन है।

यहां हम सिर्फ पिछले सितंबर महीने की बात करें तो भारत निर्माण के नाम पर टेलीविजन पर सरकार ने महज बारह दिनों में करीब पौने दस करोड़ रुपए लुटाए। ये रुपए देश के निजी मनोरंजन और समाचार चैनलों पर तीन चरणों में लुटाए गए, जिसमें सिर्फ मनोरंजन चैनलों की राशि करीब छह करोड़ रुपए है।

विज्ञापन की इस राशि, टीवी चैनलों की सूची और संबंधित आंकड़ों पर गौर करें तो कई दिलचस्प तथ्य सामने आते हैं। यह भी कि दूरदर्शन पर जो भारत निर्माण हो रहा था, उसकी राशि क्या थी? क्या प्रसार भारती जैसी स्वायत्त संस्था के तहत काम करने वाले दूरदर्शन के सभी चैनल अब भी सरकार की सेवा में लगे हैं या फिर प्रसार भारती के घाटे की भरपाई के लिए करोड़ों रुपए की जो राशि सरकार की ओर से दी जाती है, संकटकाल में उसी में ऐसे विज्ञापनों के दिखाए जाने का करार हो जाता है और व्यावसायिक दृष्टि से अलग से कोई हिसाब-किताब नहीं रखा जाता?

दूसरा कि निजी समाचार चैनलों पर सरकारी या चुनावी विज्ञापनों को देखते ही आम दर्शक अंदाजा लगाने की कोशिश करता है कि सरकार या राजनीतिक पार्टी विज्ञापन के जरिए इन पर प्रसारित खबरों को अपने तरीके से प्रभावित करना चाहती है। यह काफी हद तक सही भी है। नहीं तो जिस दौरान ये विज्ञापन दिए गए, ममता बनर्जी के समर्थन वापस लिए जाने की खबर विस्तार पाने के बजाय कपूर की तरह टीवी चैनलों से कैसे उड़ जाती या डीएलएफ, राबर्ट वडरा मामले में लंबे समय तक चैनलों की चुप्पी क्यों बनी रहती? 
मगर इन विश्लेषणों से कहीं ज्यादा दिलचस्प है कि सरकार ने ‘भारत निर्माण’ पर समाचार चैनलों के मुकाबले मनोरंजन चैनलों पर लगभग तिगुनी रकम लुटाई, जबकि इन चैनलों को सामग्री के स्तर पर सरकार के मुताबिक किसी भी तरह के फेरबदल नहीं करने पड़े। इनमें वे स्त्री-विरोधी, दहेज प्रथा समर्थक, वस्तु आधारित समाज से जुड़े टीवी धारावाहिक प्रसारित करते रहे, जो कि उनके एजेंडे में शामिल है। इसका मतलब है कि समाचार चैनलों के मुकाबले मनोरंजन चैनलों को सरकार की ओर से कहीं ज्यादा विज्ञापन राशि मिलती है, लेकिन उन्हें समाचार चैनलों की तरह सामग्री बदलने की जहमत नहीं उठानी पड़ती। 

तीसरी बात कि सरकार यह मानती है कि इस देश का टेलीविजन जिस टीआरपी व्यवस्था पर काम कर रहा है, उसमें पारदर्शिता नहीं है। पिछले दिनों सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने इसे मुद्दा भी बनाया, इस पद्धति के बदलने की बात भी की गई। यहां तक कि बाद में (26 जुलाई को) निजी चैनल एनडीटीवी की ओर से टीआरपी की मूल कंपनी निल्सन पर न्यूयार्क की एक अदालत में मामला भी दर्ज कराया गया कि गलत ढंग से और आंकड़े के साथ छेड़छाड़ करके पेश किए जाने   से उसे पिछले आठ सालों में करीब इक्यासी करोड़ अमेरिकी डॉलर का नुकसान हुआ है। 

मगर इन सबके बावजूद सरकार ने भारत निर्माण के विज्ञापन लिए चैनलों को जिस तरीके से राशि का निर्धारण किया, उसे देखते हुए लगता है कि उसने भी उसी गैर-भरोसेमंद टीआरपी को आधार बनाया, जिसके हटाने की बात वह करती आई है। नहीं तो जिस विज्ञापन के लिए स्टार प्लस को महज तीन दिन के लिए एक करोड़ इकतीस लाख पंचानबे हजार चार सौ चालीस रुपए तय किया, उसी विज्ञापन के लिए जीटीवी को महज उन्यासी लाख उनतीस हजार तीन सौ साठ रुपए क्यों? या फिर जिन तीन दिनों के विज्ञापन के लिए इंडिया टीवी को दस लाख सत्ताईस हजार तीन सौ पचास रुपए दिए गए, उसी के लिए एनडीटीवी को पांच लाख अस्सी हजार दो सौ तीस रुपए क्यों? 

इसमें एक और दिलचस्प मामला है कि इस विज्ञापन की सूची में ऐसे-ऐसे चैनल शामिल हैं, जिन्हें इसके लिए दस से बारह हजार रुपए दिए गए। ये चैनल टीआरपी की सूची में कहीं नहीं आते, न तो उनकी लोकप्रियता है और न ही सही दृश्यता। ऐसे चैनलों की राशि निर्धारण के पीछे टीआरपी के अलावा कौन-सी पद्धति अपनाई गई, यह समझ से परे है।

साथ ही ऐसे दो चैनलों के बीच राशि का जो फर्क किया गया, उसका आधार क्या रहा, इसे भी समझना मुश्किल है। शायद ऐसे ही चैनलों से निजात पाने के लिए सरकार सेटटॉप बॉक्स लगाने के लिए अलग से करोड़ों रुपए के विज्ञापन करवा रही है। 
2009 के लोकसभा में पेड न्यूज की घटनाओं के बाद सरकार इसके प्रति लगातार गंभीर दिखने की कोशिश करती रही है। यहां तक कि चुनाव आयोग के अलावा मंत्री-समूह का गठन किया गया है, ताकि मीडिया की जेब गरम करके अपने पक्ष में खबरें छपवाने पर रोक लगे। यह अलग बात है कि जनवरी में पंजाब विधानसभा चुनाव में पेड न्यूज का जो खुला खेल चला, उससे सारे दावे और प्रयास धरे के धरे रह गए। लेकिन इस तरह महज बारह दिनों में नौ-दस करोड़ रुपए उस विज्ञापन पर खर्च किए जाते हैं, जिसका संबंध किसी बीमारी या कुप्रथा पर रोकथाम या किसी दूसरे जागरूकता अभियान से नहीं है। वह शुद्ध रूप से सरकार का महिमा गान है, छोटे परदे पर गिनाई गई वे उपलब्धियां हैं, जिनका वास्तविकता से शायद ही संबंध हो। 

तो क्या समझा जाए कि 2014 के लोकसभा चुनाव को लेकर बाकी राजनीतिक पार्टियां बाद में सक्रिय होंगी! मगर सत्ताधारी पार्टी के पेड न्यूज का खेल साल-दर-साल चलता रहता है और इसके लिए उसने भारत निर्माण जैसे चोर दरवाजे खोल रखे हैं। ऐसे ही चोर दरवाजों से आवाजाही कॉरपोरेट टेलीविजन और सरकार को अपनी-अपनी जगह पर टिकाए रखती है। ऐसे में भारत का तो पता नहीं, चैनलों का निर्माण जारी रहता है।

विनीत कुमार, जनसत्ता 14 अक्टूबर, 2012:
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2 Response to 'पेड न्यूज का चोर दरवाजाः भारत सरकार का भारत निर्माण'
  1. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/10/blog-post_14.html?showComment=1350263859094#c311267201576853055'> 15 अक्तूबर 2012 को 6:47 am

    तीन दिन के विज्ञापन के तीन करोड़, पांच करोड़! क्या बात है।

     

  2. Vikas Gupta विकास गुप्ता
    http://taanabaana.blogspot.com/2012/10/blog-post_14.html?showComment=1350328258094#c7197759707783968271'> 16 अक्तूबर 2012 को 12:40 am

    इस दुनिया में तो सब कुछ बिकाउ है ।

     

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