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जाहिर है जब सिनेमा के शीर्षक में ही सेक्स शब्द जुड़ा हुआ हो तो उसके भीतर की कहानी आध्यात्म की नहीं होगी। लेकिन ये भी है कि फिल्म LSD(लव,सेक्स,धोखा)सिर्फ और सिर्फ सेक्स की कहानी नहीं है और न ही अब तक की हिन्दी सिनेमा की ग्रामेटलॉजी पर बनी प्यार और धोखे की कहानी है। प्रोमोज के फुटेज से कहीं ज्यादा इन तीनों शब्दों ने फिल्म के प्रोमोशन के फेवर में काम किया हो लेकिन अगर सामान्य ऑडिएंस इन तीनों शब्दों के लालच में आकर फिल्म देखने जाती है तो संभव है कि उन्हें निराश होना पड़े। ले-देकर सुपर मार्केट के सीसीटीवी कंट्रोल रुम की करीब 40-45 सेकंड की सीन है जो फिल्म शीर्षक में जुड़े सेक्स शब्द को सीधे तौर पर जस्टीफाई करती है जहां आदर्श(राजकुमार यादव) और रश्मि(नेहा चौहान)को सेक्स करते हुए दिखाया गया है,सीन का एक बड़ा हिस्सा ब्लर किया हुआ है। इंटरनेट पर आवाजाही करनेवाले लोगों के लिए ये सीन कोई अजूबा नहीं है। हां ये जरुरी है कि फिल्म के भीतर कई ऐसे मौके और घटनाएं हैं जहां कभी प्यार तो कभी धोखा की लेबलिंग में सेक्स एम्बीएंस पैदा करने की मजबूत कोशिशें हैं। लेकिन इस पकड़ने के लिए बारीक नजर और गहरी समझ की जरुरत पड़ती है जो सामान्य ऑडिएंस के लिए मेहनत का काम लगे।

इस सिनेमा की खासियत है कि सिर्फ नाम से ही एक धारणा बन जाती है कि फिल्म के भीतर क्या होगा,नाम और पोस्टर देखकर ही थिएटर के बाहर ही हम फाइनल एंड तक पहुंच जाते हैं कि फिल्म की कहानी क्या होगी। लेकिन दिलचस्प है कि फिल्म देखते हुए धारणा एकदम से टूटती है। अंत क्या कुछ मिनटों बाद समझ आ जाता है कि इन तीनों शब्दों में दिलचस्पी लेनेवाले लोगों के लिए ये फिल्म लगभग धोखे जैसा साबित होती है जबकि जो लोग इन तीन शब्दों को अछूत और'हमारी फैमिली अलाउ नहीं करेगी' मूल्यों को ढोते हुए इसे नहीं देखते हैं तो समझिए कि उन्होंने एक 'रिच फिल्म'को मिस कर दिया। खालिस मनोरंजन और ऑडिएंस की हैसियत से थोड़ा हटकर अगर आप फिल्म और मीडिया स्टूडेंट की हैसियत से इस फिल्म को देख पाते हैं तो ये आपकी सिनेमा की समझ को रिडिफाइन करने के काम जरुर आएगी।

सिनेमा बनानेवालों ने जिस तरह से बॉक्स ऑफिस,कमाई,मार्केटिंग,पॉपुलरिटी आदि मानकों को ध्यान में रखकर सिनेमा का एक फार्मूला गढ़ लिया है,कमोवेश उन तमाम सिनेमा को देखते हुए ऑडिएंस ने भी सिनेमा के भीतर से मनोरंजन हासिल करने का एक चालू फार्मूला गढ़ लिया है। ये फार्मूला कई बार तो बहुत ही साफ तौर पर दिखाई देता है लेकिन कई बार सबकॉन्शस तरीके से। इसलिए LSD के बारे में ये कहा जाए कि इसने बने-बनाए हिन्दी सिनेमा के फार्मूले को तोड़ने की कोशिश की है तो ऐसा कहना उतना ही सही होगा कि इस सिनेमा को देखते हुए ऑडिएंस के मनोरंजन हासिल करने का फार्मूला भी टूटता है। जिस तरह से फिल्म शुरु होते ही घोषणा कर दी जाती है कि इसमें वो सबकुछ नहीं है जो कि बाकी के सिनेमा शुरु से देखते आए हैं और न ही ये उन फिल्मों की उस अभ्यस्त ऑडिएंस के लिए हैं। अगर आप नैतिकता, फैमिली इन्टरटेन्मेंट,ढिंचिक-ढिंचिक गानों की मुराद लेकर इस फिल्म को देखने जाते हैं तो आपकी सलाह है कि घर पर रहकर आराम कीजिए। हिम्मत जुटाकर लव और धोखे की कहानी देखने जाना चाहते हैं तो भी रहने दीजिए। अगर सेक्स के लोभ में जा रहे हैं तो वही 40-45 सेकंड की सीन है जिसके लिए आप इतनी मशक्कत क्यों करेंगे? आप इस फिल्म को तभी देखने जाइए जब आप फिल्म देखने के तरीके और बनी-बनायी आदत को छोड़ना चाहते हैं,आपको सिनेमा के नयापन के साथ-साथ इस बात में भी दिलचस्पी है कि 'हाउ टू वाच सिनेमा?'

सिनेमा की कंटेट पर बात करें तो नया कुछ भी नहीं है। तीन कहानी है और ये तीनों कहानियों से सिनेमा तो सिनेमा हिन्दी के टीवी सीरियल अटे पड़े हैं। पहली कहानी फिल्म स्कूल के एक स्टूडेंट राहुल(अंशुमन झा)की है जो डिप्लोमा के लिए आदित्य चोपड़ा और दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे से प्रेरित होकर एक फिल्म बनाना चाहता है और इसी क्रम में उसे श्रुति(श्रुति) से अफेयर हो जाता है। श्रुति को पाने के लिए वो उसकी फैमिली तक एप्रोच करता है, अपने सिनेमा की सिक्वेंस में उसके बाप की मर्जी से रद्दोबदल करता है और बाप को भी उसमें शामिल करता है। श्रुति की शादी तय हो जाने की स्थिति में दोनों भागकर शादी कर लेते हैं। बाद में श्रुति का बाप दोनों को कॉन्फीडेंस में लेकर वापस अपने घर बुलाता है लेकिन रास्ते में ही उसकी शह पर उसका भाई दोनों के टुकड़े-टुकड़े करके दफना देता है। राहुल और श्रुति का बैग्ग्राउंड अलग है और इस फिल्म को देखते हुए हमें डीयू में हुई ऐसी ही एक घटना की याद आती है। दूसरी कहानी सुपर मार्केट की है जहां सुरक्षा के नाम पर लगे सीसीटीवी कैमरे के फुटेज को चैनलों के हाथों बेचा जाता है,उससे ब्लैकमेलिंग की जाती है। यही रश्मि और आदर्श के बीच अफेयर होता है और उसी सीसीटीवी कंट्रोल रुम में रश्मि अपनी दोस्त श्रुति की मौत की खबर सुनकर हाइपर इमोशनल होती है और आदर्श के साथ सेक्स के स्तर पर जुड़ती है। यहां पर आकर फिल्म का ट्रीटमेंट जरुर नया है। आदर्श इस पूरे सीन को एमएमएस का रुप दे रहा होता है जो कि बाद में इन्टरनेट पर सुपरमार्केट स्कैंडल के नाम से देखा जाता है।..और तीसरी कहानी टीवी जर्नलिस्ट प्रभात(अमित सियाल)और उसका सहारा लेकर मीडिया के भीतर स्टिंग ऑपरेशन को लेकर की जानेवाली तिकड़मों को लेकर है। प्रभात संजीदा टीवी पत्रकार है और वो प्रोफेशन की शर्तों के बीच भी इंसानियत को बचाए रखना चाहता है। इस क्रम में वो मेरठ में नंगी लड़की की तस्वीर नहीं दिखा पाता है और अपनी बॉस से जब-तब ताने सुनता है। वो कास्टिंग काउच की शिकार डांसर मृगनयना/नैना विश्वास(आर्य बनर्जी)को सुसाइड करने से बचाता है। प्रभात के स्टिंग ऑपरेशन से देश की सरकार गिर चुकी है और जो कहानी वो सिनेमा में बताता है वो तहलका की कहानी के करीब है। तहलका को स्टिंग ऑपरेशन का ब्रांड के तौर पर स्थापित किया जाता है। इसी क्रम में वो नैना का बदला लेने के लिए पॉप स्टार लॉकी लोकल(हेनरी टेंगड़ी)का स्टिंग ऑपरेशन करता है। इस हिस्से में मीडिया की जो छवि बनायी गयी है वो फिल्म 'रण'में पहले से मौजूद है। सुपर मार्केट पर जो स्टोरी है वो दरअसल मधुर भंडारकर की एप्रोच का ही विस्तार है जो सिटी स्पेस में नए-नए प्रोफेशन के बीच के खोखलेपन को समेटती है। इसलिए ये फिल्म कंटेंट के स्तर पर अलग और बेहतर होने के बजाय ट्रीटमेंट के स्तर पर ज्यादा अलग है। सिनेमा के तीनों शब्द एक क्रम में अपनी थीसिस पूरी न करके वलय बनाते हैं और कहानी एक जगह सिमटकर आ जाती है। कहानी फिर वहां से अलग-अलग हिस्सों में बिखरती है इसलिए ये सीधे-सीधे फ्लैशबैक में न जाकर रिवर्स,फार्वर्ड में चलती है जो कि हम अक्सर काउंटर नोट करते हुए करते हैं। हां ये जरुर है कि डायलॉग डिलिवरी में कहीं कहीं ओए लक्की लक्की ओए का असर साफ दिखता है।

अव्वल तो ये कि फिल्म को देखते हुए कहीं से नहीं लगता कि हम वाकई कोई फिल्म दे रहे हैं। स्क्रीन पर कैमरे का काउंटर लगातार चलता है,एक तरफ बैटरी का सिबंल है और ठीक उसके नीचे सिकार्डिंग और लाइट स्टेटस। जिन लोगों ने मीडिया में काम किया है उन्हें महसूस होगा कि वो पूरे रॉ शूट से काम के फुटेज का काउंटर नोट करने के लिए वीटीआर में टेप को तेजी से भगा रहे हैं। श्रुति,रश्मि और नैना की कहानी को देखते हुए आपके मुंह से अचानक से निकल पड़ेगा- अरे,ऐसा ही तो होता है,यही तो हमने वहां नोएडा में भी देखा था। फुटेज का जो कच्चापन है जिसमें कि कई बार कुछ भी स्टैब्लिश नहीं होता लेकिन दिखाया जाता है वो संभव है कई बार असंतोष पैदा करे कि इतना तो हम भी कर लेते हैं,इसमें नया क्या है? लेकिन यही से सिनेमा के डीप सेंस पैदा होते हैं। कई अखबारों और चैनलों ने तो कहा ही है कि इस फिल्म की खूबसूरती इस बात में है कि कहीं से नहीं लगता कि किसी भी कैरेक्टर ने सिनेमा के लिए अपने चरित्र को जिया है बल्कि वो स्वाभाविक रुप से ऐसै ही हैं। मुझे लगता है कि इसमें ये भी जोड़ा जाना चाहिए कि ये सिनेमा हमें रिसाइकल बिन में फेंके गए फुटेज से सिनेमा बनाने की तकनीक औऱ समझ पैदा करती है। ऐसा लगता है कि यहां वीडियो एडीटर गायब है लेकिन असर को लेकर कही भी कुछ अनुपस्थित नहीं है।
बीच-बीच में पर्दे का ब्लैक आउट हो जाना,दूरदर्शन की तरह रंगीन पट्टियों का आना,तस्वीरों का हिलना जिसमें कोई कहता है इसका सिग्नल खराब है,इसमें चोर मामू और मामू चोर दिखता है,ये सबकुछ हमें उन दिनों की तरफ वापस ले जाता है जहां से हमने सिनेमा को देखना शुरु किया,खासकर दूरदर्शन पर सिनेमा को देखना शुरु किया। इसमें दूरदर्शन की ऑडिएंस का इतिहास शामिल है। संभवतः हमलोग वो अंतिम पीढ़ी हैं जिसने कि दूरदर्शन पर धुंआधार फिल्में देखी जिसे कि LSD ने पकड़ा है,नहीं तो लगता है ये इतिहास यही थम जाएगा।

कुल मिलाकर ये फिल्म जिसमें कि न गाने हैं,न कोई शोबाजी है ऑडिएंस को 'सिनेमा लिटरेट' करने का काम करती है। एक गहरा असर छोड़ती है कि अच्छा सिनेमा को ऐसे भी दिखाया जा सकता है/अच्छा ऐसे भी देखा जा सकता है? हां ये जरुर है कि सिंगल स्क्रीन में देखनेवाली ऑडिएंस को ये सिनेमा मनोरंजन के स्तर पर निराश करे या फिर ये भी संभव है कि वो थियेटर से ये कहते हुए निकले- चालीस सेकेंड के सीन में ही पूरा पैसा वसूल हो गया,हम तो यही देखने आए थे,बाकी तो सब पहिले से देखा हुआ था। ऐसे में ये फिल्म सेक्स के नाम पर फुसफुसाहट पैदा करने से बाहर निकालती है।
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11 Response to 'ऑडिएंस को मैच्योर करनेवाली फिल्मः लव,सेक्स,धोखा'
  1. ravi pandey
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/03/blog-post_19.html?showComment=1268980878351#c2457506964513193667'> 19 मार्च 2010 को 12:11 pm

    बहुत अच्छा विश्लेषण किया है आपने , जरूर जाऊँगा इस फिल्म को देखने, क्योंकि इतना bore हो गए हैं लव triangle देख देख के , कि कोई offbeat फिल्म जैसा आप LSD को बता रहे हें देख कर कुछ शांति तो अवश्य मिलेगी

     

  2. Sanjeet Tripathi
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/03/blog-post_19.html?showComment=1268990914113#c9134897816712717594'> 19 मार्च 2010 को 2:58 pm

    aapke vishleshhan ke to kayal hain hi.
    dekhenge is film ko. pahli fursat me hi,
    aajkal to wekkly off bhi nahi mil rahe hain, workload k karan

     

  3. anjule shyam
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/03/blog-post_19.html?showComment=1268992721520#c4726513422865355260'> 19 मार्च 2010 को 3:28 pm

    ये सिनेमा हमें रिसाइकल बिन में फेंके गए फुटेज से सिनेमा बनाने की तकनीक औऱ समझ पैदा करती है।....बहुत खूब सर उम्मीद है अपने सिनेमा के नामी डिरेक्टर भी इस फिल्म को देखें और समझें की सिर्फ pase और आइटम गर्ल्स के भरोसे,,,फ़िल्में नहीं बनती...इसे बन्नने के लिए इसे जीना भी पड़ता है...ये तकनीक वे भी सीखें...

     

  4. कृष्ण मुरारी प्रसाद
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/03/blog-post_19.html?showComment=1269015511102#c8795643013551776643'> 19 मार्च 2010 को 9:48 pm

    शानदार विश्लेषण.....

     

  5. Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय)
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/03/blog-post_19.html?showComment=1269022300246#c2907382955482156175'> 19 मार्च 2010 को 11:41 pm

    दिबाकर जी के तो हम फ़ैन है ..ऊपर से अजय जी भी बडी तारीफ़ किये है इसकी..और अब आप भी एकदम डीटेल मे... कल ही देखकर आते है और बताते है कि कैसी लगी...

     

  6. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/03/blog-post_19.html?showComment=1269109218591#c6181838087937132003'> 20 मार्च 2010 को 11:50 pm

    तो यह है कहानी एलएसडी की। पिछ्ले दो तीन दिन से देख रहे थे जिसको देखो वही एलएसडी की बात कर रहा है। अब पता चला किस्सा। जय हो!

     

  7. aman 'bas aman'
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/03/blog-post_19.html?showComment=1269420660266#c6738450676899042285'> 24 मार्च 2010 को 2:21 pm

    hello bhaiya,
    aaj pahli dafa aapke blog par koi comment likh raha hun....
    vaise aapko mera nam yad hoga
    aapse delhi me mila tha main


    aur jaha tak bat hain is alekh ki to jab jab is film ke vishleshan ki bat aayegi to aapka yah alekh hamesha pratham pankti ke alekho me se ek hoga..
    aapki recycle bin wali bat sahaj aur saral hain aur 100 % sahi bhi hain.
    ek bat aur jinhone ye film nahi dekhi hain,ise padhne ke bad dekhna jarur chahenge....badhai.thnx

     

  8. aman 'bas aman'
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/03/blog-post_19.html?showComment=1269420662144#c3888128200690474516'> 24 मार्च 2010 को 2:21 pm

    hello bhaiya,
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    aapki recycle bin wali bat sahaj aur saral hain aur 100 % sahi bhi hain.
    ek bat aur jinhone ye film nahi dekhi hain,ise padhne ke bad dekhna jarur chahenge....badhai.thnx

     

  9. aman 'bas aman'
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/03/blog-post_19.html?showComment=1269420665380#c3036859732699537269'> 24 मार्च 2010 को 2:21 pm

    hello bhaiya,
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    ek bat aur jinhone ye film nahi dekhi hain,ise padhne ke bad dekhna jarur chahenge....badhai.thnx

     

  10. aman 'bas aman'
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/03/blog-post_19.html?showComment=1269420755770#c4749869420596279327'> 24 मार्च 2010 को 2:22 pm

    hello bhaiya,
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    vaise aapko mera nam yad hoga
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    aur jaha tak bat hain is alekh ki to jab jab is film ke vishleshan ki bat aayegi to aapka yah alekh hamesha pratham pankti ke alekho me se ek hoga..
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    ek bat aur jinhone ye film nahi dekhi hain,ise padhne ke bad dekhna jarur chahenge....badhai.thnx

     

  11. prakashmehta
    http://taanabaana.blogspot.com/2010/03/blog-post_19.html?showComment=1269824415700#c196737956675920724'> 29 मार्च 2010 को 6:30 am

    DIBEKAR SHOULD HAVE NOT NAMED THIS FILM LSD , HE MISSED MANY AUDIANCE BY DOING THIS,

     

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