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रिसर्च करो, हम तुम्हारे साथ हैं

Posted On 9:11 am by विनीत कुमार |

आपको याद होगा, आपके दोस्त या फिर खुद आप ही जब एम.फिल्.या फिर पीएच.डी. कर रहे होते थे, तो आज से एक साल पहले तक समर्थन के नाम पर कोई नहीं होता था, कुछ नहीं होता था...घिसते-पिटते गुरुजी के रहमो-करम पर कहीं कुछ पढ़ाने को मिल गया सो मिल गया। बाकी कहीं कोई हिसाब नहीं बना तो रह गए। अगर आप मुझ जैसे फैमिली से आते हैं जहां का सूत्र वाक्य है- पैसे जितना चाहिए ले लो लेकिन अक्ल मत मागों और हां ये तुम्हारा मामला कब तक निपट जाएगा। मतलब कि कब तक घर में माल आने लगेगा। अब कौन समझाए कि एम.फिल्. करने और माल आने से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है।...अगर सचमुच आपके साथ यही स्थिति रही होगी तो आप रिसर्च के साथ जरुर कई दूसरे काम किए होंगे या फिर करना चाहते होंगे..क्योंकि घर में भी जबाब देना पड़ता है भई...नहीं तो एक दिन घरवाले ही जबाब दे देंगे। खैर अब आपको रिसर्च के दौरान इस तरह की माथा-पच्ची नहीं करनी होगी।
हमारी सरकार चाहती है कि देश के विश्वविद्धालयों में हो रहे रिसर्च की क्वालिटी में सुधार हो और इसके लिए जरुरी है कि रिसर्चर को कुछ आर्थिक सुविधाएं मिले। बात भी सही है कि आप कविता तो लिख नहीं रहें हैं कि भूखे रहकर कई दिनों तक चूल्हा रोया जैसा कुछ लिख लेंगे। आप रिसर्च कर रहे हैं यानि एक तरह से मानव संसाधन खड़ी कर रहे हैं।...और ऐसे में आपको दिमागी स्तर पर उन्नत होने के साथ-साथ पेट के स्तर भी संतुष्ट रहना होगा। और सरकार की तरफ से कुछ बजीफा मिल जाने से कम से कम भूख के स्तर पर नहीं लड़ना होगा।....आपके भीतर एक ही साथ कई अच्छे भाव आ जाएंगे। आत्मसंतोष, आत्मसम्मान और सरकार के प्रति श्रद्धा कि चलो अबकि जो सरकार आई हैं वो कम से कम हम रिसर्चर की बदहाली से वाकिफ है...भले ही उसने कभी खुद रिसर्च का बीड़ा नहीं उठाया हो। तो अब जो देश में रिसर्चर की जमात पैदा होगी वो बेरोजगारों की फौज नहीं होगी बल्कि सम्पन्न(जब तक रिसर्च कर रहे हैं तब तक) रिसर्चर की खेप तैयार होगी। ये अलग मसला है कि सरकार इस खेप का क्या करेगी और इतने रुपये लगाकर कराए गए रिसर्च का क्या होगा।....आप सीना तानकर कह सकेंगे कि दिन थोड़े ही काट रहे हैं, सरकार पैसे दे रही है और हम काम कर रहे हैं। अपने को बेकार समझने का बोध जाता रहेगा और सिस्टम के प्रति अनुराग भी पैदा होगा। सरकार के लिए ये दोनों बातें अच्छी रहेगी। और वैसे भी अगर देश का नौजवान खुश है और सरकार को आत्महत्या और धरना प्रदर्शन की धमकियां नहीं दे रहा है तो फिर कहीं कोई परेशानी ही नहीं है।...और जहां तक सवाल बीच-बीच में विश्वविद्धालय में हंगामा मचाने का है तो फिर गाइड किस दिन काम आएंगे।....उनसे हर दो-तीन महीने में लिखवाकर देना होगा कि वे आपके काम से खुश हैं...एक तरह से ये जानने की कोशिश की बंदा कहीं सरकार यानि मेरे खिलाफ तो नहीं जा रहा। अब आप ही बताइए कि सरकार के वजीफे से इतनी तरह की समस्याओं का हल निकल आता है तो फिर दिक्कत कहां से है।...अब बात रह गयी माल के लिए दौड़ने की।...तो बीच-बीच में आपको एहसास होगा या कराया जाएगा कि आप स्कॉलरशिप के लिए नहीं बल्कि वृद्धा पेंशन के लिए दौड़ रहे हैं। भई तो इसमें बुरा माननेवाली कौन-सी बात है, आप एम.फिल्, पीएच.डी. कर रहे हो विश्वविद्धालय के हिसाब से बूढ़ तो हो ही गए और जब तुम्हारे अब्बू और नानी को दौड़ने में परेशानी नहीं होती और शर्म नहीं आती तो तुम्हारी तो अभी दौड़-भाग करने की उम्र ही है और फिर शर्म करोगे तो लेक्चरर किस मुंह से बनोगे।
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3 Response to 'रिसर्च करो, हम तुम्हारे साथ हैं'
  1. हफ्तावार
    http://taanabaana.blogspot.com/2007/09/blog-post_26.html?showComment=1190871480000#c4801555446106896105'> 27 सितंबर 2007 को 11:08 am

    बढिया लिखा. और लिखिए, यह मसला थोड़े और विस्तार की मांग करता है.

     

  2. meenu
    http://taanabaana.blogspot.com/2007/09/blog-post_26.html?showComment=1190989320000#c8177134813093947868'> 28 सितंबर 2007 को 7:52 pm

    U Know vinit it's very appreciable work but don't u think financial dependency is must 4 us.
    kirti jain

     

  3. kaminee
    http://taanabaana.blogspot.com/2007/09/blog-post_26.html?showComment=1191219360000#c7181253634699776223'> 1 अक्तूबर 2007 को 11:46 am

    Research demands full devotion n 4 it a reseachr shud always b free mentally n 4 it govnmnt has taken a step.Now there shud b a gd research n this is the responsblity of teachers.they shudn't b biased. This economic independency will help up to sm extent surely bt it will surely bring sm other problm s.

     

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