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मुन्नवर राणा साहब ! न्यूज चैनल के टीआरपी के बताशे बनानेवाले लोग आपकी शायरी, मुशायरा के लिए कम सास-बहू सीरियल के मेलोड्रामा पैदा करने की ताकत रखने के लिए ज्यादा याद रखेंगे..आपको शायद यकीं न हो लेकिन आपने पिछले चार-पांच दिनों में न्यूज चैनलों पर जो कुछ भी जिस अंदाज में कहा वो न्यूज चैनलों की डीएनए से हूबहू मेल खाते हैं.
चैनल के जिन चेहरे ने साहित्य को बासी और उबाऊ चीज मानकर आज से दस साल पहले ही चलता कर दिया वो हैरत में पड़े होंगे कि इसमे भी ऐसे-ऐसे शख्स मौजूद हैं जो कॉमेडी सर्कस से लेकर सास-बहू और साजिश जैसा मजा पैदा कर सकते हैं..आपका रोना सच्चा हो सकता है, जार-जार रोईए, देश की बर्बादी के आंसू इतनी जल्दी वैसे भी थमने नहीं चाहिए लेकिन चैनलों के हाथ खुद को टप्पू के पापा टाइप का चरित्र बनने से न भी रोक पाते हों तो कम से कम साहित्य को कॉमेडी सर्कस मत बनने दीजिए..आप बड़े शायर हैं लेकिन आप अकेले साहित्य की दुनिया के सिरमौर नहीं हैं. कभी तो न्यूजरूम के अलावा अकेले में भी बैठकर रोईए..रोते हुए आप महसूस करेंगे कि चैनलों पर रोने से दुनिया हंसती है, अकेले बैठकर रोने से मन हल्का होता है.
ये देश जिस दौर से गुजर रहा है उसमे आपके आंसू से कहीं ज्यादा उस व्यवस्था के प्रति कठोरता से जूझने, प्रतिरोध करने की जरूरत है जिससे इस बात की ठीक-ठीक समझ बन सके कि लेखक कभी हमारे खित्ते का नहीं हो सकता..वो कई बार खुद के खित्ते के खिलाफ जाकर भी लेखकीय धर्म को बचा ले जाता है.
क्या ये अकारण तो नहीं है कि जिस साहित्य अकादमी पुरस्कार को आपके पहले दर्जनों लेखकों ने लौटा दिए, आज टीवी स्क्रीन पर कहीं नहीं है..इसकी वजह आप भी जानते हैं.. वो अपनी बात रखना जानते हैं.बातों से तमाशे का मजा देने का हुनर नहीं आता. कुदरत ने ये हुनर आपको बख्शा है, इसे सहेजकर रखिए..चैनल से इसके लिए अनुबंध कीजिए..इसी काम के लिए बाकी के प्रोडक्शन हाउस लाखों ले लेते हैं. 
आपसे ये एंकर सवाल की शक्ल में दनादन गोली दाग रहे हैं, आप पलटकर इनसे कभी क्यों नहीं पूछते कि मैंने अपने साहित्य में जिस हिन्दुस्तान की कल्पना की है, आपने कभी अपने चैनल के जरिए कोई ऐसी कल्पना की है..हमारे लेखक साहित्य में जिस हिन्दुस्तान को दर्ज करते हैं क्या आप भी कर सकते हैं ? आपके चैनल पर समाज का सिर्फ सत्ता संस्करण क्यों मौजूद है ?
आपके लिखे से गुजरकर हम जैसे लाखों पाठकों की आंखों में आंसू छलक जाते हैं लेकिन जब टीवी पर आपकी आंखों में आंसू छलकते हैं तो वो चैनलों के प्रोमो मटीरियल बनकर रह जाते हैं..अपने सच्चे आंसू को टीआरपी के बताशे में मत बदलने दीजिए प्लीज.
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1 Response to 'अपने आंसू को टीअारपी के बताशे मत बनने दीजिए मुन्नवर राणा साहब !'
  1. Jaya Karki
    http://taanabaana.blogspot.com/2015/10/blog-post_0.html?showComment=1446099176673#c5141318919350051480'> 29 अक्तूबर 2015 को 11:42 am

    Munawar ji ka karya to saraniya tha lekin dusara din PM Modi se milne ka baad award waapas lene jaisa baat bhi aaraha hai yeh to bahut sasti lokpriyata ka propoganda bangaya hai.

     

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